Wednesday, May 11, 2016

सहयोग और सेवा का सिंहस्थ

हर दिन 50 हजार को आसरा, 15 लाख को खाना 
संत-महंतों और सामाजिक संस्थाओं ने की श्रृद्धालुओं के ठहरने-खाने-पीने की व्यवस्था
उज्जैन से विनोद शर्मा । 
सिंहस्थ 2016 बीते सिंहस्थ से विविध है। इस बार यहां न सिर्फ संतों के प्लॉटों की संख्या बढ़ी बल्कि सामाजिक संस्थाओं ने भी दोनों हाथ खोलकर श्रृद्धालुओं की सेवा शुरू कर दी है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो संतों और सामाजिक संस्थाओं के कैंप में न सिर्फ 50 हजार से अधिक श्रृद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है बल्कि हर दिन करीब 15 लाख लोगों को इनके अन्नक्षेत्र में भरपेट भोजन भी मिलेगा। जांच और प्राथमिक उपचार से लेकर आॅपरेशन थिएटर की व्यवस्थाएं भी यहां की गई हैं। 
    सिंहस्थ के सतरंगी इंद्रधनूष में एक रंग है सेवा का जिसके लिए न साधु पीछे है न सामाजिक संस्थाएं। प्रखर परोपकार मिशन ने 72 बेड का हॉस्पिटल बनाया है तो प्रभू प्रेमी संघ ने 10 बेड का हॉस्पिटल। ओम नम: शिवाय मिशन ने चार बेड लगाएगा। जांच करेगा। सलाइन चडाएगा। एम्बुलेंस चलाएगा। ऐसी व्यवस्थाएं तकरीबन दो दर्जन कैंप में है। नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर ने भी अपना कैंप लगाया जहां विकलांगों को उपकरण वितरित होंगे वहीं उपकरण देकर विकलांगों को शिप्रा स्नान की जिम्मेदारी ली है स्वामी चिदानंद सरस्वती  के परमार्थ निकेतन आश्रम ने। श्री पंच तेरह भाई त्यागी खालसे की योग चेतना विज्ञान धर्मार्थ सेवा संस्थान और सेवा संघ भी नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा दे रहा है। 
अन्न क्षेत्र बड़ा आधार
सिंहस्थ में पधारे तकरीबन सभी बड़े संतों, महंतों और सामाजिक संगठनों ने अपने प्रकल्प या कैंप में अन्न क्षेत्र (भंडारा और प्रसाद वितरण) की व्यवस्था की है। छोटे-छोटे प्रकल्पों में भी संतों, महंतों और श्रृद्धालुओं को भोजन कराया जा रहा है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो छह जोन में सिंहस्थ में करीब 1200 कैंप में भोजन की व्यवस्था है। औसत हर कैंप में सुबह-शाम एक हजार लोगों को भोजन मिल रहा है तो इसका मतलब यह है कि हर दिन 12 लाख लोगों के खाने की व्यवस्था तो इन कैंपों में ही हो चुकी है। मानें 30 दिन में 4.50 करोड़ लोग कैंप में प्रसाद पाएंगे। 
मेन्यू भी जानदार-जायकेदार : इन कैंप में भंडारे के नाम पर सिर्फ पूरी-सब्जी नहीं मिल रही है। कहीं दाल-चावल-रोटी और दो सब्जी है तो कहीं हलवा-गुलाब जामून भी मिल रहा है। वह भी शुद्ध देशी घी से। मतलब जिसे मिलावट से बचना है वह भी वहां देशी घी में बने व्यंजनों का लाभ ले सकता है। 
खाने का गणित : उज्जैन में खाने की सबसे सस्ती प्लेट 40 रुपए की है जबकि उसकी और अन्न क्षेत्र में मिलने वाले खाने की गुणवत्ता में जमीन आसमान का अंतर है। फिर भी 40 रुपए के हिसाब से ही जोड़ें तो 15 लाख लोग हर दिन 6 करोड़ और पूरे सिंहस्थ में 180 करोड़ का। उल्लेखनीय यह है कि संतों को जो राशन का सरकारी कोटा मिला है उसमें अन्न क्षेत्र के लिए अनाज नहीं दिया गया है। अनाज सिर्फ आश्रम में रहने वाले स्थाई सदस्यों को ही दिया जा रहा है। हालांकि अन्न क्षेत्र के अन्न की व्यवस्था भी दानदाताओं ने ही की है। 
ध्यान सेहत का भी
प्रखर परोपकारी मिशन की सहयोगी संस्था है सेवाधाम जो कि सिंहस्थ में आने वालों को न सिर्फ भोजन कराएगी बल्कि यह भी ध्यान रखेगी कि उन्हें लू न लगे। इसके लिए हर दिन 10 क्विंटल केरी-चिनी-पानी का पना बनाकर वितरित किया जाएगा। इस अन्नक्षेत्र में गैस का इस्तेमाल नहीं होगा। यहां खाना चुल्हें और लकड़ी से बनेगा। कई स्थानों पर छाछ का वितरण हो रहा है। कुछ स्थानों पर पताशे बांटे जा रहे हैं।
चेंजिंग रूम तक बना दिए
सामाजिक और व्यावसायिक संस्थाओ ंने नदी किनारे महिला और पुरुषों के लिए चेजिंग रूम तक बना दिए हैं ताकि कपड़े बदलने में किसी को किसी तरह की असुविधा न हो। 
पानी की प्याऊ की आई बाढ़
बीते सिंहस्थ के अनुभव को देखते हुए शिवराजसिंह चौहान की सरकार ने उज्जैन में सरकारी प्याऊ स्थापित किए हैं वहीं सामाजिक संस्थाएं भी इस काम में पीछे नहीं रही। श्री धाकड़ समाज सिंहस्थ प्याऊ समिति ने जल मंदिर, मप्र वैष्य कल्याण ट्रस्ट ने अमृत जल प्याऊ, अग्रवाल समाज सिंहस्थ समिति ने 500 से अधिक वॉटर हट बनाई है। आज मेला क्षेत्र और शहर में प्याऊ की संख्या 1000 से अधिक है। प्याऊ सामान्य नहीं है। यहां लोगों को आरओ का ठंडा पानी मिल रहा है। 
वनवासियों और मजदूरों का पूरा ध्यान 
इंदौर की सेवा भारती ने भी मैदान संभाल लिया है। सेवा भारती ने भूखी माता क्षेत्र में अपना प्रकल्प बनाया है जहां स्वयं को सनातन धर्म से अलग मानने वाले वनवासियों और आदिवासियों को उज्जैन लाकर ठहराने, खिलाने-पिलाने और शिप्रा स्नान कराकर दोबारा घर तक छोड़ने की जिम्मेदारी संगठन ने ली है। रोटेशन में हर दिन 200 वनवासियों को लाया और घर छोड़ा जाएगा। सिंहस्थ में 6000 वनवासियों को शिप्रा स्नान कराने का संकल्प है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण परिषद ने भी सिंहस्थ से 21 जिलों के वनवासियों को जोड़ा है। इसीलिए वहां भी रहने और खाने की व्यवस्था की जा रही है। 
आवास सुविधा
सिंहस्थ में पधारे तकरीबन हर बड़े संत-महंत ने सिंहस्थ में आने वाले अपने साधकों के ठहरने की व्यवस्था की है। किसी ने घास-फुस की कुटिया में लाइट-पंखे-कुलर की व्यवस्था कर दी है तो किसी की कुटिया में वीआईपी ट्रीटमेंट के मद्देनजर ऐसी और बाथरूम फिटिंग तक है। ऐसी और नॉन ऐसी टेंट और तम्बू भी तैयार हैं। वहीं बड़ी तादाद में प्लायवुड के कमरे बने हैं जो ऐसी व नॉन ऐसी हैं। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो मेला क्षेत्र में तकरीबन 20 हजार कुटिया और कमरे बनाए गए हैं। जहां मोटा-मोटा 40 हजार से अधिक लोगों को ठहराया जा सकता है। ठहरने की व्यवस्था के डोम में भी होगी। कुटिया-कमरे यूं तो फ्री बताए जा रहे हैं लेकिन सूत्रों की मानें तो सेवा-राशि के रूप में इनसे अच्छीखासी वसूली हो सकती है। 

