Thursday, August 10, 2017

सालाना 25 करोड़ की वसूली से अवैध इमारतों का अड्डा बना इंदौर

इंदौर. विनोद शर्मा।
अवैध इमारतों को संरक्षण देने का गठजोड़ नगर निगम के जोनल कार्यालयों से लेकर मुख्यालय तक फैला हुआ है। इसीलिए बिल्डिंग आॅफिसर्स(बीओ) से लेकर बिल्डिंग इंस्पेक्टर्स (बीआई) तक मलाईदार जोन दिए हैं। बशर्ते करें वहीं जो मुख्यालय चाहता है। इन जोनों पर पदस्थ बीओ और बीआई मिलकर 10 से 15 लाख रुपए/महीना कमा रहे हैं। हिस्सेदारी के बटवारे के बाद भी 7-8 लाख रुपए तो घर जाते ही हैं। एक आंकलन के अनुसार अवैध इमारतें बचाकर निगम के नुमाइंदे हर साल  22 से 25 करोड़ रुपए कमाते हैं।
राजनीतिक संरक्षण और पैसे के भूखे अधिकारियों ने इंदौर को अवैध इमारतों का अड्डा बना दिया है। ऐसा कोई जोन ही नहीं बचा जहां अवैध इमारतें न हो। नक्शा मंजूर कराकर उसे किनारे रखना और मनमाफिक निर्माण करना इंदौर में ट्रेंड बन चुका है। इस ट्रेंड का हिस्सा बनने में बिल्डर, डॉक्टर, एज्यूकेशन इंस्टिट्यूट, कोचिंग इंस्टिट्यूट, होटल संचालक भी पीछे नहीं रहे। उधर, नक्शा मंजूरी से लेकर रिमूवल नोटिस देकर बिल्डिंग बचाते तक के लिए बीओ और बीआई अपना रेटकार्ड लिए बैठे हैं।
फिर क्यों नहीं रूकती अवैध मंजिलें...
एक बीओ की तनख्वाह 50 से 60 हजार तक है। उसे गाड़ी, ड्राइवर, वायरलेस सेट, मोबाइल बिल दे रखे हैं ताकि वह फील्ड में घूमकर सुनिश्चित कर सकें कि अपने क्षेत्र में बिल्डिंगे ईमानदारी से बने। इस काम में उसका हाथ बटाने के लिए बीआई और दरोगा-बेलदार नियुक्त है। बीआई का मासिक वेतन 35 से 45 हजार तक है। वायरलेस सेट है। कुछ बीआई को गाड़ियां भी अलॉट है। इतने सबके बाद में न सिर्फ गली, मोहल्ले बल्कि मुख्यमार्ग और निगम मुख्यालय के नजदीक ही अवैध बिल्डिंग बन चुकी है।
पार्षद भी देते हैं मौका, पर 50-50 में
बीओ-बीआई को पार्षद भी मामले बताते हैं। इन मामलों में नोटिस या रिमूवल कार्रवाई के दौरान बचाने के लिए जो पैसा मिलता है उसमें पार्षद के साथ 50-50 प्रतिशत की हिस्सेदारी रहती है।
लेन-देन का गणित..
नक्शा मंजूरी : 25 हजार से लेकर... बिल्डिंगे के आकार-प्रकार और नक्शा मंजूर कराने की जल्दबाजी के आधार पर तय होता है। कुछ ज्यादा तिकड़म नहीं करते। फिर भी 10-15 हजार तो मिल जाते हैं।
कारण बताओ नोटिस : किसी की शिकायत या मौका निरीक्षण के बाद कारण बताओ नोटिस देते हैं। कभी मालिकाना हक के प्रमाण मांगते हैं, कभी स्वीकृत नक्शा। जबकि दोनों अधिकारियों के पास ही रहते हैं। इस नोटिस से कमसकम 50 हजार तो मिल जाते हैं।
रिमूवल नोटिस : इस नोटिस के बाद कार्रवाई रूकवाने या कार्रवाई के दौरान निर्माण बचाने के नाम पर 50 हजार से लेकर...। स्वीकृत नक्शे, अवैध निर्माण के साथ ही बिल्डर को होने वाली नुकसानी के आधार पर तय।
