Monday, June 8, 2015

चार संस्थाएं, 700 करोड़ बेहिसाब

-विनोद शर्मा

इंदौर। जिन चार सहकारी साख संस्थाओं ने देशभर की को-आॅपरेटिव बैंकों को आयकर के दायरे में ला दिया, उनमें अब तक करीब 700 करोड़ का हिसाब अफसरों की पहुंच से दूर है। बताया जा रहा है कि यदि दावेदारों का अता-पता नहीं मिलता है तो पूरी रकम चार संस्थाओं के अध्यक्षों पर थोप दी जाएगी। यानी इस राशि पर बनने वाले 33 प्रतिशत आयकर (करीब 231 करोड़) की देनदारी इन अध्यक्षों के गले की फांस बनना तय है। डायरेक्टर जनरल इनकम टैक्स (डीजीआईटी) इन्वेस्टिगेशन ने सितंबरअक् टूबर 2014 में इंदौर की गुरुशरण सहकारी साख संस्था, कान्हा क्रेडिट को- आॅपरेटिव, धार की राजेंद्र सूरी सहकारी साख संस्था और उज्जैन की श्री वर्धमान साख सहकारी संस्था के खिलाफ छापेमार कार्रवाई करके 1000 करोड़ के बेहिसाबी लेनदेन का खुलासा किया था।

 
श्रीवर्धमान की रिपोर्ट सीबीडीटी तक जा चुकी है। राजेंद्र सूरी की रिपोर्ट भी तैयार है। रिपोर्ट के अनुसार राजेंद्र सूरी का 150 करोड़ का जो बेहिसाबी लेन-देन मिला था, आयकर की टीम इसमें से करीब 100 करोड़ का पता लगा चुकी है। 50 करोड़ का हिसाब बाकी है। इसी तरह श्रीवर्धमान में 300 करोड़ के बेहिसाबी लेनदेन में अब तक 120 करोड़ का हिसाब व्यापारियों से पूछताछ में मिल चुका है। 180 करोड़ अब भी बेहिसाब है।

 
श्री वर्धमान साख सह. संस्था :- 
30 सितंबर को सर्वे। जांच में पता चला सोसायटी के माध्यम से करीब 300 करोड़ का लेन-देन हुआ है। सोसायटी के माध्यम से करीब 125 व्यापारी लेन-देन करते थे, जो कि मप्र, गुजरात अन्य राज्य के बताए जाते हैं।

 
जांच रिपोर्ट में उजागर हुए खेल :-
काली कमाई को वैध करने के लिए नकद लेकर चेक और डीडी बनाना।
खातेदारों की संख्या में भारी अंतर।
आरबीआई की जानकारी के बिना बंैकिंग।
फर्जी चेक और डीडी बेचकर पैसा कमाना।
अन्य राज्यों की बैंकों से संबंध।
देशी हवाला का कारोबार।
फर्जी लोन के दस्तावेज बनाकर दिए।

 
500 सदस्यों को नोटिस :-
संस्थाओं से प्राप्त 500 से अधिक खातेदारों को नोटिस थमाकर इन चारों संस्थाओं में जमा राशि का हिसाब पूछा गया है। इनमें सबसे ज्यादा सदस्य धार की राजेंद्र सूरी में है। उधर, कई सदस्यों ने जमा राशि के हिसाब के साथ उनसे संबंधित दस्तावेज भी आयकर को सौंप दिए हैं।

 
गुरुशरण और कान्हा :-
इंदौर में एक ही संचालक द्वारा संचालित गुरुशरण और कान्हा को-आॅपरेटिव बैंकों में 575 करोड़ का हिसाब मिला था। इसमें से आयकर विभाग की टीम अब तक 125 करोड़ से ज्यादा के हिसाब तक पहुंच चुकी है। 450 करोड़ अब भी विभाग की जद से दूर है। 80 फीसदी हिस्सा गुरुशरण का है, जबकि 20 प्रतिशत हिस्सा कान्हा का। इनकी रिपोर्ट भी अंतिम पढ़ाव पर है।

