Thursday, August 10, 2017

‘रेरा’ : कंपलीशन से बिल्डरों का किनारा

- नगर निगम ने थमाए 200 नोटिस, सर्टिफिकेट के लिए एक आवेदन नहीं
- आज आखिरी तारीख
इंदौर. विनोद शर्मा ।
सोमवार को 31 जुलाई है...। रीयल एस्टेट रेग्यूलेटरी एक्ट (रेरा) पंजीयन के लिए कंपलीशन सर्टिफिकेट लेने की आखिरी तारीख...। नगर निगम ने 200 प्रोजेक्ट्स को नोटिस थमाकर 31 जुलाई तक कंपलीशन सर्टिफिकेट लेने को कहा है लेकिन अब तक गिनती के लोगों ने भी आवेदन नहीं किए। उलटा, कंपलीशन से किनारा करते हुए बिल्डरों ने लिखित जवाब देते हुए कहा कंपलीशन लेकर रेरा से बचने से बेहतर है रेरा में पंजीयन करवाना। अब कंपलीशन सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब कॉलोनाइजर-बिल्डर प्रोजेक्ट का रेरा पंजीयन करवा लेंगे।
1 मई से रेरा लागू है। 31 अपै्रल से पहले के उन्हीं प्रोजेक्ट को रेरा पंजीयन से छूट प्राप्त होगी जिनके पास कंपलीशन सर्टिफिकेट हो।    इसीलिए रेरा के मद्देनजर नगर निगम ने कंपलिशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन की समयसीमा 28 अपै्रल और सर्टिफिकेट जारी करने की समयसीमा 31 जुलाई तय की थी। समयसीमा करीब-करीब खत्म हो चुकी है लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि तमाम आपाधापी के बावजूद रविवार रात तक किसी ने कंपलीशन में रुचि नहीं ली। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कंपलिशन से किनारा कर रहे हैं।
200 नोटिस जारी...
बताया जा रहा है नगर निगम में तीन तरह के प्रोजेक्ट हैं जिनके कंपलीशन सर्टिफिकेट जरूरी है। पहला किसी कॉलोनी के प्लॉट  पर तनी बिल्डिंग जिसका नक्शा बिल्डिंग पर्मिशन से जारी होता है। जहां कंपलीशन भी बिल्डिंग पर्मिशन को ही देना है। दूसरा वह बिल्डिंग जो किसी खसरे नंबर के आधार पर स्वीकृत हुई है जो कि कॉलोनी सेल में आती है। सेल ही इन्हें कंपलीशन देती है। तीसरी कॉलोनियां जो भी कॉलोनी सेल का हिस्सा है।
अब तक कॉलोनी सेल ने करीब 200 नोटिस दिए हैं। इनमें 70 कॉलोनियां हैं और 60 खसरों की जमीन पर तनी मल्टियां। इन प्रोजेक्ट्स पर कहीं एक साल से काम जारी है, कहीं दो-तीन या चार साल से। इसके अलावा करीब 70 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जो पंचायत द्वारा बिना कंपलीशन सर्टिफिकेट के नगर निगम को हस्तांतरित किए गए हैं।
किनारा क्यों?
- मप्र भूमि विकास अधिनियम के तहत किसी भी प्रोजेक्ट की पूर्णता जांचने के बाद ही नगरीय निकाय कंपलीशन सर्टिफिकेट जारी कर सकते हैं। सर्टिफिकेट जारी करने का मतलब है कि अधिकारी सुनिश्चित कर चुके हैं कि मौके पर स्वीकृत नक्शे के आधार पर ही निर्माण हुआ है। जो कि इंदौर जैसे शहर में संभव नहीं है। इसीलिए अधिकारी भी कंपलीशन नहीं देते।
-  बनने से पहले ही पूरी बिल्डिंग बिक जाती है। बिल्डर कंपलीशन सर्टिफिकेट का इंतजार भी नहीं करता। निगम ने जितने भी नोटिस दिए हैं उनमें से 70 प्रतिशत प्रोजेक्ट में दिक्कत यही है कि माल बिक चुका है लेकिन कंपलीशन नहीं है। एग्रीमेंट करके धरोहर के प्लॉट/फ्लैट तक बेचे जा चुके हैं। इसीलिए बिल्डरों ने लिखित में निगम को जवाब दे दिया है कि वे रेरा से राहत नहीं चाहते। वे रेरा पंजीयन करवा लेंगे। इसीलिए कंपलीशन सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।
कंपलीशन नहीं तो धरोहर नहीं छूटेगी
नगर निगम से कंपलीशन लेना जरूरी भी है क्योंकि उसके बिना धरोहर के रूप में रखे प्लॉट, फ्लैट या दुकान निगम नहीं छोड़ेगा।


कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं देने पर
ऐसे केस जिसमें बिल्डर को अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला है ग्राहक म्युनसिपल आॅफिस में आरटीआई लगाकर इसकी कॉपी मांग सकता है। अगर बिल्डर को ये सर्टिफिकेट मिल गया है और वो ग्राहक को नहीं देना चाहता है तो ग्राहक कंज्यूमर कोर्ट जा सकता है।

श्रीजी में 70 करोड़ से ज्यादा की आयकर चोरी

अपनी ही कंपनियों में बताई फर्जी खरीदी-बिक्री, कमीशन देना तक भी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
उज्जैन में आनंद बांगर-विष्णु जाजू के श्रीजी समूह ने  70 करोड़ से ज्यादा की आयकर चोरी की है। गुरुवार से समूह पर जारी छापेमारी के दौरान इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग के हाथ जो प्रमाण लगे हैं उससे करीब-करीब यह कहानी सामने आ रही है। हालांकि दस्तावेजों की जांच जारी है। अंतिम आंकड़ा इनकी जांच या समूह संचालकों द्वारा किए जाने वाले सरेंडर के बाद ही सामने आएगा। बहरहाल, जांच में पता चला कि समूह ने फर्जी कंपनियों में ही फर्जी लेनदेन कर रखे हैं।
बांगर-जाजू समूह पर इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग की छापेमार कार्रवाई अंतिम चरण में है। रविवार की रात तक करीब-करीब 80 प्रतिशत ठिकानों पर कार्रवाई संपन्न हो चुकी है। चुनिंदा ठिकानों पर ही कार्रवाई जारी है जो भी सोमवार सुबह तक संपन्न हो जाएगी। चार दिन में विंग के सामने मोटामोटा 70 करोड़ रुपए के आसपास की आयकर चोरी का फीगर आया है। हालांकि माना जा रहा है कि आंकड़ा 100 करोड़ तक भी जा सकता है।
बैंकों का किया भरपूर इस्तेमाल
आनंद बांगर ने श्रीजी पॉलिमर प्रा.लि. के नाम पर ही स्टेट बैंक आॅफ इंदौर, एचडीएफसी, बैंक आॅफ बरोदा, स्टेट बैंक आॅफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक और स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक आॅफ इंडिया जैसी बैंकों का भरपूर फायदा उठाया। 2005 से 2015 के बीच ही इन बैंकों ने मेहरबानी बताते हुए बांगर की श्रीजी को 182 करोड़, 86 लाख 50 हजार रुपए का लोन दिया। कई लोन खत्म हो चुके हैं, कई जारी है।
फर्जी कंपनियों से फर्जी लेनदेन
दस्तावेजों के अनुसार बांगर और जाजू ने कई डमी/ब्रीफकेस कंपनियां पंजीबद्ध करवा रखी है। इन कंपनियों का उपयोग फर्जी लेन-देन बताने के लिए किया जाता है ताकि उसे खर्च बताकर आय कम बताई जा सके। इससे आयकर बचाया जाता है। इसकी पुष्टि एक बार पहले भी इनकम टैक्स कर चुकी है। आईटीएटी द्वारा 13 फरवरी 2017 को सुनाए गए एक आदेश के अनुसार कंपनी ने 29 सितंबर 2011 को 6 करोड़ 52 लाख 57 हजार 590 रिटर्न दाखिल किया था। 49.75 लाख और 23.23 लाख की पॉलिसी अलग। इसमें भी घर ही घर में कमीशन दी गई। जांच अधिकारी ने पाया कि श्रीजी पॉलिमर ने अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए बतौर कमीशन 71.02 लाख पदमा  पॉलिटेक्स इंडिया प्रा.लि. और 35.98 लाख अर्पित प्लास्टिक प्रा.लि. को दिए। वह भी तब जबकि दोनों कंपनियां समूह की है। दोनों में वही सब डायरेक्टर है जो श्रीजी पॉलिमर में है। पद्मा पॉलिटेक्स को यह राशि 12.38 करोड़ के प्रोडक्ट बेचने पर मिली जो कि लूपिन लि. को बेचना बताया गया था। इसी तरह डॉ.रेड्डी लेब लि. को 8.57 करोड़ रुपए के प्रोडक्ट बेचने पर अर्पित प्लास्टिक को 35.98 लाख दिए।

