Thursday, May 12, 2016

हवा में उड़े सिंहस्थ के शौचालय

आधे-अधूरे सुविधाघर बने श्रृद्धालुओं की मुसीबत
उज्जैन से विनोद शर्मा । 
हवा के तेज झौकों ने जहां सिंहस्थ 2016 के लिए उज्जैन में बने साधु-संतों के अस्थाई पांडाल हिला दिए है वहीं खुले में शौच रोकने के मकसद से बनाए गए शौचालयों को भी तास की तरह बिखेरना शुरू कर दिया है। नागदा बायपास पर मालवा व्यापार मेले की जमीन पर तेज हवा से बिखरे पड़े शौचालय इसका बड़ा उदाहरण है। शौचालयों की इस बदहाली ने उनकी गुणवत्ता को लेकर सरकार और निर्माण कंपनी सुलभ इंटरनेशनल को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 
     22 अप्रैल से शुरू हुए महामेले में समाज के हर तबके के लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ना है। इसके मद्देनजर सरकार ने शहर और मेला क्षेत्र में करीब 34,000 शौचालय, लगभग 10,000 मूत्रालय और तकरीबन 15,000 स्नानघर भी बनाये हैं। इनकी गुणवत्ता पर शुरू से सवाल उठ रहे हैं। इन सवालों की पुष्टि की मालवा व्यापार मेले की जमीन पर बने सुविधाघरों ने। इन सुविधाघरों का काम आखिर में शुरू हुआ था। अभी इस्तेमाल भी शुरू नहीं हुआ था कि दो दिन पहले हवा के तेज झौकों में आधा हिस्सा ताश की तरह बह गया। बिखरा भी ऐसा कि एंगल-शीट के साथ युरोपियन कमोट भी उड़कर बिखर गए। बची तो सिर्फ देशी शीट। 
हमने काम नहीं किया
सुलभ इंटरनेशनल ने ठेका लिया था लेकिन काम दूसरे ठेकेदारों को सबलेट भी कर दिया। रविवार को भी सुविधाघर को नए सिरे से खड़े करने के प्रयास नहीं किए गए। पास में पाइप डालने का काम जरूर हो रहा था। काम करने वाली कंपनी सांवरिया कंस्ट्रक्शन के गजेंद्र ने बताया कि सुविघाघर हमने नहीं बनाए। 
ऐसे कैसे सुविधाघर
- यूरोपियन शीट का पूरा सेट होता है जिसमें वॉटर टेंक और ढक्कन तक शामिल है। वहीं जितने सुविधाघर बने हैं उनमें जो शीट लगी है वह आधी-अधूरी है। यहां सिर्फ शीट है। न वॉटर टैंक है। न ही ढक्कन। आधी-अधूरी शीट के साथ प्रशासन ने कंपनी ने शौचालय कैसे हस्तांतरित कर ली। ऐसे एक-दो नहीं कई आश्रम है। ख्यात कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर, बैतूल के बालाजी मंदिर, पहाड़ी बाबा खालसा के राजेद्रदासजी सहित कई संतों के आश्रम इस सूची में शामिल है।  
- जहां देशी शीट लगी है वह भी टूटी फुटी है। प्लेटफार्म उखड़ रहे हैं। शीट भी ऊंची-निची है। 
- सुविधाघरों में चार दिवारी के रूप में जो शीट लगाई गई उसे ठीक से फीट तक नहीं किया गया। बतौर उदाहरण शीट में जहां 10 नट-बोल्ट लगना है वहीं लग रहे हैं 5-6 ही। इसीलिए हवा के साथ हिलकर शीट टूट रही है। 
- आधे से अधिक सुविधाघरों की बोर्ड शीट पहले ही टूट चुकी है। कई के दरवाजे इस्तेमाल से पहले ही उखड़ चुके हैं जिन्हें दोबारा कसा तक नहीं गया। लोग खुले दरवाजें के साथ इनका इस्तेमाल करने को मजबूर है। 
- बायपास और चिंतामण सेक्टर सहित कुछ जगह ऐसी है जहां सुविधाघर बोर्ड शीट से नहीं बने। यहां लकड़ी की प्लाई से चार दिवारी खड़ी गई जो पानी लगने से फुलने लगी है। 
सुविधाघर चालू ही नहीं हुए 
जितने सुविधाघर बनाए गए हैं उनमें से 25 प्रतिशत को अब भी इस्तेमाल किए जाने का इंतजार है। आधों में पानी की टंकी नहीं है। आधों में टंकी है तो कनेक्शन नहीं हुए हैं। कई जगह पानी की सप्लाई तक नहीं हो रही है। इनमें सदावल मार्ग (नित्यानंद आश्रम के पास आसपास), बायपास, खिलचीपुर और त्रिवेणी जोन स्थित सुविधाघर शामिल है।

