Wednesday, July 29, 2015

स्वास्थ्य समिति: काम कम, दौरे ज्यादा


छह हजार से अधिक कर्मचारियों की फौज और व्यवस्था के निजीकरण के बाद भी प्लॉटों में फैला कचरा
स्वास्थ्य
नगर निगक की कार्यपद्धति दस विभागीय हिस्सो में बंटी है। इन विभागों के अपने दायित्व और जिम्मेदारियां हैं। हर विभाग की एक समिति होती है। अध्यक्ष एमआईसी सदस्य होता है। अन्य ९ सदस्यों में तीन विपक्ष और छह सत्तापक्ष के पार्षद रहते हैं। ऐसे में शहर की जनता उन लोगोंके कामकाज का लेखाजोखा जानना चाहती है जिन्हें चुनकर उन्होंने समिति का पदाधिकारी बनाया था। पाठकों की मांग पर 'पत्रिकाÓ हर दिन प्रस्तुत करेगा समितियों की मार्कशीट। पहली किश्त स्वास्थ्य विभाग..।
इंदौर, विनोद शर्मा ।
कचरा प्रबंधन के नाम कभी हैदराबाद-अहमदाबाद तो कभी आधुनिक स्लॉटर हाउस के लिए अलीगढ़। पांच बरस में ऐसे प'चीसों अंतरप्रांतीय दौरे और तकरीबन ६,००० सफाईकर्मियों के लंबे-चौड़े लबाजमें के बाद भी नतीजा सिफर। यह है नगर निगम मैनेजमेंट की सबसे मजबूत कड़ी कहलाने वाले स्वास्थ्य विभाग का पंचवर्षीय सफरनामा। पहले एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी), डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी) और बाद में जेएनएनयूआरएम से तकरीबन  ७० करोड़ की मदद मिलने के बाद भी विभाग शहर को मुक्कमल सफाई नहीं दे पाया। विभागीय पदाधिकारी जो भी बयानबाजी करें लेकिन सड़क-प्लॉट और मैदानों में फैली गंदगी की कड़वी सगााई को नकार नहीं सकते।
    इंदौर, किसी की औद्योगिक राजधानी तो किसी के लिए मुंबई का छोटा ख्याली रूप। २००४ की निर्वाचित निगम परिषद ने आवाम से पांच वर्षों में शहर की फिजा बदलकर स्व'छ और स्वस्थ्य इंदौर का वादा किया था। कुछ मौर्चों पर सफलता मिली तो कई मामलों में नाकामी ही हाथ लगी। फिर वह कचरा प्रबंधन की आधुनिक व्यवस्था हो या बूचडख़ानों का अत्याधुनिकीकरण। २००५ में स्वास्थ्य विभाग का बजट वेतन छोड़कर दो से तीन करोड़ रहता था जबकि आज जेएनएनयूआरएम-एडीबी और डीएफआईडी से विभाग ७० करोड़ से अधिक की योजनाओं पर काम कर रहा है। बजट में ३५ गुना इजाफे के मुकाबले व्यवस्था अपेक्षाकृत नहीं बदली। पांच साल बाद भी कॉलोनियों में कचरे के धुएं का गुबार लोगों का सांस लेना दुभर करता नजर आता है।
अध्यक्ष- राजेंद्र राठौर,
सदस्य- राजेंद्र जायसवाल, सुमनलता यादव, राजकपूर सुनहरे, पराग लोढ़े, हरिशंकर पटेल, प्रेम खड़ायता, मूलचंद यादव, दुर्गा कौल। २४ बैठकें हुई। आधे पार्षद गायब रहे।
प्रमुख काम
शहर में सफाई व्यवस्था को पुख्ता करना। सड़क, मोहल्ले और घरों से कचरा इक_ा करना। म'छरों के साथ बीमारियों की रोकथाम। जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र और विवाह पंजीयन प्रमाण-पत्र देना। दुषित खाद्य सामग्री की बिक्री पर अंकुश लगाना।
प्रमुख काम जो किए
- जुलाई २००५ की बाढ़ के बाद नालों की सफाई करके बाढ़ के प्रभाव को कम किया।
- एडीबी, डीएफआईडी के सहयोग से संसाधन बढ़ाए।
- २००६ में बर्ड फ्लू, २००७ में चिकनगुनिया और २००९ में स्वाइन फ्लू की रोकथाम के लिए अभियान चलाए।
- जोरों पर दुषित खाद्य सामग्री की धरपकड़।
- जेएनएनयूआरएम की सहमति के बाद ४३ करोड़ के संसाधन उपलब्ध कराए।
- शहर से पहले २०० से २५० मेट्रिक टन कचरा उठता था। आज ६०० टन से अधिक कचरा शहर से बाहर जा रहा है।
- विवाह पंजीयन की व्यवस्था नगर निगम में।
-जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र बगैर आवेदन के अस्पताल में भेजे गए।
काम जो नहीं कर पाए
- सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नोटिसों के बाद भी ट्रेंचिंग ग्राउंड में जलता है कचरा। पांच साल में पचासों दौरों के बाद भी कचरे से खाद बनाने का प्लांट कागजों में।
- तमाम संसाधनों की उपलब्धता के बाद भी म'छरों से मुक्त नहीं हुआ इंदौर।
- सफाई में ढिलाई के कारण २००७ में चिकनगुनिया और २००९ में डेंगू और डायरिया जैसी बीमारियों ने शहर में जगह बनाई।
- सफाईकर्मियों की बाढ़ के बाद भी सफाई असरकारक नहीं।
- कचरा पेटी के लिए ९०० में से २०० स्टैंड बने। बाकी पार्षदों की आपत्तियों की भेंट चढ़ गया।
- सुप्रीमकोर्ट के सख्त आदेशों के बाद भी स्लॉटर हाउस कागजों पर। दौरों के नाम पर लाखों रुपए खर्च हुए।
- शहर की पैथालॉज लेब्स का पंजीयन नहीं हुआ।
- दूध और खाद्य के जो नमूने पहले सुबह लिए जाते थे उनमें आई कमी ने मिलावटखोरों के मनोबल को बढ़ाया।
लिक से हटकर
- प्रभारी ने वैचारिक मतभेद के कारण सीएचओ डॉ. ए.के.पुराणिक को हटाकर डॉ. डी.सी.गर्ग को सीएचओ बनाया।
- विवाह पंजीयन कार्यालय को सुविधाजनक स्थान से हटाकर पहली मंजिल पर प्रभारी कार्यालय के पास लाया गया।
- कचरा प्रबंधन और संसाधनों की उपलब्धता को लेकर एमआईसी में रहा मतभेद। कई बार ठनी। 
- सफाई कर्मचारी संघ के एक नेता ने दी घासलेट डालकर महापौर का घर  जलाने की धमकी।
-गरीब तबके के लिए महत्वपूर्ण दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठजन स्वास्थ्य बीमा योजना एमआईसी की मनमानियों की भेंट चड़कर रह गई।
वोटर का मिजाज: विकास पर जोर, सफाई कमजोर
मनोरमागंज निवासी श्यामबाबू अग्रवाल ने बताया पांच साल पहले मैंने भाजपा को वोट दिया था। सोचा था शहर शहर साफ होगा। निगम परिषद ने पांव वर्षों में सड़क और सीवरेज सहित दूसरे ढांचागत विकासकार्यों पर जोर दिया हालांकि सफाई व्यवस्था कमजोर रही।
(सिटी फोटो में श्यामबाबू अग्रवाल का फोटो डला है। देख लेना।)
एक्सपर्ट कमेंट- बजट बढ़ाया, सफाई प्रबंधन नहीं
स्वास्थ्य विभाग को १० में से ३ नंबर ही दुंगा। इससे 'यादा का वह हकदार नहीं। वित्तीय सहयोग से नगर निगम ने स्वास्थ्य विभाग का बजट बढ़ाया। हालांकि शहर की बढ़ती सरहदों के साथ सफाई प्रबंधन पर जोर नहीं दिया। यही वजह है कि पांच साल बाद भी सफाई व्यवस्था वहीं की वहीं हैं। निगम मस्टरकर्मियों से सफाई कराता है जो मन लगाकर काम करने को तैयार ही नहीं। कचरा इक_ा करके पेटी में डालने के बजाय ये लोग आग लगाकर पाप टालने में विश्वास रखते हैं। इससे प्रदूषण फैल रहा है। लोग बीमार हो रहे हैं। साकेतनगर जैसे शहर के सबसे पॉश इलाके के प्लॉटों में औंधी पड़ी पेटियां और फैला कचरा सफाई सुधार के खोखले दावों को मुंह चिढ़ाता है।
महेंद्र महाजन, सीईपीआरडी