(अच्छे जोन पर बीओ को 10-15 लाख और बीआई को 5-7 लाख रुपए महीना मिल जाता है। वहीं पिछड़े से पिछड़े जोन पर भी बीओ को 5-7 लाख रुपए और बीआई को 2-3 लाख रुपए/महीने तक की कमाई हो जाती है। दोनों की औसत कमाई 10 लाख है तो सालाना 22.80 करोड़ की वसूली होती है।)
इनकी बोल रही है तूती...
विष्णु खरे : सिटी प्लानर की पोस्ट क्रिएट करके इन्हें भोपाल से भेजा गया है। 13 नंबर जोन के बीओ रहे। सर्वानंदनगर की अवैध होटलें, होस्टल इन्हीं के राज में फलीभूत। ट्रूबा कॉलेज की गडबड़ बस पकड़ी ही।
महेश शर्मा : सिटी इंजीनियर बिल्डिंग पर्मिशन है। मुख्यालय के साथ 8, 9, 10 और 12 नंबर जोन के बीओ। समय कम दे पाते हैं जोनों पर। इसीलिए बीआई-मुख्यालय दिनेश शर्मा को अपनी डोंगल दे रखी है। किसी भी जोन के नक्शे के मामले में राय दिनेश शर्मा को लेने को कहते हैं। सिंधी बाहुल्य इलाके हैं। इनके पास 8 से 10 लाख रुपए/महीने तक मिलते हैं। यहां बीआई 50 हजार रुपए/रोज तक वसूल चुके हैं। उसमें बीआई की हिस्सेदारी भी थी।
दिनेश शर्मा : बीआई-मुख्यालय हैं। ‘जितना कानून-कायदा, उतना ज्यादा फायदा’ यही इनका सिद्धांत है। कई बीआई के गुरु हैं। मासिक कमाई भी जबरदस्त। 5-7 लाख रुपए/महीने की कमाई।
अश्विन जनवदे : बिल्डिंग पर्मिशन के पुराने खिलाड़ी। एक बार कमिटमेंट कर दे तो फिर अपने आप की भी नहीं सुनते। हरसिद्धि जोन पर रहे। मेट्रो टॉवर को नोटिस दिया था कार्रवाई नहीं की। अभी जोन-14 आर 15 के बीओ हैं। दोनों में जबरदस्त निर्माण और जादूगरी जारी है।
वैभव देवोलासे : पिता जल यंत्रालय में रहे। उनकी मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति। परीक्षा अवधि में होने के बाद भी दूसरे बीआई से तीन गुना महंगे बीआई। पूरी छूट रहती है इनकी तरफ से। अभी शिकायत के बाद निगमायुक्त ने पीपल्याहाना बीआई पोस्ट से हटाया।
चाबी मुख्यालय में...
नगर निगम में बीओ और बीआई की संख्या कम है। जो हैं उनमें से आधे उक्त पोस्ट की योग्यता नहीं रखते। संख्या कम होने के कारण किसी को दो जोन का बीओ या बीआई बना रखा है। या किसी बीओ या बीआई को जोनल अधिकारी बना रखा है। मुख्यालय में बैठे दिग्गज ही इनका भाग्य तय करते हैं। जो मुख्यालय का डमरू बन जाता है उसे मौज करने की आजादी मिल जाती है। वरना प्रतीक चतुर्वेदी और सुधीर गुलवे जैसे लोग भी हैं जो कभी बीओ थे लेकिन उन्हें बीआई बना रखा है।
विवेश जैन : भोली सूरत का फायदा मिलता है। बिल्डिंग पर्मिशन में अर्से से। अवैध इमारतों के पोषक हैं। फिर मामला पल्हरनगर में मेहता की बिल्डिंग बख्शने का हो या फिर  474 एमजी रोड या फिर 84 नगर निगम रोड को नजरअंदाज करने का। जोन में काम भले कम हो लेकिन कमाई ज्यादा है। 