अब इंदौर में तीन कमिश्नर, चौथे की तैयारी gst

जीएसटी-सेंट्रल एक्साइज
इंदौर. विनोद शर्मा ।
गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के तहत सरकार जीएसटी-सेंट्रल एक्साइज विभाग को मैदानी स्तर पर मजबूत बना रही है। इस कड़ी में इंदौर कमिश्नर की संख्या दो से बढ़कर तीन हो चुकी है। वहीं कस्टम कमिश्नरेट के रूप में चौथे कमिश्नर की तैयारियां भी जारी है। माना जा रहा है कि विभागीय बटवारे से न सिर्फ विभाग के कामकाज को गति मिलेगी बल्कि इसका फायदा करदाताओं को भी मिलेगा। करदाताओं को मामले के निराकरण के लिए लंबा इंतजार नहीं करना होगा।
जीएसटी को लेकर कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एंड सेंट्रल एक्साइज विभाग का खांका तैयार है। इस खांके के तहत इंदौर में दिनेश पुरुषोत्तम पंगारकर के रूप में अपील कमिश्नर की पोस्टिंग और की गई है। इससे पहले दो कमिश्नर (एक्जिक्यूटिव और आॅडिट) इंदौर में थे। ऐसे कुल तीन कमिश्नर बैठ रहे हैं। अपील कमिश्नर की व्यवस्था भी कुछ वर्षों पहले इंदौर में थी जिसे भोपाल में शिफ्ट कर दिया गया था। जब अपील कमिश्नरेट इंदौर में था तब आॅडिट कमिश्नरेट भोपाल में था। उधर, एडज्यूडिकेशन के लिए लगातार अलग कमिश्नर की मांग उठती रही है। विशेषज्ञों की मानें तो एक्जिक्यूविट कमिश्नर छापेमारी करे, टैक्स चोरी पकड़े और बाद में वही मामले में न्याय भी दे, यह मुश्किल है। इसीलिए एडज्यूडिकेशन कमिश्नर अलग होना चाहिए।
कॉर्पोरेट सेंटर में होगा आॅफिस
अपील कमिश्नर अभी माणिकबाग मुख्यालय में ही बैठ रहे हैं लेकिन उनका आॅफिस जल्द ही आरएनटी मार्ग स्थित कॉर्पोरेट सेंटर में खुलेगा। इससे पहले जब इंदौर में अपील कमिश्नरेट था तब भी उसका आॅफिस यहीं था। बताया जा रहा है कि अगस्त में आॅफिस शुरू हो जाएगा।
अलग होगा कस्टम कमिश्नरेट
बताया जा रहा है कि सरकार इंदौर में कस्टम की व्यवस्था अलग ही करना चाह रही है। इस कड़ी में कस्टम कमिश्नरेट की तैयारियां भी जारी है जिसे जल्द ही अमली जामा पहनाया जा सकता है। कस्टम कमिश्नरेट इंदौर सहित आसपास के शहरों में होने वाले आयात और निर्यात पर नजर रखेंगे।
किस कमिश्नरेट का क्या काम...
एक्जिक्यूविट कमिश्नर : इस पोस्ट पर नीरव मल्लिक नियुक्त किए गए हैं। कमिश्नरेट में कितने करदाता हैं। कितना कर मिलता है। कर कैसे बढ़ाया जा सकता है। सर्वे और छापेमार कार्रवाई। एडज्यूडिकेशन की जिम्मेदारी भी है। 2 करोड़ से अधिक के करचोरी प्रकरण में एडज्यूडीकेशन का अधिकार कमिश्नर को है।
आॅडिट कमिश्नर : इस पोस्ट पर अतूल सक्सेना पदस्थ हैं। आॅफिस स्कीम-54 में रिलायंस ग्राउंड के सामने है। असेसी के बिल-बुक्स और फाइनेंशियल अकाउंट के साथ ही कस्टम, सेंट्रल एक्साइज और सर्विस टैक्स रिटर्न की समीक्षा करते हैं। समीक्षा के बाद तय होता है कि असेसी कितना टैक्स दे सकता है और कितना दे रहा है।
अपील कमिश्नर : दिनेश पंगारकर नियुक्त किए गए हैं। कमिश्नर, एडिशनल कमिश्नर या डिप्टी कमिश्नर किसी असेसी के कामकाज की समीक्षा करने के बाद उसे डिमांड नोटिस थमाते हैं। टैक्स निकालते हैं। यदि असेसी को लगता है कि निकाली गई डिमांड या थोपी गई पेनल्टी गलत है तो वह अपील कर सकता है। अपील कमिश्नर सही पाए जाने पर असेसी को राहत भी देते हैं।
फायदे...
- अलग-अलग जिम्मेंदारियां होने के कारण किसी एक पर काम का दबाव नहीं होता। न काम लंबित होते हैं। न ज्यादा समय लगता है।
- काम विभाजित होने के कारण हर कमिश्नर अपने काम को और बेहतर तरीके से कर सकता है।
- असेसी और टैक्स कलेक्शन दोनों बढ़ेगा।
- आॅडिट और अपील के जिन मामलों के निराकरण में वक्त लगता था वह कम हुआ है और कम होगा।

