Wednesday, July 29, 2015

चार ईंच बरसात में बहे बाढ़ बचाव के इंतजाम


कोरी साबित हुई कागजी कवायदें, नालों से कब्जा हटाने के बजाय ऊंची सड़कें बनाकर कॉलोनियों को नाला डाला
इंदौर, विनोद शर्मा ।
चार दिन पहले तक बरसात के लिए बादलों की ओर तांकने वाले इंदौर में सोमवार और मंगलवार की शाम हुई बारीश से हालात बदले नजर आए। बरसात पूर्व जुटाए गए बाढ़ बचाव के इंतजामों की पोल मंगलवार शाम बस्तियों में तैरते बरतनों और ताल-तलैया बनी सड़कों ने खोल दी। इसके लिए नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण जो भी कारण गिनाए नदी-नालों के कब्जादारों पर नकेल कसने की नाकामी और बगैर स्ट्रॉम वॉटर डे्रन (एसडब्ल्यूडी) या डे्रनेज के बसाहट से ऊंची सड़कों जैसे अनियोजित विकास पर पर्दा नहीं डाल सकते। उधर, जानकार हर बार लगातार चेताते हैं कि हाल यही रहे तो भविष्य में चेतने लायक नहीं रहोगे लेकिन प्रशासनिक अमला है कि चेतता ही नहीं।
    5 से 8 जुलाई 2005, 7 अगस्त 2006 और 23 जुलाई 2009 की बरसात से आई बाढ़ को सबक बताते हुए हर बार हवाई योजनाओं से कागज रंग दिए गए। नालों पर कब्जा करने वालों से सख्ती से निपटने और बाणगंगा और गौरीनगर में ईंट भट्टों में बसे लोगों को हटाने की रणनीतियां बनी। बाढ़ में बहने वालों को बचाने के लिए सरकार ने नावें दिलाई। करोड़ों रुपए लगाकर चौपट डे्रनेज दुरुस्त की, चेम्बर बनाए लेकिन बाढ़ है कि आज भी बेकाबू है। कुल मिलाकर डिजास्टर मैनेजमेंट के सरकारी दावे खोखले साबित हुए। हाल-ए-हकीकत यह है कि ड्रेनेज दुरुस्त हुई नहीं। नदी-नालों की सफाई और कब्जादारों पर कार्रवाई निगम के अधिकारियों की कमाई बन गई। पानी निकासी के लिए बनाए गए दस्ते सूर्यअस्त होते ही शराब में मस्त हो गए।   
बाढ़-बचाव की सरकारी बतौलेबाजी
-- जुलाई 2005 में आई बाढ़ के बाद शुरू हुआ नालों का सफाई अभियान बाद में कमाई का जरिया बन गया।
-- नदी-नालों के किनारे 2000 अवैध निर्माण। शिवाजी मार्केट के नीचे खान नदी के किनारे बसे करीब सौ परिवारों को छोड़ बाकी को प्रशासन हटा नहीं पाया।
-- पंचशीलनगर में जाकर आवासीय इकाइयां बनाई जबकि शेखरनगर और तोड़ा की योजनाएं कागजों में दफन। अर्जुनपुरा की इकाइयां भी अधूरी।
-- आपातकालीन इंतजामों के तहत जुटाई गई नावें बनी शो-पीस।
-- कायदे से बरसात से पहले साफ होना चाहिए सीवरेज। नहीं होती। बेकलाइनों की हालत भी यही।
पूर्व:
बगैर सीवरेज के बढ़ी अवैध बसाहट
यहां भरता है पानी
वेलोसिटी से लगी रामकृष्णबाग, देवकीनगर, धीरजनगर, सोलंकीनगर, आदर्श मेघदूतनगर, मालवीयनगर कांकड़, बड़ी ग्वालटोली, बख्तावररामनगर। गणराजनगर, मुसाखेड़ी, शांतिनगर, स्कीम-94, विजयनगर, स्कीम-54, सुखलिया, गौरीनगर, रूपनगर।
क्यों भरा-
- रिंग रोड बनने से नालों का बहाव प्रभावित।
- नालों पर कब्जा,  कटी कॉलोनियां।