पूरा प्लॉट खाली, एमओएस में ही तान दी दो मंजिला इमारत

- सड़क की जमीन भी हजम
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
स्कीम-31, साधु वासवानीनगर, सिंधी कॉलोनी, बैराठी कॉलोनी में अधिकारियों की शह पर अवैध बिल्डिंगे बन रही है। इस कड़ी में साधुवासवानीनगर में एक उदाहरण सामने आया है जहां प्लॉट नं. 444 तो खाली है लेकिन भविष्य में मिलने वाले एमओएस और सड़क की जमीन पर जी+2 बिल्डिंग जरूर तन चुकी है। लगातार शिकायतों के बावजूद इस बिल्डिंग पर कार्रवाई नहीं हुुई। उलटा, बनकर बिक गई।
वार्ड-65 में सिंधीकॉलोनी की गली नंबर-4 में करमचंद अपार्टमेंट के पास 444 साधूवासवानीनगर  का प्लॉट है। प्लॉट मालिक हकीकत राय पुरस्वानी हैं जो कि मुलत: बिल्डर है। नगर निगम की भवन अनुज्ञा शाखा द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार प्लॉट नं. 444 सी पर आरतलाल वाधुमल के नाम से नक्शा पास है जबकि 444 ई पर दीपक कुमार बालचंदानी का घर बना है। दोनों प्लॉटों के बीच पुरस्वानी का प्लॉट नं. 444 है जिसका अब तक नक्शा मंजूर नहीं हुआ है। मौके पर प्लॉट खाली भी पड़ा है। बावजूद इसके इस प्लॉट के उस पिछले हिस्से में जी+2 बिल्डिंग बन गई है जो नक्शा स्वीकृति के दौरान बेक एमओएस के रूप में खाली छोड़ा जाना चाहिए था। थोड़ा एमओएस और थोड़ी सड़क की जमीन हजम करके बिल्डिंग भी पुरस्वानी ने ही खड़ी की है। बताया जा रहा है कि बिल्डिंग प्रकाश भाटिया को बेच भी दी है।
दूसरी बिल्डिंगों से आगे है
्रबिल्डिंग पुरस्वानी के प्लॉट के पिछले हिस्से में 10 बाय 40 और सड़क की 3 बाय 40 फीट जमीन पर बनी है। ऐसे कुल 13 बाय 40 पर जी+2 कंस्ट्रक्शन है।
पहला मामला है क्षेत्र में ऐसा
शिकायतकर्ता गोपाल कोडवानी ने बताया कि मकान बनाने से पहले ही एमओएस हजम करने का ऐसा यह क्षेत्र का पहला मामला है जिसने सभी को चौका दिया है। हालांकि पुरस्वानी के इस कारनामें को क्षेत्रीय भवन अधिकारी महेश शर्मा नजरअंदाज कर रहे हैं। कई बार शिकायतें की। स्वयं निगम की बिल्डिंग पर्मिशन शाखा लिखकर दे चुकी है कि उक्त बिल्डिंग का कोई नक्शा स्वीकृत नहीं है। ऐसे में समझ नहीं आता कि आखिर इस बिल्डिंग को बख्शा क्यों जा रहा है।
कभी नोटिस देते हैं, कभी झूठी जानकारी
जनसुनवाई में भी तीन बार शिकायतें की है। सात बार सीएम हैल्पलाइन पर शिकायत की। बार-बार महेश शर्मा सीएम हैल्पलाइन पर 444 के स्वीकृत नक्शे और परिवार के रहने की झूठी जानकारी दे देते हैं। वह भी तब जब महेश शर्मा ने ही 20 अक्टूबर 2016 को भवन मालिक हकीकतराय पुरस्वानी को कारण बताओ नोटिस (911/2016) जारी किया था। नोटिस के अनुसार संपूर्ण निर्माण एमओएस में था। 