नगर निगम से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक की आंखों में झौंकी धूल बारोड हॉस्पिटल

इंदौर. विनोद शर्मा ।
क्लीनिक और घर की अनुमति लेकर दो प्लॉटों पर एक अस्पताल बनाकर डॉ. सुनील बारोड़ ने नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के साथ ही स्वास्थ्य विभाग की आंखों में भी धूल झौंकी है। डॉ. बारोड की साजिशों का हिस्सा बनते हुए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने 2015 में 30 बेड के बारोड हॉस्पिटल की अनुमति दे दी जबकि मास्टर प्लान 2021 के प्रावधान के अनुसार इतना बड़ा हॉस्पिटल बनाने के लिए 2 से 4 हेक्टेयर तक जमीन होना जरूरी है।
डॉ.बारोड ने पं.दीनदयाल उपाध्याय नगर के प्लॉट नं. 28 और 29 एएच के दो अलग-अलग नक्शे मंजूर करवाए थे। दोनों नक्शों में कुल 11599.2 वर्गफीट निर्माण मंजूर हुआ था। इसमें कमर्शियल मंजूरी मिली थी कुल 908.06 वर्गफीट की। बाकी 10691.14 पर आवासीय निर्माण होना था। इसके विपरीत मप्र भूमि विकास अधिनियम, मास्टर प्लान 2021 और नगर निगम के स्वीकृत नक्शे के खिलाफ डॉ. बारोड ने कुल 44708.2  वर्गफीट का हॉस्पिअल तान दिया। अपने मनमाने निर्माण में ही उन्होंने 30 बेड के हॉस्पिटल की मंजूरी के लिए आवेदन कर दिया। संयुक्त संचालक स्वास्थ्य और चीफ मेडिकल एंड हैल्थ आॅफिसर (सीएमएचओ) ने अपनी मोटी फीस लेकर रजिस्ट्रेशन मंजूर कर दिया।
मोटी फीस लेकर अधिकारियों ने रजिस्टर किया हॉस्पिटल
यह देखना तक लाजमी नहीं समझा कि जिस बिल्डिंग में अस्पताल मंजूर कर रहे हैं वह बनी कैसी है? नगर निगम से नक्शा स्वीकृत है भी या नहीं? अवैध निर्माण को लेकर नगर निगम कोई कार्रवाई तो नहीं करने वाला है? बताया जा रहा है कि मोटी फीस लेकर अधिकारियों ने हॉस्पिटल का पंजीयन किया।
40 प्रतिशत ज्यादा ग्राउंडकवरेज
मप्र भूमि विकास अधिनियम और मास्टर प्लान 2021 के अनुसार कमर्शियल बिल्डिंग और अस्पताल के नियम अलग-अलग हैं। दोनों के फ्लोर हाइट भी अलग रहती है। अस्पताल पब्लिक सेमी पब्लिक (पीएसपी) के तहत मंजूर होता है। वाणिज्यिक भवन में ग्राउंड कवरेज 50 प्रतिशत तक मिलता है वहीं अस्पताल में ग्राउंड कवरेज 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं मिलता। यहां अस्पताल 70 प्रतिशत से ज्यादा ग्राउंड कवरेज करके बनाया है।
अस्पताल के लिए जरूरी जमीन
100 + बेड   4 से 6 हेक्टेयर
30-100 बेड   3 से 5 हेक्टेयर
0-30 बेड   2 से 4 हेक्टेयर
नर्सिंग होम   0.20 से 0.50 हेक्टेयर
अस्पताल के नियम
बेड संख्या  ग्राउंड कवरेज एफएआर हाइट फ्रंट एमएओस  तीन तरफा
100 + 30% 1.25 24 मीटर 15 मीटर 6-6 मीटर
30-100 30%  1.25 24 मीटर  15 मीटर  6-6 मीटर
0-30   30%  1.25 18 मीटर  12 मीटर  4.5-4.5 मीटर
हैल्थ सेंटर  30%  1.25 18 मीटर  12 मीटर  4.5-4.5 मीटर
नर्सिंग होम  30%  1.25 18 मीटर  12 मीटर  4.5-4.5 मीटर
पॉलीक्लीनिक  30%  1.25 18 मीटर  12 मीटर  4.5-4.5 मीटर

