Monday, December 28, 2015

बिना विकास अनुमति तनने लगी प्राइम एक्सोटिका

प्रेमश्री देवकॉन को एसडीएम सांवेर ने थमाया नोटिस, ले-आउट निरस्त होगा !
इंदौर. विनोद शर्मा ।
बायपास से लगे सुल्लाखेड़ी में बिना विकास अनुमति के प्रेमश्री समूह की टाउनशीप प्राइम एक्सोटिका आकार ले रही है। मुण्डलाबाग की सरकरी जमीन पर कब्जा किया सो अलग। इस खुलासे के बाद एसडीएम सांवेर अनिल बनवारिया ने प्राइम एक्सोटिका के निर्माण पर रोक लगा दी है, हालांकि रोक के बावजूद मौके पर काम जारी है।
जितनी ऊंची टाउनशिप, उनकी जमीनी हकीकत उतनी ही जर्जर। इसका बड़ा उदाहरण है सुल्लाखेड़ी में जी.डी.गोयनका स्कूल के सामने बन रही प्राइम एक्सोटिका टाउनशीप। सुविधाओं के सब्जबाग के साथ बन रहे प्रेमश्री समूह के इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट की एसडीएम बनवारिया के औचक निरीक्षण के दौरान सारी हकीकत सामने आ गई। बीते दिनों बनवारिया ने कारण बताओ नोटिस देते हुए टाउनशिप का काम रोकने के निर्देश दिए हैं।
सरकारी जमीन भी जीम गए...
जांच रिपोर्ट के अनुसार सुल्लाखेड़ी से लगे ग्राम मुण्डलाबाग की सर्वे नं. 1 की 3.318 हेक्टेर जमीन के 20 बाय 1000 फीट हिस्से पर प्रेमश्री देवकॉन प्रा.लि. तर्फे डायरेक्टर राजकुमार पिता प्रेमचंद जैन निवासी मेट्रो टॉवर इंदर ने अपनी निजी जमीन पर आने-जाने का रास्ता बना दिया। इस संबंध में प्रकरण भी दर्ज हुआ। दंड वसूलकर कब्जा भी हटाया गया।
अभिन्यास में पूर्व से पश्चिम दिशा  की ओर जाने वाले 30 मीटर चौड़े पहुंचमार्ग के लिए ग्राम मुण्डलाबाग की सर्वे नं. 1 की जमीन को कांकड़ बताया गया। इसी आधार पर नक्शा पास हुआ। जबकि जिसे काकड़ बताया असल में वह जमीन ग्राम कोटवार के लिए निर्धारित सेवा भूमि है। इसीलिए स्वीकृत नक्शे की दोबारा जांच के लिए 29 सितंबर 2015 को टीएंडसीपी डिपार्टमेंट को भी एसडीएम कार्यालय की ओर से पत्र लिखा गया है।
बना अनुमति कैसे शुरू कर दिया काम...
प्रेम श्री देवकॉन तर्फे राजकुमार जैन व अन्य ने 22 दिसंबर 2011 को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीएंडसीपी) से आवासीय प्रयोजन के साथ भू-अभिन्यास स्वीकृत (प. 8826/नग्रानि/2011) कराया था। इसके बाद जमीन का डायवर्शन भी हुआ लेकिन कॉलोनाइजर ने विकास अनुमति मिले बिना ही मौके पर काम शुरू कर दिया। अभी भी अनुमति प्राप्त नहीं हुई है जबकि मौके पर 25 प्रतिशत से अधिक काम हो चुका है।
ऐसे मिलती है विकास अनुमति...
-- पंचायती राज अधिनियम के तहत गांवों में कॉलोनी विकास को लेकर नए नियम बनने के बाद इंदौर जिले में कॉलोनी विकास के लिए कमेटी बनाई गई है जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करते हैं।
-- गांव में कॉलोनी काटने के लिए कॉलोनाइजर को निर्धारित प्रारूप में आवेदन करना होगा। कमेटी में शामिल एसडीओ राजस्व, पीडब्ल्यूडी, पीएचई आदि विभागों के अधिकारी स्थल निरीक्षण करेंगे। इसके बाद इन अधिकारियों की कमेटी कलेक्टर को रिपोर्ट पेश करेगी।
-- कॉलोनाइजर प्रेजेंटेशन देगा कि कॉलोनी में किस स्तर की सड़क, बिजली, पानी और सीवेज की लाइन होगी। रिपोर्ट और प्रेजेंटेशन देखने के बाद तय करेंगे कि कॉलोनी को विकास अनुमति दी जाए या नहीं। यदि कोई कमी या खामी रही तो कमेटी कॉलोनाइजर को बताएगी। इन्हें दूर करने के लिए उसे एक सप्ताह का समय और दिया जाएगा। प्लान से संतुष्ट होने के बाद ही कलेक्टर विकास अनुमति जारी करेंगे।  
ले-आउट निरस्त करना ही उचित है...
22 दिसंबर 2011 को झूठी जानकारी देकर जो ले-आउट मंजूर कराया गया था उसकी वैधता 21 दिसंबर 2012 तक की थी। बिना विकास अनुमति के काम भी शुरू कर दिया गया। इसीलिए कॉलोनी का ले-आउट निरस्त करना ही उचित होगा। इस संबंध में कलेक्टर को भी पत्र लिखा है।
अनिल बनवारिया, एसडीएम
सांवेर

