
-- स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के एसबीआई में विलय के बाद बढ़ी उपभोक्ताओं की फजीहत
-- इंदौर बैँक के मुकाबले सहुलियतें कम, सशुल्क सेवाएं कम कर रही उपभोक्ताओं की जेब हल्की
इंदौर, विनोद शर्मा।
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के विलय के साथ बड़ी बैंक से जूड़कर ज्यादा सहूलियतों की उम्मीद लगाए बैठे उपभोक्ताओं के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अब तक 'ऊंची दुकान-फीके पकवानÓ ही साबित हुआ है। एसबीआई ने नई सुविधा-सहुलियतें तो नहीं दी। अलबत्ता, स्टेट बैंक ऑफ इंदौर की परम्परागत रियायतों की राह भी रोक दी। सेवाओं का शुल्क जो लेना शुरू किया तो सबसे बड़ी बैंक के साथ का सुख धरा रह गया और आखिरकार उपभोक्ताओं को इंदौर बैंक याद आ गई। यही हाल उन अधिकारियों का भी है जो ऊंचे ओहदे के कारण कभी कॉलर ऊंची करके चलते थे लेकिन आज एसबीआई के अधिकारियों का हुक्म बजाते नजर आते हैं।
देशभर में इंदौर का नाम रोशन रखने वाली स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के विलय के साथ जताई जाने वाली उपभोक्ताओं और स्टॉफ की फजीहत की आशंका आज कड़वी हकीकत के रूप में सामने आ रही है। बड़ी बैंक का फायदा बड़े उपभोक्ताओं को मिला हो या न मिला हो लेकिन छोटे और सामान्य उपभोक्ता आज परेशान हैं। उपभोक्ताओं की जुबानी और हाल-ए-हकीकत मानें तो विलय के तीन महीने बाद भी एसबीआई की स्टेशनरी शाखाओं तक नहीं पहुंची। शाखाएं और एटीएम तो बढ़े लेकिन उपभोक्ताओं की सहुलियत के लिहाज से एसबीआई उन्हें मेंटेन नहीं कर पाया। नतीजा कहीं केश जमा करने की व्यवस्था बदहाल है तो कहीं केश निकालने की। दूसरी शाखा में लेन-देन सशुल्क कर दिया सो अलग। फिर मुद्दा पासबुक बनाने का हो या नकद जमा कराने का। प्रक्रिया की पेचिदगियां बड़ी दिक्कत साबित हुई जिसके कारण लोन और चेक क्लीयरिंग में देर उपभोक्ताओं का सिरदर्द बढ़ा दिया है।
उधर, विलय से पहले तक खुली मुखालफत करने वाले इंदौर बैंक के अधिकारी-कर्मचारी अब एसबीआई के मातहत हैं। इसीलिए वे खुलकर तो नहीं बोलते लेकिन दबे स्वर में एसबीआई की नीतियों की हकीकत बयां करते नजर आते हैं। उनकी मानें तो एसबीआई ने इंदौर बैंक के स्टॉफ के साथ सौतेला व्यवहार शुरू कर दिया है। हमें एसबीआई स्टाफ के मुकाबले सहुलियतें कम दी जा रही है। उलटा हमारी सीनियरिटी घटा दी सो अलग।
एसबीआई से तो इंदौर बैंक ही ठीक था
अब तक नाम बड़े, दर्शन..। वाली स्थिति है। विलय से पहले सहुलियतों का जो सपना दिखाया जा रहा था वह झूठा साबित हुआ। कई सेवाओं और सामाजिक दायित्वों के मामले में इंदौर बैंक एसबीआई के मुकाबले बीसी ही साबित हुई है।
खलील अहमद निजामी, उपभोक्ता
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का हेड ऑफिस इंदौर में स्थित है, जबकि भारतीय स्टेट बैंक ऑफ का सेंट्रल ऑफिस मुंबई में है। विलय के साथ इंदौर बैंक का प्रधान कार्यालय बंद होने का खामियाजा कॉर्पोरेट हॉउसेस और उद्यमी चुका रहे हैं। उनके काम वक्त पर नहीं होते।