 
राजेंद्र सूरी साख सह. मर्या. :-
राजगढ़ में मुख्यालय। 31 अक्टूबर 2014 को हुआ सर्वे। 10 करोड़ का देसी हवाला मिला। 30 करोड़ के एफडीआर और कुछ खातों में 27 करोड़ रुपए जमा मिले। गुरुशरण में इसी संस्था का 150 करोड़ रुपया जमा मिला।

ओंकारेश्वर बांध 191 मीटर तक भरने की तैयारी

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Apr 10 2015 3:02AM | Updated Date: Apr 10 2015 3:02AM
  • facebook
  • twitter
  • googleplus
  • linkedin
विनोद शर्मा

इंदौर। बेमौसम बरसात के साथ हुई फसलों की भारी बर्बादी से पहले ही टूट चुके खंडवा, खरगोन, बड़वानी, धार के किसान कपास-मूंग की फसल के लिए आसमान ताक रहे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन के तमाम विरोध के बीच अब तीनों जिले के लाखों किसान एक सुर में बहुउद्देश्यीय ओंकारेश्वर डेम के जल स्तर को बढ़ाने की मांग करने लगे हैं। किसानों की मांग पर गुरुवार को नर्मदानगर में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) की महत्वपूर्ण बैठक हुई। इसमें बांध को एक बार फिर 191 मीटर तक भरने की तैयारी शुरू हो गई।
 
 
तकरीबन सात हजार करोड़ की लागत से बने ओंकारेश्वर बांध और उससे जुड़ी नहरें 2007-08 से शो-पीस की तरह किसानों का मुंह चिढ़ा रही हैं। न पर्याप्त पानी भरा गया। न ही नहरों को सही बहाव मिला। न खेतों तक पानी पहुंचा। कारण था नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) वालों का आंदोलन। जिसकी वजह से बांध भरने की क्षमता बढ़ाने की तैयारियां शुरू करके बार-बार बंद करना पड़ी। लगातार हुई अच्छी बरसात से किसानों को दिक्कत नहीं हुई। 2014-15 की अल्प वर्षा ने एनबीए का साथ देने वाले कई किसानों को बेकफुट पर ला दिया। अब वे एनवीडीए के साथ हो गए। 
 
 
ओंकारेश्वर बांध फायदे और भी...
कृषि उत्पादन में 1500 करोड़ की प्रतिवर्ष वृद्धि।
बहाव नहर से सिंचाई होने से बहुमूल्य विद्युत ऊर्जा की बचत।
मिगत जल स्तर में सुधार।
फल, फूल एवं सब्जियों के उत्पादन में अप्रत्याक्षित वृद्धि।
हर कमांड क्षेत्र के नदी नालों में पशुओं के लिये गर्मी में पेयजल उपलब्धता।
निमाड़ क्षेत्र के फसल चक्र में परिवर्तन।
र्याप्त चारा,पशुपालन उद्योग को प्रोत्साहन।
कृषि आधारित उद्योग धंधो में वृद्धि होने से जीवन स्तर में सुधार।
 
 
2.23 लाख एकड़ जमीन की बूझेगी प्यास  
तीनों केनाल का कमांड एरिया 1.715 लाख हेक्टेयर है। खण्डवा, खरगोन एवं धार जिलों के 678 ग्रामों के 146800 हेक्टेयर (362750 एकड़) क्षेत्र में सिंचाई होना है। 2 मीटर ज्यादा पानी भरने से इसमें से 90 हजार हेक्टेयर (2,23,394 एकड़) जमीन को सिंचाई के लिए पानी दिया जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट में फंसी सयाजी होटल की मनमानी मंजिलें

By Dabangdunia News Service | Publish Date: May 4 2015 3:00AM | Updated Date: May 4 2015 3:00AM
  • facebook
  • twitter
  • googleplus
  • linkedin
विनोद शर्मा
 