महिला एवं बाल विकास- घपले से श्रीगणेश


- पेंशन घोटाले के बाद भी ६२ हजार हितग्राही
- २४ हजार हितग्राहियों की पात्रता हो चुकी थी रद्द
इंदौर, विनोद शर्मा ।
जनवरी २००५ में ५८ हजार से शुरू और नवंबर २००९ में ६२ हजार हितग्राहियों पर खत्म। यह सफरनामा है निगम प्रबंधन की सबसे मजबूत कडिय़ों में से एक महिला एवं बाल विकास विभाग का। इस विभागीय सफरनामे का श्रीगणेश पेंशन कांड जैसे महाघोटाले से हुआ। हालांकि समापन शांतिपूर्ण रहा। हालांकि ताजा आंकड़ों और आंकड़ों को लेकर विभागीय भूमिका पर उठने वाले सवालों के बीच विपक्षियों को शांति के बाद वाले बवंडर की तलाश है।
 'सर मुंढाते ही ओले पड़ेÓ जैसी कहावतें महिला एवं बाल विकास विभाग पर सटिक बैठी। समिति प्रभारियों ने जनवरी २००५ में कामकाज संभाला ही था कि अपै्रल २००५ में पेंशन घोटाले का जिन्न चिराग तोड़कर सामने खड़ा हो गया। घोटाले में ५८ हजार में से २४,०११ हितग्राही अपात्र घोषित हो गए। जांच अब भी जारी है। मौजूदा परिषद का घोटाले से लेना-देना नहीं था लेकिन सात महीनों तक कामकाज प्रभावित रहा। दस एमआईसी सदस्यों में महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा की सबसे नजदीकी रही सपना चौहान ने घोटाले के दबाव को दूर करते हुए नए सिरे से मौर्चा संभाला और जुलाई २००५ से पात्र पाए गए ३४,१८९ हितग्राहियों की पेंशन जारी करना शुरू कर दी। नए आवेदनकर्ताओं की जोनवार जांच के बाद पात्रता सुनिश्चित करने की नई प्रथा लागू की, जो आज तक जारी है। एमआईसी के दायित्वों में बदलाव, पार्षदों के बिखराव और बहाली के बाद बीते १६ जून २००८ से विभाग का दारोमदार लालबहादुर वर्मा के कंधों पर हैं। पांच बरस तक लगातार विवादों के कारण सुर्खियों में रहे लाल उसी मंत्री खेमे के खास सिपेसालार हैं जो पेंशन घोटाले के प्रमुख आरोपी हैं। हालांकि लाल के काम को लेकर अभी तक अंगुली नहीं उठी।
अध्यक्ष- जनवरी ०५ से जून २००८ तक सपना निरंजनसिंह चौहान
जून २००८ से- लालबाहदुर वर्मा
सदस्य- सविता अखंड, निर्मला कैरो, सुमनलता वर्मा, अनुराधा उदावत, संध्या अजमेरा, पुनिया तरेटिया, फौजिया शेख अलीम, शबाना अयाज गुड्डू और रश्मि वर्मा
दायित्व-जिम्मेदारियां
महिला एवं बाल विकास विभाग दो भागों में बंटा है। एक का नियंत्रण जिला प्रशासन के पास है तो दूसरे का नगर निगम के पास। आवेदक फार्म जमा करता है। निगम प्रशासन जोनवार फार्म की जांच कराता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आवेदक की पात्रता की पुष्टि करके सूची जिला प्रशासन को सौंप दी जाती है। वहां से सूची के आधार पर राशि स्वीकृत होती है।
प्रमुख काम जो किए
-पेंशन कांड उजागर होने के बाद पात्रों का पैसा सहकारी साख संस्थाओं के माध्यम से देना बंद कर दिया। डायरियां बनाकर मनीऑर्डर से पैसा दिया जाने लगा।
- मनीऑर्डर में पोस्टमैन की मनमानी का खुलासा होते ही सदस्यों के पोस्ट ऑफिस में खाते खोल दिए गए। अब तक ५२ हजार से अधिक खातेदारों के खाते खुल चुके हैं।
- तकरीबन १० हजार आवेदन खातों के पास डाकविभाग के पास विचाराधीन हैं।
लिक से हटकर
- जनवरी २००८ में महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा ने एमआईसी के दायित्वों में परिवर्तन किया था। इसमें सामन्य प्रशासन समिति प्रभारी लालबहादुर वर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
- तकरीबन दो दर्जन पार्षदों के कड़े विरोध के बाद जून में एमआईसी में लाल की वापसी हुई और उन्हें महिला एवं बाल विकास प्रभारी बना दिया गया।
- लाल विधानसभा-२ से ताल्लुक रखने वाले उसी खेमे के खास हैं जिसके खिलाफ पेंशन घोटाले की जांच बीते पांच साल से जारी है।
एक नजर में सामाजिक सुरक्षा पेंशन
- कुल ६४ हजार हितग्राही और आवेदक
- ५२ हजार के पोस्ट ऑफिस में खाते खुले
- १० हजार आवेदन डाक विभाग के पास विचाराधीन
- बाकी दो हजार आवेदनों की जांच जारी।
- हितग्राहियों में ८,२७३ विकलांग, १७,२८६ विधवा-परितक्ताएं और १२,६९६ वृद्ध ६० से ६५ वर्ष के बीच के हैं। वहीं ६५ बरस से अधिक के हितग्राहियों की संख्या ३८,२५५ है।
क्या कहते हैं वोटर
व्यवस्थित हुई पेंशन व्यवस्था
- आदर्श इंदिरानगर निवासी विकास यादव की मानें तो कई लोग आज भी महीनों से पेंशन के लिए आवेदन लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। पात्रों के नाम पर कई अपात्र फायदा उठा रहे हैं। शुरूआती दौर में कई महीनों तक पेंशन नहीं मिली।

