Wednesday, July 29, 2015

सौ करोड़ की सड़क से दो हजार करोड़ की वसूली

इंदौर-एदलाबाद रोड : 2017 में खत्म हो"ी टोल 2002 से शुरू हुई टोल की टेंशन
इंदौर, विनोद शर्मा ।
बीओटी के नाम पर मनमानी टोल वसूली और विभा"ीय अनदेखी के मामले में सवा दो सौ किलोमीटर लंबी इस रोड ने दूसरी सड़कों को पीछे छोड़ दिया है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 165 करोड़ की इस रोड को बनाकर कंपनी आज की तारीख में मरी से मरी हालत में  50 लाख रुपए रोज का टोल उ"ा रही है। यानी 15 करोड़ रुपए महीना। नवंबर 2002 से कंपनी अप्रैल 2017 तक टोल वसूले"ी। यानी 15 साल में वसूल हो"ी तीन हजार करोड़ से भी 'यादा जो ला"त से 10 "ुना तक 'यादा है।
    इंदौर-एदलाबाद के बीच 205 किलोमीटर लंबी रोड अशोका बिल्डकॉन प्रा.लि. ने विवा हाई-वे प्रा.लि. की तकरीबन 85 प्रतिशत की भा"ीदारी के साथ बनाई थी। कंपनी के सूत्रों की मानें तो सड़क की ला"त थी 165.28 करोड़। मप्र रोड डवलपमेंट कॉर्पोरेशन के साथ हुए करारनामे के हिसाब से कंपनी ने 2002-2004 के बीच तीन चरणों में टोल वसूली शुरू की। पहले में नवंबर 2002, अ"स्त 2003 में दूसरे और फरवरी 2004 में तीसरे चरण में टोल शुरू हुआ। इंदौर-देवास फोरलेन के बाद इंदौर को दूसरे शहरों से जोडऩे वाली यह दूसरी ऐसी सड़क थी जिस पर चलने से पेट का पानी नहीं हिलता था। इसीलिए एबी रोड की बदहाली से परेशान लो" नासिक-अहमदन"र-शिर्डी-त्रयंबकेश्वर तक इस रोड से आने-जाने ल"े। अ'छी सड़क के कारण  बुरहानपुर-जल"ांव-और"ंाबाद से "ुजरने वाले इस रूट की 80 किलोमीटर से 'यादा की अतिरिक्त लंबाई भी सहन करते थे। ऐसे में कंपनी यह भी नहीं कह सकती कि शुरूआती दौर में उसकी कमाई आज के मुकाबले कम रही।
    वसूली के मामले में मोरोद से ल"ा टोल सबसे आ"े है। ओंकारेश्वर-शनि मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों, चोरल-तिंक्षा फाल-कालाकुंड जैसे प्राकृतिक सौंदर्य और नाइथ माइल-सेल सिटी-नखराली ढाणी जैसे एम्यूजमेंट पार्क के साथ तिंछा तिराहे तक कॉलेज-कॉलोनियों की बाढ़ से यहां दिनभर एक वक्त में 50 से 'यादा "ाडिय़ां खड़ी नजर आती है।
कौन-कौन से शहरों से जोड़ती है रोड़
बड़वाह, सनावद, खंडवा, ना"पुर रुस्तमपुरा, बुरहानपुर, अकोला, औरं"ाबाद, अजंता की "ुफाएं, जालना, परभानी, नांदेड़, शे"ांव और अमरावती।
ला"त : आंकड़ों की हेराफेरी
कंपनी के दस्तावेजों की मानें तो सड़क की लंबाई 404 किलोमीटर है। ला"त है 165 करोड़ रुपए जबकि एमपीआरडीसी के दस्तावेजों के अनुसार सड़क की लंबाई 203 किलोमीटर है और ला"त 123 करोड़ रुपए।
अंधेर न"री- चौपट राजा
"    ट्रांसपोर्ट कारोबार से जूड़े मां"ीलाल डाबी कहते हैं ला"त से 15 प्रतिशत 'यादा ब्याज वसूले यहां तक समझ में आती है लेकिन 15 "ुना तक की वसूली समझ से परे है। ये तो ठिक वैसा ही हुआ जैसा प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ा था अंधेर न"री चौपट राजा, टका सैर भाजी टका सैर खाजा। आंखें बंद करके टोल अनुबंधों पर साइन करने वाली सरकार यह तो देखे कि ठेकेदार ने कितना पैसा ल"ाया है और वसूला कितना जा रहा है।
"    देवास नाका ट्रांसपोर्ट ऐसोसिएशन के सचिव वी.पी.पटवारी ने बताया ला"त और वसूली का आंकलन जरूरी है। सरकार के पास पैसा नहीं है। बीओटी से सड़कें-ब्रिज बनवाएं। ठेकेदार को ला"त के साथ उसका वाजिब मुनाफा दें। किसी को कोई "ुरेज नहीं लेकिन मनमानेे अनुबंधों की खिलाफत तो करना ही पड़े"ी।
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लाइट व्हीकल या फोरव्हीलर की बात न करें तो भी इंदौर से बुरहानपुर-महाराष्ट्र बॉर्डर तक तकरीबन 9000 से 'यादा ट्रकों का आना-जाना है। इसके अलावा महु या बीच में से इधर-उधर होने वाले ट्रक अल"। कंपनियां अर्जी-फर्जी आंकड़े देकर सरकार और जनता की आंखों में धूल झोख रही है। वाहनों की संख्या का मैदानी सर्वे कराने के लिए हम भी तैयार है।
राजेंद्र त्रेहान, अध्यक्ष
इंदौर ट्रक ऑपरेटर ऐसोसिएशन