संत             प्लाट नं. 
महामंडलेश्वर अवधेशानंद    ऐसी कुटिया-अन्न क्षेत्र, कथा,
प्रखर परोपकार मिशन     ऐसी कुटिया-अन्न क्षेत्र, रामलीला
पायलेट बाबा         ऐसी कुटिया-अन्न क्षेत्र
अवधुत बाबा         ऐसी कुटिया-अन्न क्षेत्र
विजयशंकर मेहता     ऐसी कुटिया-अन्न क्षेत्र
नित्यानंद स्वामी        ऐसी कुटिया        
श्री राकेश महाराज जी      ऐसी कुटिया, अन्न क्षेत्र, रासलीला
स्वामी रामनारायण दास     ऐसी कुटिया, अन्न क्षेत्र, भजन-कीर्तन
स्वामी सखेसर दास जी    ऐसी-नॉन ऐसी कमरे। स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग। अन्न क्षेत्र। भगवत कथा।
रामतिर्थदास महाराज जी     ऐसी-नॉन ऐसी कमरे। अन्न क्षेत्र, रासलीला
राजेन्द्र कुराचार्य महाराज     ऐसी-नॉन ऐसी कमरे। अन्न क्षेत्र, वृंदावन रासलीला
गणेश दास महाराज जी    ऐसी-नॉन ऐसी कमरे। अन्न क्षेत्र, कथा-भजन
संतोष दास महाराज जी,    नॉन ऐसी। अन्न क्षेत्र, भजन
महामंडलेश्वर रंगनाथ दास  तंबू-टेंट रूम। अन्न क्षेत्र, कथा-भजन 
श्री महंत गोपाल दास जी     रूम, अन्न क्षेत्र
श्री रामसुखद दास जी     कुटिया, अन्न क्षेत्र, भजन 
स्वामी राधा प्रसाद देव     रूम, अन्न क्षेत्र ,किर्तन।
श्री सुख देव दास जी     कुटिया, तम्बू कमरे, अन्न क्षेत्र 
महंत देवराम दास         20 रुम (ऐसी, कूलर), अन्न क्षेत्र 
श्री किशोरदास महाराज     कमरे कूलर वाले, शिवपुराण 
महंत राम बालक दास       कमरे(कूलर ,पंखे),  अन्न क्षेत्र 
महंत परमेश्वर दास     तम्बू, कुटिया, रूम, टेंट(कूलर,पंखे), अन्न क्षेत्र 
 महन्त त्रिलोचन महाराज     रूम,कुटिया, तम्बू, अन्न क्षेत्र, रामायण किर्तन।

