Thursday, April 15, 2010

धनलक्ष्मी भी अवैध


इंदौर। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की जिस जमीन के कारण उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला पर 100 करोड़ के हेरफेर के आरोप लग रहे हैं, उस पर बनी इमारत भी अवैध है। धनलक्ष्मी अपार्टमेंट विजयवर्गीय, मेंदोला के सहआरोपी विजय कोठारी और मनीष संघवी की धनलक्ष्मी केमिकल ने बनवाया है।

औद्योगिक उपयोग की जमीन पर बगैर टीएंडसीपी मंजूरी के निगम से नक्शा मंजूर कराकर निर्माण होने के कारण परदेशीपुरा चौराहे स्थित यह इमारत अवैध की श्रेणी में है। कोठारी और संघवी की कंपनी को यह जमीन उद्योग के लिए निगम से लीज पर मिली थी।

इसे बाद में नंदानगर सहकारी साख संस्था के अध्यक्ष रमेश मेंदोला को 1.38 करोड़ रूपए में बेच दिया गया। मामले में तत्कालीन मेयर विजयवर्गीय, मेंदोला, कोठारी एवं संघवी के खिलाफ लोकायुक्त जांच शुरू हो चुकी है।

चार बिल्डिंगों की मिली थी मंजूरी
तत्कालीन निगम इंजीनियर नित्यानंद जोशी और जीएम अवाशिया ने धनलक्ष्मी केमिकल्स के नक्शों को मंजूरी दी थी। अब दोनों रिटायर हो चुके हैं। मंजूरी चार अपार्टमेंट की थी। इसमें से एक 1991 में बन चुका था और दूसरे का काम जारी था।

क्यों अवैध है बिल्डिंग?
- निगम ने जमीन औद्योगिक उपयोग के लिए लीज पर दी थी। भू-उपयोग परिवर्तन के लिए निगम की मंजूरी ली जाना थी, जो नहीं ली गई।
- निगम के लीज दस्तावेजों में आज भी जमीन का भू-उपयोग औद्योगिक है।
- निगम की मंजूरी मिलने के बाद टीएंडसीपी को आवेदन किया जाना था। इसके बगैर सरकार की मंजूरी के भू-उपयोग परिवर्तन नहीं कर सकता।

रहते हैं 23 परिवार
अपार्टमेंट में कैलाश गांधी, सचिन जैन, धनपाल मेहता, रमेशचंद्र मेहता, रसीला बेन, जीवनलाल शाह, प्रेमसिंह पारिख समेत 23 परिवार रहते हैं। रहवासियों का कहना है हमने धनलक्ष्मी केमिकल्स से फ्लैट खरीदे हैं, जिसकी रजिस्ट्रियां हमारे पास है। नक्शों में गड़बड़ थी तो निगम को उस वक्त कार्रवाई करना थी, जब अवैध इमारत बन रही थी।

ढहाने गए थे अफसर
गैरकानूनी मंजूरी की जानकारी मिलते ही तत्कालीन निगम प्रशासक एसएस उप्पल ने 1991 में ही नगरीय प्रशासन प्रमुख सचिव को जानकारी देकर इसे जमींदोज करने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलते ही रिमूवल दस्ते के साथ उप्पल भी मौके पर पहुंचे, लेकिन अचानक कार्रवाई टल गई। इस घटनाक्रम के बाद ही बाकी तीन बिल्डिंगें नहीं बन सकीं।

"सौ करोड़" की फाइल खुली
सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की सौ करोड़ रू. कीमत वाली जमीन की गड़बड़ी के मामले में लोकायुक्त अफसर थोड़ी हरकत में दिख रहे हैं। बुधवार को आंबेडकर जयंती की छुट्टी के बावजूद अफसर जांच करते रहे। तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, रमेश मेंदोला, धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी की भूमिका की जांच की जा रही है। इसमें तत्कालीन निगमायुक्त व एमआईसी सदस्य भी घेरे में हैं।

मंगलवार को राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने कोर्ट में कहा था कि नगरीय प्रशासन प्रमुख सचिव से जानकारी नहीं मिलने के कारण जांच नहीं हो सकी। इस पर कोर्ट ने लोकायुक्त को जांच सौंपी थी। मंगलवार को ही लोकायुक्त पीपी नावेलकर ने जांच शुरू करने के निर्देश भी दिए थे।