ब्रिज से "ुजरने वाले वाहन/घंटा
वाहन         औसत/घंटा        24 घंटों में
कार-जीप         480        11500
ट्रक        300        7200
बस         240        5760
टेम्पो-मेटाडोर    300        7200
मल्टी एक्सल ट्रक    120        2880
किससे कितना टोल
मोरोद
वाहन         टोल (रुपए)      वसूली 24 घंटों में
कार-जीप         30     3.45 लाख (11500)
टेम्पो-मेटाडोर     73     5.25 लाख (7200)
खाली-भरी बस    151     2.26 लाख (1500)
ट्रक         181     13.03 लाख (7200)
मल्टी एक्सल ट्रक    363     10.45 लाख (2880)
सनावद
वाहन         टोल (रुपए)      वसूली 24 घंटों में
कार-जीप         25     2.37 लाख (9500)
टेम्पो-मेटाडोर     61     4.27 लाख (7०00)
खाली-भरी बस    126     1.26 लाख (1000)
ट्रक         152     10.94 लाख (7200)
मल्टी एक्सल ट्रक    306     8.56 लाख (28०0)
दुलार
कार-जीप         21     1.75 लाख (8,500)
टेम्पो-मेटाडोर         51     3.57 लाख     (7०00)
खाली-भरी बस        105     00.75 लाख (700)
ट्रक         127     8.89 लाख (7000)
मल्टी एक्सल ट्रक    260     7.22 लाख (2780)
इ'छापुर
कार-जीप         21     1.47 लाख (7,000)
टेम्पो-मेटाडोर         51     3.57 लाख (7०00)
खाली-भरी बस        105     00.75 लाख (700)
ट्रक         127     8.89 लाख (7000)
मल्टी एक्सल ट्रक    260     7.22 लाख (2780)
(ये आंकड़े औसत वाहनों की संख्या और टोल शुल्क के आधार पर जुटाए "ए हैं। तीन टोल की पर्ची दिखाने पर चौथे टोल पर पैसा नहीं ल"ता। )
दूसरों को छापा, हमें तो दोड़ दो
कहां-कहां है टोल?
चार टोल हैं। 12 किलोमीटर, सनावद, रुस्तमपुर और इ'छापुर। इनमें से एक फ्री है।
रेट कार्ड क्या है?
ये क्यों पुछ रहे हो।
टोल को लेकर स्टोरी बना रहे हैं इसीलिए?
हां, तो ठिक है यार दूसरों को लिखों कोई दिक्कत नहीं लेकिन हमें तो छोड़ दो।
सॉरी सर, जानकारी तो आपको देना पड़े"ी?
मैं ये सब जानकारी नहीं दे सकता।
प्रशांत जोशी, वीवा हाई-वे
दस्तावेजों में सिर्फ 1.66 लाख रुपए रोज
एमपीआरडीसी के रेकॉर्ड में वीवा-अशोका ने टोल वसूली 5 करोड़ रुपए महीना बता रखी है। मेरा मानना है वसूली 15 लाख से 'यादा नहीं हो"ी। बावजूद इसके जरूरत पडऩे पर यातायात और रेटकार्ड के हिसाब से वसूली की समीक्षा कर सकते हैं।
विवेक अ"्रवाल, एमडी
एमपीआरडीसी

Tuesday, June 30, 2015

जमीनी बजट : कहीं राह, कहीं रोड़े


- बंटवारे-पारिवारिक दान पर स्टॉम्प ड्यूटी 2.5 प्रतिशत घटी
- 5 प्रतिशत स्टॉम्प ड्यूटी पर ही होगी पॉवर
इंदौर. चीफ रिपोर्टर । 
अपने मलाईदार बजट से व्यापारियों के दिल में जगह बनाने में काफी हद तक कामयाब रहे वित्त मंत्री जयंत मलैया जमीनी मामले में मिलाजुला रंग ही जमा पाए। उन्होंने बटवारे और परिवार के दान पत्र की संपत्तियों पर लगने वाली स्टॉम्प ड्यूटी में 2.5 प्रतिशत की राहत दी तो दूसरी तरफ पॉवर आॅफ अटर्नी के लिए 5 प्रतिशत की स्टॉम्प ड्यूटी तय कर दी। जानकारों की मानें तो एक फैसले ने राहत दी तो दूसरा बड़ी आफत साबित होगा।
बजट से पहले वित्तमंत्री और महानिरीक्षक पंजीयक से मुलाकात कर वकीलों ने कुछ मुद्दे रखे थे। बजट में इनसे से दो पर काम करते हुए मंत्री मलैया ने बटवारे और पारिवारिक दान पत्र पर संपत्तियों के आदान-प्रदान पर लगने वाली स्टॉम्प ड्यूटी 5 से घटाकर 2.5 प्रतिशत कर दी है। एडवोकेट प्रमोद द्विवेदी ने बताया कि 1994 में जब स्टॉम्प ड्यूटी 12.5 प्रतिशत थी उस वक्त भी बंटवारे और पारिवारिक दान पत्र पर संपत्तियों के आदान-प्रदान पर 4-5 प्रतिशत स्टाम्प ड्यूटी लगती थी। अब जबकि स्टॉम्प ड्यूटी घटकर 5 प्रतिशत रह गई है तब भी यह ड्यूटी इतनी है। यानी जितना पैसा सपंत्ति खरीदने पर चुकाना पड़ रहा था उतना ही दान या बंटवारे में मिलने पर चुकाना पड़ता था। इसीलिए हमने इस मामले में नितिगत निर्णय की मांग की थी। जवाब में मंत्री ने 2.5 प्रतिशत की कटौती की।
बड़ा फैसला यह भी...
पॉवर आॅफ अटर्नी के नियमों में बदलाव किया है। अब तक एक रुपए से लेकर अरबों तक की जमीन 1000 रुपए के स्टॉम्प पर पॉवर कर दी जाती थी। अब ऐसा नहीं होगा। अब पॉवर के लिए भी 5 प्रतिशत ड्यूटी चुकाना होगी जो कि संपत्ति की खरीदी-बिक्री के दौरान चुकाना पड़ती है। राहत के नाम पर सिर्फ यही है कि पॉवर आॅफ अटर्नी पर सौदे की तरह 1 प्रतिशत नगर निगम, 1 प्रतिशत पंचायत और 0.25 प्रतिशत उपकर नहीं चुकाना पड़ेगा।
महंगी हुई पॉवर
- अब तक हजार रुपए के स्टॉम्प पर पॉवर हो जाती थी जो कि सालभर तक मान्य रहती थी।
- अब 5 प्रतिशत स्टॉम्प के साथ साइन होने वाला पॉवर अनिश्चिितकालीन होगा।
- इससे पहले पॉवर पर 2 प्रतिशत स्टॉम्प शुल्क था जिसे सरकार ने हटाकर 1 हजार का स्टॉम्प तय कर दिया था। अपने ही नियम को बदलते हुए सरकार ने स्टॉम्प शुल्क फिर 5 प्रतिशत कर दिया जो कि अब तक की सबसे ऊंची दर है।
नुकसान ...
- छोटे-मोटे कामों के जरिए लाभ लेने के लिए जमीन कारोबार में जुड़े लोग कारोबार से दूर हो जाएंगे।
- मकान, दुकान, फ्लेट, प्लॉट और महंगे होंगे।
- क्योंकि स्टॉम्प ड्यूटी में होने वाला खर्च निवेशकर्ता को ही चुकाना होगा।
- चोरी के और तरीके बढ़ेंगे। लोग कच्चे कागजो, आवंटन पत्र और डायरी के आधार पर ही व्यापार करेंगे।
- भूमि विवाद और पुलिस की कमाई बढ़ेगी। 

