Wednesday, January 18, 2017

टीएंडसीपी एक्ट में भू-अधिग्रहण के नाम पर होगी सरकारी मनमानी

दिसंबर 2016 में पास विधेयक, 1973 से लागू होगा
पीड़ितों से कोर्ट जाने के अधिकार तक छीने
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एक तरफ मोदी सरकार भू-अधिग्रहण कानून को कड़ा बना रही है ताकि किसानों को उनका वाजिब हक मिले वहीं मप्र सरकार ने मप्र नगर तथा ग्राम निवेश (संशोधन तथा विधिमान्यकरण) विधेयक-2016 को मंजूरी देकर किसानों की कमर तोड़ दी है। इस विधेयक को 1973 से प्रभावशाली माना गया है। मतलब सरकार 43 साल पुराना हवाला देकर किसी भी जमीन को अधिग्रहित कर सकती है। इतना ही नहीं अधिग्रहण के विरुद्ध कोर्ट जाने के अधिकार तक छीन लिए गए हैं। इस कानून के खिलाफ किसान अब एक होने लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में बिना जोनल प्लान के पूरे प्रदेश के विकास प्राधिकरणों की स्कीम अवैध करार दी गई थी। इससे बचने के लिए सरकार ने सितंबर में अध्यादेश लाकर कानून से जोनल प्लान ही खत्म कर दिया। अफसरों ने कारगुजारी करते हुए अन्य धाराओं में भी संशोधन कर दिए। इसमें किसानों से जबरिया जमीन लेने जैसा फैसला भी है। केंद्र के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण नहीं होना। यानी अफसर मनमाने तरीके अधिग्रहण के दाम तय करेंगे।
प्रजातंत्र है या...
युवा किसान संघ के अध्यक्ष नीरज द्विवेदी ने बताया कि इंदौर में किसानों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। जमीन देने से ऐतराज नहीं है, लेकिन कार्रवाई कानूनन हो। अभी तो यह हाल है कि सुनवाई की उचित व्यवस्था नहीं। यदि किसी किसान को न्याय नहीं मिला तो वह कोर्ट भी नहीं जा सकता है। कानून में संशोधन 43 साल पहले लागू करने से कई विसंगतियां होगी। एक्ट में बदलाव की मंजूरी राष्ट्रपति से भी नहीं ली गई।
सचिव विपिन पाटीदार ने बताया कि 3 साल की समय सीमा खत्म यानी कभी भी जमीन अधिग्रहण हो सकता है। यही नहीं, प्रदेश की सभी शहरी विकास योजनाओं के लिए होने वाले जमीन अधिग्रहण पर किसानों के कोर्ट जाने से रोकने का विवादास्पद बदलाव भी कर दिया।
बदलाव जिनका है बेहद विरोध
संसोधित विधेयक दिसंबर 2016 में मंजूर हुआ तो 1973 से कैसे लागू हो सकता है जबकि इंदौर जैसे शहर का पहला मास्टर प्लान ही 1975 में आया था।
विकास योजना की परिभाषा संशोधित मप्र नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 18-19 को निर्मित विकास योजना तक सीमित रखा गया है। इससे धारा 20-21 के तहत होने वाली जोनल प्लानिंग खत्म कर दी गई है जबकि मास्टर प्लान 2021 जोनल प्लान पर अधारित था।
सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के विपरीत जाकर सरकार ने जोनल प्लान को खत्म करने का प्रयास किया है। जोन प्लान खत्म होने से अधिकारी भू-उपयोग में मनमानी करेंगे।
धारा 56 में किए गए बदलाव के अनुसार किसी भी भू-अर्जन की कार्रवाई या भू-अर्जन के दौरान जारी पंचाट ही माना जाएगा। चुनौती नहीं दी जा सकती।
धारा 6 में विधिमान्यकरण के नाम पर किए गए संसोधन के तहत भू-अर्जन से प्रभावित होने वाले किसानों से कोर्ट जाने का अधिकार छीन लिया है।
अभी तो मामला कोर्ट में ही विचाराधीन है
संगठन के दिनेश पालीवाल ने बताया कि संगठन ने संशोधन तथा विधिमान्यकरण अध्यादेश की वैधता और उसमें समाहित किए गए किसान विरोधी बदलाव को मप्र हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में याचिका (डब्ल्यूपी19342) के माध्यम से चुनौती दी थी। जो अभी विचाराधीन है। बावजूद इसके सरकार ने 6 दिसंबर को संसोधन विधेयक मंजूर कर दिया।
इंदौर में 5 हजार एकड़ जमीन पर असर
आईडीए की एमआर 10 और सुपरकॉरिडोर में आने वाली स्कीमें 171, 172, 174 व 151 आदि में करीब 5 हजार एकड़ जमीन टीएंडसीपी के एक्ट से प्रभावित है।
स्कीम 131 बी में किसानों को नोटिस भी दिए जाने लगे हैं। इंफोसिस, टीसीएस आदि को दी गई जमीनें भी कानूनी अड़चन में फंस रही थी। यही वजह है कि पूरे प्रदेश के लिए कानून बदल दिया गया।
इन स्कीमों का भविष्य भी संकट में। स्कीम-165, 169 ए और 169 बी, स्कीम-155। 