-नाले-बेकलाइनें चौक। 'यादातर कॉलोनियां अवैध, जल-मल निकासी के इंतजाम नहीं।
- समय पर साफ नहीं होते नाले।
सरकारी अनदेखी
- अवैध कॉलोनियों पर अंकुश नहीं। सोलंकीनगर और सुयश विहार कॉलोनियां नाले पर कटी।
- सीमेंट की सड़कें बना दी, सीवरेज से किया परहेज।
- नालों से अतिक्रमण हटाना तो दूर, बरसात से पहले सफाई तक नहीं की।
- वैध कॉलोनियां फैली, सीवरेज सिकुड़ गई।
- सड़कें ऊंची। मकान नीचे। इसीलिए घरों में भरता है पानी।
पश्चिम
 कॉलोनी में गड्ढे नहीं, गड्ढे में कॉलोनियां
यहां भरा पानी
कुलकर्णी भट्टा, भागीरथपुरा, कुशवाहनगर, भगतसिंहनगर, जगदीशनगर, बड़ा बांगड़दा, शिक्षकनगर, कालानीनगर, चंदननगर, गायत्रीनगर, नगीननगर, इंदिरानगर, समाजवादी इंदिरानगर, एमओजी लाइन, टोरी कॉर्नर, कलालकुई, चंद्रभागा, तोड़ा, शेखरनगर, कबूतरखाना,
क्यों भरा
- जगदीशनगर-भगतसिंहनगर और कुशवाहनगर में ईंट के भट्टे, गड्ढों में बसाहट और नालों पर कब्जे के साथ ऊंची सड़कें बड़ा कारण।
- नदी किनारे बसा है शेखरनगर, तोड़ा और भागीरथपुरा।
- शिक्षकनगर, राजमोहल्ला में सड़कें ऊंची। नालियां खत्म। ड्रेनेज चौक। बीएसएफ क्षेत्र के बहाव का ढाल कालानीनगर में।
- बगैर डे्रनेज के बसी हैं चंदनगर और बाणगंगा की 50 से 'यादा बस्तियां। पाइप डालकर नाला बंद करने से लोहापट्टी-टोरी कार्नर और तंबोली बाखल में भरता है पानी ही पानी।
- मध्य क्षेत्र का डे्रनेज सिस्टम सात दशक पुराना। लाइने चौक और चेम्बर जर्जर हैं। क्षमता से सौ गुना दबाव। इसीलिए जरासी बरसात में लाइनें दे जारी है जवाब।
सरकारी अनदेखी
-  बाणगंगा-चंदननगर सीवरेज और नालियों जैसी बुनियादी सुविधाओं से परहेज।
- सीवरेज प्रोजेक्ट के नाम पर शहरसीमा से लगे आबादीविहीन इलाकों में डली लाइनें लेकिन मध्य क्षेत्र के मौजूदा सिस्टम को अपग्रेटड करने या नई लाइनें डालने की फिक्र नहीं।
- आंखें बंद करके नदी किनारे बसने दी शेखरनगर, तोड़ा, भागीरथपुरा की बसाहट।
-  बाणगंगा में ईंट भट्टों पर नहीं अंकुश। जिन्हें खदेड़ा वे गड्ढों में कॉलोनी काट गए। हर साल हटाते हैं परिवार, मकानों पर कार्रवाई नहीं।
- कब्जों के कारण नाला बनकर रह गई खान नदी।
उत्तर
निगम ने व्यवस्थित नहीं रखी प्राधिकरण की पूंजी
यहां भरा पानी
लसूडिय़ा चौराहा, गुलाबबाग, स्कीम-114, 78 और 74 के साथ कबीटखेड़ी।
क्यों भरा-
- रिंग रोड और एबी रोड पर अब तक स्ट्रॉम वॉटर डे्रन नहीं है। जो ड्रेन है उसकी सफाई नहीं होती। चेम्बर चौक हैं।
-लसूडिय़ा चौराहे पर एक ओर भरता है पानी ही पानी। निकासी की जगह नहीं। इसीलिए चौराहा भी लबालब।
- स्कीम-114, 78 और 74 में प्राधिकरण ने डे्रनेज लाइन तो डाली थी लेकिन क्षमता से 'यादा दबाव के कारण मामला ठप।
सरकारी अनदेखी
- सड़कें बनाई लेकिन बरसाती पानी निकासी की व्यवस्था नहीं की।