 
इंदौर। क्लब की मेम्बरशिप से लेकर बिल्डिंग परमिशन देने वाले अफसरों के खिलाफ ट्रायल का आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर की सयाजी होटल की नीव हिला दी है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि होटल निर्माण के लिए हाईराइज कमेटी ने 1810.04 वर्गमीटर ग्राउंड कवरेज मंजूर किया था। इसे रिवाइज के नाम पर निगम ने 4759.11 वर्गमीटर कर दिया। अंतर है सीधे 3476.25 वर्गमीटर का। हाईराइज कमेटी के वजूद को नकारकर निगम के बिल्डिंग आॅफिसर ने न सिर्फ इसकी अनुमति दी बल्कि सातवें ही दिन पूर्णता प्रमाण-पत्र भी पकड़ा दिया।
 
 
ये हैं कमेटी में
संभागायुक्त की अध्यक्षता वाली हाईराइज कमेटी में कलेक्टर, एसपी, नगर निगम आयुक्त, अधीक्षण यंत्री आईडीए, अधीक्षण यंत्री पीडब्ल्यूडी, संभागीय अभियंता बिजली वितरण कंपनी और संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश शामिल रहते हैं।
 
 
ऐसे मिलती है मंजूरी 
फायर फाइटिंग, पानी, बिजली और सीवरेज की प्राथमिकता तय करते हुए कमेटी निर्माण की मंजूरी देती है। सयाजी होटल को ऐसी ही अनुमति 23 दिसंबर 1993 को जारी हुई थी। तकरीबन तीन लाख फीट में फैले प्लॉट पर मल्टी स्टोरी होटल और क्लब का 1810.04 वर्गमीटर (19483 वर्गफीट) निर्माण मंजूर हुआ।
 
 
ऐसा था कारनामा
11 महीने बाद (22 नवंबर 1994) को सयाजी प्रबंधन ने नवीनीकरण का आवेदन लगाया, जिसे निगम के भवन अधिकारी जीएस जादौन ने 12 जनवरी 1995 को बिना सक्षम स्वीकृति के ही मंजूर कर दिया।
 
 
सात दिन में ही बन गई बिल्डिंग
होटल सयाजी के लिए हाईराइज कमेटी ने सबसे पहला नक्शा 23 दिसंबर 1993 को मंजूर किया था। 22 नवंबर 1994 को नवीनीकरण के लिए निगम में लगाया गया। तब तक निर्माण हो रहा था। रिवाइज नक्शा मंजूर हुआ 12 जनवरी 1995 को। यानी आवेदन के 51वें दिन। कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिया 19 जनवरी 1995 को। संशोधन के अनुसार निर्माण मूल मंजूरी के मुकाबले 262 प्रतिशत ज्यादा होना था। इससे साफ है कि होटल प्रबंधन ने वह निर्माण पहले ही कर लिया था, जिसकी मंजूरी उसे रिवाइज्ड प्लान में मिली।
 
 
फायर की भूमिका भी संदिग्ध
बिल्डिंग कम्प्लीट होने से पहले 18 अक्टूबर 1994 (यानी रिवाइज्ड प्लान के लिए आवेदन करने से महीनेभर पहले) फायर ने एनओसी दी। यानी फायर की एनओसी मूल निर्माण के लिए थी, जबकि 19 जनवरी 1995 को 267 प्रतिशत ज्यादा निर्माण हो चुका था। इसका फायर की फाइल में कोई जिक्र नहीं था। फिर भी फायर ने एनओसी रद्द करने में तीन साल (रद्द दिनांक 19 अक्टूबर 1997) लगा दिए। अतिरिक्त निर्माण के बावजूद फायर एनओसी रिवाइज्ड नहीं की 
गई।
 
 
एक नजर में सयाजी
मूल मंजूरी के अनुसार 1810.04 वर्गमीटर (19483 वर्गफीट)
संशोधन के बाद : 4759.11 वर्गमीटर (51226 वर्गफीट)
अंतर : 3476.25 वर्गमीटर
(37418 वर्गफीट)
संपत्ति कर : 5.45 लाख रुपए के संपत्ति कर को जादौन ने स्वयं और अपने परिवार के पांच सदस्यों को सयाजी क्लब की आजीवन सदस्यता लेकर माफ कर दिया।
 
 
सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं दी फाइल
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के पेरा नं. 10 में स्पष्ट कर दिया है कि संसोधन के नाम पर अधिकारियों ने मानदंडों के विपरीत अतिरिक्त निर्माण अनुमति दी। हमारे पास न तो सयाजी की मंजूरी के मूल दस्तावेज हैं और न ही रिवाइज्ड प्लान के। हमारे पास निर्माण की सीमित जानकारी उपलब्ध है।

साहब, हमें विंग से मुक्ति दे दो...