पांच बरस में पेंशन व्यवस्था में खास बदली है। पहले साख संस्थाओं में लाइन लगाकर खड़े रहना पड़ता था। सुनिश्तिच तारीख तक जो सदस्य पेंशन नहीं ले पाता था उसे संस्था बाद में पैसा नहीं देती थी और न ही राशि विभाग को लौटाती थी। मनिऑडर में पोस्टमैंन परेशान करने लगे और आखिरकार पोस्ट ऑफिस में खाते खोलना पड़े। अब कभी भी जाकर अपना पैसा नजदीकी पोस्ट ऑफिस से निकाला जा सकता है।

शपथ-पत्र में आठ और भाषण में तीस करोड़


- बयानबाजी में उलझी संघवी की स"ााई
इंदौर, सिटी रिपोर्टर।
मेरे पिताजी एक करोड़ रुपए छोड़कर "ए थे। मेहनत के दम पर आज मेरे पास ३० करोड़ से अधिक की एफडी है। यह कहना है महापौर पद का चुनाव लडऩे वाले कां"्रेस प्रत्याशी पंकज संघवी का। नामांकन के साथ निर्वाचन कार्यालय को दिए शपथ-पत्र में संघवी ने स्वयं को तकरीबन साढ़े आठ करोड़ की चल-अचल संपत्ति का मालिक बताया है। यानी उनके शपथ-पत्र और भाषण के बीच सीधे २२ करोड़ का अंतर हैं। इस अंतर ने संघवी के शपथ-पत्र और उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न ल"ाना शुरू कर दिया है।
२६ नवंबर को महापौर पद के लिए १२ दावेदारों की थी। नामांकन के साथ निर्वाचन कार्यालय में सभी ने शपथ-पत्र पर चल-अचल संपत्ति का लेखाजोखा भी दिया। इसमें ८.५८ करोड़ की संपत्ति के साथ संघवी पहले क्रम पर रहे जबकि २.२० करोड़ की संपत्ति के साथ भाजपा के उम्मीदवार कृष्णमुरारी मोघे दूसरे क्रम पर। २७नवंबर से उम्मीदवारों ने चुनाव की मैदानी तैयारियों का जायजा लेना शुरू कर दिया। २९ नवंबर को इतवारिया बाजार की हुकुमचंद धर्मशाला में संपन्न हुए मिलन समारोह में संघवी भी पहुंचे। कार्यकर्ताओं में ज'बा ज"ाने के लिए संघवी ने भाषण देना शुरू कर दिया। भाषण में अपने अनुभव और काबीलियत का उदाहरण देते हुए वे अपनी संपत्ति की स"ााई बयां कर बैठे। उन्होंने तकरीबन पांच सौ लो"ों की मौजूद"ी के बीच खचाखच भरे हॉल में कहा मैंने मेहतन से एक के तीस करोड़ रुपए कर दिए। उन्होंने कहा मेरे "ुजराती समाज के पदाधिकारी बनने के बाद समाज को सामाजिक बुलंदियां मिली। प्रयास करके हमने समाज के खजाने को ४०० करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया।
अब ऐसे में सवाल यह है कि संपत्ति ब्यौरे के मामले में पहले ही तमाम दावेदारों को कोसो पीछे छोड़ चुके संघवी ने निर्वाचन कार्यालय में झुठा शपथ-पत्र क्यों दिया। शपथ-पत्र में बाकी २१.५ करोड़ रुपए का खुलासा क्यों नहीं किया। यदि शपथ-पत्र को स"ाा माना जाए तो क्या वे भाषणों के माध्यम से कार्यकर्ताओं के सामने झुठ परोस रहे हैं। इस संबंध में संघवी से संपर्क करने की कई मर्तबा कोशिश की। हालांकि जनसंपर्क की व्यस्तता के कारण उनसे बात नहीं हो पाई।
क्या था शपथ-पत्र
कुल-८ करोड़, ५८ लाख, ९२ हजार ११७. ८१
चल संपत्ति- नकद-३०,०७८.९७ रुपए स्वयं और पत्नी के पास ३, ४९२.०२ रुपए हैं।
शेयर, बांड, डाक बचत, एलआईसी पॉलिसी सहित अन्य- 1,72,62,386.82 रुपए के बांड, शेयर व अन्य मं जमा राशि खुद के पास। 1,33,11,849 रुपए के शेयर, बांड व अन्य में जमा राशि पत्नी के पास।
जेवर- सोने व चांदी के ल"भ" 53,500 रुपए के स्वयं के पास। पत्नी के पास तकरीबन 9 लाख रुपए के।
जमीन- 34,10,000 रुपए की कृषि भूमि। 3,67,65,767 रुपए के प्लॉट और उस पर 51,75,000 रुपए के निर्माण। वल्लभन"र में स्वयं, पत्नी, और बेटी के नाम से तकरीबन एक हजार वर्"फीट का और बिचौली मर्दाना में तकरीबन नौ हजार वर्"फीट का प्लॉट। दोनों की कीमत 8.98 लाख है।
बैंकों और वित्तीय संस्थाओं में देनदारी- 31,45, 246 रुपए की।

कचरे से रोशन होगा इंदौर

- मप्रऊविनि और नगर निगम संयुक्त रुप से अंजाम देंगे योजना को
डेढ़ सौ करोड़ की लागत से लगेगा 10 मेगावॉट का प्लांट
इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।