सन्यासियों का समाजशास्त्र

समाज में बदलाव की जिदउज्जैन से विनोद शर्मा ।
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सरकार और सिर्फ सामाजिक संगठन ही जनचेतना नहीं फैला रहे हैं, सांसारिक जीवन त्याग चुके साधु-सन्यासी भी इस दिशा में अपनी सकारात्मक सोच का प्रसार कर रहे हैं। कोई बेटी बचाने का संदेश दे रहा है तो कोई पेड़-पर्यावरण बचाने का। किसी ने नदियों को बचाने का बिड़ा उठाया है तो कोई गौ वध के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है। अपनी कथाओं और यज्ञों के माध्यम से भी वे अपने इस समाजशास्त्र को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। 
गौ रक्षा : पाली 1.75 लाख गायें
पहाड़ी बाबा खालसा और श्री लक्ष्मी नृसिंह खालसे के देवाचार्य राजेंद्र दास महाराज पांच गौशालाएं संचालित करते हैं और उनमें 1.75 लाख गायें पल रही है। महाराज अपनी कथाओं के साथ ही मिलने आने वाले हर व्यक्ति को गौ रक्षा के लिए प्रेरित करते नजर आते हैं। 
बेटी है तो कल है
महानिवार्णी अखाड़े के महामंडलेश्वर और शनिधाम के पीठाधीश्वर दाती महाराज बेटियों को बचाने की दिशा में वर्षों से काम कर रहे  हैं। उज्जैन में उनके हर पोस्टर पर  बेटी बचाओ का संदेश है। अब वे उज्जैन में बेसहारा और निर्धन बेटियों के लिए बालगृह की शुरूआत करेंगे। शनिधाम गोशाला भी बनाएंगे। 
नदी से लेकर पर्यावरण तक की परवाह
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष, गंगा एक्शन परिवार के प्रणेता एवं ग्लोबल इण्टरफेथ वाश एलायंस (जीवा) के सह-संस्थापक अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती उज्जैन में पेड़ और पर्यावरण बचाने के साथ शिप्रा नदी के पुनर्प्रवाह के लिए भी अभियान चला रहे हैं। उनके प्रकल्प में कथा नहीं बल्कि अलग-अलग 30 महाकुंभ हो रहे हैं। जिनमें शिक्षा के व्यावसायिकरण, श्रम सेवा, वनवासी सेवा सहित अलग-अलग मुद्दे शामिल हैं। 
शहीदों का स्मरण 
जम्मू से आए बाबा बालक योगेश्वर का प्रकल्प सबसे अनौखा है यहां सात कुंडीय 108 फीट ऊंची यज्ञशाला है। इस प्रकल्प में जीवनदाई देवताओं के फोटो-मुर्ति कम और देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों की तस्वीरें ज्यादा हैं। यहां इन्हीं की पूजा होती है। इन्हीं की स्मृति और शांति के लिए आहुति दी जाती है। 
पर्यावरण की शुद्धि-बेटी बचाओ 
बेटियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ श्री शंभू पंच दशनाम आवाहन अखाड़े के उर्द्धबाहू महंत भोलागिरि बापू 40 साल से अपने हाथ को ऊंचा किए हुए हैं। उनका साफ कहना है कि बेटियों और शांति और सुरक्षा के साथ ही समानता का वातावरण भी मिलना चाहिए। पर्यावरण शुद्धि के लिए वे  पांच हजार किलो द्रव्यों से तैयार की गई 121 फीट की अगरबत्ती भी जला रहे हैं।  
चिंता साधकों की सेहत की
सिंहस्थ में संतों के कैंप कथाओं और यज्ञ मंत्रों से गुंज रहे हैं वहीं हरिद्वार के महामंडलेश्वर प्रखरजी महाराज के प्रकल्प में कथापांडाल नहीं बना है 70 बेड का सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल जो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। यहां 25 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम नि:शुल्क सेवा दे रही है। यहां अन्नक्षेत्र भी चल रहा है। लू से बचाने के लिए श्रृद्धालुओं को केरी का पना भी पिलाया जा रहा है। 
पेड़ बचाओ, कल बचाओ 
गले में सोने की मालाएं और करोड़ों की पादुका से चर्चाओं में आए अरूण गिरी महाराज ‘अवधूत बाबा’ पर्यावण के संरक्षण के लिए 1008 कुंडी यज्ञ कर रहे हैं जिसमें 3000 टिन घी इस्तेमाल होगा। वे सवा लाख पौधे लगाने के लिए भी संकल्पित हैं। इसीलिए उन्हें लोग अब पर्यावरण बाबा भी कहने लगे हैं। 
सेवा ही सर्वोपरी 
स्वामी प्रणवनांद महाराज का भारत सेवा आश्रम संघ सेवा को सर्वापरी मानता है। इसीलिए उन्होंने सिंहस्थ 2016 में यात्रियों और साधु संतों की सेवा के लिए अपने करीब 250 स्वयंसेवक  और साधुओं की टीम उतारी है।  इनमें 100 तैराक और जीवनरक्षक भी हैं जो शिप्रा के घाटों पर स्नानार्थियों की सुरक्षा के लिए तैनात है। नि:शुल्क दवा दी जा रही है। अन्न क्षेत्र चलाया जा रहा है। 10 बेड का हॉस्पिटल भी बनाया है। 

