Tuesday, December 7, 2010

कठिन डगर पर 'कॉरिडोरÓ


-निगम के पास न वित्तीय प्रबंधन, न अतिक्रमणकर्ताओं से निपटने का जिगरा और न उन्हें विस्थापित करने की जमीन
- सीधी सपाट बीआरटीएस-फीडर रोड ने छुड़ाए पसीने

इंदौर, विनोद शर्मा।
महापौर के ऐतराज के बावजूद 90 करोड़ की मंजूरी देकर केंद्र ने रिवर साइड कॉरिडोर की नैया नगर निगम के हवाले कर दी। 284 करोड़ का प्रस्ताव देने वाले निगम को राज्य के 36 करोड़ के बाद 160 करोड़ अपना खजाने से खर्च करना होंगे वह भी उस स्थिति में जब पहले ही उसकी वित्तीय स्थिति डामाडोल है। सीवरेज प्रोजेक्ट और नर्मदा तृतीय चरण की स्वीकृत राशि और टेंडर के बीच भारी अंतर की भरपाई की मार झेल रहा निगम कॉरिडोर को किनारे लगा पाएगा ये कह पाना मुश्किल है। जानकार कहते हैं निगम पहले बाधक परिवारों की व्यवस्था करे। बाद में कॉरिडोर की। उधर, निगम प्रशासन तमाम दिक्कतों को नकार रहा है।
आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो केंद्र के 90 करोड़ और रा'य के 36 करोड़ के बाद योजना के लिए 284 करोड़ का आंकलन करने वाले निगम को 154 करोड़ रुपए जेब से लगाएगा। तमाम टैक्स और सरकारी अनुदानों के बाद सालाना 400 करोड़ का वास्तविक बजट बनाने वाली निगम के लिए रास्ता मौजूदा परिस्थितियों में मुश्किल है। क्योंकि सीवरेज 317 करोड़ की स्वीकृति अपना 30 प्रतिशत (95.1 करोड़) अंश मिलाने के बाद वर्कऑर्डर 442 करोड़ में गया। 30 प्रतिशत अंश मिलाने के बाद सीवरेज प्रोजेक्ट में 125, नमृदा तीसरे चरण में 75 करोड़, बीएसयूपी में 60 और यशवंतसागर में पांच करोड़ की भरपाई निगम की कमर तोड़ चुकी है।
वित्तीय प्रबंधन की बात छोड़ भी दें तो शहरवासी यह सोचकर परेशान हैं कि सीधे-सपाट बीआरटीएस कॉरिडोर और फीडर रोड को वक्त पर पूरा करने में नाकाम रहा प्रशासन आड़ी-तिरछी नदी पर कैसे पार पाएगा। तीन साल से 315 करोड़ की इस योजना को बनाकर बैठे निगम के पास न वोटबैंक बन चुके भागीरथपुरा-कुलकर्णी भट्टा-शेखरनगर के चार हजार लोगों को बेदखल करने का जिगरा है। न ही उन्हें विस्थापित करने के लिए जमीन।
संवारना होगी 19 ब्रिजों की सूरत
नहरभंडारा से चंद्रगुप्त प्रतिमा के बीच 14.50 किलोमीटर के टूकड़े में 19 ब्रिज बनाना होंगे। इनमें माणिकबाग, गुलजार कॉलोनी, गुरुनानक कॉलोनी, लालबाग, जयरामपुर, कड़ावघाट, म'छीबाजार, हरसिद्धि, चंद्रभागा, जवाहरमार्ग, किशनपुरा, रामबाग, लोखंडे, पोलोग्राउंड, कुलकर्णी भट्टा, भागीरथपुरा और गौरीनगर पुल शामिल हैं। कॉरिडोर के लिए इन पूलों की सूरत संवारने के साथ निगम को सैफीनगर क्रॉसिंग और लक्ष्मीनगर रेलवे अंडर ब्रिज का ध्यान भी रखना पड़ेगा।
अड़चनों की 'रिवरÓ
चंद्रगुप्त से गौरीनगर पुल :- 1.75 किलोमीटर लंबे दोनों छोर खाली।
गौरीनगर से भागीरथपुर :- 850 मीटर खाली। 1.4 किलोमीटर एक ओर से।
भागीरथपुरा से कुलकर्णी भट्टा:- 441 मीटर दोनों ओर से। 750 एक ओर से।
कुलकर्णी भट्टा से पोलोग्राउंड :- 600 मीटर दोनों ओर से। 230 मीटर में कोने पर कारखाना और होप मिल की दिवार।
पोलाग्राउंड से लोखंडे पुल:- 600 मीटर दोनों ओर। कुछ हिस्से में निर्माण।
लोखंड से रामबाग:- 600 मीटर में रामबाग की ओर निर्माण। दूसरी तरफ निगम का मटन मार्केट।
रामबाग से किशनपुरा:- 400 मीटर में पालिवाल धर्मशाला सहित निजी निर्माण तो दूसरी तरफ निगम का शिवाजी मार्केट।
किशनपुरा-जवाहरमार्ग :- 200 मीटर दोनों छोर से साफ। बाकी 200 मीटर में एक तरफ निर्माण।