स्नान शुक्रवार दोपहर 2 बजे, लोग घाट पर जम गए गुरुवार 7 बजे से

- बिना बिछौने घाट पर ही सो गए श्रृद्धालू 
- दूर की पार्किंग ने लंबा चलाया लेकिन पांडालों की भव्यता और साधुओं के स्वांग ने थकने नहीं दिया 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
सिंहस्थ 2016 के पहले शाही स्नान के लिए भले प्रशासन ने आम नागरिकों को दोपहर 2 बजे बाद का समय दिया हो लेकिन श्रृद्धालुओं ने गुरुवार शाम से ही रामघाट, नर्सिंग घाट, दत्त अखाड़ा घाट, भूखीमाता घाट और कैदारनाथ घाट पर डेरा डाल दिया था। अखाड़ों को लेकर की गई प्रशासनिक प्लानिंग से परे कई लोग कंकर-पत्थर और कीड़े-कांटे की चिंता किए बिना बिछौने के सौ गए तो कुछ  ने रात 10 बजे से ही सूरज के इंतजार में आसमान तांकना शुरू कर दिया था। 
शहरसीमा में लोगों का हुजुम कम देखकर लोग सिंहस्थ की सफलता पर टिका-टिप्पणी करते हुए आगे बढ़े तो मेला क्षेत्र की सड़कों पर पानी तरह फैले जन सैलाब ने उन्हें झूठा साबित कर दिया। मेला क्षेत्र को जोड़ने और परम्परागत घाटों की ओर जाने वाला शायद ही ऐसा कोई रास्ता था जहां पैर रखने की जगह आसानी से मिल रही हो। बिना धक्का-मुक्की के लोग चल रहे हों। घाट से पार्किंग तकरीबन 5 से 7 किलोमीटर दूर थी। फिर भी  रास्तेभर फैले पांडालों की भव्यता, साधु-संतों के सतरंगी रूप और भजन भाव का आनंद लेते ‘हर-हर महादेव’, ‘जय महाकाल’ और ‘नमामी शिप्रे’  का नारा लगाते लोगों का कारवां चलता रहा। मंजिल की ओर बढ़ता रहा। 
पूरे घाट पर सोये थे लोग 
प्रशासन जगह-जगह रात-2 बजे तक घाट खाली करने का अनुरोध कर रहा था। दूसरी तरफ लोग छह बजे से ही बोरिया-बिस्तरा और कपड़े का झोला माथे के नीचे दबाकर घाट पर आराम फरमा रहे थे। सिर्फ रामघाट और दत्त अखाड़ा घाट को छोड़ बाकी घाट सोने और बैठने वालों से भरे पड़े थे। कैदारानाथ घाट जो कि दत्त अखाड़ा मुख्य द्वार के सामने आता है वहां रात 12 बजे पैर रखने की जगह नहीं थी। 
घाट पर ही शुरू हुआ भोजन-भंडारा
दूर से आए ग्रामीण घर से ही पूड़ी-सब्जी-अचार के पैकेट बनाकर लाए थे। लंबी पदयात्रा के बाद जब घाट पर पहुंचे और जगह मिली तब लंबी सांस ली। इसके बाद पहले शिप्रा को प्रणाम किया। हाथ-पैर धोये, आचमन किया और भोजन शुरू कर दिया। भोजन करने के बाद सब आराम में लग गए ताकि सुबह जल्दी उठे और जल्दी स्नान करें। 
कुछ नागा साधु भी इस घाट पर डेरा डालकर बैठे थे।  अमरकंटक से आए चार नागाओं की एक मंडली ने मिट्टी के तीन बड़े-बड़े पत्थर उठाए। जमाए। अंदर कंडा और लकड़ी डाली। आग लगाई। चुल्हा बनाया। एक वक्त के अंगारों को बाहर निकाला और उस पर रोटी-बाटी सेक ली। फिर कंडे लगाए और पहले से उबाल कर रखे बैंगन-आलू को छोटी कड़ाई में डालकर री-फ्राई कर दिया। छोटी-छोटी मस्त अंगारे पर सिकी रोटियों पर घी लगाया और परोसगारी शुरू कर दी। 
आधी रात को लगी झाडू, धूले घाट 
चूंकि दत्त अखाड़े पर सन्यासी और रामघाट पर वैष्णव बैरागी स्नान करना है और उनके स्नान से पहले कोई यहां स्नान नहीं कर सकता। इसीलिए रात 11 बजते ही इन दोनों घाट से लोगों को पुलिस ने बिदा करना शुरू कर दिया। उधर, उज्जैन नगर निगम और ठेकेदार लल्लूजी एंड संस के सफाईकर्मियों ने घाट की झाडू लगाना शुरू कर दी। इसके बाद घाट को पानी से धोना शुरू कर दिया। हवा और लोगों के जुते-चप्पल के साथ चिपकी धूल जैसे ही पानी से साफ हुई दोनों ही घाट पर लगे धोलपुरी लाल पत्थरों से घाट की लालिमा बढ़ गई। 
आने-जाने के  अलग रास्ते
भीड़ मैनेजमेंट के लिए रामघाट पर आने-जाने की व्यवस्था अलग-अलग कर दी गई। दत्त अखाड़ा द्वार के पास से रामघाट की ओर से आने का रास्ता था। घाट तरफ जाने के लिए छोटी रपट का इस्तेमाल किया जा रहा था। 
रास्तों पर लगी वाहनों की भीड़ 
पार्किंग को लेकर पुलिस की प्लानिंग गुरूवार को जबरदस्त गड़बड़ाई। चिंतामण रोड, बड़नगर रोड, सादलपुर रोड, गोनसा रोड, भैरवगढ़,  उन्हेल रोड, आगर रोड की ओर सहित जितनी सड़कें थी वहां शुरूआत में लोगों को नहीं रोका गया। बाद में उन्हें अंदर भी जाने नहीं दिया। लोग कभी विकल्प तलाशते तो कभी  ऐसे रास्ते जहां पुलिस रोके टोके नहीं। इन सब चक्कर में मेला क्षेत्र में आने वाले हर मार्ग पर लोगों की भीड़ लग गई। 