उधर, जांच शुरू होते ही घोटाले से जुड़े लोगों में खलबली मची हुई है। धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा रमेश मेंदोला की नंदानगर साख सहकारी संस्था को 3 एकड़ लीज की जमीन 1.38 करोड़ रू. में बेचने और इसकी अनुमति देने वाली एमआईसी में सदस्य कौन-कौन थे? इसे लेकर अब तत्कालीन सदस्यों में भी खलबली है।

Tuesday, April 13, 2010

शीशे की गिरफ्त


शीशा यानी हुक्के का नया धंधा इंदौर में खुल्लम-खुल्ला चल रहा है। स्कूली बच्चे इस जहर की चपेट में है। संभवत: हफ्ता तय हो जाने के कारण पुलिस-प्रशासन अश्लीलता के अड्डों के तौर पर फल-फूल रहे इन शीशा लाउंज पर मेहराबानी बनाए हुए हैं। एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एक ताजा स्टडी में भी इस नशे को समाज व युवाओं के लिए भयंकर खतरा बताया है। अनाधिकृत तौर पर शहर में 144 शीशा लाउंज चल रहे हैं।
अश्लीलता के अवैध अड्डे
अमेरिका, यूएई, दुबई और फ्रांस जैसे देशों में प्रतिबंधित हो चुके शीशा यानी हुक्का इंदौर में भयंकर तरह से चलन में आ चुका है। यह हुक्का आलीशान ठिकानों पर बगैर लाइसेंस खुलेआम परोसा जा रहा है। हुक्का निशाना स्कूली छात्र-छात्राएं हैं, जो स्कूल से तड़ी मारकर न सिर्फ ïधुएं के छल्ले उड़ा रहे हैं, बल्कि अश्लील हरकतों में भी रम जाते हैं। चांदी काटने का इस धंधे से पुलिस-प्रशासन बेखबर है। आबकारी विभाग व नगरनिगम ने भी नशे के इन ठिकानों को लाइसेंस जारी नहीं किया है।

मोटा मुनाफा
शीशा के एक फ्लेवर पेक की कीमत 25 से 65 रुपए होती है। इससे कम से कम पांच हुक्के तैयार होते हैं और हर एक की कीमत 200 से 700 रुपए तक होती है। साफ है लाउंज मालिक एक फ्लेवर पैकेट से ही एक से साढ़े तीन हजार रुपए की कमाई करते हैं।

विदेशों में बेन
विदेशों में इस नशे को बेन किया गया है। वहां एंटी ड्रग्स कानून के तहत कार्रवाई की जाती है। वैसे तो भारत में तंबाकू नियंत्रण के लिए कई कानून बन चुके हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती।

तंबाकूयुक्त है शीशा

मैलेशिश (शीरा) के साथ टेबोनल या मसाल या जर्क के साथ गर्म होने पर शीशा तैयार होता है। टेबोनल, जर्क और मसाल निकोटीन व तंबाकुयुक्त पदार्थ हैं।


सीन 1
बाहों में बाहें डालकर हुक्केबाजी

बॉम्बे हॉस्पिटल के सामने होटल मंगल रिजेंसी का प्योरिटी शीशा लाउंज। सीढिय़ों पर ही तीन लड़कियां खड़ी थीं। अंदर पहुंचे तो पूरा अंधेरा था। बड़ी स्क्रीन पर अश्लील गाने चल रहे हैं। सामने दो लड़के हुक्का गुडग़ुड़ा रहे थे। दाईं ओर के कमरेनुमा केबिन में एक युगल था। दूसरे केबिन में तीन लड़कियां और दो लड़के थे। सभी बाहों में बाहें डालकर हुक्का खींच रहे थे। लांच कर्मचारी उन्हें कभी नाश्ते की प्लेट देता तो कभी उनके हुक्के में कोयला डालता। यहां शीशा पीना अनिवार्य है। किसी कारण से आप शीशा नहीं पीते तो एक घंटे में कम से कम दो सौ रुपए की बिलिंग जरूरी है। शीशा पीने से इन्कार किया तो उन्होंने नाश्ता दे दिया। नाश्ते का बिल डेढ़ सौ रुपए था, लेकिन जोड़ा गया 200 रुपए।