जीएसटी के फेर में उलझा केंद्रीय बजट

जीएसटी लागू होगा या करों की नई दर, असमंजस बरकरार
इंदौर. विनोद शर्मा ।
विंटर सेशन में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) सहित इकोनॉमिक रिफार्म से जुडेÞ कई बिलों के अटकने से सरकार 28 फरवरी को पेश होने वाले बजट को लेकर असमंजस में है। 1 अपै्रल को बजट पेश करे या इनकम टैक्स, कस्टम, सेंट्रल एक्साइज व सर्विस टैक्स की दरें कम-ज्यादा करे। बहरहाल, दरों की घट-बढ़ को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है। माना जा रहा है जीएसटी में देरी का खामियाजा एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स की दरों में बढ़ोत्तरी के रूप मे चुकाना होगा।
केंद्रीय बजट को लेकर कर सलाहकार, सीए और विशेषज्ञ ज्यादा सोच नहीं रहे हैं। वे मानकर बैठे हैं कि जीएसटी बिल लागू होगा। हालांकि अब तक बिल को संसद से स्वीकृति नहीं मिली है।  दूसरी तरफ बजट 2016-17 को फाइनल टच देना है। एक्साइज एक्सपर्ट आर.डी.जोशी ने बताया कि अभी एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स में बढ़ोत्तरी की संभावना कम है। जितने भी कयास लगाए जा रहे हैं कोरे हैं। सरकार 28 फरवरी को बजट पेश करेगी। कोशिश रहेगी कि तब तक जीएसटी भी क्लीयर हो जाए। क्लीयर हो जाता है तो 31 मार्च तक बजट 2015-16 के प्रावधान लागू रहेंगे। यदि जीएसटी नहीं आता है तो नए बजट के प्रावधान उस तारीख तक प्रभावी रहेंगे जिस तारीख से जीएसटी लागू किया जाएगा। उम्मीद है कि बजट सत्र में जीएसटी मंजूर हो जाएगा।
जीएसटी में समाहित हो जाएंगे टैक्स...
जीएसटी यदि लागू होता है तो उसमें एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स के साथ ही सेल टैक्स भी शामिल हो जाएगा। टैक्स की दर एक हो जाएगी। सेंट्रल जीएसटी और स्टेट जीएसटी का लाभ आम आदमी से लेकर कारोबारियों तक को मिलेगा।
सरकार की कमाई में छूट की संभावना कम..
बताया जा रहा है कि सरकार का पूरा जोर आय बढ़ाने पर रहेगा। ऐसे में कर या ड्यूटी में छूट की संभावना कम रहेगी। इसीलिए इनकम टैक्स की स्लैब 5 लाख तक करने की मांग इस बार भी पूरी नहीं होगी। स्लैब बढ़ी भी तो 3 से ऊपर नहीं जाएगी। उलटा, जो चीजें छूट के दायरे में आती हैं उन्हें दायरे में लाया जा सकता है।
एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स पर जोर...
कयास लगाऐ जा रहे हैं कि एक्साइज ड्यूटी से छूट प्राप्त उत्पादों की संख्या घटाई जाएगी।  डिब्बा बंद दूध, प्रीमियम चाय-कॉफी, बिस्कुट जैसी चीजों पर ड्यूटी लग सकती है। शुरू में एक्साइज की दर 2-4 फीसदी रह सकती है। अभी 300 उत्पादों को छूट प्राप्त है। इन उत्पादों की संख्या घटाकर 100 तक लाने पर विचार चल रहा है हालांकि 200 उत्पादों पर एक साथ ड्यूटी लगाकर सरकार जनविरोध का सामना नहीं करना चाहेगी।
2015-16 के बजट में सर्विस टैक्स की दर 12.45 से बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दी गई थी। बाद में इसमें 0.5 प्रतिशत का स्वच्छता उपकर भी जोड़ दिया। अभी कुल 14.50 प्रतिशत टैक्स लग रहा है जिसे 2016-17 के बजट में सरकार बढ़ाकर 16 प्रतिशत कर सकती है। ऐसा हुआ तो हर आइटम महंगा हो जाएगा। सुब्रह्मण्यन कमिटी ने 16.9-18.9 फीसदी स्टैंडर्ड रेट की सिफारिश की है।