परम्पराओं से परे नागाओं ने भी किया नर्मदा जल से लैस शिप्रा में स्नान

इंदौर. विनोद शर्मा । 
सिंहस्थ मेले में लाखों श्रद्धालु हालांकि अपनी धार्मिक आस्था के मुताबिक शिप्रा में स्नान करेंगे लेकिन इस नदी में हकीकत में नर्मदा का जल बह रहा होगा। वजह यह है कि शिप्रा अपने उद्गम से ही सूख चुकी थी और  किसी एक नदी को टेंकर या बोरिंगों के पानी से भरकर करोड़ों लोगों को स्नान नहीं कराया जा सकता था। हालांकि नर्मदा-शिप्रा संगम के साथ ही शुरू उपजा स्नान का विवाद अब तक कायम है। खत्म नहीं हुआ हालांकि अब साधू-संत भी स्नान में ही रूचि रख रहे हैं, पानी में नहीं। 
 करीब 432 करोड़ रुपए की लागत वाली परियोजना के जरिए शिप्रा को नर्मदा के जल से जीवित किया गया। इस काम को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) ने अंजाम दिया। शुरूआत में जहां इस योजना का बहुत विरोध हुआ वहीं अब कलकल बह रही शिप्रा लोगों को सुकुन दे रही है। अब रूड़ीवादी और परम्परागत बातें करके नाराजगी जताने के बजाय इस बात पर संतोष जताया जा रहा है कि पानी कहीं का भी हो लेकिन शिप्रा स्नान के लिए तैयार है। वरना बीते सिंहस्थ में लोगों ने शिप्रा की बदहाली देखी है।  उज्जैन में 2004 में लगे पिछले सिंहस्थ मेले के दौरान गंभीर नदी पर बने बांध के पानी को क्षिप्रा में छोड़ा गया था। इसके साथ ही बड़े टैंकरों से क्षिप्रा में पानी डाला गया था। यह शिप्रा के सुख की चाह ही थी कि स्नान से परहेज की बातें करने वाले नागा साधुओं ने भी पहले शाही स्नान में जमकर डुबकी लगाई। 
सिंहस्थ लिंक से नर्मदा का जल उज्जैनी से करीब 112 किलोमीटर की दूरी तय कर अपनी स्वाभाविक रवानी के साथ उज्जैन के रामघाट पहुंच रहा है। अब तक नर्मदा-शिप्रा लिंक के माध्यम से शिप्रा में नर्मदा का तकरीबन 86.5 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी छोड़ा जा चुका है। इस पानी से करोड़ों लोग अब तक स्नान कर चुके हैं वहीं उज्जैन और देवास के उन लोगों की प्यास भी बुझाई जा रही है जो हर गर्मी पानी की तलाश में सुबह-शाम एक कर दिया करते थे। 
क्यों जरूरत पड़ी थी संगम की
शिप्रा नदी आमतौर पर गर्मियों में सूखकर नाले में तब्दील हो जाती है और इसका पानी आचमन के लायक भी नहीं रह जाता है। इसके मद्देनजर साधु-संतों ने प्रदेश सरकार से मांग की थी कि वह सिंहस्थ मेले के दौरान क्षिप्रा में स्वच्छ जल छोड़कर इसे प्रवाहमान बनाए, ताकि देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु इसमें अच्छी तरह स्नान कर सकें। 
ताकि लबालब रहे शिप्रा
एनवीडीए के संयुक्त निदेशक आदिल खान के अनुसार मेले के मद्देनजर हम इस परियोजना के चारों पंपिंग स्टेशनों को उनकी कुल 28,370 किलोवॉट की पूरी क्षमता से चला रहे हैं। फिलहाल क्षिप्रा में हर सेकंड 5,000 लीटर नर्मदा जल प्रवाहित किया जा रहा है। हमने इसकी पूरी व्यवस्था की है कि महीने भर चलने वाले सिंहस्थ मेले के दौरान क्षिप्रा में स्वच्छ जल की लगातार आपूर्ति होती रहेगी।
हर जगह फैले ऐसी खुशहाली
उज्जैन में जहां से भी लोग आ रहे हैं वे शिप्रा को देखकर आनंदित हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की तारीफ तो करते ही हैं यह भी मानते हैं कि यदि ऐसा काम बाकी जगह भी हुआ तो कोई नदी सुखी नजर नहीं आएगी। गौरतलब है कि अभी नर्मदा ने शिप्रा की जीवित किया है। नर्मदा-गंभीर का काम जारी है। कालीसिंध और पार्वती सहित अन्य नदियों को भी नर्मदा के जल से जीवन मिलने का इंतजार है।