शहर की फिजा बिगाडऩे के साथ शहरवासियों की सेहत के लिए जहर साबित हो रहा कचरा जल्द ही इंदौर को रोशन करता नजर आएगा। मप्र ऊर्जा विकास निगम और इंदौर नगर निगम ने इसके लिए इंदौर में मप्र का पहला कचरे से बिजली बनाने का प्लांट डालने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। तकरीबन डेढ़ सौ करोड़ की इस योजना के तहत 10 मेगावॉट का सयंत्र लगाया जाएगा। सयंत्र में शहरभर से एकत्रित कचरे का वैज्ञानिक पद्धति से उपचार करके बिजली बनाई जाएगी। बहरहाल एमपीयूवीएन की सैद्धांतिक सहमति के बाद योजना दस्तावेजी खाका खींचने की तैयारी हो चुकी है।
    कचरा प्रबंधन योजना के तहत सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट (एसडब्ल्यूटीपी) स्थापित करने में नाकाम रहे इंदौर नगर निगम ने एक कोशिश और की। कोशिश है कचरे से बिजली बनाने की। निगम की इस कोशिश एमपीयूवीएन सैद्धांतिक सहमति का सहारा दे चुका है। बतौर निगमायुक्त और एमपीएकेवीएन एमडी रहते इंदौर के कचरे की दिक्कत से वाकीफ एमपीयूवीएन के एमडी नीरज मंडलोई ने विशेष रुचि लेते हुए प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। अधिकारियों मानें तो योजना के तहत 10 मेगावॉट बिजली का उत्पादन किया जाना प्रस्तावित है। एक  मेगावॉट के लिए 15 करोड़ का निवेश होता है। यानी प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत डेढ़ सौ करोड़ रुपए होगी। पीपीपी बेस्ड इस प्लांट के लिए जमीन नगर निगम उपलब्ध कराएगा। सहुलियत के लिहाज से जमीन ट्रेंचिंग ग्राउंड के आसपास भी हो सकती है।
ए-टू-'ोड ने ली रुचि
परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए गुडग़ांव की ए-टू-'ोड कंपनी ने रुचि ली है। कचरा प्रबंधन योजना के तहत इंदौर में पहले से वेस्ट कलेक्शन कर रही इस कंपनी के साथ जल्द ही एमपीयूवीएन और इंदौर नगर निगम अनुबंध करेंगी।
सौदा फायदे का
---बिजली बनने के बाद कचरे का अंतिम अवशेष गैर नुकसानदेह राख होगी।
--- इस राख से टाईलें, निर्माण सामग्री में इस्तेमाल होने वाले अन्य पदार्थ बनाए जा सकेंगे।
--- राख का इस्तेमाल निचले स्थानों की भराई के लिए भी किया जा सकेगा।
--- परियोजना जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के समझौते के अंतगर्त पंजीबद्ध है।
--- सरकार को सस्ती बिजली मिलेगी।
--- कचरे के साथ बदबू और बीमारियां भी कम होगी।
देर आए दुरुस्त आए
दक्षीण दिल्ली के ओखला इलाके में बीते दिनों वहां की मुख्यमंत्री ने 16 मेगावॉट के प्लांट की मंजूरी दी। तिहाड़ जेल में भी कचरे से रोशनी देने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। आगरा की तैयारियां भी अंतिम चरण में हैं।
सुधरेगी इंदौर की सेहत
यूनिट न केवल कूड़े से बिजली बनाने की महत्वकांक्षी योजना को पूरा करेगी बल्कि इंदौर को साफ-सुथरा बनाए रखने में भी कारगर साबित होगी। इंदौर रोज 700 से 800 मेट्रिक टन कचरा उगलता है। इतने कचरे का निपटान अकेले निगम के बूते की बात नहीं है। परियोजना इंदौर को अतिरिक्त बिजली देगी वहीं रोज उत्पन्न होने वाले कचरे का 40 फीसदी हिस्सा प्लांट में निपट जाएगा।
नीरज मंडलोई, एमडी
एमपीयूवीएन
नगर निगम पर्यावरण सुधार के लिए प्रयासरत है। इसी क्रम में प्रस्ताव भेजा था। यदि प्रस्ताव मंजूर हो गया है तो कोशिश करेंगे जल्द से जल्द प्रोजेक्ट जमीन पर आए।
सी.बी.सिंह, निगमायुक्त