Wednesday, May 11, 2016

महू के विजय ने उज्जैन में ड्रम काटकर बना दिए कुलर

कुलर की ऊंची कीमत से परेशान संतों को दी सस्ती हवा 
उज्जैन से विनोद शर्मा । 
सिंहस्थ 2016 ने अब तक जहां संतों को साधना और श्रृद्धालुओं को शांति दी है वहीं महू को युवा जुगाडू वैज्ञानिक दिया है। वैज्ञानिक का नाम है विजय चौधरी जिसने पानी का ड्रम काटकर उसे न सिर्फ कुलर बना दिया बल्कि महंगे कुलर खरीद पाने में अक्षम फौजी बाबा कैंप को हवा से ठंडा भी कर दिया। इसीलिए आश्रम के संतों ने इस कुलर को ही विजय कुलर नाम दे दिया है। 
मंगलनाथ से उन्हेल रोड के बीच एक रोड है जहां फौजी बाबा का आश्रम बना है। इस आश्रम में नीले रंग के ड्रम हैं जो कुलर की तरह भन्नाट ठंडी हवा दे रहे हैं। इन्हें बनाया है 16 साल के विजय ने जो अपने पिता के साथ दो साल से बिजली रिपेयरिंग और टेंट फिटिंग का काम कर रहा है। आश्रम में विजय के हाथ से बने ऐसे एक-दो या दस कुलर नहीं है बल्कि 40 कुलर हैं जो करंट फैलने या पानी के लीकेज की संभावनाओं से दूर ठंडी हवा दे रहे हैं। 
कैसे किया इजाद
विजय ने बताया कि वह दो महीने पहले घर में बैठा था। घर का कुलर चल नहीं रहा था। पास में छोटी मोटर और पंखी रखी थी। मैंने 10 लीटर का ड्रम काटा। उसमें मोटर व पंखा फीट किया। जरूरत की कुछ चीजें और लगाई। बिजली कनेक्शन किया तो वह चल पड़ा। शाम को पापा व अन्य मित्रों को दिखाया। 
एक दम मिला 40 कुलर का आर्डर
फौजी बाबा आश्रम में टेंट भी चौधरी परिवार ने ही लगाया है। बाबा ने 40 कुलर की जरूरत जताई थी हालांकि बाजार में कुलर की कीमत ज्यादा थी, उतना उनका बजट नहीं था। विजय का कुलर ‘जो वह महू से बनाकर लाया था’, देखकर गुरूजी ने कहा कि ऐसे ही कुलर बना दो। फिर क्या था, विजय को सब काम से मुक्त करके सिर्फ कुलर बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। तीन-चार दिन की मेहनत से उसने 40 कुलर तैयार कर दिए। कुलर पूरी तरह तैयार हुए भी नहीं थे कि सामने लगे खड़ेश्वरी आश्रम और इंदौर के कम्प्यूटर बाबा आश्रम से भी 50-50 कुलर की डिमांड आई। विजय ने बताया कि बना हुआ एक कुलर 1500-1600 रुपए का पड़ा है जबकि उसकी साइज फुल है। 
कुलर महंगे थे बाजार में इसीलिए विजय कुलर बनवाया 
बच्चा छोटा कुलर घर से लेकर आया था। हम मच्छर से परेशान थे और यह कुलर की हवा ले रहे थे। एक दिन मैंने इनसे कहा कि नए कुलर न खरीद पाएं लेकिन ऐसे कुलर तो बना दो। फिर गुरूजी आए उन्होंने 50 कुलर की डिमांड बता दी। इसके बाद विजय ने कुलर बनाना शुरू कर दिया।
उमादास त्यागी, किश्तवाड़ 