विनोद शर्मा
इंदौर। श्रीमान्, हमें सिफारिश से नहीं बल्कि मेरिट के आधार पर एंटी इवेजन विंग की जिम्मेदारी मिली थी। विंग को मलाई का डिब्बा समझने वाले आला अधिकारियों को न हम समझ आए, न हमारा काम। हमारे काम में अडंगा ही उनकी ड्यूटी रह गया। हम शहर के टैक्स चोरों से लड़ सकते हैं, अपने विभाग के अफसरों से नहीं, इसीलिए आप से निवेदन है कि आप तो हमें एंटी इवेजन विंग की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दें। यह हाल है वाणिज्यिक कर की एंटी इवेजन विंग, इंदौर का। तबादले का काउंटडाउन शुरू होते ही जहां जाने के लिए अधिकारियों में मारामारी मची है, वहीं मौजूदा अफसर सालभर से आयुक्त से कुछ इसी अंदाज में विंग से मुक्ति की गुहार कर रहे हैं।
 
 
प्रभारी और उपायुक्त को कुर्सी से चिढ़
एंटी इवेजन विंग के अधिकारियों की अपनी कुर्सी से चिड़चिड़ाहट बढ़ी 2014 की शुरूआत में। दोनों ही विंग के प्रभारी और उपायुक्त अपनी कुर्सी बदलने की मांग कर चुके हैं। अधिकारी इसकी वजह फरवरी 2015 में रिटायर हुए विभागीय संचालक प्रवीण बागड़ीकर को बताते हैं। उनकी मानें तो तत्कालीन आयुक्त अमित राठौर के नजदीकी रहते बागड़ीकर ने विंग के लिए अपने चहेते अधिकारियों में चाह जगाई। अफसरों का आरोप है कि बागड़ीकर स्वयं हमारी शिकायत आयुक्त को करते और बाद में आयुक्त को लगातार शिकायत मिल रही है कहकर हम पर कार्रवाई के लिए दबाव बनवाते। उन्हें उम्मीद थी कि उनके प्रयासों से टीम बदलेगी, इसीलिए उन्होंने विंग में पद दिलाने के प्रस्ताव बनाकर भी भेजे। कहा कि नए लोगों को मौका मिलना चाहिए। ट्रांसफर पर लगी रोक के कारण वे अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए। इसके बाद भी उनकी शिकायतों का सिलसिला जारी रहा।
 
 
टांग खिंचाई से खिन्न
टैक्स कलेक्शन का टारगेट, सर्च-सर्वे की टेंशन, मैदानी अमले की कमी और आला अफसरों द्वारा की जा रही टांग खिंचाई ने इतना खिन्न कर दिया था कि अंतत: विंग अधिकारियों ने ही कुर्सी से हाथ जोड़ लिए। उपायुक्त वी.एस.भदौरिया, श्री सोनवलकर, अलका डामोर व अन्य अधिकारी इस संबंध में आला अधिकारियों को चिट्ठी लिख चुके हैं।
 