चार ईंच बरसात में बहे बाढ़ बचाव के इंतजाम


कोरी साबित हुई कागजी कवायदें, नालों से कब्जा हटाने के बजाय ऊंची सड़कें बनाकर कॉलोनियों को नाला डाला
इंदौर, विनोद शर्मा ।
चार दिन पहले तक बरसात के लिए बादलों की ओर तांकने वाले इंदौर में सोमवार और मंगलवार की शाम हुई बारीश से हालात बदले नजर आए। बरसात पूर्व जुटाए गए बाढ़ बचाव के इंतजामों की पोल मंगलवार शाम बस्तियों में तैरते बरतनों और ताल-तलैया बनी सड़कों ने खोल दी। इसके लिए नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण जो भी कारण गिनाए नदी-नालों के कब्जादारों पर नकेल कसने की नाकामी और बगैर स्ट्रॉम वॉटर डे्रन (एसडब्ल्यूडी) या डे्रनेज के बसाहट से ऊंची सड़कों जैसे अनियोजित विकास पर पर्दा नहीं डाल सकते। उधर, जानकार हर बार लगातार चेताते हैं कि हाल यही रहे तो भविष्य में चेतने लायक नहीं रहोगे लेकिन प्रशासनिक अमला है कि चेतता ही नहीं।
    5 से 8 जुलाई 2005, 7 अगस्त 2006 और 23 जुलाई 2009 की बरसात से आई बाढ़ को सबक बताते हुए हर बार हवाई योजनाओं से कागज रंग दिए गए। नालों पर कब्जा करने वालों से सख्ती से निपटने और बाणगंगा और गौरीनगर में ईंट भट्टों में बसे लोगों को हटाने की रणनीतियां बनी। बाढ़ में बहने वालों को बचाने के लिए सरकार ने नावें दिलाई। करोड़ों रुपए लगाकर चौपट डे्रनेज दुरुस्त की, चेम्बर बनाए लेकिन बाढ़ है कि आज भी बेकाबू है। कुल मिलाकर डिजास्टर मैनेजमेंट के सरकारी दावे खोखले साबित हुए। हाल-ए-हकीकत यह है कि ड्रेनेज दुरुस्त हुई नहीं। नदी-नालों की सफाई और कब्जादारों पर कार्रवाई निगम के अधिकारियों की कमाई बन गई। पानी निकासी के लिए बनाए गए दस्ते सूर्यअस्त होते ही शराब में मस्त हो गए।   
बाढ़-बचाव की सरकारी बतौलेबाजी
-- जुलाई 2005 में आई बाढ़ के बाद शुरू हुआ नालों का सफाई अभियान बाद में कमाई का जरिया बन गया।
-- नदी-नालों के किनारे 2000 अवैध निर्माण। शिवाजी मार्केट के नीचे खान नदी के किनारे बसे करीब सौ परिवारों को छोड़ बाकी को प्रशासन हटा नहीं पाया।
-- पंचशीलनगर में जाकर आवासीय इकाइयां बनाई जबकि शेखरनगर और तोड़ा की योजनाएं कागजों में दफन। अर्जुनपुरा की इकाइयां भी अधूरी।
-- आपातकालीन इंतजामों के तहत जुटाई गई नावें बनी शो-पीस।
-- कायदे से बरसात से पहले साफ होना चाहिए सीवरेज। नहीं होती। बेकलाइनों की हालत भी यही।
पूर्व:
बगैर सीवरेज के बढ़ी अवैध बसाहट
यहां भरता है पानी
वेलोसिटी से लगी रामकृष्णबाग, देवकीनगर, धीरजनगर, सोलंकीनगर, आदर्श मेघदूतनगर, मालवीयनगर कांकड़, बड़ी ग्वालटोली, बख्तावररामनगर। गणराजनगर, मुसाखेड़ी, शांतिनगर, स्कीम-94, विजयनगर, स्कीम-54, सुखलिया, गौरीनगर, रूपनगर।
क्यों भरा-
- रिंग रोड बनने से नालों का बहाव प्रभावित।
- नालों पर कब्जा,  कटी कॉलोनियां।
-नाले-बेकलाइनें चौक। 'यादातर कॉलोनियां अवैध, जल-मल निकासी के इंतजाम नहीं।
- समय पर साफ नहीं होते नाले।
सरकारी अनदेखी
- अवैध कॉलोनियों पर अंकुश नहीं। सोलंकीनगर और सुयश विहार कॉलोनियां नाले पर कटी।
- सीमेंट की सड़कें बना दी, सीवरेज से किया परहेज।
- नालों से अतिक्रमण हटाना तो दूर, बरसात से पहले सफाई तक नहीं की।
- वैध कॉलोनियां फैली, सीवरेज सिकुड़ गई।
- सड़कें ऊंची। मकान नीचे। इसीलिए घरों में भरता है पानी।
पश्चिम
 कॉलोनी में गड्ढे नहीं, गड्ढे में कॉलोनियां
यहां भरा पानी
कुलकर्णी भट्टा, भागीरथपुरा, कुशवाहनगर, भगतसिंहनगर, जगदीशनगर, बड़ा बांगड़दा, शिक्षकनगर, कालानीनगर, चंदननगर, गायत्रीनगर, नगीननगर, इंदिरानगर, समाजवादी इंदिरानगर, एमओजी लाइन, टोरी कॉर्नर, कलालकुई, चंद्रभागा, तोड़ा, शेखरनगर, कबूतरखाना,
क्यों भरा
- जगदीशनगर-भगतसिंहनगर और कुशवाहनगर में ईंट के भट्टे, गड्ढों में बसाहट और नालों पर कब्जे के साथ ऊंची सड़कें बड़ा कारण।
- नदी किनारे बसा है शेखरनगर, तोड़ा और भागीरथपुरा।
- शिक्षकनगर, राजमोहल्ला में सड़कें ऊंची। नालियां खत्म। ड्रेनेज चौक। बीएसएफ क्षेत्र के बहाव का ढाल कालानीनगर में।
- बगैर डे्रनेज के बसी हैं चंदनगर और बाणगंगा की 50 से 'यादा बस्तियां। पाइप डालकर नाला बंद करने से लोहापट्टी-टोरी कार्नर और तंबोली बाखल में भरता है पानी ही पानी।
- मध्य क्षेत्र का डे्रनेज सिस्टम सात दशक पुराना। लाइने चौक और चेम्बर जर्जर हैं। क्षमता से सौ गुना दबाव। इसीलिए जरासी बरसात में लाइनें दे जारी है जवाब।
सरकारी अनदेखी
-  बाणगंगा-चंदननगर सीवरेज और नालियों जैसी बुनियादी सुविधाओं से परहेज।
- सीवरेज प्रोजेक्ट के नाम पर शहरसीमा से लगे आबादीविहीन इलाकों में डली लाइनें लेकिन मध्य क्षेत्र के मौजूदा सिस्टम को अपग्रेटड करने या नई लाइनें डालने की फिक्र नहीं।
- आंखें बंद करके नदी किनारे बसने दी शेखरनगर, तोड़ा, भागीरथपुरा की बसाहट।
-  बाणगंगा में ईंट भट्टों पर नहीं अंकुश। जिन्हें खदेड़ा वे गड्ढों में कॉलोनी काट गए। हर साल हटाते हैं परिवार, मकानों पर कार्रवाई नहीं।
- कब्जों के कारण नाला बनकर रह गई खान नदी।
उत्तर
निगम ने व्यवस्थित नहीं रखी प्राधिकरण की पूंजी
यहां भरा पानी
लसूडिय़ा चौराहा, गुलाबबाग, स्कीम-114, 78 और 74 के साथ कबीटखेड़ी।
क्यों भरा-
- रिंग रोड और एबी रोड पर अब तक स्ट्रॉम वॉटर डे्रन नहीं है। जो ड्रेन है उसकी सफाई नहीं होती। चेम्बर चौक हैं।
-लसूडिय़ा चौराहे पर एक ओर भरता है पानी ही पानी। निकासी की जगह नहीं। इसीलिए चौराहा भी लबालब।
- स्कीम-114, 78 और 74 में प्राधिकरण ने डे्रनेज लाइन तो डाली थी लेकिन क्षमता से 'यादा दबाव के कारण मामला ठप।
सरकारी अनदेखी
- सड़कें बनाई लेकिन बरसाती पानी निकासी की व्यवस्था नहीं की।
- प्राधिकरण से हस्तांतरित होने के बाद निगम ने सीवरेज सुधार पर नहीं दिया जोर।
- सड़कें यहां भी बसाहट से ऊंची।
दक्षीण
कॉलोनियों-कारखानों ने नदी को नाला बना दिया
यहां भरा पानी
रेडियो कॉलोनी, आजादनगर, संवादनगर, मुराई मोहल्ला, पालदा, चितावद कांकड़,  स्नेहनगर, खातीवाला टैंक, ट्रांसपोर्टनगर, शिवमपुरी, अमितेशनगर की नीचला हिस्सा, बिजलपुर,
क्यों भरा
- रेडियो कॉलोनी में ऊंची-नीची है बसाहट। नर्मदा की मेनलाइन रोक रही है बहाव, इसीलिए संवादनगर में भरता है पानी। संवादनगर के पीछे स्टॉपडेम से आजादनगर में आती है बाढ़।
- स्नेहनगर और लोहामंडी में नीची सड़क, कगाी और चोपट है डे्रेनेज।
- नालियों पर निर्माण।
- पालदा-चितावद और ट्रांसपोर्टनगर में सीवरेज नहीं।
- प्रकाशनगर और नवलखा का ढाल संवादनगर में।
सरकारी अनदेखी
- 2006-07 में नदी में नाव चलाने के नाम पर हुई आधी-अधूरी सफाई के बाद आज तक नहीं हुई सफाई।
- अवैध कब्जों के कारण नाला बनकर रह गई नदी।
- पालदा और चितावद में कारखानों का नालों पर कब्जा है जो निगम को दिखाई नहीं देता।
- शिवमपुरी और अमितेशनगर में बरसाती पानी निकासी की जगह नहीं।
क्या कहते हैं जानकार
तो तबाह हो जाएगा इंदौर
शासन और जनता ने नदी-नालों और उन तक पानी पहुंचाने वाले ढलानों पर अतिक्रमण करने में कोर-कसर नहीं छोड़ी। लोगों ने भी भराव करके ओटले खड़े करे और  सड़क को नाली बना डाला। सड़कों-चौराहों पर बनी पुरानी जितनी भी पुल-पुलियाएं थीं बंद हो चुकी हैं। कुल मिलाकर इंदौर में इंजीनियरिंग के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत काम हो रहा है। हालात यही रहे तो जिस दिन मुंबई-दिल्ली की तरह 15-20 ईंच बरसात एक झटके में हुई उस दिन इंदौर का तबाह होना तय है।
अतूल सेठ, इंजीनियर
प्लींथ लेवल पर बने सड़कें
- नई सड़कें प्लींथ लेवल (जिस लेवल पर आसपास की बसाहट है) के हिसाब से बनाई जाना चाहिए। कारण- आप सड़क ऊपर-नीचे कर सकते हैं लेकिन बसाहट को नहीं। कई बार ऐजेंसियां कहती है सड़क नीचे रहे तो लोगों के घर का पानी जमा होता है। इससे निपटने के लिए ऐजेंसियां सेंटर से उठाकर सड़क के दोनों ओर ढाल दें और ड्रेनेज लाइन डालकर निकासी की व्यवस्था कर सकती हैं।
एच.एस.गोलिया, प्रोफेसर, एसजीआईटीएस
बरसाती पानी निकासी के बिना जीता इंदौर
- मध्यक्षेत्र में सीवरेज आजादी से पहले की। वहां मल्टीस्टोरी बनने से बेकाबू हुए हालात। निर्माणाधीन योजनाओं ने भी बढ़ाया बहाव में अवरोध। मौजूदा इंतजाम कारगर नहीं। अतिक्रमण हटाकर नालों को मूल स्वरूप देने की कोई योजना नहीं। सीवरेज प्रोजेक्ट के तहत सिटी की लाइनें पहले डाली जाना थी। लोगों ने बरसात का पानी डे्रनेज में जोड़ दिया। ड्रेनेज की क्षमता नहीं।
एसके बायस, पूर्व सिटी इंजीनियर नगर निगम