सिंहस्थ के लिए उज्जैन पहुंचे देशभर में से भिखारी

5 करोड़ से अधिक लोग और 10 करोड़ से अधिक दान का आंकलन खींचलाया उज्जैन
उज्जैन से विनोद शर्मा। 
सिंहस्थ 2016 उम्मीद और उत्साह का महापर्व है। साधु-संतों को शिप्रा स्नान से अमृत मिलने की उम्मीद है तो श्रृद्धालुओं को दुर्लभ साधुओं के आशीर्वाद की। इसी तरह उम्मीदों का पिटारा लेकर देशभर के भिखारी भी सिंहस्थ पहुंच रहे हैं। कोई दिल्ली से है, कोई बिहार या यूपी से। सब अपना आइडेंटिफिकेशन भी साथ लाए हैं ताकि सुरक्षा व्यवस्था के मामले में उनकी पहचान बाधा न बने। 
सिंहस्थ को लेकर शासन-प्रशासन बीते महीनों में दो-तीन बार उज्जैन की सड़कों से भिखारियों को खदेड़ चुका है। बावजूद इसके सिंहस्थ मेला क्षेत्र में भिखारियों की बाढ़ आ गई है। इन दिनों रामघाट पर ही 200 से अधिक भिखारी जमा है। इनमें ज्यादातर दिल्ली, राजस्थान, उप्र, बिहार, उड़िसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र से ट्रेन, बस या किसी न किसी की मदद लेकर उज्जैन पहुंचे हैं। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो ऐसे 2000 से अधिक लोग अब तक आ चुके हैं। सिंहस्थ शुरू होने के साथ और सिंहस्थ के दौरान भी तकरीबन इतने ही लोग और भी बाहर से आना है। 
अभी 700 रुपए तक मिलने लगे हैं
सात दिन पहले दिल्ली से अपने साथियों के साथ आई शांति कुमारी ने बताया कि आठ लोगों का समूह आया है। आधे रामघाट पर है। आधे दूसरे घाट पर। सिंहस्थ शुरू हुआ नहीं है और अभी 500 से 700 रुपए रोज दान मिल रहा है। भरे सिंहस्थ में यह बढ़कर 800 से 1200 रूपए हो जाएगा। दिल्ली में रहते भी तो रोज के 150 से 200 रुपए ही कमाते। यहां खाने की व्यवस्था भी अलग है। 
काफी दिन से बन गई थी प्लानिंग
दिल्ली से आए विकलांग विश्वनाथ ठाकुर और बिहार से आए हेमंत पशवार ने बताया कि फकीर लोग हैं। दान से ही जीवन चल रहा है। इसीलिए सोचा सिंहस्थ में स्नान भी हो जाएगा और थोड़ी अतिरिक्त कमाई भी। इसीलिए काफी दिन से समूह बना लिया था। यहां भी समूह में ही आए हैं। आधार कार्ड और वोटर आईडी के साथ ही सीविल सर्जन द्वारा दिया गया मेडिकल सर्टिफिकेट भी साथ हैं। 
राजस्थान से आए हैं 200 लोग 
थावरा, उदयपुर से आए मुरारी सेन ने बताया कि राजस्थान से अलग-अलग वक्त में अब तक 200 से अधिक लोग यहां भिक्षावृति के लिए आ चुके हैं। लोग पैसा तो देते ही हैं खाने की सामग्री और पहनने के लिए कपड़े भी दे देते हैं। 
दान का गणित
सरकारी अनुमान के अनुसार सिंहस्थ के दौरान 30 दिन में 5 करोड़ से अधिक लोग उज्जैन पहुंचेंगे। इनमें से 40 फीसदी भी दान देते हैं तो दानदाताओं की संख्या होती है 2 करोड़। ये 2 करोड़ लोग औसत 5 रुपया भी एक भिखारी को देते हैं तो महीनेभर में कुल दान हुआ करीब 10 करोड़।  यदि सिंहस्थ में 5 हजार भिखारी हैं या रहते हैं तो इसका मतलब है कि उन्हें 30 दिन में 20 हजार तो मिलना ही है। अब इसमें जिसकी जितनी अच्छी लोकेशन, उसे मिलेगा उतना अच्छा पैसा। मूल स्थानों पर बैठने वाले 40 से 50 हजार रुपए तक घर ले जाएंगे। 