जनहित बताकर बिना अनुमति काट दी कॉलोनी

बचने के लिए कहते हैं आरटीओ के कारण हटाए लोगों को बसा रहे हैं
इंदौर. विनोद शर्मा ।
शासन और प्रशासन की तमाम सख्त कार्रवाइयों के बावजूद इंदौर में भू-माफियाओं की मनमानी जारी है। रालामंडल अभ्यारण्य के ठीक पीछे ढ़ाई एकड़ जमीन पर आकार ले रही सोनकर बंधुओं की कॉलोनी इसका बड़ा उदाहरण है। तकरीबन डेढ़ सौ प्लॉट की इस कॉलोनी में तीन से साढ़े तीन लाख रुपए में 600-600 वर्गफीट के प्लॉट थमाए गए हैं। सरपंच की शिकायत और कार्रवाई को लेकर कलेक्टर द्वारा दिए आश्वासन के बावजूद कॉलोनी में 90 फीसदी प्लॉट बिक चुके हैं।
मामला बिहाड़िया के सर्वे नं. 230/1 की 1.080 हेक्टेयर (करीब ढ़ाई एकड़) जमीन का है। राजस्व रिकार्ड में राजकुमार पिता देवनारायण कुमावत के नाम से चढ़ी इस जमीन पर दो महीने से कॉलोनी कट रही है। मुरम की सड़क बिछाकर 15 बाय 40 (600 वर्गफीट) के कुल 168 प्लॉट निकाले गए थे जिसमें से 130 प्लॉट बेचे जा चुके हैं। कुमावत की मानें तो वह जमीन कमल सोनकर और विकास सोनकर को बेच चुका है। अभी आधी जमीन की रजिस्ट्री हुई है, आधी की होना है इसीलिए राजस्व रिकार्ड पर उनका नाम चढ़ा हुआ है। कॉलोनी कमल सोनकर, विकास सोनकर और सुंदरलाल मालवीय काट रहे हैं जो मुलत: पालदा के रहने वाले हैं।
न बिजली के खम्बे, न पानी
जिस जमीन पर कॉलोनी काटकर 3 से 3.5 लाख रुपए में 130 से ज्यादा प्लॉट बेचे जा चुके हैं वहां मुरम की कच्ची सड़क के अलावा कोई जनसुविधा नहीं है। फिर बात बिजली की हो या पानी की। डेÑनेज, बगीचे और ट्रांसफार्मर की बात तो दूर है। दबंग स्टींग के दौरान कॉलोनाइजर ने कहा था कि सुविधा देते तो तीन लाख में प्लॉट कैसे देते। हम सिर्फ कॉलोनी काट रहे हैं, सुविधा पंचायत देगी। सरपंच जगदीश यादव से बात हो चुकी है।