देश के टॉप-10 कर्जेदारों में इंदौर की जूम भी


कमीशन की कहानी : एक के बाद एक बैंकों ने दिखाई थी मेहरबानी
बैंकों का अस्तित्व सैकड़ों-हजारों छोटे-मोटे खातेदारों की जमा पूंजी पर टिका है। जरूरत के वक्त इन्हीं जमाकर्ताओं को कर्जे के कायदों की मोटी किताब पढ़ा दी जाती है। दस्तावेजों की थप्पी लगाने के बाद भी फाइलें रिजेक्ट कर दी जाती है। कभी सिविल रिपोर्ट की दहशत। कभी भारी-भरकम ब्याज दर का डर। कभी कुर्की-नीलामी के नोटिस का डर। कभी बाउंसर। इन सबसे दूर बैंक प्रबंधक से लेकर बोर्ड आॅफ डायरेक्टर तक मोटी कमीशन की आड़ में ऐसे ‘करोड़पतियों’ को कर्जा दिए बैठे हैं जो चुकाने के नाम पर कायदे बताकर हाथ खड़े कर चुके हैं। इनके लिए बैंकों के पास न बाउंसर है और न ही सिविल का डर। इसीलिए देश के ‘कुबेरों’ का 2.36 लाख करोड़ रुपया बकाया है। बकाया की यह रकम लगातार बढ़ रही है। 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
बैंकों ने बीते दिनों केंद्रीय वित्त मंत्रालय को देश के प्रमुख 10 बड़े बकायादारा ‘कुबेरों’ की सूची सौंपी है। इस सूची में सातवें नंबर मुरैना की केएस आॅइल प्रा.लि. है जबकि आठवें क्रम पर इंदौर की जूम डेवलपर्स प्रा.लि.। सिर्फ इन दोनों पर ही 3124 करोड़ रुपया बकाया है। भारी-भरकम रिश्वत और 3 प्रतिशत की कमीशन के चक्कर में जिम्मेंदारों ने रिकवरी की चिंता किए बिना ही एक के बाद एक बैंकों के खजाने इनके लिए खोल दिए। बात सिर्फ जूम डेवलपर्स की ही करें तो समूह ने एक के बाद एक दो दर्जन बैंकों को 2600 करोड़ से ज्यादा का झटका दे दिया।
देश के 50 कर्जदारों के पास दिसंबर 2013 तक बैंकों का 53,000 करोड़ रुपया फंसा हुआ है। बैंकों ने इनकी सूची वित्त मंत्रालय को भेजी है। इसमें 19 कंपनियां ऐसी है जिनके पास 1000 करोड़ से ज्यादा बकाया है। अगर आम आदमी कर्ज ले तो उसे चुकाना भी पड़ेगा लेकिन हर शहर में ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहंी हैं जो चुकाने के नाम पर चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। इनसे वसूली इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि  हमारे कानून में कई कमियां हैं। इन खामियों का फायदा उठाकर प्रमोटर बच निकलते हैं। बैंकों का पैसा फंस जाता है। आम जर्माकर्ताओं की मानें तो डिफाल्टरों के साथ इन्हें लोन देने वाले बैंक के कर्ताधर्ताओं पर भी कार्रवाई होना चाहिए।
क्यों जरूरी है नकेल...
- जूम डेवलपर्स पर जितना पैसा बकाया है उतना तो मप्र की सबसे बड़ी इंदौर नगर निगम का एक साल का वास्तविक बजट भी नहीं है। इंदौर का वास्तविक बजट 800 करोड़ का है।
- सामान्यत: बैंकों में ऐसे खातेदारों की संख्या 80 फीसदी तक रहती है जिनके खातों में 5 लाख से कम जमा हो। यदि औसत 5 लाख की जमापूंजी का भी एक खाता माना जाए तो चौधरी के कर्जे और बैंक संचालकों के मजे की सजा  37776 खातेदारों को अपनी जमापूंजी से चुकाना पड़ रही है।
इंदौर के अन्य बड़े बकायदारा...
बेटा नेपथॉल - 692.40 करोड़
अम्बिका सॉल्वेक्स - 147.95 करोड़
मांडवी माइन्स प्रा.लि. - 88.92 करोड़
मैथसंस प्लास्टिक्स एंड ग्लासेस प्रा.लि. - 64.96 करोड़