खदानों के खेल में 'राजपुत्रÓ खिलाड़ी


-- इंदौर में मंत्रीपुत्र ने खोदी जमीन तो धार में सांसद के भतीजे और उसके दोस्तों ने सरकारी जमीन पर किया कब्जा
 इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।

रसूखदारों की रं"दारी और खिदमतगार अफसरों के संरक्षण ने खदानों के नाम पर जमीनी सेंधमारी के अवैध कारोबार को आसमानी बुलंदी दे दी। सत्ता में बैठे राजनीतिक रंगदारों और उनके परिजनों ने अपने रौब का पूरा फायदा उठाया। इंदौर के हातोद में विवादित मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बेटे ने मंजूरी से 'यादा खुदाई की। वहीं धार के धांकदार भाजपाई प्रशांत वर्मा और उनके साथियों ने महापुरा की विवादित जमीन को खदान बना डाला। प्रशांत धार के सांसद विक्रम वर्मा का भतीजा है।
आकाश की कंपनी ने खोदी सरकारी जमीन
हातोद की जिस जमीन पर सरकारी दफ्तर और कॉलेज बनना था उसे अधिकारियों की मिलीभगत से जमीन के जालसाजो ने खदान बना डाला। खदान सूर्या इन्फ्रावेंचर प्रा.लि. की है जिसके कर्ताधर्ता आकाश विजयवर्गीय हैं। आकाश सौ करोड़ के सुगनीदेवी जमीन लीज घोटाले में आरोपों से घिरे उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। सूर्या सब कॉन्ट्रेक्टर के रूप में दिलीप बिल्डकॉन से ठेका लेकर इंदौर-देपालपुर रोड बना रहा है। इसीलिए उसे गिट्टी-मुरम की जरूरत पूरी करने के लिए खदान खोदी।
    किस्सा हातोद स्थित सर्वे नं. 538 का है। दस हेक्टेयर में फैली इस जमीन के दो हेक्टयेर (9 एकड़) हिस्से में मार्च-अपै्रल 2010 को यहां खुदाई की मंजूरी दी गई। इस जमीन पर सरकारी दफ्तर और कॉलेज बनना था। मंत्री की मंशा और उनके रूदबे से वाकीफ पूर्व कलेक्टर और खनिज अधिकारी संजय लूणावत ने नियमों को तांक पर रखकर मनमाने ढंग से यह मंजूरी दी। मंजूरी दिलीप बिल्डकॉन को दी गई। क्षेत्रीय पार्षद, पटवारी, तहसीलदार और जिला पंचायत अध्यक्ष सहित कई लोगों की आपत्तियों के बावजूद आला अधिकारियों ने मामला रफादफा कर दिया। पिता के दबदबे और अफसरों के संरक्षण का आकाश ने भरपूर फायदा उठाया। उनकी कंपनी ने जितनी अनुमति ली, उससे 'यादा खुदाई की। हालात यह है कि 27 रुपए प्रति घनमीटर के हिसाब से मंजूरी मुरम के लिए दी गई थी लेकिन बगैर किसी अनुमति के कंपनी अगस्त तक गिट्टी की खुदाई करती रही। जबकि गिट्टी की रॉयल्टी 44 रुपए प्रति घनमीटर है। अंतर सीधे 17 रुपए घनमीटर का। दादागिरी इतनी कि भूले-बिसरे यदि कोई अधिकारी मौके पर पहुंचा तो भी उसे डरा-धमकाकर भगा दिया गया।
आपत्तियों की अनदेखी
राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट ने पहले ही दौर में खदान की खुदाई खारिज कर दी थी। उनका कहना था कि जमीन चरनोई की है। यहां मिट्टी 'यादा है। मुरम या गिट्टी के लिए खुदाई 'यादा करना पड़ेगी। इससे यहां दफ्तर और कॉलेज बनाने की योजना प्रभावित होगी। जवाब में कलेक्टर श्रीवास्तव ने यह कहकर आपत्ति खारिज कर दी थी कि ऐसे आपत्ति लेते रहे तो रोड कैसे बनेगी।
मंजूरी से कम में किया काम
हातोद में आपत्तियों के बावजूद खदान दी गई?
कोई आपत्ति नहीं थी। तहसीलदार की अनुसंशा के बाद दी मंजूरी।
खदान में मंजूरी से 'यादा की गई खुदाई?
शिकायतें मिली थी लेकिन जांच कराई तो ऐसा कुछ नहीं निकला।
क्या कहती है आपकी जांच रिपोर्ट?
रिपोर्ट के अनुसार मंजूरी से कम में किया काम।
संजय लुणावत, खनिज अधिकारी
अनुसंशा नहीं, हमने आपत्ति ली थी
क्या आपने अनुसंशा की थी?
नहीं, उलटा हमने तो आपत्ति ली थी।
क्या थी आपत्ति?
जमीन पर तहसील कार्यालय बनना है। जमीन चरनोई की है। इसीलिए खदान की मंजूरी न दी जाए।
बावजूद इसके मंजूरी दी?
पूर्व अधिकारियों का कहना था कि मंजूरी नहीं देंगे तो रोड कैसे बनेगा।
क्या कंपनी ने जरूरत से 'यादा खुदाई की?
इसकी जानकारी नहीं। हां, कंपनी ने काम बंद कर रखा है।
विजय खरे, तहसीलदार हातोद