जनहित की आड़ में खेल
कॉलोनाइजर कॉलोनी को जनहित से जोड़कर बताता है उनकी मानें तो तीन लाख में प्लॉट बेचकर लोगों की सेवा ही कर रहे हैं, इसमें मिलता क्या है। वहीं जब मौके पर अनुमति की बात करें तो कॉन्फिडेंस के साथ कॉलोनाइजर कहता है पालदा आॅफिस आ जाओ, सभी अनुमतियां है।
कोई अनुमति नहीं ली है
2015 से मैं सरपंच हूं अब तक कॉलोनी को लेकर कोई व्यक्ति अनुमति लेने नहीं आया है। कुछ प्लॉट होल्डर जरूर आए थे, तब मैंने कलेक्टर को शिकायत की थी। दो महीने हो चुके हैं। अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
जगदीश यादव, सरपंच
कॉलोनी से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। न हमने अनुमति दी थी। सब झूठ बोल रहे हैं।
किरण अनुराग, पूर्व सरपंच
कॉलोनी से लेना-देना नहीं है मेरा। मैं प्रॉपर्टी ब्रोकर हूं और राजू कुमावत से सोनकर बंधुओं को जमीन दिलाने का ही काम किया है। नायता मुंडला में आरटीओ बनने के दौरान जो लोग हटाए गए थे उन्हें पूर्व सरपंच किरण अनुराग विस्थापित कर रही थी।
संदीप यादव
कमल और विकास सोनकर को है। ढ़ाई एकड़ है। सेलडीड है। पेमेंट  पूरा नहीं है। हमने तो जमीन बेच दी। फंसे तो सोनकर फंसे। सवा एकड़ की रजिस्ट्री हुई है।
राजकुमार कुमावत, जमीन मालिक
कॉलोनी नहीं, जनहित है
बिहाड़िया में आप अवैध कॉलोनी काट रहे हैं?
नहीं, अनुमति है। पंचायत से।
सरपंच/पूर्व सरंपच कहते हैं अनुमति नहीं है?
आपको क्या आपत्ति है।
मतलब आप कॉलोनी काट रहे हैं?
कॉलोनी नहीं है। कांकड़ से हटाए लोगों को डेढ़-दो लाख रुपए में प्लॉट देकर विस्थापित किया है।
यह काम आपका तो नहीं है?
पर कर दिया, जनहित में।
साढ़े तीन लाख में 600 वर्गफीट, रोड से 4 किलोमीटर अंदर, कैसा जनहित?
आप तो आ जाओ, बैठकर बात कर लेंगे।
विकास सोनकर, कॉलोनाइजर