निगम को निचौड़ने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

स्वास्थ्य समिति प्रभारी राठौर ने लिखा निगमायुक्त को कड़ा पत्र
स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर दी गई 65.09 लाख की माफी ने फिर पकड़ा तूल
इंदौर. विनोद शर्मा ।
लापरवाही पर मस्टरकर्मियों को निलंबित करने वाले नगर निगम आयुक्त को पत्र लिखकर स्वास्थ्य समिति प्रभारी राजेंद्र राठौर ने निगम के अधिवक्ता और आधा दर्जन अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। इन्होंने तमाम आपत्तियों के बावजूद स्कीम-31 के प्लॉट नं. 22 पर प्रीमियम आॅन एफएआर के पेटे मिलने वाले 65 लाख रुपए माफ कर दिए थे। बाद में राठौर की पहल पर मामला पकड़ में आया और राशि जमा कराई गई हालांकि अब तक प्लॉट की बिल्डिंग पर्मिशन रद्द है।
राठौर ने 21 दिसंबर को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि 65 लाख रुपए का पीएफएआर माफ करने के मामले में जब मैंने शिकायत की थी तब अपर आयुक्त मनोज पुष्प ने जांच की थी। जांच में उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि निगम के अधिवक्ता जाहिद हसन खान ने बिल्डर के पक्ष में अभिमत देकर निगम को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया है। जबकि इसी स्कीम 31 के प्लॉट नं. 27 का नक्शा पास करने से पहले पीएफएआर की बड़ी राशि वसूली गई। जांच रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि के बावजूद आज दिन तक न अभिभाषक के खिलाफ कार्रवाई की गई। न ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ। चूंकि आप सख्ती और अनुशासन पसंद है लिहाजा आप से कार्रवाई की उम्मीद करते हैं। ताकि आगे से निगम को नुकसान पहुंचाने वालों को सबक मिले।
65,09 लाख कर दिए थे माफ...
मामला सपना संगीता रोड स्थित स्कीम-31 रेसिडेंशियल और सेमी कमर्शियल है। यहां प्लॉट नं. 22 पर बिल्डिंग के लिए लक्ष्मण दास पिता उदाराम भाटिया एवं अन्य ने आवेदन किया था। स्वीकृति के क्रम में दो फीस मेमो जारी हुए। बिल्डिंग पर्मिशन के 3,89,826 रुपए और कर्मकार कल्याण शुल्क पेटे 2,25,600 रुपए जमा कराए गए। यहां जनवरी 2008 में स्वीकृत हुए मास्टर प्लान-2021 के अनुसार कमर्शियल प्लॉट पर बिल्डिंग पर्मिशन के दौरान अनिवार्य किया गया प्रीमियम आॅन एफएआर नहीं वसूला गया जो 65,09,000 रुपए जोड़ा गया था।
एक वकील ने कहा जमा करो, दूसरे ने कहा माफ...
नक्शा लगने के बाद निगम ने पीएफएआर के लिए 65 लाख का फीस मेमो भी जारी किया। भवन निमार्ता ने आपत्ति ली, कहा शुल्क नहीं चुकाऊंगा। निगम ने विधिक राय ली। अधिवक्ता नवीन नवलखा ने राशि जमा करवाने की राय दी। वहीं अधिकारियों ने बिल्डर को फायदा देने के मकसद से बाद में जाहिद खान की राय ली। खान ने पीएफएआर न लेने की अनुसंशा कर दी।
दो साल बाद जमा कराई राशि
मुख्यालय के भवन अधिकारी (बीेओ) विनोद नागर ने भी लिख दिया शुल्क लेना होगा।  भवन निमार्ता ने लोकायुक्त में नागर की शिकायत की। वहां जांच शुरू हुई, इधर भवन निमार्ता ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। नागर को व्यक्तिगत रूप से पार्टी बनाया गया। कोर्ट ने सिटी इंजीनियर भवन अनुज्ञा हरभजनसिंह ने को सुनवाई के निर्देश दिए। सिंह ने जनवरी 2014 में फीस जमा कराने का आदेश दिया। आखिर में राशि जमा कराई गई। उधर, नगर निगम ने बिल्डिंग पर्मिशन रद्द कर दी। इस संबंध में बिल्डर को हाईकोर्ट से आज तक राहत नहीं मिली है।
नहीं तो निगम को 100 करोड़ का नुकसान होता....
प्लॉट नं. 22 के लिए 2012 में आवेदन किया गया था जबकि पीएफएआर लागू हुआ था जनवरी 2008 से। यदि पकड़ में नहीं आता तो प्लॉट नं. 22 से तो 65.09 लाख मिलते ही नहीं बल्कि माफी पर आपत्ति लेने वाले प्लॉट नं. 27 के बिल्डर को भी वसूला गया पीएफएआर लौटाना पड़ता जो भी लाखों में था। इन दो उदाहरणों से जनवरी 2008 से 2012 के बीच जितनी बिल्डिंगों से पीएफएआर वसूला गया था उन्हें भी रास्ता मिल जाता निगम के खिलाफ मोर्चा खोलने का। इसीलिए निगम के लिए घर भेदी साबित हो रहे ऐसे अभिभाषक और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाना चाहिए।
राजेंद्र राठौर, प्रभारी
स्वास्थ्य समिति 

