Wednesday, January 18, 2017

57.12 करोड़ में थमाया ‘165’ के हवाई विकास का ठेका

प्राधिकरण का कारनामा
वर्कआर्डर के बाद मुआवजे के लिए आज तक चक्कर काट रही है कंपनी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
स्कीम-165 के नाम पर इंदौर विकास प्राधिकरण अब तक हवा में तीर छोड़ते आया है। किसानों से जमीन लेकर स्कीम के खांके को मैदानी रूप देने में पूरी तरह नाकाम रहे प्राधिकरण के हवाहवाई पदाधिकारियों ने बगैर जमीन के ही 24 महीनों की समयसीमा के साथ 57.12 करोड़ की सड़कें बनाने का ठेका दे डाला। ठेका लिया पीडी अग्रवाल ने, बिना जमीन के ठेका देने के मामले में प्राधिकरण पर से मुआवजा क्लेम कर रहे हें।
प्राधिकरण ने स्कीम के बायपास से लगे हिस्से के डेवलपमेंट के लिए 14 दिसंबर 2011 को टेंडर जारी किए थे। 13 जनवरी 2012 तक कंपनियों द्वारा टेंडर डाले गए। टेंडर कॉस्ट थी 52 करोड़, 49 लाख 32 हजार 800 रुपए। टेक्नीकल और फाइनेंशियल नेगोसिएशन के बाद 8 प्रतिशत अधिक दर में पीडी अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर, 6 जॉय बिल्डर कॉलोनी को 10 मई 2012 को वर्क आॅर्डर दे दिया। 5.06 करोड़ की बैंक गारंटी देने के बाद जब कंपनी मौके पर काम करने पहुंची तो पता चला कि जिस प्राधिकरण ने वर्कआॅर्डर जारी किया है जमीन उसके नाम है ही नहीं। बहरहाल, कंपनी तीन साल से मुआवजा मांग रही है लेकिन प्राधिकरण है कि सुनने को तैयार ही नहीं है।
भू-अर्जन अवार्ड वर्कआर्डर के ढ़ाई साल बाद जारी हुआ
प्राधिकरण ने टेंडर निकाले थे दिसंबर 2011 में और वर्कआॅर्डर दिया था मई 2012 में जबकि जमीन के अधिग्रहण के लिए कलेक्टर इंदौर ने अवार्ड पारित (प्रकरण : 01अ82/11-12) किया था 14 नवंबर 2014 को। 40.318 हेक्टेयर जमीन के लिए जारी 119,72,138,20 रुपए का यह अवार्ड पहला था लेकिन इसके बाद कोई अवार्ड पारित नहीं हो सके। तीन महीने में प्राधिकरण को कोर्ट में पैसा भरकर जमीन का कब्जा लेना थी लेकिन प्राधिकरण सिर्फ 10 करोड़ ही चुका पाया उस अवधि में।
 जैसे ही जमीन मिलेगी डेवलपमेंट कर देंगे
जब कंपनी ने आईडीए से संपर्क किया तो अधिकारियों ने तर्क देते हुए कहा कि जमीन जल्द मिल जाएगी। इसीलिए टेंडर जारी किया है ताकि जमीन मिलने के बाद कागजी कवायदों में ज्यादा वक्त न लगे। विकास जल्द शुरू हो।
हकीकत यह थी कि 350 हेक्टेयर (८६५ एकड़) में से 50 हेक्टेयर जमीन प्रशासन को मुआवजे के आधार पर लेना थी। ४० हेक्टेयर सरकारी जमीन है। बाकी जमीन के लिए आईडीए किसान और जमीन मालिकों से एग्रीमेंट कर चुका है। पैसा नहीं दे पाया।
कंपनी का हुआ भारी नुकसान
जिस पीडी अग्रवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को 57 करोड़ का ठेका दिया गया था उससे 10 फीसदी के हिसाब से 5 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी ली थी। जमीन नहीं है प्राधिकरण ने कंपनी को नहीं बताया। मैदान में जाने के बाद कंपनी को पता चला। कंपनी ने प्राधिकरण को कई पत्र लिखे। जवाब नहीं दिया। उलटा, बैंक गारंटी जब्त करने की तैयारी शुरू कर दी। जिसे कंपनी ने कोर्ट में चुनौती दी। तब कहीं जाकर बैंक गारंटी बची। पूरी लड़ाई 2014-15 तक चली। कंपनी का ब्याज का तो नुकसान हुआ ही। अधिकारी पैसे के साथ कंपनी की दी हुई गाड़ियां तक वापरते रहे।
प्राधिकरण में मनमानी के अवाला कुछ नहीं
कंपनी के एक पदाधिकारी ने आत्म अनुभव बयां करते हुए बताया कि पहला ऐसा काम था जिसका वकआर्डर मिलने के बाद हम उस वक्त को कोसते रहे जब वकआर्डर जारी हुआ था। 24 महीने की समयसीमा तय की थी। यदि इसमें कंपनी काम नहीं करती तो हम पर रोज पेनल्टी लगती। बैंक गारंटी काटी जाती।  बिना जमीन के ही प्राधिकरण ने ठेका दिया तब भी अधिकारियों ने हमारी बैंक गारंटी जब्त करना चाही जबकि गलती कंपनी की थी भी नहीं। गलती प्राधिकरण की है तो मुआवजा उसे देना चाहिए।

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