बिना नक्शे के तन गया गंदवानी वेअरहाउस-चौथवानी कारखाना

- मुंडलानायता में अधिकारियों की अनदेखी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
पंचायती नक्शों की आड़ में नगर निगम सीमा में जुड़ी पंचायतों में भारी खेल हो रहा है। इसका बड़ा उदाहरण ग्राम मुंडला नायता में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीएंडसीपी) और नगर निगम की अनुमति के बिना ही चौथवानी और गंगवानी परिवार ने वेअर हाउस और बड़ा सा कन्फेक्शनरी कारखाना तान दिया। इस कारखाने में क्षेत्रीय पार्षद और बिल्डिंग आॅफिसर्स से लेकर बिल्डिंग इंस्पेक्टर्स की भारी रूचि है। पार्षद और अधिकारियों की एक खेप अपना जढ़ावा भी ले चुकी है।
मामला मुंडलानायता का है जो कि 2013-14 में ही नगरसीमा विस्तार के कारण नगर निगम सीमा में आ चुका है। यहां सर्वे नं. 8/1 और 8/2 की 3.498 एकड़ जमीन का है। राजस्व रिकार्ड के अनुसार उक्त जमीन 11 विद्यानगर निवासी पुष्पा पति आनंदराम चौथवानी के नाम दर्ज है। दुग्गल पेंट्स एंड केमिकल्स के सामने इसी जमीन पर जी+2 कारखाना बना है। इसके साथ ही पोहेवाले कमल गंदवानी के पास करीब 6500 वर्गफीट पर जी+1 एक बड़ा गोदाम बना है जिसे गंदवानी वेअर हाउस बताया जा रहा है जो कि कमल गंदवानी का है।
नगर निगम से कोई नक्शा मंजूर नहीं है
नगर निगम के राजस्व रिकार्ड और भवन अनुज्ञा शाखा में उक्त दोनों निर्माण का जिक्र नहीं मिला। जोन पर पदस्थ रहे भवन निरीक्षक वैभव देवलाशे ने भी मौके पर जाकर जांच की थी। मामले में पार्षद पुष्पा बसंत पारगी भी गंदवानी से बात कर चुके हैं। लगातार शिकायतों के बाद देवलाशे दूसरी बार मौका देखने पहुंचे लेकिन उसी दिन उन्हें शिकायतों के आधार पर जोन से हटा दिया। जोन पर पदस्थ अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि मौके पर निर्माण बिना नक्शे के हो रहा है।
क्यों अवैध है कारखाना
जिस मुंडला नायता पंचायत से कारखानों का नक्शा मंजूर करना बताया जा रहा है नगर निगम सीमा में गांव के विलय के बाद 2013 से ही उसके अधिकार समाप्त हो चुके हैं। पंचायत राज अधिनियम की धारा-55 के तहत ग्राम पंचायत किसी भी इमारत का नक्शा पास कर सकती है। हालांकि इस स्वीकृति की अवधि सिर्फ एक वर्ष रहती है। यानी जिस साल में मंजूरी ली गई है उसी साल में काम शुरू करना जरूरी है। अन्यथा मंजूरी स्वत: ही निरस्त हो जाती है। चूंकि 2013 में पंचायत के अधिकार समाप्त हो चुके थे लिहाजा यदि मंजूरी दी भी होगी तो 2012 में जो कि 2013 में स्वत: ही रद्द हो गई। क्योंकि बिल्डिंग का काम शुरू हुआ है जुलाई 2016 के बाद।
पैसे मांगने वालों ने परेशान कर दिया
जब अवैध निर्माण के संबंध में क्षेत्रीय पार्षद पुष्पा पति बसंत पारगी से बात की तो उन्होंने कहा कि मुझे वैध-अवैध की जानकारी नहीं है। यह जांचना अधिकारियों का काम है। मुझे तो इतना पता है कि गंदवानी को फोन लगाकर पैसा मांगने वाले आते रहते हैं। कभी पत्रकार तो कभी कौन..।
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मैं मौके पर जांच करता, उससे पहले मेरा ट्रांसफर हो गया
मामला संज्ञान में आया था। शिकायतें भी मिली। मैं मौके पर पहुंचा उसी दिन मेरा जोन से ट्रांसफर हो गया था। आगे क्या हुआ मुझे नहीं मालूम।
वैभव देवलासे, जोन से हटाए गए भवन निरीक्षक
(मौजूदा भवन निरीक्षक सुधीर गुलवे के फोन पर दो दिन तक संपर्क किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।)

