Wednesday, July 29, 2015

महिला एवं बाल विकास- घपले से श्रीगणेश


- पेंशन घोटाले के बाद भी ६२ हजार हितग्राही
- २४ हजार हितग्राहियों की पात्रता हो चुकी थी रद्द
इंदौर, विनोद शर्मा ।
जनवरी २००५ में ५८ हजार से शुरू और नवंबर २००९ में ६२ हजार हितग्राहियों पर खत्म। यह सफरनामा है निगम प्रबंधन की सबसे मजबूत कडिय़ों में से एक महिला एवं बाल विकास विभाग का। इस विभागीय सफरनामे का श्रीगणेश पेंशन कांड जैसे महाघोटाले से हुआ। हालांकि समापन शांतिपूर्ण रहा। हालांकि ताजा आंकड़ों और आंकड़ों को लेकर विभागीय भूमिका पर उठने वाले सवालों के बीच विपक्षियों को शांति के बाद वाले बवंडर की तलाश है।
 'सर मुंढाते ही ओले पड़ेÓ जैसी कहावतें महिला एवं बाल विकास विभाग पर सटिक बैठी। समिति प्रभारियों ने जनवरी २००५ में कामकाज संभाला ही था कि अपै्रल २००५ में पेंशन घोटाले का जिन्न चिराग तोड़कर सामने खड़ा हो गया। घोटाले में ५८ हजार में से २४,०११ हितग्राही अपात्र घोषित हो गए। जांच अब भी जारी है। मौजूदा परिषद का घोटाले से लेना-देना नहीं था लेकिन सात महीनों तक कामकाज प्रभावित रहा। दस एमआईसी सदस्यों में महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा की सबसे नजदीकी रही सपना चौहान ने घोटाले के दबाव को दूर करते हुए नए सिरे से मौर्चा संभाला और जुलाई २००५ से पात्र पाए गए ३४,१८९ हितग्राहियों की पेंशन जारी करना शुरू कर दी। नए आवेदनकर्ताओं की जोनवार जांच के बाद पात्रता सुनिश्चित करने की नई प्रथा लागू की, जो आज तक जारी है। एमआईसी के दायित्वों में बदलाव, पार्षदों के बिखराव और बहाली के बाद बीते १६ जून २००८ से विभाग का दारोमदार लालबहादुर वर्मा के कंधों पर हैं। पांच बरस तक लगातार विवादों के कारण सुर्खियों में रहे लाल उसी मंत्री खेमे के खास सिपेसालार हैं जो पेंशन घोटाले के प्रमुख आरोपी हैं। हालांकि लाल के काम को लेकर अभी तक अंगुली नहीं उठी।
अध्यक्ष- जनवरी ०५ से जून २००८ तक सपना निरंजनसिंह चौहान
जून २००८ से- लालबाहदुर वर्मा
सदस्य- सविता अखंड, निर्मला कैरो, सुमनलता वर्मा, अनुराधा उदावत, संध्या अजमेरा, पुनिया तरेटिया, फौजिया शेख अलीम, शबाना अयाज गुड्डू और रश्मि वर्मा
दायित्व-जिम्मेदारियां
महिला एवं बाल विकास विभाग दो भागों में बंटा है। एक का नियंत्रण जिला प्रशासन के पास है तो दूसरे का नगर निगम के पास। आवेदक फार्म जमा करता है। निगम प्रशासन जोनवार फार्म की जांच कराता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आवेदक की पात्रता की पुष्टि करके सूची जिला प्रशासन को सौंप दी जाती है। वहां से सूची के आधार पर राशि स्वीकृत होती है।
प्रमुख काम जो किए
-पेंशन कांड उजागर होने के बाद पात्रों का पैसा सहकारी साख संस्थाओं के माध्यम से देना बंद कर दिया। डायरियां बनाकर मनीऑर्डर से पैसा दिया जाने लगा।
- मनीऑर्डर में पोस्टमैन की मनमानी का खुलासा होते ही सदस्यों के पोस्ट ऑफिस में खाते खोल दिए गए। अब तक ५२ हजार से अधिक खातेदारों के खाते खुल चुके हैं।
- तकरीबन १० हजार आवेदन खातों के पास डाकविभाग के पास विचाराधीन हैं।
लिक से हटकर
- जनवरी २००८ में महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा ने एमआईसी के दायित्वों में परिवर्तन किया था। इसमें सामन्य प्रशासन समिति प्रभारी लालबहादुर वर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
- तकरीबन दो दर्जन पार्षदों के कड़े विरोध के बाद जून में एमआईसी में लाल की वापसी हुई और उन्हें महिला एवं बाल विकास प्रभारी बना दिया गया।
- लाल विधानसभा-२ से ताल्लुक रखने वाले उसी खेमे के खास हैं जिसके खिलाफ पेंशन घोटाले की जांच बीते पांच साल से जारी है।
एक नजर में सामाजिक सुरक्षा पेंशन
- कुल ६४ हजार हितग्राही और आवेदक
- ५२ हजार के पोस्ट ऑफिस में खाते खुले
- १० हजार आवेदन डाक विभाग के पास विचाराधीन
- बाकी दो हजार आवेदनों की जांच जारी।
- हितग्राहियों में ८,२७३ विकलांग, १७,२८६ विधवा-परितक्ताएं और १२,६९६ वृद्ध ६० से ६५ वर्ष के बीच के हैं। वहीं ६५ बरस से अधिक के हितग्राहियों की संख्या ३८,२५५ है।
क्या कहते हैं वोटर
व्यवस्थित हुई पेंशन व्यवस्था
- आदर्श इंदिरानगर निवासी विकास यादव की मानें तो कई लोग आज भी महीनों से पेंशन के लिए आवेदन लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। पात्रों के नाम पर कई अपात्र फायदा उठा रहे हैं। शुरूआती दौर में कई महीनों तक पेंशन नहीं मिली।

पांच बरस में पेंशन व्यवस्था में खास बदली है। पहले साख संस्थाओं में लाइन लगाकर खड़े रहना पड़ता था। सुनिश्तिच तारीख तक जो सदस्य पेंशन नहीं ले पाता था उसे संस्था बाद में पैसा नहीं देती थी और न ही राशि विभाग को लौटाती थी। मनिऑडर में पोस्टमैंन परेशान करने लगे और आखिरकार पोस्ट ऑफिस में खाते खोलना पड़े। अब कभी भी जाकर अपना पैसा नजदीकी पोस्ट ऑफिस से निकाला जा सकता है।

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