सीन 2
बंदूकधारी गार्ड तैनात

मंगल सिटी का द शीशा लïाउंज। दरवाजे पर बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी। अंदर शीशा लगाते दो कर्मचारी। सामने के सोफे पर तीन लड़के बैठे थे। उनके बगल वाले केबिन में दो लड़कियां और एक लड़का बैठे थे। चौकड़ी टी-शर्ट वाली लड़की को छोड़कर दोनों आमने-सामने बैठकर लंबे कश के साथ हुक्के का धुआं उड़ा रहे थे। बीच-बीच में लड़का चौकड़ी वाली लड़की के मुंह पर धुआं उड़ा रहा था। सामने वाली लड़की आदतन नशेडिय़ों की तरह धुएं के छल्ले बना रही थी। तीनों दो घंटे तक हुक्का गुडग़ुड़ाते रहे। लड़का-लड़की के बीच इस दौरान अंतरंग प्रेमी-प्रेमिका की तरह की हरकतें भी होती हैं।

सीन 3
नाम कैफे, कॉफी नहीं मिलती

बीसीएम हाईट्स में ब्लू रॉक्स कैफे लाउंज। अंदर पहुंचे तो देखा बीच में तीन लड़के हवा में धुआं छोड़ रहा है। लांज का नाम कैफे है, परंतु यहां कॉफी नहीं मिलती। नाश्ते का पूछा तो बोले जनाब यहां सिर्फ शीशा चलता है। शीशा ही पीना पड़ा। इसी दौरान कुछ और लड़के-लडि़कयां आए। इनके साथ स्कूल बैग भी थे।

सीन 4
कम नहीं पड़ी लड़की

आनंद बाजार स्थित फ्यूम्स शीशा में शुक्रवार रात 9.10 बजे कोने वाले केबिन में एक लड़की अपने ब्वाय फ्रेंड के साथ थी। पूरे हाल में धुआं हो रहा था। लड़की लड़के को फोर्स कर रही थी कि खींचो ना। लड़की भी लंबे कश मार रही थी।

सीन 5
सुलग रहे थे कोयले

आनंद बाजार में बाउंस लाउंज में अंदर पहुंचते ही चार-पांच लड़कें धूआं उड़ाते नजर आ रहे थे। आसपास के कैबिन खाली थे। लॉन्ज कर्मचारी लड़कों के हुक्के में कभी फ्लेवर डाल रहा था तो कभी कोयला।


सामान्य लाइसेंस से धंधा

युवाओं को आकर्षित करने वाले शीशे का धंधा नगर निगम के सामान्य गुमाश्ता लाइसेंस के आधार पर चल रहा है। शासन और प्रशासन के पास न तो इस धंधे के संबंध में ïकोई गाइड लाइन तय है और न ही इसकी निगरानी का इंतजाम।


लड़कियों को भांग-शराब का चस्का
लाउंज में आने वाली लड़कियों को रोज मिंट, कच्ची केरी, आरपीएम (रॉयल पान मसाला), स्ट्रॉबेरी फ्लेवर ज्यादा पसंद आते हैं। कुछ रम, विस्की और डबल एप्पल फ्लेवर भी पसंद करती हैं। कई बार बेस में पानी की जगह शराब और शीशा फ्लेवर में भांग की गोलियां डलवाती हैं।

दो दर्जन से ज्यादा फ्लेवर

नाश, वनीला, नारियल, गुलाब, जैसमीन, शहद, आम, स्ट्रॉबेरी, तरबूज, पुदीना, मिंट, चेरी, नारंगी, रसभरी, सेब, एप्रीकोट, चॉकलेट, मुलेठी, कॉफी, अंगुर, पीच, कोला, बबलगम, पाइनापल, बनारसी पान, पान सालसा, पान रसना, पान मघई, कोला, रूहाबजा, अनार, जेस्मीन, नींबू और सेक्सी सुपारी जैसे दो दर्जन से अधिक फ्लेवर का हुक्का लाउंज पर मिलता है।


हम नहीं देते लाइसेंस

हमने इंदौर में एक भी शीशा लॉन्ज का लाइसेंस जारी नहीं किया है। हो सकता है नगर निगम ने किए हों।

विनोद रघुवंशी, आबकारी अधिकारी

शीशा लाउंज को नगरनिगम की ओर से कोई विशेष लाइसेंस जारी नहीं किया है।

एमपीएस अरोरा, मार्केट अधिकारी, नगरनिगम
इनके लाइसेंस की स्थिति देखना पड़ेगी। सूची तैयार करवाकर कार्रवाई शुरू करेंगे।

