सिंधी सहकारी संस्था
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
संचालकों की मनमानी के कारण बेदखल किए गए 671 सदस्यों के मंसूबों पर उपायुक्त सहकारिता के.पाटनकर ने पानी फेर दिया है। पाटनकर ने संचालकों द्वारा लिए गए बेदखली के फैसले के खिलाफ आई आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि जो अध्यक्ष ने किया हम तो वही मानेंगे। आपको आपत्ति लेना है तो अब कोर्ट में जाएं। इसीलिए नाराज सदस्यों ने कोर्ट जाने का मन बना लिया है।
संस्थाध्यक्ष प्रकाश लालवानी और उपाध्यक्ष सरिता मंगवानी के साथ अन्य संचालकों ने ऋृण न लेने के कारण 671 सदस्यों को संस्था से बाहर कर दिया। आगामी चुनाव में यह सदस्य मतदान नहीं कर सकते। संचालकों की इसी मनमानी को संचालक मंडल के सदस्य अनिल फतेहचंदानी व अन्य सदस्यों ने उपायुक्त सहकारिता के.पाटनकर के समक्ष चुनौती दी थी। हालांकि लालवानी बंधुओं के घर-आॅफिस में हुई बैठक के बाद पाटनकर ने आपत्तियां खारिज कर दी।
विभाग की दलील
सदस्यों को बेदखल करने का निर्णय संचालक मंडल का है। हमने उसी लिस्ट को फाइनल किया है जो अध्यक्ष ने हमें सौंपी थी। वैसे भी माले में भोपाल से ही रजिस्ट्रीकरण अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। यह सही है कि 2012 में ऋृणी व अऋृणी दोनों श्रेणी के सदस्यों ने मतदान किया था और यदि उस व्यवस्था में कोई बदलवा किया तो उसकी जानकारी एजीएम के माध्यम से सभी सदस्यों के समक्ष रखी जाना थी। बहरहाल, हम मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते।
क्यों उठे सवाल?
2012 से पहले भी अऋृणी के चुनाव न लड़ने का नियम था। 2012 में इसे सिथिल करते हुए ऋृणी और अऋृणी दोनों श्रेणी के सदस्यों को मतदान की पात्रता दी गई। तभी संचालक मंडल चुना भी गया। चुनने के बाद 2013 में बिना किसी चुनावी अवसर के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष ने नियम बदलकर अऋृणी सदस्यों से मतदान की पात्रता छीन ली। मतलब अपनी सहुलियत के हिसाब से नियम बनाओ, काम निकल जाए तो सहुलियत के लिहाज से बदल भी लो।
तो न्याय मिलता भी कैसे?
पूरे मामले में संचालक मंडल को सहकारिता विभाग का श्रेय प्राप्त है। तभी तो शुरू से संस्था का आॅडिट करते आए आनंद खत्री को ही रजिस्ट्रीकरण अधिकारी बना दिया गया।
संस्था से बेदखल किए गए सदस्यों की जानकारी रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को डीआर/जेआर को देना थी। तीन दिन या पांच दिन का वक्त आपत्ति बुलाने के लिए तय करना था। ताकि सदस्य ऋृण लेकर सदस्यता बरराकर रख सकें। ऐसा कुछ भी नहीं किया गया।
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
संचालकों की मनमानी के कारण बेदखल किए गए 671 सदस्यों के मंसूबों पर उपायुक्त सहकारिता के.पाटनकर ने पानी फेर दिया है। पाटनकर ने संचालकों द्वारा लिए गए बेदखली के फैसले के खिलाफ आई आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि जो अध्यक्ष ने किया हम तो वही मानेंगे। आपको आपत्ति लेना है तो अब कोर्ट में जाएं। इसीलिए नाराज सदस्यों ने कोर्ट जाने का मन बना लिया है।
संस्थाध्यक्ष प्रकाश लालवानी और उपाध्यक्ष सरिता मंगवानी के साथ अन्य संचालकों ने ऋृण न लेने के कारण 671 सदस्यों को संस्था से बाहर कर दिया। आगामी चुनाव में यह सदस्य मतदान नहीं कर सकते। संचालकों की इसी मनमानी को संचालक मंडल के सदस्य अनिल फतेहचंदानी व अन्य सदस्यों ने उपायुक्त सहकारिता के.पाटनकर के समक्ष चुनौती दी थी। हालांकि लालवानी बंधुओं के घर-आॅफिस में हुई बैठक के बाद पाटनकर ने आपत्तियां खारिज कर दी।
विभाग की दलील
सदस्यों को बेदखल करने का निर्णय संचालक मंडल का है। हमने उसी लिस्ट को फाइनल किया है जो अध्यक्ष ने हमें सौंपी थी। वैसे भी माले में भोपाल से ही रजिस्ट्रीकरण अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। यह सही है कि 2012 में ऋृणी व अऋृणी दोनों श्रेणी के सदस्यों ने मतदान किया था और यदि उस व्यवस्था में कोई बदलवा किया तो उसकी जानकारी एजीएम के माध्यम से सभी सदस्यों के समक्ष रखी जाना थी। बहरहाल, हम मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते।
क्यों उठे सवाल?
2012 से पहले भी अऋृणी के चुनाव न लड़ने का नियम था। 2012 में इसे सिथिल करते हुए ऋृणी और अऋृणी दोनों श्रेणी के सदस्यों को मतदान की पात्रता दी गई। तभी संचालक मंडल चुना भी गया। चुनने के बाद 2013 में बिना किसी चुनावी अवसर के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष ने नियम बदलकर अऋृणी सदस्यों से मतदान की पात्रता छीन ली। मतलब अपनी सहुलियत के हिसाब से नियम बनाओ, काम निकल जाए तो सहुलियत के लिहाज से बदल भी लो।
तो न्याय मिलता भी कैसे?
पूरे मामले में संचालक मंडल को सहकारिता विभाग का श्रेय प्राप्त है। तभी तो शुरू से संस्था का आॅडिट करते आए आनंद खत्री को ही रजिस्ट्रीकरण अधिकारी बना दिया गया।
संस्था से बेदखल किए गए सदस्यों की जानकारी रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को डीआर/जेआर को देना थी। तीन दिन या पांच दिन का वक्त आपत्ति बुलाने के लिए तय करना था। ताकि सदस्य ऋृण लेकर सदस्यता बरराकर रख सकें। ऐसा कुछ भी नहीं किया गया।
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