 
जहां 15 अधिकारी रहते थे, वहां छोड़े तीन
विंग अधिकारियों ने तत्कालीन अफसरों पर यह भी आरोप लगाए थे कि जिस विंग में कभी 15-15 अधिकारी होते थे, वहीं षड्यंत्रपूर्वक तीन वर्षों में अधिकारी दिए गए तीन-चार। विंग ‘ए’ में भदौरिया के साथ तीन अन्य अधिकारी हैं। जिनमें दो महिलाएं हैं। अलका डामोर बीमारी का हवाला देते हुए विंग से मुक्ति का लिख चुकी है। वहीं दूसरी अधिकारी भी बीमार हैं। यही स्थिति विंग-बी की है, यहां तो विंग संभालने वाला ही
नहीं है। विंग में अमले की कमी से छापेमार कार्रवाइयों का ग्राफ घटा, वहीं मैदानी अमले को टैक्स चोरों की दादागीरी का सामना भी करना पड़ा। अलका डामोर ने जिनकी गाड़ी पकड़ी थी उन्हीं ने उनके साथ धक्कामुक्की की। गाड़ी की चाबी और मोबाइल ले गए।
 
 
हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था
विंग के अधिकारी विंग मुक्ति के लिए अपनी बात रखते हुए यह भी कह चुके हैं कि इंदौर जैसे शहर में टैक्स चोरों पर छापा मारना और टैक्स वसूलने से ज्यादा टेंशन दायक है अफसरों की आंखों की किरकिरी बने रहना। क्योंकि टैक्स चोरों से तो लड़ झगड़कर हम जैसे-तैसे टैक्स ले आएंगे लेकिन गलतियां निकालने के आदी हो चुके अफसरों के सवालों के जवाब देना भारी पड़ जाएगा।

खजाना खाली, खुद खौफ में खौफ दिखाने वाले अफसर


विनोद शर्मा इंदौर। आयकर, सेंट्रल एक्साइज और वाणिज्यिक कर...। आम आदमी, व्यापारी और उद्योगपतियों की नींद उड़ाने वाले इन विभागों की हालत इन दिनों पतली है। पतली हो भी क्यों न? टार्गेट के मुकाबले वसूली के लिए पूरी ताकत झोंकने के बावजूद तीनों विभाग वसूली से करीब 2000 करोड़ रुपए पीछे रह गए। अब दिक्कत है जवाब की, जो सीबीडीटी, सीबीईसी या फिर वित्त मंत्रालय को देना है।
31 मार्च बीतने के साथ ही वित्त वर्ष 2014-15 का लेखा-जोखा भी करीब- करीब बंद हो चुका है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा तय किए गए टारगेट को पूरा करने में आयकर, सेंट्रल एक्साइज और वाणिज्यिक किसी ने भी कसर नहीं छोड़ी। 31 मार्च को आयकर के कैश काउंटर रात 11 बजे तक चालू रहे। इसके अलावा नियमित काउंटर्स की संख्या अलग बढ़ा दी गई थी। इसके बावजूद इनकम टैक्स 2550 करोड़ के टारगेट से दूर रहा।
 
 
 
मंदी के कारण घटाया गया था टारगेट, फिर भी दूर
बताया जा रहा है कि इनकम टैक्स, वैल्थ टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स और टीडीएस सभी जगह विभाग की हालत खस्ता है। इसीलिए विभाग टारगेट से करीब-करीब 400 करोड़ रुपए तक दूर रह सकता है। हालांकि अंतिम आंकड़े 5 अपै्रल तक ही सामने आएंगे। आयकर की स्थिति देशभर में यही है। देश के लिए सीबीडीटी ने 7.36 लाख करोड़ का टार्गेट दिया था। जिसे मंदी देखते हुए घटाकर 7.06 करोड़ कर दिया था। 30 मार्च तक वसूली हुआ करीब-करीब 6.30 लाख करोड़। यानी एक लाख करोड़ अभी भी दूर।
 
 
वाणिज्यिक कर को 1000 करोड़ का फटका
वाणिज्यिक कर विभाग को 22770 करोड़ रुपए का टार्गेट मिला था। सालभर की छापेमार कार्रवाई और पेट्रोल-डीजल जैसी जरूरत पर वेट बढ़ाकर भी विभाग टारगेट तक नहीं पहुंच पाया। अधिकारिक सूत्रों की मानें तो तमाम कोशिशों के बावजूद वसूली का आंकड़ा 21700 करोड़ से ऊपर नहीं रहा। करीब 1000 करोड़ रुपए से पिछड़कर वाणिज्यिक कर विभाग ने वित्त मंत्रालय का गणित भी गड़बड़ा दिया है।
 