एक्शन प्लान बचाएगा बाघों की जान

- जंगलों में घास एरिया बढ़ेगा, कैमरे लगेंगे
- इंदौर-देवास में आधा दर्जन से अधिक है बाघ
इंदौर. विनोद शर्मा ।
इंदौर और देवास के जंगलों में भूख-प्यास से बाघों की मौत नहीं होगी। इसके लिए वन विभाग ने एक्शन प्लान तैयार किया है जिसे वन मंत्रालय की मंजूरी भी मिल चुकी है। एक्शन प्लान के तहत जगह-जगह पेयजल स्रोत विकसित किए जाएंगे। घास एरिया बढ़ाया जाएगा ताकि शाकाहारी व वन्य प्राणियों की संख्या बढ़े। इतना ही नहीं जंगल और बाघों की निगरानी और सुरक्षा के मद्देनजर कैमरें लगाए जाएंगे।
2014 की एक आॅडिट रिपोर्ट के अनुसा मप्र में 2010 तक बाघों की संख्या 262 थी। इसमें इंदौर-देवास रेंज में 7 बाघों की गिनती की गई। इनका ज्यादातर मुवमेंट इंदौर, देवास और सिहोर के जंगलों में रहता है। बीच में कैमरा ट्रेप में बाघ के बच्चे भी दिखे। ऐसे में संख्या बढ़ने का अनुमान है। उदयनगर में हुई बाघ की मौत के बाद विभाग ने बाकी बाघों की सुरक्षा को लेकर कमर कस ली है। सिर्फ वन विभाग ने ही तकरीबन 25 लाख रुपए की बाघ संरक्षण योजना भेजी थी जिसे मंत्रालय ने मंजूर कर दिया है।
यह है कार्ययोजना...
- जगह-जगह जलस्रोत विकसित होंगे। तलई बनेगी। ऐसी व्यवस्था होगी कि गर्मी में भी बाघ व अन्य प्राणियों को पानी मिले। अभी पेयजल स्रोतों का अभाव है। गर्मी में ज्यादा दिक्कत।
- रहवास सुधार कर रहे हैं। इसमें घास एरिया बढ़ाया जाएगा ताकि शाकाहरी प्राणियों की संख्या बढ़े। इन्हीं प्राणियों का बाघ शिकार करेंगे। अभी हिरण व अन्य प्राणी काफी कम हो चुके हैं।
- 25-30 कैमरा ट्रेप लगाएंगे। इनमें बाघ के मुवमेंट के साथ ही जंगल में लोगों के अवैधानिक प्रवेश पर भी निगाह रखी जाएगी।
- वन विभाग के अमले को वाहन और संचार साधन उपलब्ध कराए जा रहे है। ताकि गश्त आसान हो। पीओपी से बाघ के पग मार्क लेना सिखाएंगे।
- ग्रामीण क्षेत्रों में वन विभाग के अधिकारियों के मोबाइल नंबर व कंट्रोल रूम नंबर चस्पाए जा रह हैं। लोगों को समझाइश दी जाएगी ताकि वे जंगल में प्रवेश करने वाली अनाधिकृत गाड़ियों की सूचना दे सकें।
दो-चार दिन में काम शुरू कर देंगे
बाघों की सुरक्षा के मद्देनजर एहतियात के तौर पर जितने भी प्रयास किए जा सकते हैं, कर रहे हैं। एक एक्शन प्लान भी बनाया है जिसे  जिसे मंजूरी मिल चुकी है। दो-चार दिन में मैदानी काम शुरू कर रहे हैं। इसके परिणाम सकारात्मक होंगे।
पी.सी.दुबे, सीसीएफ
उज्जैन
मूलभूत सुविधाएं जुटाना जरूरी
उदयपुर में बाघ का पोस्टमार्टम करने के दौरान मैंने जो आॅबजर्व किया है उसके अनुसार जंगल में बाघों के लिए मूलभूत सुविधाएं जुटाना जरूरी है। हिरण व वन्य प्राणी कम हुए हैं इनका विस्तार जरूरी है वरना भूख के मारे बाघ बस्तियों में प्रवेश करेंगे।
डॉ.उत्तम यादव, प्रभारी
चिड़ियाघर, इंदौर
न फोटो न स्थान की सूचना...
इंदौर-देवास-सिहोर वाइल्डलाइफ जोन है। उदयपुर में एक की मौत के बाद भी करीब छह बाघ है यहां। बच्चे अलग। इनकी लोकेशन गोपनीय रखी जाती है। सख्त हिदायत कोई फोटो खींचकर वॉट्स एप न करे ताकि बाघों पर शिकार के संकट की संभावना कम रहे। गांव में बाघ के प्रवेश से हुई हानियों के 35 मामलों में 20 लाख से अधिक मुआवजा भी दिया है।  एक बाघ 15 से 100 किलोमीटर के बीच भ्रमण करता है। उसका औसत एरिया 10 वर्गकिलोमीटर है।