इस्सर अलॉय एंड स्टील लि. - 49.91 करोड़
मिडमैक्स ग्लोबल प्रा.लि. - 31.28 करोड़
नर्मदा वेअर हाउस - 31.19 करोड़
उत्कर्ष इंडस्ट्री प्रा.लि. - 29.98 करोड़
पिथमपुर स्टील प्रा.लि. - 24.49 करोड़
माया स्पीनर्स प्रा.लि. - 20.27 करोड़
जूम डेवलपर्स ने ऐसे बूना कर्जे का तानाबाना
बैंक ब्रांच बकाया (करोड़)
पंजाब नेशनल बैंक मुंबई 410.18
यूको बैंक मुंबई 309.50
यूनियन बैंक आॅफ इंडिया मुंबई 241.69
ुइंडियन बैंक मुंबई 238.73
ओरियंटल बैंक आॅफ कॉमर्स मुंबई 127.78
स्टैट बैंक आॅफ हैदराबाद मुंबई 113.90
आंध्रा बैंक मुंबई 65.44
कर्नाटका बैंक लि. मुंबई 63.48
देना बैंक मुंबई 56.84
विजय बैंक मुंबई 53.03
तमिलनाडू मर्केटाइल बैंक मुंबई 45.65
फेडरल बैंक मुंबई 34.30
स्टैट बैंक आॅफ पटियाला मुंबई 73.03
कॉर्पोरेशन बैंक मुंबई 55.31
कुल 1888.87
(यह दिसंबर 2013 की स्थिति है। अब तक करीब 200 करोड़ रुपए की रिकवरी बैंके संपत्ति कुर्क करके कर चुकी है।)
इन नामों पर लिया लोन...
आंध्रा बैंक - बी.एल.केजरीवाल, विजय चौधरी
देना बैंक - बिहारीलाल केजरीवाल, विजय चौधरी
इंडियन बैंक - बी.के.केजरीवाल, एस.प्रधान, विजय चौधरी
कर्नाटका बैंक - बिहारीलाल केजरीवाल, विजय चौधरी, यशपाल साहनी
ओरियंटल बैंक - बिहारीलाल केजरीवाल, डी.एन.भाखाई, के.पी.सेनगुप्ता,
-  प्रदीप सक्सेना, विजय चौधरी और वाय.पी.साहनी
पी.एन.बी. - बी.एल.केजरीवाल, माइकल स्टर्लिंग, विजय चौधरी
एस.बी.एच - बिहारीलाल केजरीवाल,  माइकल स्टर्लिंग, विजय मदनलाल चौधरी
तमिलनाडू मर्केटाइल्स - सुशांतकुमार प्रधान, विजय मदनलाल चौधरी
यूको बैंक - बी.एल.केजरीवाल, विजय चौधरी
यूबीआई - बी.एल.केजरीवाल, डी.एन.बखाई
जूम की तकनीक...
- जूम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर फेडरल बैंक, तमिलनाडू मर्केटाइल्स प्रा.लि, विजया बैंक, देना बैंक, कर्नाटका बैंक, ओरियंटल बैंक आॅफ कॉमर्स, इंडियन बैंक, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया, यूको बैंक और पंजाब नेशनल बैंक का 1569.76 करोड़ बकाया है। जूम डेवलपर्स (प्राइवेट) लिमिटेड के नाम पर स्टैट बैंक आॅफ पटियाला और कॉर्पोरेशन बैंक का 128.34 करोड़ बकाया है। यहां (प्राइवेट) का है। जबकि जूम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड एक ही कंपनी है जिसका पंजीयन 1994 में हुआ था।
- जूम के नाम पर जहां स्वयं का नाम कभी विजय चौधरी तो कभी विजय मदनलाल चौधरी बताकर कर्ज लिया। कभी बिहारीलाल केजरीवाल को बी.के.केजरीवाल बताकर। नाम के शॉर्टफार्म और फूलफार्म का भरपूर इस्तेमाल किया।
- कंपनियां बदलबदल कर दिया झटका। जूम सॉफ्टेक प्रा.लि., मेग्निफिसेंट इन्फ्रा, चौधरी इनावेटिव बिजनेस, सनस्टार इन्फ्रा और रजत जैसी दर्जनभर से ज्यादा कंपनियों में चौधरी डायरेक्टर है।

यह है टॉप-8 डिफाल्टर...
1- किंगफिशर -4,022 करोड़
2- विनसम डायमंड -3,243 करोड़
3- इलेक्ट्रोथर्न इंडिया -2,653 करोड़
4- कॉपोर्रेट पॉवर -2,487 करोड़
5- स्टर्लिंग बायोटेक -2,031 करोड़
6- फोरएवर प्रेसस -1,754 करोड़
7- केएस आॅयल -1,705 करोड़
8- जूम डेवलपर्स -1,419 करोड़ 