महाकुंभ अच्छे से संपन्न हो इसलिए की महाश्मशान में पूजा

जलती चिता, ...और ‘मिर्ची यज्ञ’
चक्रतीर्थ महाश्मशान से विनोद शर्मा ।
शिप्रा के तट पर स्थित चक्रतीर्थ महाश्मशान में बुधवार रात नौ बजे जहां छह चिताएं जल रही थीं, वहीं तैयारी चल रही थी तांत्रिक यज्ञ की। मां बगुलामुखी के लिए पीले फूल और भगवान भैरव के लिए लाल गुलाब का त्रिकोण बनाया गया। त्रिकोण के बीच कुंकुम से श्रीयंत्र बनाया गया। फिर लकड़ी और कंडे जमाए गए। रात 10 बजे लाल मिर्च-महुए, पीली सरसों, गूगल, लौंग, नमक, नीबू, सरसों के तेल की आहुति के साथ यज्ञ शुरू हुआ। मंत्रों के साथ आहुतियां रात 11.25 बजे तक चलती रहीं। सिंहस्थ पर मंडराए चांडाल योग और श्रद्धालुओं की बलाएं दूर करने के मकसद से यह यज्ञ किया गया। खास बात यह थी कि मिर्ची जलती रही, लेकिन उसकी धांस ने किसी को परेशान नहीं किया। 
    यज्ञ की तैयारियां रात 8 बजे से शुरू हो गई थीं। 9 बजे तक श्रीयंत्र-त्रिकोण बन गए थे। नींबू, लौंग और सिंदुर से पहले त्रिकोण का बंधन किया गया। माथे पर काली पगड़ी, काले कपड़े, गले में रुद्राक्ष-मुंड मालाएं और हाथ में भैरव दंड लिए गुरु अचलनाथ और आंध्रप्रदेश से आए शिव बाबा जिस सिंदूर से बंधन किया था, उसी से तिलक लगा रहे थे। वहीं महाकाल तिलकधारी बाबा उड़द के आटे, इत्र, ब्रांडेड शराब, गंगा जल और लौंग से पुतला (मानव तत्व के रूप में) बना रहे थे ताकि सभी की बला पुतले पर उतारी जा सके। इसके बाद अचलनाथजी ने एक चिता से जलती लकड़ी उठाई और अग्नि प्रवाहित की। फिर पीली सरसों उठाई और मंत्रों के साथ उसे चारों दिशाओं में फेंका गया। इधर, तिलकधारीजी कभी स्वयं चीलम पीते, कभी अपने भैरव दंड को शराब पिलाते, कभी सिगरेट।
अब शुरू हुई आहुतियां