धार : भाजपाई रसूखदारों की धांक
इंदौर की तरह अपने रौब-रुदबे को भुनाकर सरकारी जमीनों पर अपने मालिकाना हक की तख्ती टांगने वाले धार जिले में भी कम नहीं है। महापुरा में नर्मदा किनारे की उस जमीन को रसूखदारो ने रेत की खदान बना डाली जो जिला प्रशासन द्वारा मप्र खनिज निगम को हस्तांतरित की जाना थी। खुदाई खलघाट निवासी अनिल मालवीय के नेतृत्व में हो रह है। भाजपा के सांसद विक्रम वर्मा के भतीजे प्रशांत वर्मा और विधायक रंजना बघेल के नजदीकी जयदीप भैया अनिल के पार्टनर हैं।
    मामला नर्मदा से लगे धार के महापुरा गांव का है। धमरपुरी से लगा यह गांव गोगावां पंचायत का हिस्सा है। यहां सर्वे नं. 127 (रकबा 9.067 एकड़) राजस्व रेकॉर्ड में सरकारी जमीन है। जमीन पर अनिल और प्रशांत की फर्म बालू रेती का खनन कर रही है। बगैर किसी सक्षम स्वीकृति के। सिर्फ पंचायत के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के आधार पर। एनओसी 4 सितंबर 2010 की है जबकि खुदाई करते दो महीनें हो चुके हैं। लोगों की शिकायत पर 'पत्रिकाÓ ने मौके का जायजा लिया तो वहां अनिल के साथ प्रशांत भी मौके पर था। 'पत्रिकाÓ के पास इसकी वीडियो फूटेज भी मौजूद है। क्षेत्रवासियों ने बताया शिकायत धार कलेक्टर बी.एम.शर्मा और खनिज अधिकारी एम.एस. खतेडिय़ा को हुई लेकिन भाजपाई रसूखदारों के आगे इनके सूर बदले नजर आए। खतेडिय़ा ने तो अपना पल्ला झाड़ते हुए यहां तक कह दिया कि जमीन खनिज निगम को सौंप दी है और ये निगम के ही ठेकेदार हैं। उधर, क्षेत्रीय पटवारी डी.एम.शर्मा कहते हैं कि सर्वे 125 और 127 की अनुमति मांगी थी। अनुमति मिल जाती तो आवंटन पत्र मुझे भी मिल जाता जो नहीं मिला।
अफसरों की अनदेखी ले चुकी है जान
नर्मदा किनारे अवैध रेत खदानों का खेल नया नहीं, पूराना है। 18 मई 2009 को रेत खदान धंसने से चार मजदूर दब गए थे। हादसा जलकोटी से करीब दो किमी दूर उस वक्त हुआ जब खदान में 30 मजदूर थे। अचानक खदान धंसने से भूरीबाई पिता बालू भील (16), रणजीत पिता नानका भील (16) निवासी जहांगीरपुर, गुजरीबाई पति रमेश भील (30) निवासी खुटामोड़ एवं कविताबाई पति गणेश (22) बावड़ीपुरा की मौत हो गई। उस वक्त भी खनिज अधिकारी एम.एस.खेतडिय़ा ने पल्ला झाड़ लिया था। मृतकों के परिजनों का आरोप है कि खतेडिय़ा की खदानों पर बंधी बंदी है। इसीलिए उन्हें खदाने नजर नहीं आती।
क्यों ली ग्रामीणों ने आपत्ति
खदान नर्मदा के किनारे है। खदान तक पहुंचने के लिए पूरा महापुरा गांव पार करना पड़ता है। तकरीबन 20 हजार से 'यादा की आबादी वाले इस गांव में सड़कें पहले ही बदहाल हैं। खदान शुरू हुई तो दिनभर ट्रक-डम्परों की अंधाधूंध दौड़ मची रहेगी जो गांव के बगाों के लिए जानलेवा साबित होगी।
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निगम को सौंपी जमीन, खदान मालिक निगम के ठेकेदार
अनिल और प्रशांत के खिलाफ शिकायत मिली थी। जांच कराने पर पता चला जमीन खनिज निगम को हस्तांरित कर दी है। कागजी कवायदें तकरीबन पूरी हो चुकी हैं। थोड़ी-बहुत औपचारिकता रही हैं। जो लोग खुदाई कर रहे हैं वे निगम के ही ठेकेदार हैं।
एम.एस.खतेडिय़ा, जिला खनिज अधिकारी
माइनिंग की मंजूरी दी ही नहीं जा सकती
महापुरा की जिस जमीन की आप बात कर रहे हैं वह निगम को हस्तांरित नहीं हुई है। जमीन जिला प्रशासन के पास है। जिला प्रशासन ने साल-दो साल पहले यहां माइनिंग की मंजूरी दे दी थी जिसके खिलाफ स्थानीय लोग हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया। मामला विचाराधीन है। इसीलिए यहां माइनिंग की मंजूरी दी भी नहीं जा सकती।
राजीव सक्सेना, मप्र खनिज निगम