(एमडी) विवादास्पद तुलसी नगर में फिर फर्जीवाड़ा

अब नाले पर कब्जा कर काट दिए प्लॉट
भराव कर बदल दी बहाव की दिशा
इंदौर, दबंग रिपोर्टर। निपानिया ग्राम पंचायत के तुलसी नगर में फिर एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। पुलिस-प्रशासन की मॉनिटरिंग के बावजूद यहां नाले पर कब्जा कर प्लॉट काटे गए और बिजली के खंभे लगाए जा रहे हैं। बेशकीमती जमीन पर कई प्लॉट काटने, इनकी बिक्री तथा अब यह हिस्सा विकसित करने की तैयारियों के चलते आसपास के लोगों में रोष है और जल्द ही वे इस मामले में निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत करेंगे।
भू-माफियाओं ने इस बार फर्जीवाड़े की शुरुआत बी सेक्टर नाले के पास की है। यहां निर्मित छह बंगलों के कोने की जगह खाली है। पास ही एक बड़ा नाला है। तीन-चार महीने पहले नाले की सफाई का काम चला और धीरे-धीरे इसके विपरीत हिस्से में लंबी खुदाई शुरू की जाने लगी। कुछ दिन बाद लोगों को पता चला कि यह खुदाई नाले को मिलाने के लिए की जा रही है। इसके बाद करीब आधा किलोमीटर हिस्से में मुरम डालकर उसकी दिशा बदली और प्लॉट की रूपरेखा बना दी गई।
डर के कारण नहीं की शिकायत
रहवासियों ने भू-माफियाओं के डर के कारण अब तक इसकी शिकायत नहीं की। 2007-10 के बीच तुलसी नगर में तेजी से अवैध निर्माण हुए थे। इस दौरान सरपंच हेमलता के पति किशोर पटेल ने भू-माफियाओं के साथ मिलकर संयुक्तिकरण कर कई भवन तान दिए। रहवासी संघ के अध्यक्ष संजय ठाकरे ने विरोध किया तो उन्हें धमकियां मिलीं। इस बीच आईजी, कलेक्टर व लोकायुक्त तक शिकायत पहुंची तो गोली मारकर ठाकरे की हत्या कर दी गई। तब जाकर पुलिस-प्रशासन सक्रिय हुआ और हत्या के मामले में सरपंच पति सहित अन्य के खिलाफ केस दर्ज करने के अलावा क्षेत्र में निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद जनवरी 2012 में निपानिया ग्राम पंचायत के दो मामले, तुलसी नगर व महालक्ष्मी नगर में अवैध निर्माण आदि को लेकर तत्कालीन अध्यक्ष विवेक श्रोत्रिय की रिपोर्ट पर पूर्व सरपंच, सचिव सहित दो दर्जन से ज्यादा लोगों पर केस दर्ज किया गया।
लसूड़िया थाने से केस डायरी गायब
विडंबना यह कि इसमें से महालक्ष्मी नगर मामले में तो लसूड़िया थाने से केस डायरी ही गायब कर दी गई थी, जबकि तुलसी नगर मामले में तो दो-ढाई साल बाद भी चालान पेश नहीं किया गया। पुलिस के मुताबिक इसमें बिल्डरों सहित अन्य लोगों के जो नाम सामने आए हैं उनकी भूमिका की जांच एसआई ओएस भदौरिया कर रहे हैं।  बैडमिंटन हॉल बनाकर किराए पर दिया
इसके पूर्व भी तुलसी नगर के एए सेक्टर में बगीचे की जमीन पर बैडमिंटन हॉल बनाकर किराए से दे दिया गया। इस मामले में पिछले दिनों निगम की ओर से कॉलोनाइजर शिवनारायण अग्रवाल से ले-आउट प्लान और अन्य दस्तावेज मंगाए गए थे। इनमें से कुछ नहीं मिले। अग्रवाल का कहना है टाउन एंड कंट्री प्लानिंग में ही उक्त दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। बहरहाल, क्षेत्र में प्रतिबंध के बावजूद न केवल निर्माण जारी है, बल्कि अब इस तरह से नए प्लॉट काटकर कॉलोनी का एक हिस्सा विकसित कर बड़ी कमाई की तैयारी है।