डी. श्रीनिवास राव, एसएसपी, इंदौर
शीशा लाउंज के कानूनी पहलूओं का राज्य स्तर पर अध्ययन किया जा रहा है। शीघ्र ही इनके विरूद्ध कार्रवाई करने की व्यापक रणनीति बनाई जाएगी।

डॉ. बीएम श्रीवास्तव, स्टेट नोडल अधिकारी, तंबाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ
विनोद
प्रमुख शीशा लाउंज
एबी रोड : स्पाइडर (एलआईजी), लॉ-कैफे (उत्तमभोग के बगल में), द शीशा लॉन्ज (मंगल सिटी)
बॉम्बे हॉस्पिटल के पास : बॉट्म्स स्वीप (ऑर्बिट मॉल) ब्ल्यू रॉक्स कैफे (बीसीएम), प्योरिटी शीशा (मंगल रिजेंसी), ग्योरिटी बार एंड शीशा (मंगल रिजेंसी), न्यू स्पाइडर (रॉयल प्लेटिनम)
वेलोसिटी टॉकिज : ऑन द रॉक्स
आनंद बाजार : फ्लूम्स शीशा और बाउंस कैफे
एमजी रोड : मिस्टर बिन्स, फ्लेवर्स, जूम कैफे
रसोमा चौराहा : ऑलिव गार्डन
खंडवा रोड : रिच गार्डन, क्लोरोफिल

मेंदोला को सौ करोड़ की भूमि



इंदौर। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की जिस तीन एकड़ जमीन में लोकायुक्त जांच के आदेश हुए हैं, उसकी कीमत 100 करोड़ है। धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज ने यह जमीन रमेश मेंदोला की नंदानगर साख सहकारी संस्था को महज 1.38 करोड़ रूपए में बेचा था। इस सौदे में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय पर महापौर परिषद (एमआईसी) के रास्ते मदद का आरोप है।

धनलक्ष्मी के भागीदार विजय नगीन कोठारी और मनीष रमणीकभाई संघवी थे, जिन्होंने पहले सरकार से 2400 रूपए साल की लीज पर जमीन ली और बाद में मेंदोला से सौदा किया। इसी कारण से चारों के खिलाफ कोर्ट ने लोकायुक्त जांच के आदेश दिए हैं। यह बात पूर्व मंत्री व परिवादी सुरेश सेठ ने शनिवार को मीडिया से कही। उनके एडवोकेट राजेंद्र शर्मा ने पुष्टि के लिए दस्तावेज भी उपलब्ध करवाए, जिससे कई तथ्य उजागर होते हैं।

गड़बड़ी की कड़ी दर कड़ी
कड़ी 1
13 नवंबर 1980 को आवास एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए सुरेश सेठ ने सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की शासन की लीज की आठ में से तीन एकड़ जमीन धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज को 30 साल के उपयोग के लिए 2400 रूपए वार्षिक लीज पर दी।

कड़ी 2
तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की परिषद बनते ही 10 हजार वर्गफीट जमीन पर धनलक्ष्मी केमिकल ने मल्टी तान दी।

कड़ी 3
6 अक्टूबर 2004 को एमआईसी ने जमीन को रमेश मेंदोला की नंदानगर साख सहकारी संस्था को बेचने की अनुमति दी।

कड़ी 4
जुलाई 2007 में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के उपसचिव नरेश पाल ने निगमायुक्त को कई बिंदुओं पर आपत्तियां जताते हुए नंदानगर संस्था को जमीन देने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

अब उठ रहे ये पांच सवाल*
सरकार ने जमीन हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी, इसलिए अभी संस्था का कब्जा कानूनी नहीं है। क्या सरकार अतिक्रमण हटाएगी?
* क्या लोकायुक्त तय समय 6 जुलाई 10 तक रिपोर्ट पेश कर पाएगी?
* निगमायुक्त समेत जिस-जिस अफसर ने मामले को दबाए रखा, क्या उनके खिलाफ सरकार कोई त्वरित कार्रवाई करेगी?
* धनलक्ष्मी संचालकों से क्या वसूली की कार्रवाई होगी?
* कॉलेज समेत समस्त आठ एकड़ जमीन की लीज 13 नवंबर 2010 को समाप्त होगी। क्या सरकार इसके बाद इसे अपने हाथ में लेगी?