 
अस्सी प्रतिशत ही वसूला
कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एवं सर्विस टैक्स सेंट्रल बोर्ड आॅफ एक्साइज एंड कस्टम (सीबीईसी) ने आयुक्त कार्यालय, इंदौर और ग्वालियर को मिलाकर जो कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एवं सर्विस  टैक्स वसूली टारगेट दिया था वह शत प्रतिशत नहीं रहा। करीब-करीब 80 प्रतिशत ही राशि वसूल हो पाई।
 

गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन में दिल्ली से आगे इंदौर

विनोद शर्मा-  
इंदौर। सड़क और पार्किंग जैसी बुनियादी सहूलियतों के संकट के बावजूद मप्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर आबादी के अनुपात में वाहनों की उपलब्धता के मामले में देश की राजधानी दिल्ली और मायानगरी मुंबई को भी पीछे छोड़ चुका है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा बीते दिनों जारी वार्षिक रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार प्रति हजार व्यक्ति वाहनों की उपलब्धता के मामले में चंडीगढ़ पहली पायदान पर है, जबकि इंदौर चौथी पर। दिल्ली नौवें क्रम पर है।

ऐसे हुआ खुलासा
मंत्रालय ने आंकड़ों का खुलासा ईअर बुक 2014 में किया। बुक में सड़क और वाहनों से संबंधित कई तरह के सर्वे हैं। इसी कड़ी में एक सर्वे  रिपोर्ट 31 मार्च 2012 तक की भी शामिल है। रिपोर्ट में देश के प्रमुख 16 शहरों में आबादी के अनुपात में वाहनों की उपलब्धता का सर्वे किया गया था। इसके अनुसार प्रति 1000 व्यक्ति इंदौर में 617 वाहन पंजीबद्ध हैं। यहां 13 लाख वाहन पंजीबद्ध हैं। इनमें प्रति हजार व्यक्ति पर 70 कार-जीप पंजीबद्ध है, जबकि 471 दोपहिया वाहन हैं। इससे पहले जो रिपोर्ट आई थी, उसमें जिन 16 शहरों का सर्वे हुआ था उनमें कोयम्बटूर के बाद इंदौर दूसरे क्रम पर था।


हर दूसरे व्यक्ति के पास वाहन
इंदौर जिले की आबादी 35 लाख है और वाहन पंजीबद्ध हैं करीब 15 लाख। यानी करीब-करीब हर दूसरे व्यक्ति के पास वाहन है। सबसे ज्यादा वाहनों की उपलब्धता नगरीय क्षेत्र में है। हालात यह है कि शहर में वाहन ज्यादा हैं और रखने के लिए जगह कम। इसीलिए जाम लगता है।


लोक परिवहन ने प्रभावित नहीं किया 2005 में सिटी बस सेवा शुरू की गई थी। मकसद था इंदौर में पंजीबद्ध होने वाले वाहनों की संख्या में बेहिसाब बढ़ोतरी को रोकना। 10 साल हो चुके हैं पर वाहनों के पंजीयन का ग्राफ जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। इसकी बड़ी वजह लोक परिवहन की खामियां और सफर में लगने वाले समय के साथ कई स्थानों तक लोक परिवहन की पहुंच न होना।


नौवें क्रम पर है दिल्ली
दिल्ली की आबादी 16.30 मिलियन है और वाहनों की 7.4 मिलियन। प्रति हजार व्यक्ति पर 451 वाहन हैं। इसमें से 286 दोपहिया वाहन हैं और 137 कार हंै। वाहनों की एकमुश्त संख्या के मामले में दिल्ली बाकी शहरों से आगे है, लेकिन आबादी अनुपात के लिहाज से दिल्ली से ज्यादा कारें चंडीगढ़ में है। दो पहिया इंदौर से भी कम है।