गड़बड़ियों से भरी मालवा काउंटी टॉउनशिप

ृ-ईओडब्ल्यु की प्रारंभिक जांच में 75 लाख से ज्यादा की गड़बड़ी
-टॉउनशिप को लाभ पहुंचाने के मामले में सांवेर के दो एसडीओ की खास भूमिका
-नियम विरुद्ध 25 प्रतिशत सिक्युरिटी की जमीन दे दी
-जल्द ही होगा धोखाधड़ी का केस दर्ज
इंदौर, दबंग रिपोर्टर।
बायपास स्थित करोड़ों की लागत की मालवा काउंटी टॉउनशिप के खिलाफ  राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यु) में हुई शिकायत की जांच अंतिम दौर में हैं। तीन साल पहले दर्ज हुई इस शिकायत में टॉउनशिप में ढेरों अनियमितताएं तो पाई ही गई लेकिन खास मामला सांवेर के तत्कालीन दो एसडीओ का है। इन दोनों अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए टॉउनशिप के कर्ताधर्ताओं को 75 लाख रु. से अधिक का लाभ पहुंचाया और शासन को चपत लगाई। ब्यूरो अगले माह इस मामले में कर्ताधर्ताओं सहित दोनों एसडीओ के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज करने संबंधी प्रतिवेदन मुख्यालय को भेजेगा।
बायपास (नेशनल हाई वे आगरा-मुंबई) स्थित मालवा काउंटी टॉउनशिप को 2006 में निर्माण की अनुमति दी थी। यह टॉउनशिप दिल्ली के सत्य ग्रुप की है जिसकी अन्य शहरों में भी टॉउनशिप हैं। बहरहाल, निर्माण के दौरान ग्रुप ने शहरभर में इसके होर्डिंग्स लगाए और साथ ही लिटरेचर व अन्य माध्यम से इसका खासा प्रचार-प्रसार किया वटॉउनशिप में तमाम सुविधाएं देने की बात कही। इन सुविधाओं के नाम से कई लोगों ने कर्ताधर्ताओं से संपर्क साधा। इन्हें बताया गया कि इसका डिजाइन मे. राजिन्दरकुमार एसोसिएट (गुडगांव) द्वारा किया गया। उक्त ग्रुप देश का नंबर वन ग्रुप माना जाता है। हवाला दिया गया कि यह वही ग्रुप है जिसने जिसने गुडगांव में ग्रीन बिल्डंग, देशभर में कई अस्पतालों, कमर्शियल व रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स की डिजाइन तैयार की है। टॉउनशिप की खूबसूरत डिजाइन व अत्याधुनिक सुविधाओं के मद्देनजर कई लोगों ने यहां अलग-अलग कीमतों के प्लॉट, फ्लैट आदि के लिए रुपए जमा कर दिए।
ये सुविधाओं का वादा
टॉउनशिप में हायपर मार्केट, शॉपिंग मॉल कम मल्टीप्लेक्स, आईटी पार्क, स्कूल, मेडिकल, सीवेज ट्रिटमेंट प्लांट, वाटर हारवेस्टिंग, क्लब, बैनक्वेट हॉल, पॉवर बेक अप, लिफ्ट, आरओ रूम, गार्डन, रिक्रिएशन हॉल, सिक्युरिटी गार्ड, इलेक्ट्रॉनिक सिक्युरिटी, इंटरकॉम, फायर अलार्म, विजिटर्स पार्किंग, तलघर, मेंटेनेंस स्टाफ, वाटर सप्लाय, स्टोरेज, बारिश का पानी की निकासी, वेस्ट डिस्पोजल आदि सुविधाएं देने का हवाला दिया गया। खास बात यह कि इसमें आईटी पार्क के लिए 6 एकड़ जमीन देने का वादा किया गया।
तीन साल का पजेशन छह साल बाद भी नहीं मिला
उक्त टॉउनशिप 110 एकड़ में विकसित की गई है। 2006 में जब लोगों ने यहां प्लॉट/प्लैट बुक कराए तो उन्हें 2000 में पजेशन देने का एग्रीमेंट किया गया था लेकिन 2011 तक नहीं दिया गया। ऐसे करीब 200 से ज्यादा लोग थे जिन्हें उस दौरान पजेशन नहीं मिला। इस पर इनमें से कुछ लोगों ने ईओडब्ल्यु को मामले की शिकायत की जिस पर मामला जांच में लिया गया।
ऐसे पता चली गड़बड़ियां
जांच में पता चला कि टॉउनशिप को लाभ पहुंचाकर शासन को चूना लगाने में सांवेर के दो एसडीओ की खास भूमिका रही है। दरअसल टॉउनशिप में रोड, पानी, बिजली व ड्रेनेज जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर य्नियम है कि कुल जमीन में से 25 प्रतिशत राजस्व विभाग द्वारा सिक्युरिटी बतौर रखा जाता है। यानी जब तक 75 फीसदी हिस्से में ये तमाम सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती तब तक यह 25 प्रतिशत हिस्सा निर्माण या अन्य कार्य के लिए नहीं दिया जा सकता लेकिन इसका भरसक मजाक बनाया गया। यह कारनामा 2006 से 2010 के बीच किया गया।
रेवेन्यू इंस्पेक्टर की शॉर्ट रिपोर्ट पर बेशकीमती जमीन सौंप दी
सूत्रों के मुताबिक 2010 में तत्कालीन एसडीओपी ने तो और भी बड़ी गड़बड़ी कर दी। शासन ने 25 प्रतिशत हिस्सा जो सिक्युरिटी बतौर के लिए रखा था, उसे एक रेवेन्यू इन्सपेक्टर (आरआई) की  शॉर्ट रिपोर्ट पर टॉउनशिप को दे दिया गया। विडम्बना यह कि इसके लिए अधिकारियों ने इसका भौतिक सत्यापन भी नहीं किया।
पंचायत को सुपरविजन के नाम 35 लाख रु. की चपत
जांच में पाया गया कि पंचायत को सुपरविजन शुल्क देने के मामले में भी अधिकारियों ने काफी मेहरबानी जताई। कुल निर्धारित शुल्क में से 35 लाख रु. की रियायत देकर शासन को राजस्व की चपत लगाई गई।
3 करोड़ पर तीन साल का ब्याज भी बख्शा
इसी तरह मप्र विद्युत कंपनी पर 3 करोड़ रु. देय था। इसका भुगतान 2009 में किया जाना था जो 2012 में किया गया। इसमें भी तीन साल की पेनल्टी व ब्याज करीब 15 लाख रु. नहीं जोड़ा गया। इस तरह अधिकारियों की मिलीभगत से 75 लाख रु. से ज्यादा की चपत लगाई गई। ईओडब्ल्यु अधिकारियों की माने तो यह आंकड़ा एक करोड़ रु. से ज्यादा का भी हो सकता है। इस मामले में अब अगले माह मुख्यालय को कर्ताधर्ताओं व एसडीपीओ पर केस दर्ज करने के लिए प्रतिवेदन तैयार कर मुख्यालय भेजा जा रहा है।

बस एक पखवाड़े में रिपोर्ट तैयार
जांच थोड़ी सी बाकी है। कई गड़बड़ियां मिली हैं। इसे क्रॉस चेक करने के लिए रेवेन्यू विभाग सहित अन्य विभागों से दस्तावेज मंगाए गए हैं। एक पखवाड़े में जांच पूरी हो जाएगी।
आनंद यादव, डीएसपी (ईओडबल्यु)