एक यज्ञशाला जहां देव नहीं, दिखते हैं प्राणदानी

उज्जैन से विनोद शर्मा । 
108 फीट की सात मंजिला ऐसी यज्ञशाला जहां देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और चित्र  नहीं है।  खांकी और सैन्य वर्दी में मुछों पर ताव देते नजर आ रहे चित्र हैं भी तो उन मर्दानों के जो देश के खातिर अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। तिरंगे और भारत मात्रा के चित्र से सुशोभित शिखर वाली इस यज्ञशाला में शहीदों के सौ से अधिक चित्र लगे हैं। 
यह कैंप है बालक योगेश्वर का जिन्हें फौजी बाबा कहते हैं। भूखीमाता मेन रोड पर इस कैंप की दीवार से लेकर यज्ञशाला के चौतरफा शहीदों के फोटो हैं। फिर बात 26/11 में शहीद हुए हेमंत करकरे, संदीप उन्नीकृष्णन, आलोक कामटे, विजय सालसकर की हो या फिर सरहद पर शहीद हुए मेजर अजयसिंह जसरोटिया, केपटन विक्रम बत्रा, अनुसुइया प्रसाद हो। हर एक के चमकते चेहरे ने इस यज्ञशाला को सिंहस्थ की बाकी 1000 यज्ञशालाओं से अलग और विशेष बना दिया है। यहां शहीद अरूण चिट्टी, तुकाराम गोपाल अम्बोले, जयवंत पाटिल, शशांक शिंदे, अम्बादास पंवार, बापूसाहेब दुरुगराड़े, बालासाहेब भौसले, राहुल एस शिंदे, योगेश पाटील, विजय सिंह चंद, मदन लाल, गजेंद्र सिंह की तस्वीरें भी हैं। 
उन्होंने प्राणों की आहुति दी, हम मंत्रों की देंगे
दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक मेले में उन जवानों को भी याद किया जाएगा जिन्होंने कारगिल युद्ध और मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के दौरान देश की आन-बान और शान के लिए अपनी शहादत दी थी। झंडे सहित 123 फीट ऊंची इस यज्ञशाला में 100 हवन कुंड बनाए गए हैं। यज्ञ के लिए वाराणसी से पंडितों की टीम बुलाई गई है। बद्रीनाथ धाम के बालक योगेश्वर दास ने वर्ष 2005 में पहली बार शहीदों के परिवारों के लिए यज्ञ किया था। जम्मू में हुए इस महायज्ञ में कारगिल युद्ध के शहीदों के घर वाले शामिल भी हुए थे।
पूरा खर्च उठाते हैं महाराज 
2010 में हरिद्वार में हुए कुम्भ मेले में हुए महायज्ञ में भी शहीदों के परिवारों को एकत्रित किया गया था। प्रयाग कुंभ में शहीदों के परिजनों को पहली बार न सिर्फ आमंत्रित किया गया था बल्कि उनके आने-जाने और रहने का खर्च तक उठाया गया। ठीक वैसे ही उज्जैन में भी व्यवस्था की जा रही है। यहां 400 परिवार शामिल होंगे। कुछ परिवार आ भी चुके हैं। 
एक परिवार बन चुका है 
सबसे बड़ा दान प्राणदान है जो सिर्फ एक सैनिक ही कर सकता है इसीलिए देशवासियों के मन में उनके लिए श्रृद्धा जरूरी है। जब में जम्मू में यज्ञ कर रहा था तब मुझसे मिलने  मेजर अजयसिंह जसरोटिया के माता-पिता आए जो बाद में काफी भावुक हो गए। उनकी भावुकता ने मुझे शहीदों के लिए भी धर्म के क्षेत्र में कुछ करने की प्रेरणा दी। इसके बाद से सिलसिला जारी है। अब तक 25 यज्ञ कर चुके हैं। इन यज्ञ से मुझे जो फायदा मिला वह यह कि मेरा परिवार बढ़ गया। आज तकरीबन हजार शहीदों के परिवार मुझसे परिवार की तरह जुड़Þे हैं। एक-दूसरे के सुखदूख में भागीदार हैं। 

