-- 165 की जगह डलेगी सिर्फ 125 किलोमीटर लंबी लाइन
-- कंपनियों को दिया रूट चार्ट
-- वर्कऑर्डर 442 करोड़ का, 210 करोड़ में काम समेटने की तैयारी
-- स्वीकारते हुए कहते हैं 210 नहीं, 320 करोड़ का होगा काम
इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
सड़कों की बदहाली का मुद्दा अंजाम तक पहुंचा भी नहीं कि घपले का जिन्न सीवरेज प्रोजेक्ट की बंद बोतल से बाहर आ गया। 'पत्रिकाÓ के हाथ लगे सुरागों की मानें तो सीवरेज प्रोजेक्ट का वर्कऑर्डर भले 165.08 किलोमीटर का जारी हुआ हो लेकिन लाइनें सिर्फ 125 किलोमीटर लंबी ही डलेंगी। जमीनी अंतर सीधे 40 किलोमीटर का। कौनसी साइट कम हुई? इसका जवाब निगम के उन नीति निर्धारकों के पास भी नहीं है जो काम की कटौती को निगम खजाने की बचत बता रहे हैं।
नगर निगम ने मई 2008 में सीवरेज प्रोजेक्ट के तहत तीन क्षेत्रों के लिए दो कंपनियों को 442 करोड़ का वर्कऑर्डर जारी किया था। हैदराबाद की नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी को 266 करोड़ में पूर्व और मध्य क्षेत्र में 100.58 किलोमीटर लंबी लाइन डालना थी। वहीं पश्चिम क्षेत्र की कमान सिम्पलैक्स को सौंपी गई। पश्चिम में 175 करोड़ में 65 किलोमीटर लंबी डाली जाना थी। सीवरेज लाइनों की गुणवत्ता शुरूआती दौर से विवादों में रही। इसकी बेहतरी को तवगाो देना तो दूर निगम के नीति निर्धारकों ने बालेबाले 39 किलोमीटर लंबी साइट ही कम कर डाली। साइटें कौनसी हैं? कम क्यों और किस आधार पर किया गया? जैसे सवालों के जवाब में नीति निर्धारक निगम का पैसा बचाने की दलीलें दे रहे हैं। हालांकि दलीलों को एमआईसी की अनुसंशा मिली न ही निगम परिषद की मंजूरी।
तब किया ताबड़तोड़ भुगतान, आज याद आई तंगी
निगम के जो अधिकारी आज तंगी की आड़ में काम में कटौती करके निगम का खजाना बचाने की दलीलें दे रहे हैं वे सबसे पहले 442 करोड़ के हिसाब से दोनों कंपनियों को मोबलाइजनेशन के लिए 44 करोड़ का अवैधानिक भुगतान कर चुके थे। इसमें 26.60 करोड़ रुपए एनसीसी और 17.50 करोड़ रुपए सिम्पलेक्स को दिए गए थे। लोकायुक्त भुगतान की वैधता की जांच भी कर रहा है।
थोड़ा न बहुत अंतर सीधे 230 करोड़ का
एनसीसी को 266 करोड़ का वर्कऑर्डर दिया था। 58 किलोमीटर लाइन डलने के बाद 90 करोड़ की बीलिंग हो चुकी है। बमुश्किल 20 करोड़ की बीलिंग और होगी। अंतर कुल मिलाकर 156 करोड़ का। सिम्पलेक्स 175 करोड़ के वर्कऑर्डर देकर 72 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। बकाया काम के लिए 28 से 30 करोड़ की बिलिंग हुई तो भी मामला सौ करोड़ में सिमट जाएगा। बचेंगे 75 करोड़ रुपए। दोनों कंपनियों के कर्ताधर्ता निगम प्रशासन के मनमाने निर्णय से नाराज हैं। उनका कहना है कि वर्कऑर्डर के हिसाब से ही कंपनी ने इंदौर में इन्वेस्ट किया। मशीनरी स्थापित की। मैदानी अमला नियुक्त किया। लोगों का विरोध सहा। गालियां खाई। मार खाई। अब निगम काम में कटौती की बात करके हमारे साथ धोखा कर रहा है।
दोषी:- डीपीआर बनाने वाले या काम करने वाले?
लाइन में कटौती की वजह इंजीनियर अलाइनमेंट में लाइनों की लंबाई कम होना बताते हैं। इसे जानकार निगम इंजीनियरों की कोरी बहानेबाजी करार देते हैं। उनकी मानें तो डीपीआर किसी नौसीखिए ने नहीं बल्कि निगम के काबिल इंजीनियरों और कंसलटेंट की टीम ने तैयार की थी। इसे डीपीआर को नगर निगम से केंद्र सरकार तक सबने मंजूर किया। अलाइनमेंट के आधार पर ही योजना की लागत निर्धारित कराकर वर्कऑर्डर जारी किया गया। ऐसे में अब निगम के इंजीनियर यह कैसे कह सकते हैं कि अलाइमेंट की लंबाई कम हो गई।
अलाइनमेंट की लंबाई कम हो गई
-- क्या सीवरेज प्रोजेक्ट में काम की कटौती हुई है?
हां, अलाइमेंट की लंबाई कम होने के कारण काम तो कम हुआ ही है।
-- अलाइनमेंट क्यों कम हुआ?
मैदान में मशक्कतें बहुत है। उनको देखते हुए ही अलाइनमेंट में फेरबदल करना पड़ता है।
-- लागत पर कितना फर्क पड़ेगा?
442 करोड़ का काम 320 करोड़ तक निपट जाएगा। 120-122 करोड़ बचेंगे।
-- क्या कटौती की जानकारी एमआईसी या परिषद को दी गई?
नहीं , अभी तक 60 प्रतिशत काम हुआ है। जैसे-जैसे काम हो रहा है अलाइमेंट की वास्तविक्ता सामने आ रही है। जिस दिन अंतिम प्रारूप तैयार हो जाएगा, एमआईसी और परिषद को बता देंगे।
-- कंपनियों को अलाइनमेंट की जानकारी दे दी?
हां, उनके पास पहले से है।
हरभजन सिंह, प्रोजेक्ट इंचार्ज
पूर्व (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 58.57 किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 39.99 किलोमीटर
अंतर- 18.58 किलोमीटर
मध्य क्षेत्र (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 42.01 किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 28.96 किलोमीटर
अंतर- 13.05 किलोमीटर
पश्चिम क्षेत्र (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 64.50 किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 57.00 किलोमीटर
अंतर- 7.50 किलोमीटर
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