मामला माणिकबाग के निर्माणाधीन ब्रिज का

पांच भवनों को बचाने के लिए संकरा कर डाला 7 करोड़ का ब्रिज
-नाले पर स्थित मेडिकल दुकान के लिए ब्रिज को मोड़ दिया
-एक टॉउनशिप सहित चार भवनों को भी बख्शा
इंदौर, दबंग रिपोर्टर।
विकास के नाम पर किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करने का दावा करने वाले नगर निगम ने 7 करोड़ की लागत के माणिकबाग ब्रिज के मध्य स्थित एक मेडिकल दुकान को बचाने के लिए ब्रिज को ही संकरा कर दिया। निगम के कर्ताधर्ता अधिकारियों ने न सिर्फ इस मेडिकल दुकान पर विशेष मेहरबानी की बल्कि इसकी सीध में आगे एक टॉउनशिप सहित चार भवनों को भी बख्शते हुए ब्रिज को आगे और भी ज्यादा संकरा कर दिया। चौंकाने वाली बात यह कि ब्रिज का निर्माण अंतिम दौर में है तथा अब सालों तक इस पर से गुजरने वाले लोगों को ऐसी विसंगतिपूर्ण निर्माण के रास्ते गुजरना होगा।
कुछ साल पर जब इस मार्ग के पहले हिस्से का ब्रिज का निर्माण शुरू हुआ जो लंबे समय तक चला। हालांकि ब्रिज बनने के बाद लोगों को राहत मिली। इस ब्रिज का एक छोर कलेक्टोरेट (हेमू कालानी चौराहे के पास है तो दूसरा खातीवाला टैंक के पास) है। इस मार्ग को आगे व्यवस्थित करने के लिए माणिकबाग ब्रिज (नाले के ऊपर) से एक और ब्रिज का प्रस्ताव बना। यह ब्रिज सिक्सलेन के लिए प्रस्तावित है और फिर तमाम प्रक्रियाओं के बाद इसे मंजूरी मिली। इसकी एक भुजा केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क के आॅफिस के सामने से शुरू ही गई जबकि दूसरी चोइथराम अस्पताल के पास से।
महत्वाकांक्षी इस ब्रिज बनाने के पीछे परिकल्पना यह है कि हेमू कालानी चौराहे के पास से शुरू हुआ यह पूरा मार्ग चोइथराम अस्पताल के आगे चौराहे पर खत्म होने के लिए इसके सहित दोनों ब्रिजों से ट्रैफिक निर्बाध गति से चले। यही कारण है कि यह नया ब्रिज सिक्स लेन के आधार पर शुरू किया गया। पहले इसका टेंडर केडी कंस्ट्रक्शन के नाम से हुआ लेकिन 2010 में यह कंपनी ब्लैक लिस्टेट घोषित होने के बाद ठेका सोम प्रोजेक्ट को दिया गया। अक्टूबर 2012 में ब्रिज का निर्माण शुरू हुआ और इसे दो साल में यानी अक्टूबर 2014 में पूरा करना है।
खास बात यह कि जब भी ब्रिज बनने की शुरुआत होती है तो उसका सही स्वरूप तब पता चलता है जब स्ट्रक्चर के साथ करीब 70 फीसदी से ज्यादा काम हो जाए। इस ब्रिज के साथ भी ऐसी ही स्थिति हुई लेकिन जब इसका स्वरूप सामने आया तो यह ब्रिज के नाम ही मजाक ही बनता दिख रहा है। दरअसल इस ब्रिज की चौड़ाई 30 मीटर है जबकि लंबाई 40 मीटर। इसके साथ ही इसके दोनों ओर 100-100 मीटर जमीन दी गई है जिससे ब्रिज की चौड़ाई काफी है लेकिन इसके मध्य आते ही निगम की सारी कारगुजारियां सामने आ जाती है।
यह है मामला
दरअसल सालों पुराने माणिकबाग नाले पर इस नए ब्रिज का मध्य हिस्सा बना है। यहां कई दुकानें व अन्य निर्माण थे जो तो हटा दिए गए लेकिन पांच दुकानों वाले एक भवन को हटाने में निगम को पसीने आ गए। इस भवन में सुरभि मेडिकोज की दो दुकानें हैं जबकि पास की अन्य दुकानें इसी मेडिकल के संचालक ने किराए से दी थी। चूंकि पूरा भवन ही बीचोबीच है इसलिए निगम ने इसे हटाने के लिए कोशिश की। इसमें पता चला कि उक्त भवन की रजिस्ट्री है। इस पर मशक्कत के बाद निगम ने इसमें से दो दुकानें तोड़ी जबकि तीन को वहीं (ब्रिज के मध्य) रहने दिया। इनमें दो दुकानों में अभी भी सुरभि मेडिकोज जबकि एक दुकान (किराए से) चोइथराम अस्पताल कर्मचारी साख संस्था को किराए से दी है।
इन तीन दुकानों के लिए ब्रिज को इसके पास से संकरा कर दिया। यानी इन दुकानों के आगे आने-जाने के लिए तीन फीट की जगह और छोड़कर ब्रिज आगे बढ़ा दिया गया। यानी अब ब्रिज सीधा नहीं होकर इन दुकानों को बचाते हुए काफी संकरा हो गया है। खास बात यह कि ब्रिज की ऊंचाई के हिसाब से उक्त दुकानें काफी नीचे चली गई है।
बहरहाल, निगम की मेहरबानी यह खत्म नहीं होती। इन दुकानों की लाइन में ही 500 मीटर आगे ब्लू मून पैलेस, राज टॉउनशिप, राज कॉम्प्लेक्स व एक अन्य भवन हैं। इन भवनों में 200 से ज्यादा दुकानें व फ्लैट हैं। इन सभी को न सिर्फ बचाया गया बल्कि इनके आगे पार्किंग को जगह देते हुए ब्रिज मार्ग को और भी संकरा कर दिया। मामले में निगम अधिकारियों का एक ही तर्क रहा कि वे हट नहीं रहे या उनके पास रजिस्ट्रियां हैं, ऐसे बयान देकर ब्रिज का 80 फीसदी से ज्यादा काम पूरा कर लिया गया। अब ब्रिज निर्माण की अवधि अक्टूबर 2014 को खत्म होने को है लेकिन संकेत हैं कि दिसंबर तक यह पूरा हो जाएगा। विडम्बना यह कि महत्वाकांक्षी यह प्रोजेक्ट भी ऐसी करतूतों के कारण न सिर्फ संकरा हुआ बल्कि लंबे समय तक लोग ऐसी विसंगतिपूर्ण बने ब्रिज से गुजरेंगे।