सिंहस्थ में चलेगी इस्कॉन की भंडारा एक्स्प्रेस

किचन से अन्न क्षेत्र तक दौडेगी 15 डिब्बों की ये रेल 
इंदौर. विनोद शर्मा। 
सिंहस्थ 2016 के मद्देनजर  इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णाकांशसनेस अर्थात इस्कॉन मंगलनाथ क्षेत्र में विशेष रेल चलाएगा। रेल इस्कॉन कैम्प में आने वाले श्रद्धालुओं को सफर तो नही करेगी, हां उनकी भूख जरूर मिटाएगी। पाण्डाल तैयार है जल्द ही रेल के लिए ट्रेक का काम भी शुरू हो जायगा। 
मंगलनाथ जोन के खिलचीपुर सेक्टर में मंगलनाथ-आगर रोड पर तकरीबन सवा लाख वर्गफीट में इस्कॉन का अस्थाई कैम्प बन रहा है। कैम्प के दो आकर्षण है अभी। भव्य द्वार और हरे रामा, हरे कृष्णा गाते और मृदंग बजाते पुतलों से सजा गोल मंदिर। किचन और अन्न क्षेत्र का काम जारी है। इस्कॉन की प्लानिंग के हिसाब से इस किचन और अन्नक्षेत्र को जैसा डिजाइन किया जा रहा है वैसा किसी पांडाल तो क्या किसी अच्छी से अच्छी सितारा होटलों में किचन नहीं मिलता। 
 ट्रेक डलेगी, रेल चलेगी 
कैम्प की व्यवस्था देख रहे  स्वामी रसस सिंध गोपालदास ने बताया की ट्रेक का काम एक दो दिन में शुरू हो जायगा। ट्रेक किचन से अन्नक्षेत्र तक राउंड शेप में डलेगी। इसमें करीब 15 'डिब्बे' होंगे। किचन में जो खाना बनेगा उसे इन डिब्बों में भर देंगे। किसी में दाल, किसी में चावल, किसी में रोटी। भरी ट्रेन अन्न क्षेत्र में जाकर खड़ी हो जायेगी  जन्हा श्रद्धालु अपने हिसाब से प्रसाद पा सकेंगे। अन्न क्षेत्र किसी ख़ास वर्ग के लिए नही होगा। यंहा कोई भी भोजन कर सकेगा।
एक घण्टे में 1500 रोटी 
इस्कॉन किचन में अत्याधुनिक और मैकेनाइज्ड रोटी मशीन भी लगाएगा जो औटोमेटिकली रोटी बनाएगी। ऐसी मशीन किसी बड़े मध्यान्ह भोजन सेंटर पर होती है या किसी बड़ी सामाजिक या धार्मिंक संस्थान में। बताया जा रहा है कि मशीन पर एक घण्टे में 1500 रोटी बनेगी ताकि प्रसाद पाते वक्त लोगों को गर्म रोटी मिले। रोटी 24 घण्टे तक नरम रहेगी। 
बर्तन उठाएगी मशीन 
कीचन में भट्टी के पास भी क्रेन लगेगी जो भोजन बनाने वालों की मदद करेगी। खाली और भरे बर्तन क्रेन उठायेगी। कच्चा सामान भी इसी से मैनेज होगा। 
यह रहेगा मेन्यु दाल, सब्जी, रोटी, आम रस, आम पट्टी, खीर, चावल, पकोड़ा, समोसा, कचोरी सहित हर सिन कुछ अलग। जो भी बनेगा शुद्ध देशी घी से बनेगा।
जैसी बनी 24 घण्टे तक वैसी रहेगी रोटी 
हर सिन 1500 से 2000 लोग भोजन कर सकेंगे। प्रसाद शुद्ध और सात्विक होगा जिसमे आला दर्जे की सामग्री इस्तेमाल होगी। रोटी जैसी बनी है वैसी  24 घण्टे तक नरम रहेगी। 
स्वामी रसस सिंध गोपालदास