डायरी में नोट होकर रह गई कलेक्टर की कार्रवाई

बिहाड़िया पंचायत की शिकायत के दो महीने बाद भी सोनकर बंधु बेखौफ काट रहे हैं कॉलोनी
पंचायत कहती है साहब ही नहीं सुने, तो हम क्या करें
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जब अवैध कॉलोनी कटना शुरू ही हुई थी कि हमने लिखित में कलेक्टर पी.नरहरि को शिकायत की। उन्होंने  पर्सनल डायरी में डिटेल नोट की। हमने कहा भी था कि साहब कार्रवाई डायरी में ही तो दबकर नहीं रह जाएगी। इस पर कलेक्टर ने कहा था कि प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करेंगे, इसीलिए डायरी में नोट किया है। फिर भी दो महीने हो चुके हैं कॉलोनी कटते-कटते। प्लॉट बिकते-बिकते। कलेक्टर तो दूर पटवारी तक ने मौके पर जाकर नहीं देखा कि कॉलोनी अनुमति से कट रही है या बिना अनुमति से।
यह कहना है विकास सोनकर, कमल सोनकर और सुंदरलाल मालवीय की अवैध कॉलोनी की मुखालफत करने वाले बिहाड़िया पंचायत के पदाधिकारियों का। कॉलोनी कटती रही, आप देखते रहे? सवाल के जवाब में पदाधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि कॉलानी का काम रूकवाना हमारे हाथ में नहीं है। कलेक्टर को लिखित शिकायत कर सकते थे, सो हमने की। अब कलेक्टर ही कार्रवाई नहीं करें तो अब हम किसके पास जाएं? और क्यों? हम ही सब कर लें तो पटवारी, आरआई और एसडीएम जैसा मैदानी अमला क्या करेगा।
कॉलोनी विस्तार की तैयारी
तकरीबन ढ़ाई एकड़ जमीन पर 168 प्लॉटों में से 80 फीसदी प्लॉट बेच चुकी भू-माफिया तिकड़ी अब कॉलोनी के विस्तार की तैयारी में है। इसके लिए जहां पीछे की तरफ सर्वे नं. 230/1 की जमीन खत्म हो रही वहां सर्वे नं. 231 और 225 की जमीन का अनुबंध करके कॉलोनी काटने की फिराक में है। बताया जा रहा है कि यहां करीब सौ प्लॉट निकलेंगे।
बिजली कहां से लाएंगे? खम्बे लगाएंगे न
कॉलोनी में अब तक मुरम की रोड बिछाई गई है। इसके अलावा व्यवस्था के नाम पर कुछ नहीं है। बिजली के सवाल पर सोनकर एंड टीम कहती है कि बिजली के खम्बे लगाएंगे। कब? जवाब मिलता है रजिस्ट्री कराओ और मीटर के लिए आवेदन कर दो। जब मीटर बढ़ जाएंगे तो आॅटोमेटिक बिजली कंपनी को खम्बे लगाना पड़ेंगे। कुछ ऐसा ही जवाब मिलता है पीने के पानी की व्यवस्था के नाम पर। कहते हैं आसपास खेतों में बोरिंग है ही किसी से टायअप करके लाइन डाल देंगे।
सरकारी अमले को तो जानकारी ही नहीं
बायपास (नायता मुंडला चौराहे) से बिहाड़िया 4 किलोमीटर दूर है। 3.5 किलोमीटर पर कॉलोनी कट रही है लेकिन पटवारी से लेकर एसडीएम तक मैदानी अमले में किसी की नजर कॉलोनी पर नहीं पड़ी। दो महीने में 168 प्लॉट की कॉलोनी में 140 प्लॉट बिकने तक यह कैसे संभव है? इसके दो ही मतलब है अधिकारी बिहाड़िया जैसे नजदीकी गांव में ही मौके पर नहीं जाते हैं या फिर कॉलोनी तो देख ली लेकिन उसे अनदेखा करने की फीस मिल गई हो।
आप ने जानकारी दी है, मैं दिखवाती हूं
पंचायत पदाधिकारियों ने शिकायत की होगी लेकिन मुझे मामले की जानकारी नहीं है। अब मामला संज्ञान में आया है हम आवश्यकतानुसार कार्रवाई करेंगे।
शालिनी श्रीवास्तव, एसडीएम
मुझे जानकारी नहीं है। मौका व दस्तावेज देखकर ही कुछ कह पाऊंगी।
श्रृद्धा पंचौली, पटवारी
हम सिर्फ शिकायत कर सकते हैं
पंचायत के पंचों ने सामुहिक रूप से कॉलोनी की शिकायत कलेक्टर पी.नरहरी को की थी। दो महीने हो चुके हैं। कॉलोनी में बिक रहे प्लॉट को देखकर नहीं लगता कि अब तक कार्रवाई हुई होगी।
जगदीश यादव, सरपंच