बांगर की ‘श्री’ सुशील-मुकेश के भरौसे

उज्जैन से इंदौर तक फैला है जोड़ी का रीयल कारोबार
इंदौर. विनोद शर्मा ।
उज्जैन के जिन आनंद बांगर और विष्णु जाजू की कंपनियों पर इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन विंग गुरुवार से छापेमार कार्रवाई कर रही है उनकी जमीन सुशील जैन ‘गिरिया’ और मुकेश रांका के भरौसे टिकी है। सुशील-मुकेश वैसे तो उज्जैन के रहने वाले हैं लेकिन इंदौर में भी इनका कामकाज अच्छा जमा हुआ है। दोनों बांगर की कंपनियों में डायरेक्टर है। यह भी सामने आया कि बांगर ने स्क्रैप बताकर पेपर खरीदा। बंद बताकर मिल खरीदी।
श्रीजी पॉलिमर इंडिया प्रा.लि. समूह पर इनकम टैक्स ने गुरुवार को छापेमार कार्रवाई की थी तो जो कि लगातार दूसरे दिन भी जारी रही। दूसरे दिन प्रॉपर्टीज के पेपर्स में 4 नयापुरा उज्जैन निवासी सुशील जैन और 18 नयापुरा निवासी मुकेश कुमार रांका का नाम भी सामने आया। सुशील-राका र्पाश्व वीर बिल्डर्स एंड डेवलपर्स प्रा.लि., आरएम विनो एस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. और सिक्योर प्रॉपर्टीज प्रा.लि. जैसी कंपनियों में 2010 से डायरेक्टर है। जमीनी सौंदो में दोनों का नाम इंदौर-उज्जैन तक चर्चा में रहता है। आर्यन वेअर आउस के नाम से दोनों का आॅफिस 102 वरूण टॉवर मीरापथ इंदौर में भी है। दोनों फर्जीवाड़े के डॉक्टर है इसीलिए बच्चों को सीए भी बनाया ताकि वह कागजी मामले संभाल सके।
2003 और 2013 में हो चुका है सर्वे
मुकेश रांका पर इनकम टैक्स की सर्च 25 सितंबर 2003 को हो चुकी है। भारी अनियमितता मिली। मुकेश रांका ने 1.1 करोड़ सरेंडर किए। सुशील जैन ने 14 लाख सरेंडर किए। मामला 2007 में अपील कमिश्नर और 2011 में आईटीएटी पहुंचा। 20 फरवरी 2017 को उज्जैन में जो सरकारी शादी हुई उसमें दोनों ने पायल सेट वितरित किए थे।
प्रॉपर्टी कारोबारी सुशील-मुकेश के ठिकानों पर दिसंबर 2013 में इनकम टैक्स सर्वे की कार्रवाई भी कर चुका है। बिल्डरों ने लाखों रुपए के ट्रांजेक्शन करने के बाद भी टीडीएस जमा नहीं किया था। जांच में यह भी पता चला है कि इन दोनों बिल्डर्स के नाम से कई फर्मों का संचालन किया जा रहा है।
‘अर्थ’ ही नहीं ‘करंट’ भी दिया बांगर को...
नीमच बायोमास एनर्जी प्रा.लि. भी दोनों की है। इसीलिए दोनों ने बांगर और जाजू को न सिर्फ अर्थ (जमीन) के धंधे की बारीकियां सिखाई। वहीं बांगर को करंट (एनर्जी) के क्षेत्र में आगे बढ़ाया। समूह ने विंड एनर्जी में निवेश किया। विंड प्लांट मंदसौर की दलोदा तहसील के नंदवेल गांव में है। बांगर समूह के डायरेक्टर्स भी नीमच बायोमास एनर्जी प्रा.लि. से जुड़े हैं जिनमें प्रमुख अनुराग सोमानी है। दोनों समूह के बीच आजादनगर उज्जैन निवासी कामिनी अग्रवाल भी डायरेक्टर है।
घरेलू रिश्ता..
मुकेश की जेपीजे एक्जिम प्रा.लि. में सूमन रांका भी डायरेक्टर है जो कि श्रीजी उज्जैन पॉवर लि. की डायरेक्टर भी है। इस कंपनी में उनके साथ कामिनी अग्रवाल और मंगला बांगर भी डायरेक्टर है। मंगला क्वालिटी इंडस्ट्री भोपाल लि. सुशेन रेमेडीज प्रा.लि., श्रीजी उज्जैन पॉवर और व्यंकटेश कोरोगेर्ट्स प्रा.लि. में भी आनंद बांगर के साथ भागीदार है।
बंद बताकर कंपनियां खरीदी...
जांच में यह भी सामने आया है कि बांगर 2005 से फार्म में है। उसने सरकारी अधिकारियों द्वारा समूह में लगाई गई अपनी ऊपरी कमाई से  12 वर्षों में जबरदस्त तरक्की की। कई पेपर और कोरेगेट्ड बॉक्स बनाने वाली कंपनियां खरीदी। इन कंपनियों को खरीदने के लिए बंद और मशीनों को स्कै्रप बताकर खरीदता है बांगर ताकि कम कीमत बताई जा सके। टैक्स बचाया जा सके। उधर, कार्रवाई के दौरान बड़ी केश रकम मिली है। ज्वैलरी सामने आई है जिसका वेल्यूवेशन जारी है। 