रात 10.10 बजे आहुतियों का दौर शुरू हुआ। लकड़ी पर भैरव दंड रखा गया। फिर उठाया, शराब पिलाई। आहुतियां शुरू हुर्इं। तिलकधारी और शिव बाबा मिर्ची की आहुति देते रहे। अचलनाथजी ने राल-नमक-महुए और लौंग की आहुति दी। तिलकधारीजी भैरवदंड को सिगरेट और शराब पिलाते रहे मिर्ची के साथ शराब-नीबू की आहुति भी देते रहे। साथ-साथ शराब-सिगरेट भी पीते रहे। कभी धीरे-धीरे मंत्र बोलते हुए भैरव दंड घुमाते। कभी जोर-जोर से मिर्ची डालते। सरसों के तेल की सात बोतलें (एक-एक किलोग्राम) थीं, उनसे भी आहुति दी गई।
इंजीनियरिंग छोड़ शवसाधना कर रही
इंजीनियरिंग छोड़कर शवसाधना सीखने आई रश्मि (योगिनी कालीनाथ) ‘जो आंध्रप्रदेश की हैं’, भी त्रिकोण के तिकोने पर बैठी थीं। अचलनाथजी ने उन्हें भी मिर्ची का बोरा थमा दिया और जितनी आहुति दे सकती हों, उतनी दो यह कहते हुए उन्हें अग्निकुंड के पास खड़ा कर दिया। इसके बाद आसपास खड़े लोगों को भी आहुति डालने दी गई। जोर-जोर से मिर्ची और नमक के साथ सरसों के तेल की आहुतियों का दौर चलता रहा, जो रात 11.10 बजे संपन्न हुआ। पूर्णाहुति शराब और सरसों के तेल के साथ नीबू से दी गई।
चिता में मिर्ची-नमक की आहुति
यज्ञ में आहुति देने के साथ ही तीनों साधु एक जलती चिता के पास पहुंचे। पहले तिलकधारीजी ने डंड घुमाकर मिर्ची और शराब की आहुति दी। फिर शिव बाबा ने। इसके बाद अचलनाथजी ने नमक की आहुति दी। 
दिन में सलाइन चढ़ी, रात को आहुति देने पहुंच गए
राजस्थान के बारां जिले से भी सिंहस्थ के लिए रमन गिरी अघोरी आए हुए हैं, जो हर्निया की बीमारी से ग्रस्त हैं। दिन में अस्पताल में भर्ती थे, जहां उन्हें बोतलें चड़ रही थीं। इसी दौरान उन्होंने यज्ञ का सुना और रात को आहुति देने पहुंच गए। उनके हाथ में पट्टी तक बंधी हुई थी। उन्होंने नीबू और सरसों के तेल की आहुति दी। 
...ताकि नजर उतरे सिंहस्थ की
40 दिन से नंगे पैर साधना कर रहे हैं। हर दिन 11 किलोग्राम मिर्ची की आहुति देंगे। 30 दिन तक नियमित यज्ञ चलेगा। कुल तीन क्विंटल मिर्ची और 210 किलोग्राम सरसों के तेल की आहुति दी जाएगी। बाकी तत्व अलग हैं। कुल मिलाकर मकसद एक ही है सिंहस्थ सुखद हो। 
महाकाल तिलकधारी