जूम की 32 करोड़ की संपत्ति ईडी ने की अटैच

28 एकड़ जमीन के साथ विभिन्न कंपनियों के शेयर भी
अब क 132 करोड़ का अटैचमेंट
इंदौर. चीफ रिपोर्टर।
बैंक गारंटी के नाम पर 25 बैंकों को 2600 करोड़ की चपत लगाने वाली इंदौर की जूम डेवलपर्स प्रा.लि. की करीब 32 करोड़ रुपए संपत्ति प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सीज कर ली है। इसमें जमीन से लेकर अलग-अलग कंपनियों में जूम या उसके डायरेक्टर विजय चौधरी के नाम पर खरीदे गए शेयर भी शामिल हैं। अब तक ईडी कंपनी की 132 करोड़ की संपत्ति अटैच कर चुका है जिसकी बाजार कीमत 1500 करोड़ से ज्यादा है।
सीबीआई द्वारा मामला सौंपे जाने के बाद से ईडी जूम डेवलपर्स के खिलाफ प्रिवेंशन आॅफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) 2002 के तहत जांच कर रहा है। आरोप है कि इस कम्पनी ने अलग-अलग परियोजनाओं के नाम पर फर्जी दस्तावेजों के बूते सरकारी क्षेत्र के 25 बैंकों से करीब 2650 करोड़ रुपए का कर्ज और बैंक गारंटी हासिल की थी। बाद में मंदी की आड़ लेकर गारंटी केश करवा ली। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर ईडी ने मंगलवार को 32 करोड़ की संपत्ति अटैच की।
ईडी के अधिकारियों ने बताया कि जब्त की गई संपत्ति में बेंगलुरू, इंदौर, मुंबई और रायगढ़ (महाराष्ट्र) में कुल 23.80 एकड़ जमीन, अलग-अलग कम्पनियों में उसके शेयर और कुछ अन्य निवेश कुर्क किया गया है। कानूनी प्रक्रिया के तहत कुर्की के इस अंतरिम आदेश की पुष्टि के लिए ईडी अब अपीलीय न्यायाधीकरण के सामने अपनी शिकायत पेश करेगा।
आरोप
जूम डेवलपर्स पर आरोप है कि उसने कर्जदाता भारतीय बैंकों के साथ धोखाधड़ी करते हुए इस रकम को संबंधित परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय अपनी अलग-अलग इकाइयों में लगा दिया और बैंकों का ऋण भी नहीं चुकाया।
अब तक हुई कार्रवाई
ईडी ने जुलाई 2015 में कंपनी की 200 करोड़ की संपत्ति सीज की थी। इसमें 130 एकड़ जमीन छोटा बांगड़दा में, 40 हजार वर्गफीट जमीन मुंबई में और केरला में जूम कंपनी की केरला इंडस्ट्रियल फायनेंस कॉर्पोरेशन शामिल है। जुलाई 2015 में ही ईडी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए जूम की  कैलिफोर्निया स्थित 1280 एकड़ जमीन जब्त की। दस्तावेजों के हिसाब से जब्त की गई संपत्ति की कीमत 100 करोड़ है।
घपला : सीबीआई ने कहा 967, ईडी कहता है 2500 करोड़
चौकाने वाली बात यह है कि जूम के खिलाफ सात एफआईआर दर्ज कर चुकी सीबीआई ने अपनी छानबीन में पाया था कि जूम ने बैंकों के साथ 967 करोड़ की ही धोखाधड़ी की है। वहीं तीन साल की अपनी जांच में ईडी ने पाया कि मामला 2500 करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी का है। मतलब ईडी और सीबीआई के आंकड़ों के बीच अंतर सीधे 1533 करोड़ का है। वहीं सीबीआई अब तक जूम के डायरेक्टर विजय चौधरी और मंजरी चौधरी में से किसी को भी पकड़ नहीं पाई है।