डॉ. बारोड का अस्पताल 33109 वर्गफीट अवैध

निगम की मेहरबानी, 11599 वर्गफीट की मंजूरी, 44708 वर्गफीट बिल्डिंग तानी
क्लीनिक की जमीन पर अस्पताल, एमओएस हजम, बेसमेंट 100 प्रतिशत अवैध
इंदौर. विनोद शर्मा ।
क्लीनिक और घर की मंजूरी लेकर अस्पताल ताानने वाले डॉ. सुनील बारोड पर नगर निगम के जोनल अधिकारी से लेकर निगम मुख्यालय में बैठे अफसरान तक मेहरबान है। शायद यही वजह है कि डॉ. बारोड ने नगर निगम से मिली मंजूरी से तीन गुना ज्यादा निर्माण कर दिया। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो दोनों प्लॉटों पर कुल 11599.2 वर्गफीट निर्माण मंजूर हुआ जबकि 44708.2 ने वर्गफीट का हॉस्पिटल तान दिया। मतलब 33109 वर्गफीट निर्माण अवैध।
डॉ.बारोड ने कैसे पंडित दिनदयाल उपाध्यायनगर(सुखलिया) के प्लॉट नं. 28 एएच और 29 एएच पर मनमाने तरीके से बारोड हॉस्पिटल तान दिया है? इसका खुलासा दबंग दुनिया ने सोमवार के अंक में ‘दो प्लॉट+दो नक्शे=बारोड हॉस्पिटल’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। मामले में जब दबंग दुनिया ने गहराई से तफ्तीश की तो पता चला कि अस्पताल में बेसमेंट से लेकर टॉप तक झोलझाल है। तीन तरफा एमओएस हजम करके ग्राउंड कवरेज बढ़ाया। बिना किसी अनुमति के बेसमेंट बना डाला। ऊपर टीन शेड अलग ठोक दिए।
क्या करते रहे नगर निगम अधिकारी
सामान्यत: किसी भी प्लॉट पर दी गई मंजूरी का प्लींथ लेवल पर नगर निगम सर्टिफिकेट जारी करता है। यदि 35 की जगह 70 प्रतिशत ग्राउंड कवरेज किया तो फिर प्लींथ सर्टिफिकेट कैसे मंजूर हुआ? या दूसरे शब्दों में कहें तो प्लींथ सर्टिफिकेट मंजूर ही नहीं किया गया। ऐसे में उन अधिकारियों की भूमिका जांची जाना चाहिए जिनके जोन पर बतौर भवन अधिकारी और भवन निरीक्षक रहते सुखलिया चौराहे जैसे व्यस्ततम चौराहे पर इतना बड़ा अस्पताल तन गया।
प्लॉट नं. एएच-28
शालीग्राम व सुमित्रादेवी बारोड
नक्शा : आईएमसी/0634/जेड5/डब्ल्यू35/2012
स्वीकृत दिनांक : 12 अक्टूबर 2012
हाईट :  जी+3
प्लॉट एरिया : 360 वर्गमीटर
ग्राउंड कवरेज : 35.00 वर्गमीटर
कुल बिल्टअप एरिया : 540 वर्गमीटर
प्लॉट नं. एएच-29
शालीग्राम व सुमित्रादेवी बारोड