श्रीजी में सेंट्रल एक्साइज अफसरों का भी निवेश

- सामने आए आधा दर्जन से अधिक नाम,
- एक असिसटेंट कमिश्नर के घर दो दिन से कार्रवाई जारी
- आधे ठिकानों पर कार्रवाई संपन्न
इंदौर. विनोद शर्मा ।
इनकम टैक्स उज्जैन की जिस श्रीजी पॉलिमर प्रा.लि. के खिलाफ छापेमार कार्रवाई कर रहा है उसमें सेंट्रल एक्साइज और वाणिज्यिक कर विभाग के अधिकारियों के अधिकारियों ने भी बेनामी निवेश कर रखा है। सबसे ज्यादा पैसा सेंट्रल एक्साइज के उन अधिकारियों का लगा है जो विभिन्न अवसरों पर श्रीजी पॉलिमर या समूह के खिलाफ छापेमार कार्रवाई कर चुके हैं। कुछ रिटायर हो चुके हैं तो कुछ का इंदौर से मुंबई ट्रांसफर हो चुका है।
आनंद बांगर और विष्णू जाजू की कंपनियों पर इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन विंग गुरुवार से छापेमार कार्रवाई कर रही है। तीसरे दिन भी कार्रवाई जारी रही। शनिवार तक अन्य प्रदेशों सहित आधे से अधिक स्थानों पर कार्रवाई संपन्न हो चुकी थी। बांगर-जाजू के मूल ठिकानों पर कार्रवाई जारी है। डिपार्टमेंट ने ज्वैलरी का वेल्यूवेशन भी शुरू कर दिया है।  कार्रवाई 94/1 चंद्रलोक कॉलोनी स्थित दत्ता निवास पर भी जारी है। यह जीएसटी सेंट्रल एक्साइज के असिसटेंट कमिश्नर सुनील दत्ता और उनके बेटे व बांगर के भागीदार कोविद दत्ता का घर है। दत्ता के अलावा भी इनकम टैक्स के हाथ सेंट्रल एक्साइज के आधा दर्जन ऐसे अधिकारियों के नाम लगे हैं जो समूह में निवेश करके बैठे हैं। सभी दत्ता के साथ इंदौर, उज्जैन और पीथमपुर में भी पदस्थ रहे हैं। खास बात यह है कि निवेश करने वालों में वे अधिकारी भी शामिल हैं जिनके नेतृत्व में श्रीजी पॉलिमर पर रेड हो चुकी है या फिर जिन्होंने रेड में अहम भूमिका निभाई। इन सबकी सेटिंग दत्ता ने ही करवाई थी।
रेड हुई लेकिन केस नहीं बने
इधर, सेंट्रल एक्साइज के अधिकारिक सूत्रों की मानें तो डिपार्टमेंट ने 2003-04 में आखिरी रेड की थी बांगर की कंपनियां पर। जिसमें केस भी बना। इसके पहले और इसके बाद कई ऐसी रेड हुई जो सिर्फ हुई ही केस नहीं बने। बताया जा रहा है कि बांगर की सेंट्रल एक्साइज की अधिकारिक लॉबी में इतनी मजबूत पकड़ है कि कोई भी कमिश्नर उसके समूह के खिलाफ कार्रवाई की इजाजत नहीं देता।
हैदराबाद में भी डाली यूनिट
मक्सी रोड उज्जैन, गोविंदपुरा भोपाल, मालनपुर ग्वालियर के बाद 2006 में श्रीजी समूह ने 13 करोड़ रुपए का निवेश करके देवास में री-साइकिल पेपर प्लांट डाला था। चीनी कंपनियों की मदद से पीथमुपर में पैसा लगाया। अब कंपनी हैदराबाद में बड़ा पैकिंग प्लांट बना रही है। इस प्लांट को आनंद बांगर का भाई संभाल रहा है।
दत्ता ने बनाया नेटवर्क
2005 में प्रिवेंटिव विंग में आए सुनील दत्ता मुलत: उज्जैन के ही रहने वाले है। 23 सितंबर 1959 को जन्में दत्ता ने लोकमान्य तिलक स्कूल उज्जैन से स्कूली और माधव कॉलेज उज्जैन से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 2005 में ही इंदौर में बंगला खरीदा। उनका बेटा है कोविद दत्ता। 22 अपै्रल 1988 को जन्मा कोविद 2011 से विभिन्न कंपनियों में डायरेक्टर है। वह बांगर की लिमिटेड कंपनियों के अलावा 101 गोल्ड स्टार बिल्डिंग 576 एमजी रोड के पते रजिस्टर्ड बेटरस्टेप ट्रेडिंग प्रा.लि. में कैलाश गर्ग के साथ पार्टनर है। वहीं अंधेरी-मुंबई के पते पर पंजीबद्ध मसाला रिपब्लिक प्रा.लि. में भी डायरेक्टर। इस कंपनी में सुमितकुमार दत्त, चिराग कनक्रेचा, रवि लुथरिया जयप्रकाश भी भागीदार है। 