13 नहीं 16 अखाड़ों से होगा सिंहस्थ 2016 sinhastha

- तीन अखाड़ों में से किसी को नहीं मिली 14वें अखाड़े की भी पात्रता, विवाद जारी
उज्जैन से विनोद शर्मा । 
पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा जैसे 13 अखाड़े ही सिंहस्थ की प्रमुख पहचान रहे हैं लेकिन इस सिंहस्थ के लिए उज्जैन में कुल 16 अखाड़े डेरा डालकर बैठे हैं। 14वें अखाड़े के रूप में अपनी-अपनी दावेदारी जता रहे इन तीन अखाड़ों को भले 13 प्रमुख अखाड़ें और उनके संतों ने मान्यता न दी हो लेकिन लोगों में उनकी पूछपरख बढ़ी है। 
देश में अभी तक 13 अखाड़े हैं। इनमें 10 शैव और तीन वैष्णव अखाड़े हैं। सिंहस्थ 2016 में जन्में तीन नए अखाड़ो में शाही स्नान के लिए संतों द्वारा बहिष्कृत किया जा चुÞका किन्नर अखाड़ा, जनवरी से अपनी तंत्र क्रियाओं से चर्चा में आई तांत्रिक शिवानी दुर्गा का सम्मानसर्वेश्वरी शक्ति अंतरराष्ट्रीय महिला अखाड़ा और साधवी त्रिकाल भवंता का परि संपदाय महिला अखाड़ा शामिल है। इन तीनों में से अब तक किसी एक अखाड़े को भी चौदहवे अखाड़े के रूप में 13 प्रमुख अखाड़ों से शाही स्नान की अनुमति नहीं मिली है। अनुमति का इंतजार करने के बजाय इन अखाड़ों ने भी मेला क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ने की तैयारी कर ली है। कोई बड़ा भारी पांडाल बना रहा है तो कोई किसी की विद्या श्रृद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। 
परि अखाड़ा 
2014 में प्रयाग में महिला अखाड़ा बना। वेदमाता गायत्री इस अखाड़े की देवी और भगवान दत्तात्रेय अखाड़े के आचार्य बनाए गए। देश में साधु-संतों के अखाड़ों के इतिहास में 858 साल बाद एक नया अखाड़ा जुड़ा। अखाड़े की नींव साधवी त्रिकाल भंवता ने रखी उनका पट्टाभिषेक 150 साल पहले बने दशनामी अखाड़े की तर्ज पर हुआ। इस अखाड़े ने प्रयाग और नासिक कुंभ में भी स्नान किया है। 
कमजोरी : महिला संतों की संख्या कम है। दूसरे अखाड़ों की तरह भव्यता नहीं। कौने में मिला प्लॉट। संसाधन की जंग जारी।
ताकत : दो वर्षों से 14वें अखाड़े के लिए सबसे सशक्त दावेदारी। 2015 में नासिक कुंभ के दौरान त्रिकाल भंवता ने मुख्यमंत्री के सामने मुखरता से रखी थी बात। यहां भी लड़कर जमीन ली। हाईकोर्ट से सुविधाओं में बराबरी की जंग जीती।
क्या कहती हैं त्रिकाल भंवता
13 अखाड़े एक साथ तो बने नहीं। जब 12 के बाद 13वें अखाड़े को मान्यता मिल सकती है तो 858 साल बाद बने परी अखाड़े को मान्यता देने से क्यों परहेज है। हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला रही है तो यहां पुरुषों के परम्परागत अखाड़े में महिला सन्यासियां बेचारगी क्यों सहे। क्यों उनके साथ चिलम धुनके। क्यों उनके नियम पाले। 
किन्नर अखाड़ा 
यह अखाड़ा 2015 में बना। लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी इसके प्रमुख हैं। शुरूआत से ही इस अखाड़े को 14वें अखाड़े के रूप में मान्यता देने का विरोध हो रहा है। अब तक विवाद नहीं सुलझा। सिंहस्थ 2016 में भी प्रमुख अखाड़ों ने इस अखाड़े को शाही स्नान की अनुमति नहीं दी। इसीलिए ये अमृत स्नान करेंगे। 
कमजोरी : अक्टूबर 2015 में स्थापित। कौने में मिला प्लॉट। संसाधन संकट। शैली राय जैसी किन्नर सन्यासी के उत्तेजक फोटो ने पहले अखाड़े की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाया। फिर अखाड़े और शैली के बीच हुए विवाद ने। 
मजबूती : 14वें अखाड़े के रूप में लोगों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। हर दिन रहती है किन्नर संतों से मिलने के लिए लोगों की भीड़। 
क्या कहते हैं संस्थापक सदस्य लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी
सनातन धर्म से किन्नरों का वजूद रहा है। किन्नर जन्मजात योगी हैं। इसलिए उन्हें न तो अलग से किसी अखाड़े की सदस्यता की जरूरत है और न ही किसी की मान्यता की। किन्नर अखाड़े के रूप में वे सिंहस्थ में शामिल होंगे। 
सर्वेश्वरी शक्ति अंतरराष्ट्रीय महिला अखाड़ा 
अमेरिका में पीएचडी करके तंत्र साधना में लीन रहने वाली अघोर तांत्रिक शिवानी दुर्गा ने इस अखाड़े को बनाया है। वे अब तक आनंद अखाड़े से जुड़ी रही लेकिन आनंद अखाड़े के संतों द्वारा उनकी पदवी को लेकर उठाए जाते रहे सवालों से परेशान होकर उन्होंने आनंद अखाड़े का बहिष्कार कर दिया। अपना नया अखाड़ा बनाया। उन्होंने कहा इस अखाड़े में सब समान है। यह महिला अखाड़ा भले है लेकिन पुरुष भी इससे जुड़े हैं और जुड़ रहे हैं। 
कमजोरी : कुछ ही दिनों में उज्जैन की धरा पर छाई शिवानी दुर्गा कई संतों की आंख की किरकिरी बनी। पहले आनंद अखाड़े के संतों के साथ उपाधि को लेकर विवाद और फिर अपनी ही सचिव रही कांग्रेस नेत्री पुष्पा चौहान के साथ कानूनी जंग। 
मजबूती : पढ़ी-लिखी हैं शिवानी। तथ्यों के साथ लोगों को तंत्र-मंत्र की जानकारी देती हैं। बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं अब उनसे। 
क्या कहती हैं शिवानी दुर्गा 
यह आडम्बरों से दूर ऐसा अखाड़ा है जहां न सिर्फ साधना-हवन यज्ञ होंगे बल्कि लोगों को तंत्र-मंत्र और वैदिक साइंस के प्रति जागरू किया जाएगा।  यही महिला अखाड़ा है लेकिन सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं है। इसमें पुरुषों की भागीदारी भी अच्छी है। 
आए दिन विवाद 
नए अखाड़ों के साथ ही नए विवाद भी सामने आ रहे हैं। पहले इन अखाड़ों के जमीन आवंटन का विरोध हुआ। एक तरफ तांत्रिक शिवानी दुर्गा और संतों के बीच नोकझोंक जारी है। साधवी जान के खतरे की आशंका भी जता चुकी है वहीं नासिक कुंभ में तांत्रिक शिवानी दुर्गा के स्टिंग का शिकार हुई साधवी त्रिकाल भवंता के परि अखाड़े की जमीन का मामला हाईकोर्ट, इंदौर तक पहुंचा। हाईकोर्ट की दखल के बाद आवंटन का रास्ता साफ हुआ। हालांकि सुविधा नहीं मिली। 
विवाद कोई साजिश तो नहीं
14वें अखाड़े के रूप में दावेदारी जताने वाले ये अखाड़े जहां किसी न किसी विवाद या कमजोरी से जुझ रहे हैं वहीं इनके प्रमुखों को शंका है कि परम्परागत 13 अखाड़े तो इन विवादों की जड़ नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि विवादों में उलझाए रखने के लिए एक-दूसरे के बीच फूट डाली जा रही हो। क्योंकि इससे पहले नासिक कुंभ में पहले त्रिकाल भंवता और शिवानी दुर्गा कई बार मिले। दोनों में अच्छी बातचीत भी रही लेकिन एन वक्त पर शिवानी दुर्गा ने स्टिंग कर दिया। बाद में वे आनंद अखाड़े से जुड़ी जिसने अब उन्हें अपना मानने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं उनकी उपाधि पर भी सवाल खड़े कर दिए। सिंहस्थ 2016 में दोनों अलग ध्रुव बनकर सामने आर्इं। तीसरा अखाड़ा आया किन्नर अखाड़ा लेकिन वहां भी शैली रॉय का ‘जादू’ चला जिसकी भरपाई अखाड़े के लोग अब भी कर रहे हैं। 
यह है प्रमुख अखाड़े...
1- पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी, 2-श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, 3-श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, 4-श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा, 5-श्री पंचायती महानिवार्णी अखाड़ा, 6-श्री शंभुपंच अग्नि अखाड़ा, 7-श्री शंभु पंचायती अटल अखाड़ा, 8-श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा, 9-श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन, 10-श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा, 11-श्री अखिल भारतीय पंच रामानंदीय निवार्णी अखाड़ा, 12- अखिल भारतीय श्री पंच रामानंदीय दिगंबर अणि अखाड़ा, 13-श्री पंच रामानंदीय निमोर्ही अणि अखाड़ा। 