बाघों की सुरक्षा को लेकर सरकार सख्त है। इसीलिए जो प्रस्ताव मिलता है उसकी समीक्षा करके मंजूरी देने में देर नहीं की जाती है। जल्द ही मैदान में काम दिखेगा।
डॉ.गौरीशंकर शेजवार, वन मंत्री










अवैध कॉलोनी काटकर बेच डाले छह करोड़ के प्लॉट

जांच में ही अटक कर रही गई कार्रवाई
इंदौर. चीफ रिपोर्टर।
सीलिंग और नजूल की जमीन पर कटी कॉलोनी के खिलाफ जिला प्रशासन सख्त अभियान चला रहा है वहीं मैदानी अफसरों की निगरानी में असरावद खुर्द के पूर्व सरपंच, उसके भाई और उसके समधी ने सरकारी जमीन पर कॉॅलोनी काट दी। कॉलोनी भी छोटी-मोटी नहीं, बल्कि 200-250 प्लॉटों की। एक-एक प्लॉट 3 से 5 लाख में बेचकर सरकारी जमीन से भू-माफिया 6 करोड़ कमा गए और इसका बड़ा हिस्से अफसरों को भी बांटा, यही वजह है कि बार-बार जांच के बावजूद आज तक इन पर कार्रवाई हुई ही नहीं।
मामला खंडवा रोड स्थित असरावद खुर्द का है। इस गांव में सर्वे नं. 19/2, 19/3, 37/1/1, 37/1/3, 37/2, 171/1, 171/1/1, 171/1/2, 171/1/3, 171/1/4, 172/1 की जमीनें सरकारी हैं। इनका भू-उपयोग राजस्व रिकार्ड में चरनोई और गांवठान दर्ज है। खंडवा रोड से गांव के बीच पॉवर हाउस के पास अलग-अलग हिस्सों में कॉलोनी कट गई है। 7 एकड़ में नगर निगम इंदौर की गवला कॉलोनी है। 2 एकड़ जमीन खली फेक्टरी के पास है। फेक्टरी के पास तेजाजीनगर की ओर कॉलोनी है जिसे टपाल घाटी कहते हैं जो कि नगर निगम सीमा में आ गई। फेक्टरी के पीछे और नगर निगम की गवला कॉलोनी के पास सर्वे नं. 37/1/1, 37/1/3 और 37/2 की जमीन पर 2010-2015 के बीच पप्पू पिता अमृतलाल राजौरिया, उनके भाई दिनेश राजौरिया और समधी महेश भिमाजी ने कॉलोनी काट दी। इन पांच वर्षों में असरावद खुर्द की सरपंच पिंकी राजौरिया रही जो कि पप्पू राजौरिया की पत्नी है।
पहले शिकायतें ठंडे बस्ते में थी, अब जांच भी...
क्षेत्र के लोगों ने राजौरियां बंधुओं द्वारा की जा रही सरकारी जमीन की बंदरबाट की शिकायतें पटवारी से लेकर कलेक्टर तक को की। पहले तो दर्जनों शिकायतें रद्दी की टोकरी में डाल दी गई। लगातार शिकायतों के बाद आखिरकार कलेक्टर आकाश त्रिपाठी ने जांच के आदेश दिए। पहले तहसीलदार अजीत श्रीवास्तव ने जांच की। जांच में शिकायत की पुष्टि हुई। बावजूद इसके कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद एसडीएम अनुपमा निनामा, तहसीलदार राजकुमार हलधर और नायब तहसीलदार राजेश सिंह ने भी जांच की। तेजाजीनगर पुलिस को कार्रवाई के लिए लिखा भी गया लेकिन कार्रवाई हुई ही नहीं।
कॉलोनी में तीन-चार बार जा चुके हैं हलधर
तहसीलदार राजकुमार हलधर जांच के नाम पर तीन-चार बार कॉलोनी के चक्कर काट चुके हैं। इस दौरान उनकी मुलाकात कॉलोनाइजर पप्पू राजौरिया और उसके भाई दिनेश से भी हो चुकी है। क्षेत्रवासियों का आरोप है कि हर बार हलधर राजौरिया से कॉलोनी बचाने की ‘फीस’ ले जाते हैं, इसीलिए कॉलोनाइजरों के खिलाफ आज तक उन्होंने कार्रवाई में गंभीरता नहीं दिखाई। सिर्फ कागजी खानापूर्ति ही की।
50-50 के दो स्टॉम्प पर लाखों के खेल
राजौरिया और महेश भिमाजी ने चार पन्नों के दस्तावेज पर प्लॉटों के सौदे किए। इसमें दो स्टॉम्प है 50-50 रुपए के। बड़ा खेल यह है कि इन नोटरियों में खसरे का जिक्र नहीं है। 600-600 वर्गफीट के प्लॉट बेचे गए हैं। किसी को प्लॉट 1.5 लाख में बैचे तो किसी को