नक्शा : आईएमसी/0635/जेड5/डब्ल्यू35/2012
स्वीकृत दिनांक : 12 अक्टूबर 2012
हाईट :  जी+3
प्लॉट एरिया : 360 वर्गमीटर
ग्राउंड कवरेज : 35.00 वर्गमीटर
कुल बिल्टअप एरिया : 540 वर्गमीटर
कैसा हो कंस्ट्रक्शन
कमर्शियल- 42.30 वर्गमीटर
आवासीय- 420.72 वर्गमीटर
स्टेयर-34.24 वर्गमीटर
लिफ्ट- 21.60 वर्गमीटर
ऐसे जी+3 (आंकड़े, वर्गमीटर में)
फ्लोर कमर्शियल रेसीडेंसी स्टेयर लिफ्ट
ग्राउंड 42.30 57.59 8.56 5.40
फर्स्ट 00 121.04 8.56 5.40
सेकंड 00 121.04 8.56 5.40
थर्ड 00 121.04 8.56 5.40
कुल 42.30 420.72 34.24 12.60
मार्जिनल ओपन स्पेस(एमओएस)
सामने - 6 मीटर
पीछे - 3 मीटर
एक तरफ - 3 मीटर
दूसरी तरफ - 3 मीटर
हुआ यह है-
- चूंकि दो अलग-अलग प्लॉट थे इसीलिए दोनों के नक्शों में एमओएस का गणित अलग था। मसलन एक प्लॉट में दोनों तरफ 3-3 मीटर छोड़ना था। अब डॉ. बारोड ने यदि दोनों प्लॉटों को जोड़ा है इसका मतलब दोनों प्लॉटों के बीच का 6 मीटर (19 फीट) एमओएस हजम कर गए। प्लॉट की लंबाई 85 फीट है। इसमें 19 फीट फ्रंट एमओएस छोड़ा। लंबाई बची 66 फीट और 19 फीट पर कब्जा है तो ग्राउंड फ्लोर पर 1254 वर्गफीट निर्माण हुआ। इसी निर्माण को तीन मंजिला बनाया गया है मतलब कुल 5016 वर्गफीट निर्माण सेंटर एमओएस हजम करके किया।
- ऐसे ही दोनों प्लॉटों के दोनों ओर भी 3-3 मीटर एमओएस छोड़ा जाना चाहिए था जो न छोड़ते हुए यहां भी 5016 वर्गफीट निर्माण किया।
- ऐसे ही दोनों प्लॉटों पर पिछला एमओएस भी 3-3 मीटर छोड़ना था। यहां दोनों  प्लॉटों की चौड़ाई 45 फीट है। मतलब एक फ्लोर पर 1710 वर्गफीट निर्माण हुआ। जी+3 पर कुल 6840 वर्गफीट निर्माण किया।
- एमओएस पर ही कुल निर्माण हुआ है 16872 वर्गफीट। इसके बाद 35 प्रतिशत की जगह 70 प्रतिशत ग्राउंड कवरेज किया। दोनों प्लॉटों को जोड़कर कुल प्लॉट एरिया हुआ 7732.8 वर्गफीट। इसमें 70 प्रतिशत पर ग्राउंड कवरेज के साथ 5412.96 वर्गफीट का अवैध बेसमेंट बना डाला।
- कुल 2706.48 वर्गफीट ग्राउंड कवरेज मंजूर था। जिसकी जगह 5412.96 वर्गमीटर ग्राउंड कवरेज किया। अंतर 2706.48 वर्गफीट का जो कि पूरे जी+3 तक लागू है। 10825.92 वर्गफीट अवैध निर्माण।