10 लाख बांटकर बचाया कारखाना-गोदाम

मुंडला नायता में मनमानी
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
मुंडला नायता में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के ले-आउट और नगर निगम से नक्शा स्वीकृति के बिना जो कारखाना और गोदाम तना है उसे बचाने के लिए निर्माणकर्ता नगर निगम के अफसरों और क्षेत्रीय पार्षद को अच्छी खासी रकम अदा कर चुका है। पैसा प्राप्त करने वालों में भवन निरीक्षक से लेकर भवन अधिकारी तक शामिल है। हालाकि भवन निरीक्षक का ट्रांसफर हो चुका है लेकिन नए भवन निरीक्षक ने अब तक मौका नहीं देखा।
मामला मुंडलानायता का है। जहां 11 विद्यानगर निवासी पुष्पा पति आनंदराम चौथवानी के नाम दर्ज सर्वे नं.  8/1 और 8/2 की 3.498 एकड़ जमीन पर कैसे गोदाम और कारखाने आकार लेने लगे इसका खुलासा दबंग दुनिया ने बीते दिनों किया था। बावजूद इसके 19 नंबर जोन के अधिकारियों ने मौके पर जाकर निर्माण की वैधानिकता जांचने की कोशिश नहीं की। उलटा, कभी बेक डेट में नक्शा मंजूर कराने तो कभी कंपाउंडिंग का आवेदन करने तो कभी स्टे के लिए कोर्ट जाने की सलाह दी जा रही है।
शिकायतकर्ताओं से लेकर जांचकर्ताओं तक को साधा
दुग्गल पेंट्स एंड केमिकल्स के सामने इसी जमीन पर जी+2 कारखाना बना है। वहीं पास में कमल नंदवानी ‘टेस्टी पोहा’ वाले का गोदाम भी बन रहा है जिसकी भी कोई अनुमति नहीं है। बताया जा रहा है कि मामले में कभी शिकायत करते रहे पार्षद पति बसंत पारगी की बैठक नंदवानी से हो चुकी है। इसके बाद एक बैठक नंदवानी और वैभव देवलासे की भी हो चुकी है जो कि यह कहते रहे कि उनके मौके पर पहुंचने से पहले ही उनका ट्रांसफर कर दिया गया था। अब तक 10 लाख रुपए लगा चुके हैं नंदवानी अपने निर्माण को बचाने के लिए।
फर्जी है पंचायती नक्शा
कमल नंदवानी का एक कारखाना सर्वे नं. 5/3 मुंडलानायता में चल रहा है जिसकी वैधानिकता भी संदेहास्पद है। इस कारखाने को चिराग नंदवानी संभालते हैं। नगर निगम से प्राप्त जानकारी के अनुसार मौके का नक्शा पास नहीं है। चार साल पहले निगम सीमा में विलय हो गई मुंडलानायता पंचायत का नक्शा दिखाकर फर्जी तरीके से निर्माण किया जा रहा है। जबकि पंचायत राज अधिनियम की धारा-55 के तहत ग्राम पंचायत द्वारा स्वीकृत नक्शे की अवधि सिर्फ एक वर्ष रहती है। 