(पप्पू राजौरिया के मोबाइल पर संपर्क किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। )

बक्से में पूरी हो गई उपकरणों की उम्र

खरीदी का मनमाना खेल, तांक पर रोगी कल्याण
इंदौर. विनोद शर्मा।
कायाकल्प के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने वाले एमवायएच प्रशासन की मरीजों को लेकर सोच कितनी सतही है इसका अंदाजा अस्पताल परिसर में इस्तेमाल के इंतजार में कबाड़ हो रहे उपकरणों से लगाया जा सकता है। फिर मुद्दा एक्सरे डिपार्टमेंट में पेटीपेक पड़ी कम्प्यूटराइज्ड डिजिटल रेडियोग्राफी (सीडीआर) मशीन का हो या फिर बक्से में ही गारंटी पीरियड पूरे कर चुके वेंटिलेटर का। अतिआवश्यक सेवाओं के नाम पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाकर इन उपकरणों की खरीदी की गई थी।
दवा और उपकरणों की खरीदी को लेकर सरकार जितनी पारदर्शिता की बात करती है हकीकत उसकी उतनी ही उलटी है। यहां तो कमीशन के लालच में जबरिया मांग बताकर उपकरण खरीदे जाते हैं। यह बात अलग है कि उनका इस्तेमाल अर्से तक हो या न हो। इस्तेमाल के इंतजार में ही अस्पताल परिसर में दर्जनों उपकरण सड़ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो एक्स-रे विभाग में सीडीआर मशीन सालभर पहले खरीदी गई थी। आज तक बक्से से बाहर नहीं आई। मशीन की खरीदी डिजिटल रेडियोग्राफी के लिए की गई थी। हालांकि एमवाय के पास इस मशीन को चलाने के लिए प्रशिक्षित आॅपरेटर तक नहीं है।
तो फिर खरीदी क्यों..
केज्युअल्टी में जो ट्रामा सेंटर है वहां दर्जनभर से अधिक बॉक्सेस रखे हुए हैं। इन बॉक्स में वेंटिलेटर मशीने हैं। इन मशीनों की खरीदी करीब सवा साल पहले हुई थी। बड़ी बात यह है कि इन मशीनों पर कंपनी ने एक साल की गारंटी दी थी और तीन साल की वारंटी। गारंटी बक्से में ही खत्म हो चुकी है। वारंटी का भी कुछ समय बीत चुका है। ये मशीनें कब खुलेगी और कब इस्तेमाल होगी? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। एक वेंटिलेटर मशीन की कीमत 14 लाख है। यदि 12 मशीनें भी हैं तो उनकी खरीदी 1.68 करोड़ में हुई है।
आधी मशीनें बंद...
सूत्रों की मानें तो एक्स-रे डिपार्टमेंट में 7 सीडीआर मशीने हैं जिनमें से चलती सिर्फ 3 ही हैं। चार इस्तेमाल ही नहीं होती। इनमें से कुछ खराब भी है। इसी तरह बड़ी तादाद में खरीदे गए पल्स आॅक्सीमीटर भी बर्बाद पड़े हैं। कंपनी ने ब्रांड के नाम पर चायनीज उपकरण सप्लाई कर दिए ताकि जल्दी खराब हो और जल्दी आॅर्डर मिले।
ऐसे होती है उपकरणों की खरीदी में सेटिंग...
-- दलाल अस्पतालों के सतत संपर्क में रहते हैं। डॉक्टरों को लालच देकर उपकरणों व दवाइयों की जरूरत पैदा करते हैं।
-- चूंकि खरीदी ई टेंडर से होती है। यहां गड़बड़ की संभावना कम रहती है। लिहाजा कंपनी के प्रतिनिधि और दलाल टेंडर जारी होने से पहले ही अस्पतालों से संपर्क कर लेते हैं।
-- यहां वे अपनी कंपनी के उत्पाद के जो स्पेसिफिकेशन हैं उन्हीं स्पेसिफिकेशन को टेंडर की शर्तों में अनिर्वायता के साथ शामिल करवा देते हैं। जैसे यदि कोई कंपनी सोनोग्राफी के 14 र्इंची मॉनिटर बनाती है, बाकी कंपनियां 12 र्इंची बनाती है या फिर 16 र्इंची। ऐसे में कंपनी स्पेसिफिकेशन की शर्त में डलवा देती है कि मॉनिटर 14 र्इंची ही खरीदा जाएगा।
- जब विज्ञप्ती जारी होती है तो 12 और 16 र्इंची मॉनिटर वाली कंपनियां शर्तों के लिहाज से बाहर हो जाती है और मनमाने कोटेशन के बावजूद आॅर्डर मिलता है 14 र्इंची मॉनिटर बनाने वाली कंपनी को।
ऊपर से होती है सेटिंग...
स्पेसिफिकेशन के मापदंड वहीं सेट करते हैं जो टेंडर की शर्तें तय करते हैं। जिनके आदेश से टेंडर जारी होते हैं। जिन्हें खरीदी की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।


इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
टार्गेट रहता है जो कि नॉमिनल है। महीने में दो-चार सेंपल का रहता है।
 फेल तो होता ही नहीं है।   चार-पांच साल में एकाध ही फेल होता है।  पुराने केस में सुनवाई चलती रहती है। पांच साल हो गए हैं नए लोगों को हैं। पीडीपीएल  रिपोर्ट  प्रोस्यूकशन  फिर दंड  त्रिवेदी था। पीडीपीएल का मामला है। पीडीपीएल में ही कंसलटेंसी कर रही है।  ड्रग इंस्पेक्टर हैं।
ड्रग की लैब है भोपाल में। कोलकाता में विशेष जाता है। सेंट्रल ड्रग लेब है।  एमवायएच में सेंपल लेने में कभी अजय गोयल का नंबर हो तो  9755112121 गोयल अशोक गोयल है।  मंथनी रिपोर्ट  दिसंबर में बनेगी। ड्रग कंट्रोलर  आॅनलाइन ही नहीं है। 

लोकायुक्त के निशाने पर आयकर अफसर

- भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
सर्च और सर्वे से बड़े-बड़े कारोबारियों की नींद उड़ाने वाले आयकर विभाग के कुछ अफसर लोकायुक्त के निशाने पर है। बताया जा रहा है कि भ्रष्टाचार की लगातार शिकायतों ने आयकर में लोकायुक्त अधिकारियों की आवाजाही बढ़ा दी है। एक तरफ जहां लोकायुक्त अफसर इसकी पुष्टि नहीं कर रहे हैं वहीं आयकर की बैठकों में बड़े अधिकारी लोकायुक्त का हवाला देकर मैदानी अमले को ईमानदारी का पाठ पढ़ा रहे हैं।
आयकर में बीते कुछ दिनों से लोकायुक्त एसपी अरूण मिश्रा की आवाजाही बढ़ी है। उनकी आवाजाही की बड़ी वजह आयकर अधिकारियों के खिलाफ मिल रही शिकायतों को बताया जा रहा है। इन शिकायतों की चर्चा आयकर के गलियारों में भी है। बताया जा रहा है कि बीते दिनों एक मीटिंग हुई थी जिसमें एक आला अधिकारी ने शिकायतों को लेकर अधिकारियों व कर्मचारियों को आड़े हाथ लिया। उन्होंने यहां तक कहा कि आप जो कर रहे हो उस पर लोकायुक्त व सीबीआई की नजर है। गौरतलब है कि चार-पांच साल पहले लोकायुक्त आयकर अधिकारी आर.के.कोष्ठा के खिलाफ भी छापेमार कार्रवाई कर चुकी है।
मंत्रालय तक है परेशान...
आयकर व अन्य राजस्व विभागों में भ्रष्टाचार को लेकर वित्त मंत्रालय गंभीर है। बीते दिनों वित्त मंत्रालय के राजस्व सचिव सुमित बोस ने इस संबंध में कुछ सुझाव और भ्रष्ट आॅफिसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई  की चेतावनी भी दी है। वे कह चुके हैं कि आयकर, उत्पाद व कस्टम विभाग के विजिलेंस विंग का मुख्य उत्तरदायित्व है कि वह भ्रष्ट आॅफिसरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।
लोकायुक्त कर सकता है कार्रवाई