- प्राधिकरण से हस्तांतरित होने के बाद निगम ने सीवरेज सुधार पर नहीं दिया जोर।
- सड़कें यहां भी बसाहट से ऊंची।
दक्षीण
कॉलोनियों-कारखानों ने नदी को नाला बना दिया
यहां भरा पानी
रेडियो कॉलोनी, आजादनगर, संवादनगर, मुराई मोहल्ला, पालदा, चितावद कांकड़,  स्नेहनगर, खातीवाला टैंक, ट्रांसपोर्टनगर, शिवमपुरी, अमितेशनगर की नीचला हिस्सा, बिजलपुर,
क्यों भरा
- रेडियो कॉलोनी में ऊंची-नीची है बसाहट। नर्मदा की मेनलाइन रोक रही है बहाव, इसीलिए संवादनगर में भरता है पानी। संवादनगर के पीछे स्टॉपडेम से आजादनगर में आती है बाढ़।
- स्नेहनगर और लोहामंडी में नीची सड़क, कगाी और चोपट है डे्रेनेज।
- नालियों पर निर्माण।
- पालदा-चितावद और ट्रांसपोर्टनगर में सीवरेज नहीं।
- प्रकाशनगर और नवलखा का ढाल संवादनगर में।
सरकारी अनदेखी
- 2006-07 में नदी में नाव चलाने के नाम पर हुई आधी-अधूरी सफाई के बाद आज तक नहीं हुई सफाई।
- अवैध कब्जों के कारण नाला बनकर रह गई नदी।
- पालदा और चितावद में कारखानों का नालों पर कब्जा है जो निगम को दिखाई नहीं देता।
- शिवमपुरी और अमितेशनगर में बरसाती पानी निकासी की जगह नहीं।
क्या कहते हैं जानकार
तो तबाह हो जाएगा इंदौर
शासन और जनता ने नदी-नालों और उन तक पानी पहुंचाने वाले ढलानों पर अतिक्रमण करने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। लोगों ने भी भराव करके ओटले खड़े करे और  सड़क को नाली बना डाला। सड़कों-चौराहों पर बनी पुरानी जितनी भी पुल-पुलियाएं थीं बंद हो चुकी हैं। कुल मिलाकर इंदौर में इंजीनियरिंग के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत काम हो रहा है। हालात यही रहे तो जिस दिन मुंबई-दिल्ली की तरह 15-20 ईंच बरसात एक झटके में हुई उस दिन इंदौर का तबाह होना तय है।
अतूल सेठ, इंजीनियर
प्लींथ लेवल पर बने सड़कें
- नई सड़कें प्लींथ लेवल (जिस लेवल पर आसपास की बसाहट है) के हिसाब से बनाई जाना चाहिए। कारण- आप सड़क ऊपर-नीचे कर सकते हैं लेकिन बसाहट को नहीं। कई बार ऐजेंसियां कहती है सड़क नीचे रहे तो लोगों के घर का पानी जमा होता है। इससे निपटने के लिए ऐजेंसियां सेंटर से उठाकर सड़क के दोनों ओर ढाल दें और ड्रेनेज लाइन डालकर निकासी की व्यवस्था कर सकती हैं।
एच.एस.गोलिया, प्रोफेसर, एसजीआईटीएस
बरसाती पानी निकासी के बिना जीता इंदौर
- मध्यक्षेत्र में सीवरेज आजादी से पहले की। वहां मल्टीस्टोरी बनने से बेकाबू हुए हालात। निर्माणाधीन योजनाओं ने भी बढ़ाया बहाव में अवरोध। मौजूदा इंतजाम कारगर नहीं। अतिक्रमण हटाकर नालों को मूल स्वरूप देने की कोई योजना नहीं। सीवरेज प्रोजेक्ट के तहत सिटी की लाइनें पहले डाली जाना थी। लोगों ने बरसात का पानी डे्रनेज में जोड़ दिया। ड्रेनेज की क्षमता नहीं।
एसके बायस, पूर्व सिटी इंजीनियर नगर निगम

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