पाठक को बचाने के लिए जांच ईडी के पाले में

पुलिस पर शंका के चलते केस को सस्टेनेबल नहीं मानता डिपार्टमेंट
इंदौर. विनोद शर्मा ।
कटनी हवाला कारोबार में मंत्री संजय पाठक का नाम आने के बाद प्रदेश सरकार और भाजपा दोनों घिर रही थी। इसीलिए एक तरफ जांच करने वाले एसपी गौरव तिवारी का तबादला किया गया तो दूसरी तरफ सरकार ने जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के भरौसे छोड़ दी। वहीं आर्थिक मामले छोड़ ईडी पुलिस की जगह धोखाधड़ी का मामला तो जांच नहीं सकती। पुलिस की जांच जरूरी है जिसे स्वयं सरकार और उसके द्वारा नियुक्त किए गए कटनी के नवागत एसपी ही नकार रहे हैं।
देशव्यापी बदनाम हो चुकी एक्सिस बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत से एसके मिनरल्स, महावीर ट्रेडिंग कंपनी और अमर ट्रेडिंग कंपनी के नाम से फर्जीवाड़ा 2008 से चल रहा है। इनकम टैक्स द्वारा थमाए गए नोटिस के बाद 5 जुलाई से दिसंबर के बीच धारा 420, 467, 471 भादवि के तहत चार एफआईआर (अपराध क्रमांक 738/16, 739/16, 741/16 व 1367/16 ) दर्ज हुई। एसके मिनरल्स का डायरेक्टर बनाए जाने के खिलाफ लाइनमेन रजनीश तिवारी, आॅटोमोबाइल दुकान संचालक विनय जैन  द्वारा महादेव ट्रेडिंग और उमादत्त होलकर द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर शामिल हैं। मामला बंद होने और री-ओपन होने तक सब सामान्य था। सरकार की नींद उड़ी मंत्री संजय पाठक का नाम सामने आने के बाद।
एसपी का ट्रांसफर, जांच ईडी को
मार्च से जुलाई तक तीन शिकायतों पर एफआईआर नहीं हुई थी लेकिन एसपी बनते ही गौरव तिवारी ने 5 जुलाई को तीन केस दर्ज किए थे। पुलिस की जांच परिणाम तक पहुंचती उससे पहले ही एसपी का ट्रांसफर कर दिया। नए एसपी शशिकांत शुक्ला ने करीब-करीब फाइनल हो चुकी तिवारी की जांच रिपोर्ट एक तरफ करते हुए नए सिरे से जांच शुरू कर दी। उन्होंने फर्जी कंपनियों के नेटवर्क से फोकस हटाकर इस बात पर लगा दिया कि फर्जी खाते खोले किसने? इसीलिए पाठक का नाम आते ही मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा ईडी से जांच कराए जाने का आश्वासन दिए जाने के बाद शुक्ला ने एफआईआर की कॉपी ईडी इंदौर को सौंप दी।
सिर्फ एफआईआर का क्या करें?
ईडी ने औपचारिकता निभाते हुए एफआईआर के आधार पर इन्फोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) के लिए अहमदाबाद आॅफिस से अनुमति मांगी है। हालांकि ईडी का साफ कहना है कि चूंकि मामला क्रिमिनिल अफेंस से जुड़ा है इसीलिए जांच सीबीआई को सौंपी जाती तो ज्यादा बेहतर थी। ईडी की सारी जांच पुलिस की जांच पर टिकेगी। हम ईसीआईआर दर्ज कर भी लें लेकिन पुलिस चार्जशीट फाइल नहीं करती तो हमारा भी सारा किया धरा पानी में जाएगा। क्योंकि एफआईआर पर ईसीआईआर दर्ज हो सकती है लेकिन प्रॉपर्टी अटैचमेंट के लिए पुलिस की चार्जशीट होना जरूरी है। फिलहाल जो परिस्थितियां कटनी में नजर आ रही है उसके चलते तो पुलिस की भूमिका अब शंकास्पद है। इसीलिए केस सस्टेनेबल नहीं है।
ईडी को क्यों नहीं..
मामले को पुलिस हवाले से जोड़कर देख रही है जबकि स्थानीय या अंतर राज्यीय हवाला ईडी की जांच के दायरे में नहीं आता। ईडी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय हवाले के मामले में फेमा का केस दर्ज कर सकती है।
पीएमएलए के लिए धोखाधड़ी की धाराओं में क्रिमिनिल अफेंस या प्रिवेंशन आॅफ करपंशन एक्ट जरूरी है। क्रिमिनल अफेंस पर जांच करना  पुलिस/सीआईडी या सीबीआई का काम है वहीं पीसीए में ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त या सीबीआई का।