चूंकि आयकर, सेंट्रल एक्साइज जैसे विभाग केंद्र सरकार का हिस्सा है, इनसे राज्य सरकार को कोई वास्ता नहीं। सामान्यत: इन विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कार्रवाई सीबीआई करती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या लोकायुक्त केंद्रीय कर्मचारियों पर कार्रवाई कर सकता है? स्वयं लोकायुक्त एस.पी. अरूण मिश्रा ने इस संबंध में बताया कि मप्र की भूमि पर जो भी भ्रष्टाचार करता है उस पर लोकायुक्त कार्रवाई कर सकता है। फिर वह राज्य कर्मचारी हो या केंद्रीय कर्मचारी। ऐसे मामलों में कार्रवाई से लेकर चालानी कार्रवाई तक लोकायुक्त करता है।
इन कामों के बदले लगते हैं पैसे..
- कर मुल्यांकन यदि ज्यादा है तो उसे कम करना
- इनकम टैक्स चुकाने के बाद जल्द रिफंड
- असेसमेंट रिपोर्ट देने के लिए।
- आईटीआर और बैंक रिपोर्ट के आधार पर सर्वे की कार्रवाई की चेतावनी देना और वसूली करना।
- पेन जल्द ट्रांसफर कराना।
(सर्वे और सर्च की चेतावनी बड़ी रकम दिलाती है)
सामने आकर शिकायत नहीं कर सकते...
सूत्रों की मानें तो पहले मुख्य आयकर आयुक्त को भी शिकायत की जाती थी । ज्यादा से ज्यादा सबूत मांगे जाते थे। कार्रवाई की संभावना कम और नाम उजागर होने की संभावना ज्यादा रहती है। नाम उजागर होने की स्थिति में कारोबारियों या व्यापारियों का काम करना मुश्किल हो जाता है। जबरिया परेशान किया जाता है। इसीलिए आॅफिस स्तर पर शिकायतें कम हो गई। अब सीवीसी, सीबीआई और  लोकायुक्त के पास पहुंचने वाले मामले बढ़ गए।
ये मामले आए सामने...
- मार्च 2012 में पेन ट्रांसफर के लिए 20 लाख रुपए की रिश्वत का मामला सामने आया था। सीबीआई ने कार्रवाई की।
- 2011 में सीबीआई अदालत ने भोपाल में पदस्थ रहे आयकर अधिकारी बीएस बांठिया को चार साल के कारावास और 33 लाख रुपये जुमार्ने की सजा सुनाई थी।
- 2012 में सीबीआई कोर्ट ने भोपाल में पदस्थ रहे एक असिस्टेंट इनकम टैक्स कमिश्नर सुरेश सोनी को तीन साल कैद की सजा सुनाई है। सोनी 1993 से 1999 तक भोपाल-इटारसी में पदस्थ रह चुके हैं। 1999 में उनके घर छापा पड़ा था।
रूटिन में जाता हूं ऐसे ही...
क्या आयकर अफसरों की शिकायतें मिली है।
नहीं, शिकायत सामने नहीं आई।
आयकर में आपकी आवाजाही बढ़ी है?
मैं तो यूं ही रूटी में आता-जाता हूं।
मीटिंग में लोकायुक्त का हवाला देकर चेताया जाता है?
इस संबंध में मैं क्या कह सकता हूं। अच्छा है अगर ऐसा है भी तो।
क्या आयकर पर लोकायुक्त कार्रवाई कर सकत है?
क्यों नहीं, पहले भी कर चुके हैं।
अरूण मिश्रा, एसपी
लोकायुक्तरू