Thursday, January 21, 2016

शराब कारोबारी अफसरों को बांट रहे हैं सालाना 260 करोड़

आबकारी को  ‘फ्रीडम टैक्स’
 और पुलिस को ‘पार्किंग टैक्स’
इंदौर. विनोद शर्मा ।
आयकर की छापेमार कार्रवाई में शराब कारोबारी शिवहरे समूह से ज्यादा मप्र आबकारी विभाग एक्सपोज हो गया। शिवहरे के ठिकानों से आयकर को मिले दस्तावेजों और शराब कारोबार से जुड़े सूत्रों की मानें तो सिर्फ इंदौर में ही आबकारी विभाग के अधिकारी सालाना 20 करोड़ से ज्यादा की रिश्वत लेते हैं।  यदि 5 करोड़/जिले के औसत से बात करें तो प्रदेश में सालाना 260 करोड़ बांटना पड़ते हैं। बंटवारा आबकारी विभाग में इंस्पेक्टर से लेकर ऊपरी आकाओं तक का होता है। पुलिस और नेताओं की फीस अलग।
पेट्रोलियम प्रोडक्ट के बाद शराब है जो सरकार को ज्यादा राजस्व देती है। आबकारी विभाग, पुलिस और नेताओं की जैब भी यही भरती है। न दे तो मप्र आबकारी एक्ट में इतनी धाराएं हैं कि उनका पालन करने में व्यापारी बुजुर्ग हो जाए लेकिन शराब का व्यापार न कर पाए। फिर मामला दुकानों पर टंगे आबकारी सूचना के बोर्ड का हो या फिर बोर्ड पर लिखे अक्षरों की साइज का। इसी एक्ट से शराब दुकानों पर अधिकारियों की जमावट होती है। इंदौर में पब और क्लब संस्कृति ने फीस बढ़ाई है।
600 करोड़ की ड्यूटी, 20 करोड़ की रिश्वत
इंदौर जिले में शराब की 171 इनमें 90 अंग्रेजी और 81 देशी शराब की हैं। 2015-16 में जिले की इन दुकानों ने तकरीबन 600 करोड़ की एक्साइज ड्यूटी चुकाई। अनुमानित कारोबार है करीब 1100 करोड़ का, एक नंबर में। 3.28 करोड़/दिन। एक दुकान से औसत 80-90 हजार रुपए का बंटवारा होता है जो कुल 18.50 से 19 करोड़ होता है।
मप्र में कुल 3694 दुकाने हैं। देशी 2634 और 1060 विदेशी। इन दुकानों से औसत 60 हजार रुपए के हिसाब से हर महीने 18.47 करोड़ की रिश्वत बंटती है। सालाना यह आंकड़ा 265 करोड़ तक पहुंचता है।
किसको किस काम के कितने...
- आबकारी सर्कल बनाकर काम करता है। भोई मोहल्ला, काछी मोहल्ला, बंबई बाजार, मलवा मिल अ मालवा मिल ब, पलासिया, ग्रामीण में एक-दो, सांवेर, देपालपुर सर्कल हैं। हर सर्कल के लिए मैदानी अमला तय है।
- एक दुकान से हर महीने इंस्पेक्टर 10-12 हजार रुपए और एडीओ व उससे ऊपर वाले को 15 से 20 हजार रुपए तक मिलते हैं। ताकि दुकान घंटे-आधे घंटे जल्दी खुले, घंटे-आधे घंटे देर तक चालू रहे। देर रात तक कारोबार हो। लाइसेंसी दुकानों के माल की बिक्री (एरिया) चाय-पान की दुकानों पर हो सके।
- पुलिस 5-10 हजार तक क्षेत्र के थाना प्रभारी को ताकि पुलिस की अनावश्यक दखल न हो। विवाद-झगड़े में मदद मिले। दुकानों के सामने अवैधानिक पार्किंग होती रहे।
लाइसेंस...
- बार लाइसेंस 3.50 लाख में बनता है जबकि क्लब-पब लाइसेंस 7.30 लाख में। नियम से ये लाइसेंस 3-3 महीने तक नहीं बन पाते जबकि लाख-दो लाख रुपए दो तो 15-20 दिन में लाइसेंस मिल जाता है।
- बार वालों से ज्यादा पैसा मिलता है। क्योंकि बार वाले संबंधित दुकानों से पूरा कोटा नहीं लेते। दो नंबर की शराब खरीदकर बेचते हैं। इसीलिए उन्हें मुनाफा ज्यादा होता है।
-जिले में इंस्पेक्टर, एडीओ और डीओ बैठते हैं। हर दुकान पर इनकी दखल और फीस ज्यादा है। उड़नदस्ते का आॅफिस अलग है। उसकी फीस कम है।
 शराब में सक्षम है सबसे पिछड़े जिले...
अलीराजपुर, झाबुआ और धार को इंदौर-उज्जैन संभाग के पिछड़े जिलों में होती है लेकिन प्रतिबंध के बावजूद गुजरात में गैरकानूनी रूप से हो रही शराब की बिक्री ने इन जिलों की पूछपरख इंदौर जैसे प्रदेश के महानगर से ज्यादा कर दी है। सबसे ज्यादा दुकानें इंदौर जिले में हैं। इन जिलों में दुकानों का अनुपात भले कम हो लेकिन रिश्वत का रेशो बहुत ज्यादा है। हालात यह हैं कि कभी सजा समझी जाने वाली इन जिलों की जिम्मेदारी लेने के लिए अब अधिकारी कुछ भी करने को तैयार हैं।
विधायकों की दखल से बिक रही है शराब...
खरगोन, धार, झाबुआ, अलीराजपुर और खंडवा में विधायक शराब दुकान चलवाने के पैसे ले रहे हैं। धंधा करना है तो उन्हें पैस देना ही है। जितना वजनदार विधायक, उतना ज्यादा पैसा। सबसे ज्यादा खराब स्थिति धार में है। बुरहानपुर और नेपानगर में कुछ पत्रकार भी हैं जो गाड़ियों के फोटो खींचते हैं और बाद में बड़ा पैसा लेते हैं।
देशी घटी, विदेशी बढ़ी..
2010-11 2012-13 2014-15
देशी शराब 2770 2751 2634
विदेशी 916 934 1060
शराब कंजम्शन..
2010-11 2012-13 2014-15
देशी 828.59 926.33 1103.69
विदेशी 1078.12 1383.45 1439.77
(लाख प्रुफ लीटर)

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