आधा दर्जन रिमूवल नोटिस, फिर भी तना हुआ है बारोड हॉस्पिटल

नोटिस को बनाया निगम के मैदानी अमले ने कमाई का जरिया
राजनीतिक प्रेशर की आड़ लेकर कार्रवाई नही ंकी
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
मप्र भूमि विकास अधिनियम और मास्टर प्लान 2021 के प्रावधान को नजरअंदाज करते हुए नगर निगम द्वारा स्वीकृत नक्शे के विपरीत आवासीय प्लॉट पर तने बारोड हॉस्पिटल पर नगर निगम मेहरबान है। यही वजह है कि दो साल से बनकर खड़े हॉस्पिटल को छह महीने पहले रिमूवल नोटिस तो थमाया लेकिन कार्रवाई नहीं की। अब नए सिरे से नोटिस जारी करने के लिए अधिकारियों को इंतजार है लिखित शिकायत का।
सुखलिया में डॉ. बारोड ने कैसे पंडित दिनदयाल उपाध्यायनगर(सुखलिया) के प्लॉट नं. 28 एएच और 29 एएच पर मनमाने तरीके से बारोड हॉस्पिटल तान दिया है? इसका खुलासा दबंग दुनिया ने सोमवार के अंक में ‘दो प्लॉट+दो नक्शे=बारोड हॉस्पिटल’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। अनुमति के विपरीत अस्पताल कैसे बनकर तैयार हो गया? और अधिकारी आंख मुंद पर तमाशा क्यों देखते रहे? जैसे सवालों पर जोन-5 के मैदानी अमले ने कहा कि डॉ. सुनील बारोड को रिमूवल नोटिस दिया जा चुका है। नोटिस कब दिया के जवाब में उन्होंने कहा कि पांच-छह महीने पहले नोटिस दिया था। फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जैसे सवाल सुनते ही सबने फोन काट दिया।
राजनीतिक पकड़ भारी है नियमों पर
डॉ. सुनील बारोड के पिता शालीग्राम बारोड विकलांग हेैं और वे विकलांगों के क्लीपर्स व अन्य उपकरण बनाते हैं। वे आला दर्जे पर सरकार से सम्मानित भी हो चुके हैं। एक तरफ बारोड परिवार  विधायक महेंद्र हार्डिया के रिश्ते में है वहीं पिता के अच्छे काम के कारण विधानसभा-2 के कद्दावर नेता भी बारोड परिवार से जुड़े हैं। इसी का फायदा उठाकर डॉ. बारोड ने आवासीय अनुमति लेकर अस्पताल तान दिया और अधिकारी देखते रहे। क्षेत्रीय नेताओं ने भी मदद की।
लिखित शिकायत का इंतजार
मैदानी अमले ने क्षेत्र के राजनीतिक प्रभुत्व का हवाला देते हुए कहा कि यहां जो होता है उन्हीं की अनुमति से होता है। वरना अस्पताल बन नहीं पता। ऐसे अस्पताल की फाइल खोलना मतलब अपने लिए मुसीबत मोल लेने के बराबर है। बहरहाल, कोई शिकायत भी हमारे पास नहीं है जो हम फाइल खोलकर देखें भी क्या और कैसा बनाया है।
यह है गड़बड़ियां
-- संयुक्तिकरण प्रतिबंधित है फिर भी दीनदयाल उपाध्यायनगर के प्लॉट 28 और 29 एएच को जोड़कर अस्पताल बना डाला।
-- इन दोनों प्लॉटों के नक्शे भी डॉ.सुनील बारोड के पिता के नाम पर अलग-अलग ही पास हुए।
-- स्वीकृत नक्शों में सिर्फ स्वीकृत बिल्टअप एरिया में से सिर्फ 10 प्रतिशत ही कमर्शियल मंजूर किया था लेकिन डॉ. बारोड ने पूरा अस्पताल बना दिया।
-- चूंकि दो प्लॉट थे इसीलिए दोनों के स्वीकृत नक्शे में मार्जिनल ओपन स्पेस (एमओएस) स्वीकृत था जिसे बिल्डिंग जोड़कर बारोड हजम कर गए।
-- बेसमेंट भी बना दिया जबकि स्वीकृत ही नहीं है।
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जब में पार्षद बनकर आया तब तक हॉस्पिटल बनकर शुरू हो चुका था। इसीलिए मुझे जानकारी नहीं है कि हॉस्पिटल कैसे और किस आधार पर बना। मैं इस संबंध में अधिकारियों से बात करके जानकारी लूंगा।
राजेंद्र राठौर, पार्षद