घपला क्यों?
लीज की जमीन को कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी को बेच नहीं सकती। अत: एमआईसी की मंजूरी और धनलक्ष्मी केमिकल द्वारा सौदा किया जाना अवैध था।

कैलाश सेे मांगा इस्तीफा"
मुख्यमंत्री बताएं सिंहस्थ, पेंशन, इंदौर नवरतन बाग भूमि घोटाले सहित अन्य मामलों में कदाचरण मामला सिद्ध होने के बाद भी विजयवर्गीय को संरक्षण क्यों दिया जा रहा है। उनसे इस्तीफा लेना चाहिए।"
- केके मिश्रा, प्रवक्ता, प्रदेश कांग्रेस

भाजपा ने कहा जांच होने दो
"मामला न्यायालय का है। जल्द ही दूध का दूध-पानी का पानी हो जाएगा। संगठन स्तर पर इस मामले में कोई बात नहीं हुई। इसलिए अभी इस पर कुछ नहीं कह सकते।"
- नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा

"मेरे महापौर पद के कार्यकाल में सिर्फ नामांतरण की कार्रवाई हुई है। निर्णय निगम परिषद का था। मुझ पर और भी आरोप लगे हैं। कोर्ट ने जांच का आदेश दिया है। अब जांच हो जाने दीजिए। इसके बाद ही कुछ कह सकेंगे। "
- कैलाश विजयवर्गीय, उद्योग मंत्री

उक्त सौदे पर सहमति कांग्रेस के शासनकाल में ही पक्ष-विपक्ष के समक्ष दी गई। इसके लिए निगम ने बाकायदा अनुमति दी जिसके प्रमाण हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से भी अनुमति ली गई।
- रमेश मेंदोला, विधायक

कैलाश ही नहीं, कमिश्नर भी घेरे में



इंदौर। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की लीज की करोड़ों की भूमि की गड़बड़ी में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला व धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के खिलाफ मामले का भंडाफोड़ होने के बाद 2002 से अब तक रहे निगम कमिश्नर भी संदेह के घेरे में आ गए हैं। इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई, शिकायतें भी हुई, लेकिन वे आंखें मूंदे रहे। कानूनविदों के मुताबिक, इस दौरान पदस्थ रहे कमिश्नर भी बच नहीं सकते।

कोर्ट ने लोकायुक्त को आदेश दिया है कि 90 दिन (6 जुलाई तक) में जांच प्रतिवेदन पेश करें और संबंधितों के दोषी पाए जाने पर धोखाधड़ी की धाराओं में केस दर्ज करें। इसके चलते फाइलें खंगालना शुरू हो गया है। परिवादी व पूर्व मंत्री सुरेश सेठ का दावा है कि उनके बताए महत्वपूर्ण पांच सूबतों की जांच से मामले का पटाक्षेप हो जाएगा।

सेठ का दावा : इन पांच बिंदुओं की जांच हो तो सुलझे मामला
संस्था अध्यक्ष रमेश मेंदोला ने लीज की जमीन की निगम व टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से अनुमति की बात कही है। सेठ व एक्सपर्टो का मत है कि लीज की जमीन बेची-खरीदी ही नहीं जा सकती। ऎसे में तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय की परिषद ने अनुमति कैसे दी?

जब 2004 में उप सचिव ने गंभीर खामियां पाकर जमीन को धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा नंदानगर संस्था (मेंदोला) को बेचने की अनुमति नहीं देकर शून्य घोषित किया, तो कमिश्नर क्या करते रहे?

जमीन 2002 में 1.38 करोड़ रू. बेची गई। तब सेठ ने लगभग हर कमिश्नरको शिकायत की, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इस दौरान रहे कमिश्नर नीतेश व्यास, सीबी सिंह, आकाश त्रिपाठी, पी. नरहरि, विनोद शर्मा, नीरज मंडलोई और फिर अब सीबी सिंह की भूमिका पर सवाल उठे हैं। सेठ ने तो हाल ही में सीबी सिंह से फिर शिकायत की थी। लीज की भूमि का उपयोग कैसे बदला?