Friday, December 23, 2016

ाात्रता से 20 फीट ज्यादा ऊंचा बनी प्रीमियम गुलमोहर

इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
नौ मीटर चौड़ी सड़क को 12 मीटर चौड़ी बताकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के अधिकारियों ने जिस होराइजन प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क नाम की टाउनशीप को मंजूरी दी उसमें बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हुआ है। बावजूद इसके नगर निगम के अधिकारी बिल्डर राजू टेकचंदानी और निखिल कोठारी की मनमानी को नजरअंदाज करते आ रहे हैं। शायद, इसीलिए अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई।
प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क में हुई मनमानी का खुलासा दबंग दुनिया ने गुरुवार को ‘सड़क फैलाकर मंजूर कर दी छह मंजिला इमारत’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। खबर छपने के बाद नगर निगम तो हरकत में नहीं आई लेकिन टेकचंदानी ने जरूर नगर निगम के आला अधिकारियों व जिम्मेदारों के घर के चक्कर काटना शुरू कर दिए। उधर, लोकायुक्त में पहुंची शिकायत के अनुसार जितनी चौड़ी सड़क मौके पर थी उतनी के हिसाब से बिल्डिंग 40 फीट ऊंची बन सकती थी लेकिन अधिकारियों के खेल ने इसे 60 फीट की ऊंचाई दे दी।
निगम की टीएंडसीपी की मनमानी की पुष्टि
34 मार्च 2008 को टीएंडसीपी ने नियमों को नजरअंदाज करते हुए तीन ब्लॉक वाली इस छह मंजिला इमारत को मंजूरी दी। नगर निगम ने सड़क की चौड़ाई पर कोई आपत्ति नहीं ली। बस व्यक्तिगत लाभ अर्जित करते हुए नगर निगम के अधिकारियों ने बिल्डिंग बनाने वाली सूर्य शक्ति गृह निर्माण सहकारी संस्था को दो अतिरिक्त मंजिल बनाने की अनुमति दे दी। भवन निर्माण समिति की अनुसंशा (130/12 जनवरी 2010) पर भवन अनुज्ञा(25076) 25 जनवरी 2010 को जा की गई जो कि 15 जनवरी 2013 तक ही वैध थी। बावजूद इसके अधिकारियों से मिली खुली छूट के कारण अब तक मौके पर निर्माण किया जा रहा है।
नपती करके करें कार्रवाई
शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त से मांग की है कि टीएंडसीपी और नगर निगम द्वारा नियमों को नजरअंदाज करते हुए दी गई अनुमतियों की बारीकी से जांच हो। बिल्डिंग की नपती कराई जाए ताकि अवैध निर्माण भी सामने आए जो कि बड़े पैमाने पर हुआ है। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी पत्र लिखकर राजू टेकचंदानी व निखिल कोठारी के लाइसेंस रद्द करने व प्रकोष्ठ की बिक्री पर रोक लगाने की मांग की गई है।
पजेशन में भी परेशानी
टेकचंदानी ने जो बिल्डिंग बनाई उसके लिए लोगों से 24 महीने में पजेशन का वादा करके पैसे लिए गए थे लेकिन बिल्डिंग बनते-बनते छह साल हो चुके हैं। अब तक किसी एक फ्लैट में भी पजेशन नहीं दिया गया। शो-पीस की तरह दिखाने के लिए बनाए गए आधे-अधूरे फ्लैट को छोड़कर बाकी फ्लैट में टाइल्स तक भी नहीं लगी है।