ग्रीन बेल्ट पर बना डाला स्कूल

विनोद शर्मा इंदौर। ग्राम बांक में प्रशासन की आंखों के सामने ग्रीन बेल्ट स्कूल पर भव्य सार्इं श्री इंटरनेशनल स्कूल (एसएसआईएस) बन गया। इसकी शिकायत पटवारी-आरआई से लेकर कलेक्टर तक की जा चुकी है। हालांकि अब तक कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ। उक्त स्कूल की दो दिन पहले दोबारा शिकायत हुई। शिकायत के अनुसार धार रोड पर ग्राम बांक है। इस गांव में सर्वे नं. 20/1/मिन-1 की 1.122 हेक्टेयर जमीन मुमताज पति जलील एहमद कुरैशी निवासी 37 बी चंदननगर के नाम दर्ज है। 1 जनवरी 2008 को जारी हुए मास्टर प्लान 2021 में उक्त सर्वे नंबर भी ग्रीन बेल्ट है। इसके बाद भी इस जमीन पर कुरैशी दंपत्ति ने दोमंजिला स्कूल बना दिया है। ... इसलिए अवैध है निर्माण मप्र भूमि विकास अधिनियम-2012 ग्रीन बेल्ट के लिए आरक्षित की गई या छोड़ी गई जमीन पर किसी भी तरह के निर्माण की इजाजत नहीं देता। मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट रिक्रेशन के रूप में परिभाषति है। इसमें प्री-प्राइमरी, नर्सरी स्कूल, प्राइमरी स्कूल, सेकंडरी स्कूल, सीनियर सेकंडरी स्कूल के निर्माण को अस्वीकार किया गया है। यानी इस जमीन का न नक्शा पास हो सकता है। न ही डायवर्शन हो सकता है। फिर भी निर्माण होता है तो वह अवैध है। ऐसा है स्कूल जमीन कुल एक लाख 20 हजार 771 वर्गफीट है। राजस्व अभिलेखों में जमीन का भू-उपयोग स्पष्ट नहीं है। इसमें बड़ा हिस्सा गार्डन की तरह छोड़ा गया है। इसी तरह स्कूल भवन के पीछे का हिस्सा पक्के प्ले ग्राउंड की तरह बनाया गया है। दो बड़े हिस्सों में स्कूल भवन बना है। सामने कांकड़ की जमीन (सर्वे नं. 21/1) है, जिसका इस्तेमाल स्कूल प्रबंधन द्वारा पार्किंग के लिए किया जा रहा है। यहां कार्रवाई क्यों नहीं ग्रीन बेल्ट में बिना अनुमति के इतना भव्य स्कूल बन गया और किसी को पता ही नहीं चला, यह संभव ही नहीं है। स्कूल एक-दो दिन में नहीं बना, इससे बनने में दो साल लगे। यदि जानकारी नहीं थी तो भी अब जब लगातार शिकायत कर रहे हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। यहां तो कर दी थी कार्रवाई मार्च 2015 में जिला प्रशासन और नगर निगम ने मिलकर ग्रीन बेल्ट में बने निर्माण तोड़े। अन्नपूर्णा रोड पर शनिवार को तालाब के पीछे ग्रीन बेल्ट की जमीन पर बने आठ फार्म हाउस विस्फोट से उड़ाए। अहिरखेड़ी में मो. खम्बाती का फार्म हाउस तक तोड़ दिया। 14 मई 2015 को भी अन्नपूर्णा रोड पर ग्रीन बेल्ट की जमीन पर अवैध रूप से बनी चार दुकानों को शुक्रवार को नगर निगम की गैंग ने तोड़ा। -बंटी तोलानी, शिकायतकर्ता मैं क्षेत्र में कुछ समय पहले ही आया हूं। जैसे ही मुझे पता चला, मैंने आला अधिकारियों को इसकी जानकारी भेज दी। -मनीष बांगर, पटवारी, बांक जल्द हटाएंगे शिकायत के आधार पर हमने जांच करवाई थी। जांच में पुष्टि हो चुकी है कि स्कूल ग्रीन बेल्ट पर है। इसीलिए ग्रीन बेल्ट से स्कूल हटाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस संबंध में बांक पंचायत को भी पत्र लिख चुके हैं। -संदीप सोनी, एसडीएम