Friday, April 8, 2016

एम्पायर लॉजीपार्क में मनमानी

सरकारी आदेश से गेट तो टूटा नहीं, रोड भी बनने लगी
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
बिना अनुमति के एम्पायर लॉजी पार्क में जारी विकासकार्यों को लेकर जहां जिला प्रशासन नोटिस पर नोटिस थमा रहा है वहीं मनमानी पर आमादा बिल्डर ने काम नहीं रोका। उलटा, अवैध गेट को तोड़े जाने के सरकारी नोटिस के बावजूद लॉजी पार्क में अब सड़कों का काम भी शुरू हो चुका है।
अर्जुन बरौदा की 26.884 हेक्टेयर जमीन पर लॉजीपार्क का मनमाना काम हो रहा है जिसका खुलासा दबंग दुनिया ने रविवार को ‘सख्त सरकार, टुटेगा लॉजी पार्क का द्वार’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। इसके जहां सरकारी गलियारों में हलचल रही वहीं अर्जुन बरौदा साइट पर ऐसे शांति से काम चल रहा था मानों सभी तरह की अनुमतियां ली जा चुकी हो। मौके पर सड़क बन रही है। तकरीबन 20-30 फीट लंबी सड़क बन भी चुकी है। 20 मजदूर काम कर रहे हैं। दो-तीन डम्पर लगे हैं।
पीएनबी के पास गिरवी रखी है जमीन
राजस्व दस्तावेजों के अनुसार तहसीलदार के 1 नवंबर 2012 को जारी आदेश के अनुसार लॉजीपार्क में शामिल तकरीबन 6.187 हेक्टेयर जमीन पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी)  औद्योगिक क्षेत्र, देवास शाखा में बंधक है। फिर भी जमीन का नामांतरण 27 जनवरी 2014 को हुआ। इसी तरह लॉजीपार्क की अन्य कुछ जमीन भी बंधक थी जिसे 1 अपै्रल 2013 में मुक्त कराया।
नजर सरकारी जमीन पर भी..
लॉजीपार्क बनाने वाले एम्पायर समूह की नजर अब राधेश्वरी डेवलपर्स की जमीन से लगी सरकारी जमीन पर भी है। इसका बड़ा उदाहरण है सर्वे नं. 75 की जमीन जो कि नाला है। नाला लॉजीपार्क में घुमते हुए जाएगा। इसके अलावा एबी रोड तक अप्रोच रोड भी सरकारी जमीन पर बनी है। यहां सर्वे नं. 29/2 और 26/2/1 की जमीन पर भी नजर है।
राधेश्वरी के  अलावा अलग लोगों के नाम पर भी है जमीन
सर्वे नं. नाम उपयोग
30/1 अयोध्याबाई सरदार खाती लॉजिस्टिक
119/2 नीनादेवी पति विनोद कुमार लॉजिस्टिक
5/1 भुवानसिंह कोदर लॉजिस्टिक
32/2 भागीरथ भगवान लॉजिस्टिक
कंपनी का बहाना...
एसडीओ के रीडर को आवेदन किया था लेकिन उस वक्त कंपोनेंट अथॉरिटी डिसाइड नहीं थी। एक साल तक मामला टला। बाद में कलेक्टर को सक्षम अधिकारी बनाया लेकिन नियम में कमर्शियल लिखना भूल गई सरकार। हमने कलेक्टर को पत्र लिखा और पूछा कि कमर्शियल के लिए विकास अनुमति की जरूरत नहीं है क्या? जवाब नहीं मिला। तब कोर्ट की शरण ली। कोर्ट की अनुमति के आधार पर विकास शुरू किया। इस बीच एसडीएम ने आपत्ति ली। कहा कि हाईकोर्ट ने कहीं नहीं लिखा कि विकास अनुमति की जरूरत नहीं है। अब जब कोर्ट विकास की अनुमति दे चुकी है तो विकास अनुमति की जरूरत क्या है। गेट तोड़ने का नोटिस हुआ तो हमने कोर्ट की शरण ली। स्टे मिला। डायवर्शन कराकर किसानों को बाहर करना चाहा तो सरकार ने नामांतरण रुकवा दिया। इससे हमारा टाइटल रूकेगा नहीं। बंधक जमीन की जानकारी नहीं है।
बी.डी.दीक्षित, लीगल हेड
एम्पायर