पुखराज पैलेस के नक्शे में बदलाव का प्रस्ताव रद्द

इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
मुख्यमंत्री शिवराजरासिंह चौहान के हाथों प्लॉट बटवाने के बावजूद छह साल में सदस्यों को प्लाट नहीं दे पाई बसंत विहार गृह निर्माण सहकारी संस्था के नए नक्शे पर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट ने रोक लगा दी है। डिपार्टमेंट ने स्पष्ट कर दिया है कि सहकारिता विभाग से स्पष्ट निर्देश आने और नक्शे को लेकर मिल रही आपत्तियों के निराकरण के बिना नक्शा मंजूर नहीं किया जा सकता।
सबसे विवादित संस्थाओं में से एक जनकल्याण गृह निर्माण संस्था की जैबी संस्था बसंत विहार गृह निर्माण सहकारी संस्था के संचालकों ने कैस 2010 में मुख्यमंत्री के हाथों सदस्यों को प्लॉटों के आवंटन पत्र सौंपे और कैसे आज दिन तक सदस्यों को प्लॉट नहीं दे पाए? इसका खुलासा दबंग दुनिया ने 13 दिसंबर के अंक में ‘छह साल बाद भी प्लॉट नहीं दे पाई बसंत विहार’, शीर्षक से प्रकाशित खबर में किया था। इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए टीएंडसीपी के संयुक्त संचालक राजेश नागल ने सहकारिता विभाग से अभिमत मांगा।
सहकारिता विभाग : न मानें अभिमत, स्थगित रखें कार्रवाई
20 दिसंबर 2016 को जारी पत्र में सहकारिता विभाग के उपायुक्त ने कहा कि संस्था को स्वीकृत अभिन्यास के संशोधन के लिए अभिमत दिया था। बाद में शिकायतें मिली। जांच जारी है। वास्तविकता जांच रिपोर्ट में ही सामने आएगी। तब तक विभाग द्वारा दिए गए अभिमत पर टीएंडसीपी अपनी कार्रवाई को स्थगित रखे। जांच रिपोर्ट से डिपार्टमेंट को अवगत करा दिया जाएगा।
टीएंडसीपी : संसोधन स्थगित
संयुक्त संचालक नागल ने सहकारिता उपायुक्त से मिले पत्र के आधार पर 22 दिसंबर 2016 को बसंत विहार गृह निर्माण संस्था को पत्र लिखा और संशोधन स्थगित करने की जानकारी दे दी। नागल ने अपने पत्र में लिखा कि  संस्था की ग्राम निपानिया में 6.533 हेक्टेयर जमीन (सर्वे नं. 78/1, 78/3, 79/2, 77/2, 79/5, 88/2, 79/3 व 80/2) है। 129 इमली बाजार के पते पर पंजीबद्ध इस संस्था द्वारा प्रस्तावित पुखराज एवेन्यू कॉलोनी का ले-आउट 8 जुलाई 2011 को  मंजूर किया था, लेकिन विकास नहीं किया।  अगस्त 2016 में पूर्व स्वीकृत अभिन्यास में संशोधन की मांग करते हुए नया अभिन्यास मंजूरी के लिए लगाया। प्राप्त शिकायतों और सहकारिता विभाग के अभिमत के आधार पर अभिन्यास के संसोशन की कार्रवाई स्थगित की जाती है। सहकारिता विभाग से स्पष्ट जानकारी मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।