क्लीनिक व घर मंजूर, बना दिया अस्पताल

आवासीय हिस्सा हजम कर गए डॉ. सुनील बारोड
इंदौर. विनोद शर्मा ।
पं.दीनदयाल उपाध्यायनगर के दो प्लॉट जोड़कर अस्पताल बनाने वाले डॉ. सुनील बारोड़ के कारनामे गजब हैं। जिन दो प्लॉटों को जोड़कर हॉस्पिटल को बनाया गया है उनके नक्शे में कुल 10 प्रतिशत ही कमर्शियल निर्माण की मंजूरी दी गई थी। मतलब सीधे शब्दों में कहें तो प्लॉटों पर अस्पताल की अनुमति नहीं दी गई, अनुमति थी तो सिर्फ क्लीनिक और डॉक्टर के आवास की। यह बात अलग है कि क्लीनिक की अनुमति लेकर डॉ. बारोड ने 30 बेड का पूरा अस्पताल ही तान दिया।
सुखलिया में डॉ. बारोड ने कैसे पंडित दिनदयाल उपाध्यायनगर(सुखलिया) के प्लॉट नं. 28 एएच और 29 एएच पर मनमाने तरीके से बारोड हॉस्पिटल तान दिया है? इसका खुलासा दबंग दुनिया ने सोमवार के अंक में ‘दो प्लॉट+दो नक्शे=बारोड हॉस्पिटल’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। इसके बाद भी एक तरफ जहां नगर निगम के अधिकारियों ने हॉस्पिटल की सूध नहीं ली। वहीं दबंग दुनिया के हाथ लगी फाइल के आधार पर बात करें तो उक्त दोनों प्लॉटों पर आवासीय अनुमति दी गई थी, कमर्शियल अनुमति सिर्फ 10 प्रतिशत थी।
क्या कहती है अनुमति
प्लॉट नं. 28 एएच का 12 अक्टूबर 2012 को नक्शा (आईएमसी/0634/जेड5/डब्ल्यू35/2012)स्वीकृत हुआ था उसके अनुसार 3866.4 वर्गफीट प्लॉट आवासीय/व्यावसायिक निर्माण हो सकता था।  1.5 एफएआर के साथ कुल 5799.6 वर्गफीट निर्माण की अनुमति दी गई। इसमें 4518.53 वर्गफीट आवासीय, 454.30 वर्गफीट व्यावसायिक, 367.73 वर्गफीट स्टेयर और 231.98 वर्गफीट लिफ्ट के लिए मंजूर हुआ।
इसी तरह प्लॉट नं. 29 एएच का 12 अक्टूबर 2012 को जो नक्शा (आईएमसी/0635/जेड5/डब्ल्यू35/2012) मंजूर हुआ था उसके अनुसार 3866.4 वर्गफीट प्लॉट 1.5 एफएआर के साथ कुल 5015.6 वर्गफीट निर्माण की अनुमति दी गई। इसमें 4498.77 वर्गफीट आवासीय, 451.00 वर्गफीट व्यावसायिक,  367.73 वर्गफीट स्टेयर और 231.98 वर्गफीट लिफ्ट के लिए मंजूर हुआ।
आवासीय अनुमति पर कैसे बन गया अस्पताल
नगर निगम द्वारा स्वीकृत नक्शे के अनुसार बात करें तो जिन प्लॉटों पर 90 प्रतिशत उपयोग आवासीय मंजूर हुआ हो वहां शतप्रतिशत हिस्से में अस्पताल कैसे बन गया? यह बड़ा सवाल है लेकिन निगम के अधिकारियों को इससे गुरेज है नहीं क्योंकि वे इन्हीं सवालों के आधार पर डॉ. सुनील बारोड से लंबी-चौड़ी फीस लिए बैठे हैं। वरना, जिस जोन-5 ने नक्शा मंजूर किया उसके और अस्पताल के बीच की दूरी बमुश्किल 300 मीटर है। अस्पताल गली या किसी मोहल्ले में नहीं है। एक दम सुखलिया चौराहे पर है। जहां से दिनभर में कई दफा अधिकारियों की आवाजाही लगी रहती है। फिर भी उन्हें घर की जगह बनता अस्पताल नजर नहीं आया, यह संभव नहीं है।
हाउसिंग बोर्ड से निगम तक ने दिया साथ
डॉ. बारोड द्वारा देखे गए बारोड हॉस्पिटल के सपने को पूरा करने में उनका साथ पं. दीनदयाल उपाध्यानगर विकसित करने वाले मप्र हाउसिंग बोर्ड से लेकर नक्शा मंजूर करने और निर्माण नजरअंदाज करने वाले नगर नगम तक ने अच्छे से दिया। इस काम में डॉ. बारोड के लाइजनर मित्रों ने भी दलाली के माध्यम से निर्माण पर सरकारी सख्ती की आंच नहीं आने दी।

ऐसे स्वीकृत हुए हैं अलग-अलग नक्शे
प्लॉट नं. एएच-28
शालीग्राम व सुमित्रादेवी बारोड
नक्शा : आईएमसी/0634/जेड5/डब्ल्यू35/2012
स्वीकृत दिनांक : 12 अक्टूबर 2012
हाईट :  जी+3
प्लॉट एरिया : 360 वर्गमीटर
कुल बिल्टअप एरिया : 540 वर्गमीटर
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प्लॉट नं. एएच-29
शालीग्राम व सुमित्रादेवी बारोड
नक्शा : आईएमसी/0635/जेड5/डब्ल्यू35/2012
स्वीकृत दिनांक : 12 अक्टूबर 2012
हाईट :  जी+3
प्लॉट एरिया : 360 वर्गमीटर
कुल बिल्टअप एरिया : 540 वर्गमीटर