सीवरेज प्रोजेक्ट : 40 किलोमीटर लंबी लाइनों में सेंध


-- 165 की जगह डलेगी सिर्फ 125 किलोमीटर लंबी लाइन
-- कंपनियों को दिया रूट चार्ट
-- वर्कऑर्डर 442 करोड़ का, 210 करोड़ में काम समेटने की तैयारी
-- स्वीकारते हुए कहते हैं 210 नहीं, 320 करोड़ का होगा काम
इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
सड़कों की बदहाली का मुद्दा अंजाम तक पहुंचा भी नहीं कि घपले का जिन्न सीवरेज प्रोजेक्ट की बंद बोतल से बाहर आ गया। 'पत्रिकाÓ के हाथ लगे सुरागों की मानें तो सीवरेज प्रोजेक्ट का वर्कऑर्डर भले  165.08 किलोमीटर का जारी हुआ हो लेकिन लाइनें सिर्फ 125 किलोमीटर लंबी ही डलेंगी। जमीनी अंतर सीधे 40 किलोमीटर का। कौनसी साइट कम हुई? इसका जवाब निगम के उन नीति निर्धारकों के पास भी नहीं है जो काम की कटौती को निगम खजाने की बचत बता रहे हैं।
    नगर निगम ने मई 2008 में सीवरेज प्रोजेक्ट के तहत तीन क्षेत्रों के लिए दो कंपनियों को 442 करोड़ का वर्कऑर्डर जारी किया था। हैदराबाद की नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी को 266 करोड़ में पूर्व और मध्य क्षेत्र में 100.58 किलोमीटर लंबी लाइन डालना थी। वहीं पश्चिम क्षेत्र की कमान सिम्पलैक्स को सौंपी गई। पश्चिम में 175 करोड़ में 65 किलोमीटर लंबी डाली जाना थी। सीवरेज लाइनों की गुणवत्ता शुरूआती दौर से विवादों में रही। इसकी बेहतरी को तवगाो देना तो दूर निगम के नीति निर्धारकों ने बालेबाले 39 किलोमीटर लंबी साइट ही कम कर डाली। साइटें कौनसी हैं? कम क्यों और किस आधार पर किया गया? जैसे सवालों के जवाब में नीति निर्धारक निगम का पैसा बचाने की दलीलें दे रहे हैं। हालांकि दलीलों को एमआईसी की अनुसंशा मिली न ही निगम परिषद की मंजूरी।
तब किया ताबड़तोड़ भुगतान, आज याद आई तंगी
निगम के जो अधिकारी आज तंगी की आड़ में काम में कटौती करके निगम का खजाना बचाने की दलीलें दे रहे हैं वे सबसे पहले 442 करोड़ के हिसाब से दोनों कंपनियों को मोबलाइजनेशन के लिए 44 करोड़ का अवैधानिक भुगतान कर चुके थे। इसमें 26.60 करोड़ रुपए एनसीसी और 17.50 करोड़ रुपए सिम्पलेक्स को  दिए गए थे। लोकायुक्त भुगतान की वैधता की जांच भी कर रहा है।
थोड़ा न बहुत अंतर सीधे 230 करोड़ का
एनसीसी को 266 करोड़ का वर्कऑर्डर दिया था। 58 किलोमीटर लाइन डलने के बाद 90 करोड़ की बीलिंग हो चुकी है। बमुश्किल 20 करोड़ की बीलिंग और होगी। अंतर कुल मिलाकर 156 करोड़ का। सिम्पलेक्स 175 करोड़ के वर्कऑर्डर देकर 72 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। बकाया काम के लिए 28 से 30 करोड़ की बिलिंग हुई तो भी मामला सौ करोड़ में सिमट जाएगा। बचेंगे 75 करोड़ रुपए। दोनों कंपनियों के कर्ताधर्ता निगम प्रशासन के मनमाने निर्णय से नाराज हैं। उनका कहना है कि वर्कऑर्डर के हिसाब से ही कंपनी ने इंदौर में इन्वेस्ट किया। मशीनरी स्थापित की। मैदानी अमला नियुक्त किया। लोगों का विरोध सहा। गालियां खाई। मार खाई। अब निगम काम में कटौती की बात करके हमारे साथ धोखा कर रहा है।
दोषी:- डीपीआर बनाने वाले या काम करने वाले?
लाइन में कटौती की वजह इंजीनियर अलाइनमेंट में लाइनों की लंबाई कम होना बताते हैं। इसे जानकार निगम इंजीनियरों की कोरी बहानेबाजी करार देते हैं। उनकी मानें तो डीपीआर किसी नौसीखिए ने नहीं बल्कि निगम के काबिल इंजीनियरों और कंसलटेंट की टीम ने तैयार की थी। इसे डीपीआर को नगर निगम से केंद्र सरकार तक सबने मंजूर किया। अलाइनमेंट के आधार पर ही योजना की लागत निर्धारित कराकर वर्कऑर्डर जारी किया गया। ऐसे में अब निगम के इंजीनियर यह कैसे कह सकते हैं कि अलाइमेंट की लंबाई कम हो गई।
अलाइनमेंट की लंबाई कम हो गई
-- क्या सीवरेज प्रोजेक्ट में काम की कटौती हुई है?
हां, अलाइमेंट की लंबाई कम होने के कारण काम तो कम हुआ ही है।
-- अलाइनमेंट क्यों कम हुआ?
मैदान में मशक्कतें बहुत है। उनको देखते हुए ही अलाइनमेंट में फेरबदल करना पड़ता है।
-- लागत पर कितना फर्क पड़ेगा?
442 करोड़ का काम 320 करोड़ तक निपट जाएगा। 120-122 करोड़ बचेंगे।
-- क्या कटौती की जानकारी एमआईसी या परिषद को दी गई?
नहीं , अभी तक 60 प्रतिशत काम हुआ है। जैसे-जैसे काम हो रहा है अलाइमेंट की वास्तविक्ता सामने आ रही है। जिस दिन अंतिम प्रारूप तैयार हो जाएगा, एमआईसी और परिषद को बता देंगे।
-- कंपनियों को अलाइनमेंट की जानकारी दे दी?
हां, उनके पास पहले से है।
हरभजन सिंह, प्रोजेक्ट इंचार्ज
पूर्व (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 58.57 किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 39.99 किलोमीटर
अंतर- 18.58 किलोमीटर
मध्य क्षेत्र (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 42.01  किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 28.96 किलोमीटर
अंतर- 13.05 किलोमीटर
पश्चिम क्षेत्र (एनसीसी)
वर्कऑर्डर - 64.50  किलोमीटर
स्कोप ऑफ वर्क- 57.00 किलोमीटर
अंतर- 7.50 किलोमीटर