भक्तों से मिलने उज्जैन पहुंच गए भव्य भगवान

वैष्णोदेवी, अमरनाथ और बालाजी के साथ बालाजीपुरम तक के अस्थाई मंदिरों ने बढ़ाई सिंहस्थ की शोभा 
उज्जैन से विनोद शर्मा । 
देश ही नहीं दुनिया की जनता सिंहस्थ 2016 के लिए उज्जैन में आ पहुंची है तो फिर देवी-देवता क्यों पीछे रहते! वे भी अपने भक्तों को दर्शन देने उज्जैन आ पहुंचे! फिर जम्मू-कश्मीर से आई वैष्णोदेवी हो या फिर कैलाश मानसरोवर से आए बाबा अमरनाथ। उज्जैन पहुंचने वाले देवी-देवताओं में तिरूपति बालाजी और स्वामीनारायण जी भी पीछे नहीं रहे। वे भी अपने भव्य मंदिरों के साथ मेला क्षेत्रों में लोगों को दर्शन दे रहे हैं। सिंहस्थ में साधु-संतों के भव्य पांडालों के साथ ही मेला क्षेत्र के अस्थाई मंदिरों ने न सिर्फ मेला क्षेत्रों की शोभा बढ़ाई है बल्कि जो लोग दूर-दराज मंदिर नहीं जा पाते वे इन्हीं प्रतिकृतियों में ही प्रभू दर्शन पा रहे हैं। 
वैष्णोदेवी मंदिर, जम्मू : अंकपात चौराहे पर सांदिपनी आश्रम के सामने मंदाकिनी माता का आश्रम है जहां 65 फीट ऊंचा भव्य वैष्णो देवी मंदिर बना है। मुख्य द्वार से लेकर मंदिर की गुफा तक लोगों को भा रही है। मंदिर से जुड़े सूत्रों ने बताया कि दिनभर में 50 हजार से अधिक लोग दर्शन करते हैं। 
अमरनाथ मंदिर, जम्मू : ऋृणमुक्तेश्वर मंदिर के पास अंकपात रोड पर बाबा अमरनाथ का मंदिर बना है। इस मंदिर में 121 फीट बर्फीली गुफा है। तकरीबन 30 किलोग्राम वजनी शिवलिंग है। अंदर वैसा ही नजारा है जैसा कि अमरनाथ में होता है। समुद्रमंथन की झांकी भी है हालांकि देखने की फीस 50 रुपए है। 
महाकाल मंदिर, उज्जैन : अमरनाथ मंदिर के पास ही महाकाल मंदिर भी है जो कि 20 किलोग्राम चांदी से बना है। महाकाल दरबार की लागत ही 48 लाख रुपए है। इस मंदिर को उदयपुर के धीरज पानेरी ने बनाया है। 
तिरूपति बालाजी मंदिर, तिरूमला : मंगलनाथ जोन में तकरीबन सात एकड़ जमीन पर रावतपुरा सरकार का आश्रम है। इस आश्रम में तिरुमाला पर्वत (दक्षीण भारत) पर स्थित भगवान तिरुपति बालाजी के मंदिर की भव्य प्रतिकृति बनाई गई है। मुख्य द्वारा जितना सुंदर है उतना ही मनोरम है लाल रोशनी से जगमगाता मंदिर का वातानुकुलित हॉल। यहां रूकमणी बालाजी की प्रतीमा भी है जिनके दर्शन के लिए रोज हजारों की भीड़ लगती है। 
स्वामीनारायण मंदिर, वड़तल : भूखीमाता रोड पर किन्नर अखाड़े के पास आचार्य राकेशप्रसादजी महाराज का आश्रम है। वड़तल (गुजरात) में बने भगवान स्वामीनारायण मंदिर की प्रतिकृति बन रही है। 90 फीसदी काम हो चुका है। इस मंदिर को वड़तलधाम भी कहा जाता है। यहां भगवान स्वामीनारायण की प्रतिमा भी वैसी ही है जैसी की मूल मंदिर में है। मंदिर को जूनागढ़ के कलाकारों ने बनाया है। 
अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर : बड़नगर रोड पर अन्नपूर्णा आश्रम इंदौर का भी आश्रम है। यहां भी यज्ञ और कथा के साथ साधकों के ठहरने की व्यवस्था है। इस पांडाल का आकर्षण गेट है जो ठीक वैसा ही बना है जैसा कि इंदौर में अन्नपूर्णा मंदिर का गेट है। 
राजबाड़ा, इंदौर : मंगलनाथ-उन्हेल रोड पर महामंडलेश्वर कम्प्यूटर बाबा का आश्रम है। इस आश्रम में बाबा ने इंदौर के राजबाड़े की प्रतिकृति का द्वार बनवाया है। उनका कहना है कि मैं जिस शहर से हूं उस शहर की चमक-दमक भी मेरे साथ ही रहना चाहिए। 
बालाजीपुरम, बैतूल : महाकाल मंदिर के पास जो रूद्रसागर है उसमें विक्रमादित्य मंदिर से लगी जमीन पर बैतूल के प्रसिद्ध बालाजीपुरम मंदिर की प्रतिकृति बनाई गई है। इस सुनहरे मंदिर में भगवान बालाजी की प्रतिमा है। बाहर गरूड़ है जिनके कान में लोग अपनी मनोकामना कहते नजर आते हैं। अंदर विश्व प्रसिद्द 65 किलो वजनी महामर्कत मणि स्फटिक शिवलिंग भी है।