जवाहरमार्ग से हरसिद्धि:- एक किलोमीटर में दोनों तरफ कबूतरखाना, नार्थ तोड़ा और शेखरनगर जैसी बस्तियां। कुछ हिस्से में रोड भी।
हरसिद्धि से म'छीबाजार- 400 मीटर में एक तरफ सड़क दूसरी तरफ मार्केट।
म'छीबाजार से कड़ावघाट :- 300 मीटर में दोनों ओर बस्ती। 90 मीटर खाली।
कड़ावघाट से जयरामपुर कॉलोनी :- 400 मीटर में कहीं-कहीं निर्माण।
जयरामपुर से लालबाग:- 700 मीटर में दोनों ओर क'चे-पक्के निर्माण।
लोकमान्य से सैफीनगर :- 550 मीटर में एक तरफ निर्माण।
माणिकबाग से नहरभंडारा :- 1.25 किलोमीटर में दोनों छोर खाली।
- : सिकुड़ गई नदी :-
लालबाग से लोकमान्यनगर :- 1 किलोमीटर सकरी है नदी। कुछ निर्माण भी।
सैफीनगर से माणिकबाग :- 800 मीटर में नदी आधी सकरी। आधी के एक हिस्से में निर्माण।
भागीरथपुरा :- पुल से गौरीनगर की ओर सौ मीटर में नदी सकरी।
-: ये भी बाधा :-
-- कड़ाव घाट का डेम
-- किशनपुरा पैदल पुल
-- शिवाजीमार्केट पैदल पुल
जमीनी हकीकत से दूर है प्रोजेक्ट
मैदानी हकीकत से कोसों दूर इस प्रोजेक्ट में इंदौर का कम, नेताओ-अधिकारियों का हित ज्यादा है। न रोड की फिजिब्लीटी जांची गई। न ही जमीन अधिग्रहण की रीति-नीति तैयार की। बाधक में बस्तियों के साथ पक्के निर्माण भी है इनका क्या होगा। इसकी रणनीति नहीं। सडक का मोबेलिटी प्लान भी तैयार नहीं किया गया जो यह बता सके कि इस सडक पर कहां का ट्रेफिक चलेगा।
अतुल सेठ, इंजीनियर
मुश्किल लग रहा है, है नहीं
निगम के वित्तीय मामलों से ताल्लुक रखने वाले जानकारों की मानें तो कॉरिडोर के लिए तीन साल की समयसीमा तय है लेकिन काम पूरा करने में चार-पांच साल लगेंगे। तक आय बढ़ाकर पैसा निकालना मुश्किल नहीं है। इससे पहले नमृदा तृतीय चरण के 75 में से 60 और यशवंत सागर के पांच में से दो करोड़ भी निगम दे चुका है।
किस्मत से मिली मदद
नदी के कारण प्रदूषण बढ़ा जिससे निपटने के लिए आज नहीं तो पांच साल बाद निगम को पैसा लगाना पड़ता। शुक्र है कि आज केंद्र-रा'य से 126 करोड़ की मदद तो मिल रही है। प्रोजेक्ट में कुछ कंपोनेंट ऐसे हैं जिन पर निगम पहले ही काम कर रहा है। जैसे 19 ब्रिज में से 4 निगम बना रहा है। एक किलोमीटर में नदी जहां सकरी है वहां बसें बायपास करेंगे। रहा सवाल तीन हजार बसाहट का तो निगम बेसिक सर्विस फॉर अर्बन पुवर के तहत दो चरणों गरीबों के लिए मकान बना ही रहा है। वहां शिफ्ट कर देंगे। इसके लिए 82 करोड़ की मंजूरी मिल चुकी है। वैसे भी नदी से 30 मीटर के दायरे में निर्माण मान्य नहीं है। एफएआर बढ़ाकर क्षेत्र को कमर्शियल कॉरिडोर के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।
हितेंद्र मेहता, आर्किटेक्ट
नहीं आएगी बाधा, ये है मेरा वादा
ऐतराज के बाद हमने रिवाइज प्लान भेजा था। पहले प्रोजेक्ट 315 करोड़ का था। उसे पूरा करने जाते तो 400 करोड़ भी कम पड़ते। उधर, केंद्र 90 करोड़ रुपए देकर बैठ जाता। शुक्रवार को रिवाइज प्लान मंजूर हुआ। जिसकी लागत 205 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र और रा'य के अंशदान के बाद निगम को 45-50 करोड़ ही मिलाना पड़ेंगे। अतिक्रमण को लेकर बीआरटीएस और रिवर कॉरिडोर की तुलना नहीं की जा सकती। वहां लड़ाई स्वामित्व की जमीन की थी और यहां सरकारी जमीन पर कब्जा लेने की। इसीलिए मैं विश्वास दिलाता हूं कि प्रोजेक्ट में दिक्कत नहीं आएगी।
कृष्णमुरारी मोघे, महापौर

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