जब उक्त जमीन पर सहकार के आधार पर स्कूल-कॉलेज निर्माण की महत्वाकांक्षा थी, तो योजनाओं का प्रस्ताव सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया, जबकि यह हजारों छात्र-छात्राओं से जुड़ा मामला था।

मेयर इन काउंसिल के पत्र (22 सितंबर 04) में मेंदोला के नाम तीन एकड़ भूमि का नामांतरण स्वीकार एवं आगामी 30 वर्ष यानी 13 नवंबर 2010 के बाद 30 वर्ष के लिए नाममात्र लीज पर मंजूर हुआ, लेकिन इसमें राज्य सरकार की तो स्वीकृति थी ही नहीं।

कस रहा शिकंजा



इंदौर। सुगनीदेवी कॉलेज परिसर की करीब 100 करोड़ की तीन एकड़ जमीन के मामले में विशेष न्यायाधीश ने राज्य आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को जांच से जुड़ी जानकारी की रिपोर्ट तत्काल पेश करने के आदेश दिए हैं। जानकारी मांगने से ब्यूरो में खलबली है। अफसर फाइलें खंगालने में लगे हैं। मंगलवार को रिपोर्ट पेश होगी।

इस बीच लोकायुक्त ने आवेदन कोर्ट में पेश किया, जिसमें लिखा कि मामले की जांच पहले ईओडब्ल्यू ने की थी तो उससे स्थिति स्पष्ट कर ली जाए कि कार्रवाई हुई, लंबित है या मामला खारिज हो गया। इस पर विशेष न्यायाधीश एसके रघुवंशी ने सुनवाई की। ईओडब्ल्यू के विशेष लोक अभियोजक अश्लेष शर्मा ने बताया कोर्ट ने एसपी महेंद्रसिंह सिकरवार को पत्र लिखकर जानकारी मांगी है।

अगर ब्यूरो ने कार्रवाई की है या लंबित है अथवा जैसी भी स्थिति है, उसे लेकर तत्काल रिपोर्ट पेश करें। रिपोर्ट मंगलवार को पेश की जाएगी। गौरतलब है पिछले दिनों कोर्ट ने उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, मे. धनलक्ष्मी केमिकल इंडस्ट्रीज के भागीदार विजय कोठारी और मनीष संघवी के खिलाफ लोकायुक्त को जांच कर रिपोर्ट 90 दिन में पेश करने का कहा था। यह भी हवाला दिया गया था कि दोष साबित होता है तो धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं में केस भी दर्ज करें।

अवर सचिव ने भी ली थी आपत्ति
अवर सचिव ने 14 सितंबर 2009 को निगमायुक्त को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा था कि लीज की भूमि को धनलक्ष्मी केमिकल को आवंटित करने के बारे में शासन की अनुमति और निगम के बीच हुए अनुबंध में यह शर्त नहीं थी कि धनलक्ष्मी इंडस्ट्रीज लीज पर आवंटित भूमि या उसके अधिकारों का विक्रय करने को स्वतंत्र रहेगी।

यदि धनलक्ष्मी लीज को आगे जारी नहीं रखना चाहती थी तो उसे नियमानुसार निगम को वापस करना चाहिए था। अवर सचिव ने एक पत्र में निगमायुक्त को यह भी लिखा था कि उक्त जमीन निगम को सौंपे बिना नंदानगर साख सहकारी संस्था को बिना टेंडर बुलाए कैसे बेच दी गई?

जांच की हकीकत
आखिर ईओडब्ल्यू में कब शिकायत की गई थी? क्या इसमें जांच शुरू हुई? क्या दबाव के चलते मामला दबा दिया गया? ऎसे कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं। जानकारी के मुताबिक 27 फरवरी 2009 को मामले में परिवादी सुरेश सेठ ने शिकायत सिर्फ ईओडब्ल्यू की इंदौर विंग को ही नहीं, बल्कि आईजी (भोपाल) को भी की थी यानी एक साल से ज्यादा समय हो गया, लेकिन ब्यूरो में मामला ठंडे बस्ते में रहा।

तारीख-पर-तारीख

शिकायतों की फेहरिस्त
*17 मई 07 को आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया को।
*1 मई 08 को निगमायुक्त नीरज मंडलोई को।
*6 अक्टूबर 08 को फिर निगमायुक्त नीरज मंडलोई को।
*12 फरवरी 09 को निगमायुक्त सीबी सिंह को।
*2 मार्च 2009 को इन्हें डिमांड ऑफ जस्टिस का नोटिस

1. मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन
2. गृह सचिव
3. पुलिस महानिदेशक
4. आईजी (ईओडब्ल्यू, भोपाल)
5. डीआईजी, 6. आईजी
7. एसपी
8. कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी
9. एसपी, ईओडब्ल्यू, इंदौर