हम कहीं गलत नहीं
हमारी यहां 20 साल से ज्यादा समय से दुकानें हैं। पूरी रोजीरोजी इस मेडिकल की दुकान पर निर्भर है। भवन का निर्माण वैध है तथा इसकी रजिस्ट्री है। ब्रिज कोई संकरा नहीं हुआ बल्कि सिर्फ 60 सेमी का फर्क पड़ा और ब्रिज हल्का सा मोड़ा गया। हम कहीं भी गलत नहीं है।
रमेश नागवानी
संचालक (सुरभि मेडिकोज)

बिल्डर का काम दूर से दिखता है, छिपाने से बचें..

के्रडाई के वीसीईएस सेमीनार में सर्विस टैक्स आयुक्त ने दी बिल्डरों को हिदायत 
इंदौर. चीफ रिपोर्टर । 
बिल्डर्स एंड डेवलपर्स जो बिल्डिंग या टाउनशीप बनाते है उसे वे छिपा नहीं सकते। जो किया है, दिखेगा। फिर छिपाने की कोशिश करके कितने दिन सर्विस टैक्स बचा पाओगे। अच्छा यही है कि 10 मई 2013 से लागू हुई वॉलेंटरी कम्प्लाइअन्स एन्करिज्मन्ट स्कीम (वीसीईएस) का फायदा उठाओ और अपना बकाया सर्विस टैक्स डिक्लेयर कर दो। इससे सर्विस टैक्स पर न 18 प्रतिशत ब्याज भरने की चिंता रहेगी, न टैक्स के समानांतर पेनल्टी की। मंगलवार को होटल रेडीसन में क्रेडाई द्वारा आयोजित एक सेमीनार में यह जानकारी कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स आयुक्त जयप्रकाश ने बिल्डर्स एंड डेवलपर्स को दी।
मंंगलवार शाम संपन्न हुए सेमीनार में आयुक्त जयप्रकाश ने बताया कि वीसीईएस 31 दिसंबर तक है। हमारे पास दिन भी कम है और स्टॉफ भी। हम कहीं जा नहीं सकते। इसका फायदा उठाओ और अपने डिक्लेरेशन फाइल कर दो। कोई भी कैसे भी स्कीम का फायदा उठा सकता है। हम नाम पते को छोड़कर आपसे कुछ नहीं पूछेंगे। बस अपने डिक्लेरेशन के साथ कोई एक सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट जरूर दें जिसके आधार पर आपने डिक्लेरेशन फाइल किया। उन्होंने बताया कि डिक्लेरेशन में यदि कोई संशय है तो उसकी जांच एक साल में आयुक्त के आदेश पर हो सकती है। आंकड़ों में भारी हेरफेर से बचें। डिक्लेरेशन फाइल होते ही सात दिन में डिस्चार्ज एक्नॉलेजमेंट जारी कर देंगे। इसका बड़ा फायदा यह भी है कि वीसीईएस में हुए डिक्लेरेशन कहीं भी किसी कोर्ट में नहीं खोला जा सकता। सेमीनार में एडिशनल कमिश्नर आर.के.वर्मा, वीरेंद्र जैन, डिप्टी कमिश्नर स्मृति शरन, सीए अरविंदसिंह चावला और क्रेडाई के अध्यक्ष गोपाल गोयल भी मौजूद थे।
सवाल..
1 - वीसीईएस का फायदा कौन उठा सकता है..?
जवाब :- 1 अक्टूबर 2005 से लेकर 31 दिसंबर 2012 के बीच किसी भी वित्त वर्ष के दौरान सर्विस टैक्स का भुगतान नहीं किया है, वे इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। बशर्ते उनके खिलाफ इस दौरान कोई विभागीय जांच या नोटिस या अन्य कार्यवाही प्रचलित न हो।
2 - डिक्लेरेशन के बाद भुगतान कैसे करना है?
जवाब :- वीसीईएस के तहत टैक्स देने वाले को बकाए टैक्स की कम से कम आधी रकम 31 दिसंबर तक भरनी है। बाकी 30 जून 2014 तक। 30 जून तक भी जो व्यक्ति आधी रकम नहीं भर पाता है उसके पास 31 दिसंबर 2014 तक का मौका और होगा। हालांकि इसमें ब्याज देना होगा।
3 - 31 दिसंबर के बाद क्या होगा?
जवाब :- 31 दिसंबर तो डिफाल्टर टैक्स जमा नहीं करते उनकी गिरफ्तारी के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा।
4 -फाइल किए गए डिक्लेरेशन पर बाद में विभाग हमारी घेराबंदी तो नहीं करेगा?
जवाब :- बिल्कुल नहीं।