सड़क पर लौटा सुकुन, पार्क हुई पाबंदी

- स्टॉपर हटे, बेरिंगेट्स हुए कम, वाहन पास का चक्कर भी थमा
इंदौर/उज्जैन. चीफ रिपोर्टर । 
सुरक्षा और व्यवस्थित यातायात के नाम पर 21 अपै्रल से छावनी बना उज्जैन सोमवार को खुला-खुला नजर आया।   सोमवार को जाम में फंसे और मार्गों पर लगे प्रतिबंध से परेशान वाहनों की पेंपें सुनाई नहीं दी। सुनाई दी तो सिर्फ सिंहस्थ की गुंज। करीब एक सप्ताह के बाद लोग महाकाल  मंदिर, हरसिद्धि मंदिर और रामघाट तक अपने चौपहिया वाहन तक पहुंच पाए। 
    वाहनों की नोइंट्री और बेरिकेटिंग के साथ ही चप्पे-चप्पे नियम-कायदे बताते पुलिस जवानों ने सिंहस्थ के पहले शाही स्नान को फीका कर दिया था। उनकी मुश्तैदी से चांडाल योग को लेकर आशंकित उज्जैन में कोई बड़ी घटना तो नहीं हुई लेकिन पहले शाही स्नान से लाखों लोगों की दूरी किसी बड़ी घटना से कम नहीं थी। समीक्षा के बाद  सिंहस्थ 2016 को कर्फ्यू कुंभ तक कहा जाने लगा। इसीलिए शासन-प्रशासन और पुलिस ने भी नरमी दिखाई जिसका असर सोमवार को उज्जैन की सड़कों पर दिखा। लोग अपने वाहनों से आसानी न सिर्फ मेला क्षेत्र में घुम सके बल्कि शहर के मध्य क्षेत्र (हरसिद्धि, महाकाल, रामघाट, पंचायती अखाड़ा, भूखीमाता रोड़) में भी उनकी पहुंच वैसी ही रही जैसी सिंहस्थ शुरू होने से पहले थी। 
व्यवस्था जवानों ने संभाली
जिन रास्तों को बेरिगेट्स और नो इंट्री के बोर्ड लगाकर बंद कर दिया गया था। वहां से नो इंट्री के बोर्ड भी हटे। बेरिगेट्स भी कम हुए। व्यवस्था संभाली पुलिस के जवानों ने। शाम 8 बजे जब मेला क्षेत्र लोगों की भीड़ बढ़ी तब अंकपात चौराहा, वीर सवारकर चौराहा व अन्य चौराहों की स्थिति देखने लायक थी। यहां पुलिस पहले राहगिरों को रोकती, समूह बनने देती और फिर वाहनों को रोककर उन्हें रास्ता दे देती। वाहन चालकों ने भी सब्र का परिचय और पुलिस का साथ दिया। 
यहां भी पहुंच रही आसान...
मंगलनाथ रोड, गढ़कालिका रोड, भूखी माता रोड से दत्त अखाड़ा जोन, जयसिंहपुरा से महाकाल मंदिर-हरसिद्धि मंदिर-रामघाट, गोपाल मंदिर।
दिन में कम, शाम-रात को ज्यादा भीड़
सिंहस्थ में काले बादलों के साथ उज्जैन की 38 डिग्री का रंग भी अपने पूरे तेवर दिखा रहा है। लाल पत्थर से सजे परम्परागत घाट सुबह 10 बजे से ही गरम हो जाते हैं। इसीलिए वहां दिन में नहाने वालों की संख्या जितनी कम नजर आती है, उतने ही ज्यादा लोग दिखते हैं रात में। शाम 5 बजे से उज्जैन की सड़कों पर भीड़ बढ़ जाती है। इंदौर, भोपाल, देवास, शाजापुर, आगर, राजगढ़, सीहोर, खंडवा, खरगोन, बड़वानी, धार, रतलाम, नीमच और मंदसौर के लोग शाम 6 बजे बाद पहुंचते हैं। घुमते-फिरते हैं, स्नान करते हैं और फिर सुबह 6 बजे तक रवाना हो जाते हैं। ताकि अपने गंतव्य तक पहुंच जाएं। इससे वर्किंग क्लास लोगों को छुट्टी के लिए झिकझिक भी नहीं करना पड़ती और रात में शांति से स्नान हो जाते हैं सो अलग। रविवार की अल सुबह 3 बजे रामघाट-दत्त अखाड़ा घाट पर तकरीबन 10 हजार लोगों की भीड़ थी नहाने के लिए। 
भीड़ कम नहीं, बटी हुई हैं 
चूंकि मेला क्षेत्र 2004 के मुकाबले करीब-करीब दोगुना है। एरिया बढ़ने के साथ ही लोगों की संख्या भी यहां बंट गई। 
तकरीबन हर दूसरे तीसरे पांडाल में रामकथा, भागवत कथा, शिवपुराण जैसी कथाएं हो रही हैं। इन पांडालों में भी लोग अपना वक्त दे रहे हैं। 
दिन में भोजन शाला और अन्न क्षेत्रों में भीड़ रहती है। इसके साथ ही खाली पांडालों या विश्राम के लिए बने पांडालों में लोग आराम भी करते हैं। इसलिए भी भीड़ सड़क पर कम दिखती है।