17 जून 09 को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से शिकायत।
शिकायतों की फेहरिस्त पर सुनवाई न होने पर मार्च 2010 में कोर्ट की शरण। कोर्ट से लोकायुक्त को कैलाश विजयवर्गीय, रमेश मेंदोला, विजय कोठारी और मनीष संघवी की भूमिका को लेकर जांच के आदेश।

नगर निगम भी हरकत में, सौंपेगा सरकार को रिपोर्ट, खंगाली फाइलें
करोड़ों के घपले में नगर निगम विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपेगा। इसमें निगम जमीन को लेकर अब तक अलग-अलग कार्रवाई और मौजूदा स्थिति का ब्योरा होगा।

यह काम लीज शाखा और विधि विभाग के अफसरों को सौंपा गया है, जिन्होंने करीब 100-100 पेज की दो बड़ी फाइलें ढूंढ़ निकाली हैं। इसमें 1940 में हिम्मतलाल एंड संस को दी गई लीज से लेकर 2002 में धनलक्ष्मी और नंदानगर साख संस्था के बीच करार के दस्तावेज हैं।

निगम की चिंता लोकायुक्त जांच को लेकर भी है जिसमें अफसरों से पूछताछ के आसार हैं। कमिश्नर के अलावा 1980 में मास्टर प्लान के बाद पहला अनुबंध करने वाले सिटी इंजीनियर से 2002 तक पदस्थ इंजीनियरों से भी जांच एजेंसी जानकारी मांग सकती है।

रिपोर्ट इसलिए भी लंबी-चौड़ी बनाई जा रही है ताकि वक्त आने पर जवाब पेश किया जा सके। रिपोर्ट सरकार के पास भेजने के बाद वहां से भी कोई निर्णय हो सकता है, क्योंकि मामला कबीना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला से जुड़ा है।

नंदानगर संस्था ने लिखी थी चिट्ठी
मार्च में नंदानगर साख संस्था ने निगम को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि उनके व धनलक्ष्मी केमिकल के बीच जमीन हस्तांतरण के मामले में क्या हुआ है। इस पर निगम ने जवाब दिया था कि मामला सरकार के स्तर पर विचाराधीन है।

- कोर्ट के आदेश पर देख रहे हैं कि हमारी भूमिका क्या होगी। रिपोर्ट भी तैयार कर रहे हैं जो सरकार को भेजी जाएगी। इसमें जमीन से जुड़ा हर बिंदु शामिल रहेगा। विधि विशेषज्ञों से भी सलाह ली जा रही है। फिलहाल हस्तांतरण का मामला सरकार के पास लंबित है।
-सीबी सिंह, कमिश्नर

चिंता नहीं मिल रहे कागजों की
बताते हैं अफसरों की चिंता कुछ चिट्ठी व अनुबंध पत्रों को लेकर है, जो फाइलों में नहीं मिल रहे। लिहाजा, फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों पर ही रिपोर्ट बनाई जा रही है। रिपोर्ट में निगम लीज अनुबंध को लेकर 1940, 1977, 1980, 2002 में हुए अलग-अलग मामलों का ब्योरा देगा। यह भी बताया जाएगा कि जमीन का हस्तांतरण दो-तीन मर्तबा हो चुका है और हर बार अनुबंध के मुताबिक ही कार्रवाई की गई।

इस्तीफा दें विजयवर्गीय



भोपाल। कांग्रेस ने इंदौर के मिल क्षेत्र मेंकरोड़ों रूपए के जमीन घोटाले के मामले में राज्य के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से इस्तीफे की मांग की है। इंदौर की जिला अदालत ने पूर्व मंत्री सुरेश सेठ की याचिका पर विजयवर्गीय, भाजपा विधायक रमेश मेंदोला और तीन अन्य के खिलाफ लोकायुक्त को जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं।

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता के.के. मिश्रा ने शनिवार को बयान जारी कर सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री यह बताएं कि सिंहस्थ घोटाले, पेंशन घोटाले, इंदौर के नवरतन बाग भूमि घोटाले सहित कई आर्थिक मामलों में कदाचरण का मामला सिद्ध होने के बाद भी विजयवर्गीय को निरंतर संरक्षण क्यों दिया जा रहा है। जबकि उनके विरूद्घ लोकायुक्त एवं इओडब्ल्यू में भी प्रकरण दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि विजयवर्गीय से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा ले लेना चाहिए।