‘रेरा’ : कंपलीशन से बिल्डरों का किनारा

- नगर निगम ने थमाए 200 नोटिस, सर्टिफिकेट के लिए एक आवेदन नहीं
- आज आखिरी तारीख
इंदौर. विनोद शर्मा ।
सोमवार को 31 जुलाई है...। रीयल एस्टेट रेग्यूलेटरी एक्ट (रेरा) पंजीयन के लिए कंपलीशन सर्टिफिकेट लेने की आखिरी तारीख...। नगर निगम ने 200 प्रोजेक्ट्स को नोटिस थमाकर 31 जुलाई तक कंपलीशन सर्टिफिकेट लेने को कहा है लेकिन अब तक गिनती के लोगों ने भी आवेदन नहीं किए। उलटा, कंपलीशन से किनारा करते हुए बिल्डरों ने लिखित जवाब देते हुए कहा कंपलीशन लेकर रेरा से बचने से बेहतर है रेरा में पंजीयन करवाना। अब कंपलीशन सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब कॉलोनाइजर-बिल्डर प्रोजेक्ट का रेरा पंजीयन करवा लेंगे।
1 मई से रेरा लागू है। 31 अपै्रल से पहले के उन्हीं प्रोजेक्ट को रेरा पंजीयन से छूट प्राप्त होगी जिनके पास कंपलीशन सर्टिफिकेट हो।    इसीलिए रेरा के मद्देनजर नगर निगम ने कंपलिशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन की समयसीमा 28 अपै्रल और सर्टिफिकेट जारी करने की समयसीमा 31 जुलाई तय की थी। समयसीमा करीब-करीब खत्म हो चुकी है लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि तमाम आपाधापी के बावजूद रविवार रात तक किसी ने कंपलीशन में रुचि नहीं ली। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कंपलिशन से किनारा कर रहे हैं।
200 नोटिस जारी...
बताया जा रहा है नगर निगम में तीन तरह के प्रोजेक्ट हैं जिनके कंपलीशन सर्टिफिकेट जरूरी है। पहला किसी कॉलोनी के प्लॉट  पर तनी बिल्डिंग जिसका नक्शा बिल्डिंग पर्मिशन से जारी होता है। जहां कंपलीशन भी बिल्डिंग पर्मिशन को ही देना है। दूसरा वह बिल्डिंग जो किसी खसरे नंबर के आधार पर स्वीकृत हुई है जो कि कॉलोनी सेल में आती है। सेल ही इन्हें कंपलीशन देती है। तीसरी कॉलोनियां जो भी कॉलोनी सेल का हिस्सा है।
अब तक कॉलोनी सेल ने करीब 200 नोटिस दिए हैं। इनमें 70 कॉलोनियां हैं और 60 खसरों की जमीन पर तनी मल्टियां। इन प्रोजेक्ट्स पर कहीं एक साल से काम जारी है, कहीं दो-तीन या चार साल से। इसके अलावा करीब 70 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जो पंचायत द्वारा बिना कंपलीशन सर्टिफिकेट के नगर निगम को हस्तांतरित किए गए हैं।
किनारा क्यों?
- मप्र भूमि विकास अधिनियम के तहत किसी भी प्रोजेक्ट की पूर्णता जांचने के बाद ही नगरीय निकाय कंपलीशन सर्टिफिकेट जारी कर सकते हैं। सर्टिफिकेट जारी करने का मतलब है कि अधिकारी सुनिश्चित कर चुके हैं कि मौके पर स्वीकृत नक्शे के आधार पर ही निर्माण हुआ है। जो कि इंदौर जैसे शहर में संभव नहीं है। इसीलिए अधिकारी भी कंपलीशन नहीं देते।
-  बनने से पहले ही पूरी बिल्डिंग बिक जाती है। बिल्डर कंपलीशन सर्टिफिकेट का इंतजार भी नहीं करता। निगम ने जितने भी नोटिस दिए हैं उनमें से 70 प्रतिशत प्रोजेक्ट में दिक्कत यही है कि माल बिक चुका है लेकिन कंपलीशन नहीं है। एग्रीमेंट करके धरोहर के प्लॉट/फ्लैट तक बेचे जा चुके हैं। इसीलिए बिल्डरों ने लिखित में निगम को जवाब दे दिया है कि वे रेरा से राहत नहीं चाहते। वे रेरा पंजीयन करवा लेंगे। इसीलिए कंपलीशन सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।
कंपलीशन नहीं तो धरोहर नहीं छूटेगी
नगर निगम से कंपलीशन लेना जरूरी भी है क्योंकि उसके बिना धरोहर के रूप में रखे प्लॉट, फ्लैट या दुकान निगम नहीं छोड़ेगा।


कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं देने पर
ऐसे केस जिसमें बिल्डर को अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला है ग्राहक म्युनसिपल आॅफिस में आरटीआई लगाकर इसकी कॉपी मांग सकता है। अगर बिल्डर को ये सर्टिफिकेट मिल गया है और वो ग्राहक को नहीं देना चाहता है तो ग्राहक कंज्यूमर कोर्ट जा सकता है।