"निगम परिषद का था निर्णय"
लोकायुक्त जांच के कोर्ट के आदेश पर उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने शनिवार को यहां कहा कि इस प्रकरण में उनके महापौर पद के कार्यकाल में सिर्फ नामान्तरण की कार्रवाई हुई है। यह निर्णय निगम परिषद का था। जांच के बाद सब स्पष्ट हो जाएगा। विजयवर्गीय ने कहा कि उन पर और भी आरोप लगे हैं। कोर्ट ने जांच का आदेश दिया है। जांच हो जाने दीजिए। इसके बाद ही कुछ कह सकेंगे। वे राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के बुलावे पर संगठन से जुड़े मसलों पर चर्चा के लिए पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे।

न्यायालय ने जांच के आदेश दिए हैं। जल्द ही दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। संगठन स्तर पर इस मामले में कोई बात नहीं हुई है।
-नरेन्द्र सिंह तोमर, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष

निजी हाथों में सुगनीदेवी कॉलेज!


इंदौर। सुगनी देवी कॉलेज पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी कॉलेज को सालाना पैसा देने के साथ हर तरह की जिम्मेदारी से हाथ खींचने की तैयारी में है। कार्य परिषद की अगली बैठक में भी इस पर विचार-विमर्श किया जाएगा। चर्चा कॉलेज को निजी हाथों में सौंपे जाने की है।

पिछले आठ साल से कॉलेज का संचालन यूनिवर्सिटी द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए हर साल लगभग 14 लाख रूपए यूनिवर्सिटी और इतनी ही राशि शासन द्वारा दी जाती है। कुछ पैसा सेल्फ फायनेंस कोर्सेüस से आने वाली फीस से आता है। शुरू से ही घाटे का सौदा मानकर यूनिवर्सिटी ने इसमें रूचि नहीं ली। परिणामस्वरूप आठ साल में भी कॉलेज खुद का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है। साल में दी जाने वाली मोटी रकम अब यूनिवर्सिटी को अखरने लगी है। हालत यह है कि आधा जनवरी खत्म होने के बाद भी फैकल्टी के वेतन की राशि जारी नहीं की गई। यूनिवर्सिटी प्रशासन इस मामले पर बोलने को तैयार नहीं है। हालांकि दबी जुबान से यह जरूर कहा जा रहा है कि आखिर कॉलेज को पैसा कब तक दें?

भाजपा नेता की निगाह

इस बीच मिल क्षेत्र के कद्दावर भाजपा नेता इसे लेने में रूचि दिखा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार पार्टी में गहरी पैठ रखने वाले भाजपा नेता के दो समर्थक पिछले दिनों कुलपति डॉ. अजीतसिंह सेहरावत से भी इस मामले को लेकर मिल चुके हंै। यदि कोई बड़ा रोड़ा नहीं आता है तो यह कॉलेज जल्द ही निजी हाथों में चला जाएगा। 2010 में ही जमीन की लीज का नवीनीकरण किया जाना है। इसी दौरान स्थानांतरण की कार्रवाई भी संभावित है।

बढ़ेगा आर्थिक बोझ
शासन से अनुदान होने के कारण यहां फीस ज्यादा नहीं है। निजी हाथों में कॉलेज जाने के बाद प्रबंधन मनमानी फीस वसूलेगा, जिससे गरीब विद्यार्थियों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।

ये है इतिहास
कपड़ा मिलों के मजदूरों की बेटियों को उच्च शिक्षा देने के लिए हुकमचंद मिल के कैलाश अग्रवाल ने कॉलेज खोलने का सपना देखा। निगम से 99 साल की लीज पर जमीन लेकर 1982 में कॉलेज स्थापित किया गया। मिल के बंद होने पर अग्रवाल ने इसे चलाने से मना कर दिया। शासन को भी इस संबंध में अवगत कराया गया। 2003 में देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी ने छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखकर इसे गोद ले लिया। शासन को साक्षी मानते हुए यूनिवर्सिटी और अग्रवाल ग्रुप के ओंकार चेरेटी ट्रस्ट के बीच एक एमओयू साइन हुआ। शासन ने भी अनुदान राशि देने की घोषणा कर दी।

- कार्य परिष्ाद की अगली बैठक में सुगनी देवी को दिए जाने वाली राशि पर चर्चा की जाएगी। पैसा देने की भी हमारी अपनी सीमा है। इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता।
डॉ. अजीतसिंह सेहरावत, कुलपति