रामगोपाल दीक्षित, उपभोक्ता
प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल के मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया दोनों करीब-करीब एक समान है थी। इंदौर बैंक वह सभी प्रौद्योगिकीकृत सुविधाएँ दे रहा था जो एसबीआई मुहैया करा रहा है। इससे आम ग्राहकों को कोई नई एडेड सर्विस नहीं मिली।
जगदीश गड़वाल, उपभोक्ता
शेयरधारकों की नजर से नुकसान
इंदौर बैंक के मध्यप्रदेश में निवासरत अंशधारक अब तक बैंक की इंदौर में होने वाली वार्षिक साधारण सभा में अपनी राय जाहिर करते थे। विलय के बाद उन्हें ये सुविधाएं नहीं मिल रही है। एसबीआई के शेयरधारकों की बैंठक तो केवल मुंबई, कोलकाता और अन्य महानगरों में ही आयोजित की जाती है। जहां जाना हर किसी के लिए संभव भी नहीं।
उपभोक्ताओं की दिक्कत
1- काम जिस गति से होता था अब नहीं हो रहा है। प्रक्रिया बढ़ी है।
2- लोन स्वीकृति जटिल होने से वक्त 'यादा लगने लगा।
3- चेक क्लीयरिंग में भी चार-चार दिन लगते हैं। लोग वक्त पर पैसों का लेन-देन नहीं कर पाते।
4- एक शाखा का उपभोक्ता यदि दूसरी शाखा से पास बुक प्रिंट कराता है तो अब दस रुपए देना पड़ते हैं जबकि पहले कोई शुल्क नहीं था।
5- दूसरी शाखा में नकद जमा कराने पर 25 रुपए का शुल्क देना पड़ता है जो स्टेट बैंक ऑफ इंदौर में नहीं लगता है।
6- बड़ी मात्रा में नकद जमा करने वाले उपभोक्ताओं को प्रति बंडल 25 रुपए का शुल्क चुकाना पड़ रहा है। इससे बड़े व्यापारी भी परेशान हैं।
7- करंट खाते के लिए न्यूनतम बैलेंस 5 हजार रुपए तय है जबकि पहले एक हजार रुपए था। इससे ग्रामीण क्षेत्र और छोटे उपभोक्ताओं को अब पांच हजार रुपए तक जमा रखना पड़ रहे हैं वह भी उस स्थिति में जब करंट खाते में ब्याज नहीं मिलता।
स्टाफ की नजर में मर्जर
1- मर्जर के तीन महीने बाद भी एसबीआई की स्टेशनरी शाखाओं तक नहीं पहुंची। इंदौर बैंक की स्टेशनरी से ही चल रहा है काम।
2- विलय के बाद काम बदला। नियम बदले। तरीके बदले लेकिन स्टाफ को प्रशिक्षण नहीं दिया। सिर्फ बोर्ड बदल दिया।
3- इंदौर बैंक का इंदौर में हेड ऑफिस था। अब हेड ऑफिस और जोनल ऑफिस भी बंद कर दिया।
4- इंदौर बैंक में एमडी स्तर के लोग बैठते थे जो हर स्तर के निर्णय के लिए सक्षम थे। विलय के बाद दारोमदार एसबीआई के सहायक महाप्रबंधक स्तर के अधिकारियों के कंधों पर आ गया जिनका अधिकार क्षेत्र कम है। उन्हें हर बड़े काम की मंजूरी के लिए फाइल भोपाल या मुंबई भेजना पड़ती है।
5- बड़ी बैंक से जूडऩे के बावजूद स्टाफ के आर्थिक लाभ बढऩे के बजाय कम हुए हैं। भत्ते और सुविधाएं जो इंदौर बैंक द्वारा स्थानीय स्तर पर दी जाती थी विलय के बाद बंद हो गई हैं।
6- विशेष क्षतिपूरक भत्ते और सीधी भर्ती के अधिकारियों को चार अतिरिक्त इंक्रीमेंट जैसी सहुलियतें एसबीआई ने इंदौर बैंक के लोगों को नहीं दी।
7- लोन लेने वाले स्टॉफ को इंदौर बैंक जो ब्याज दर में जो रियायत देती थी वह भी एसबीआई ने बंद कर दी। बैंक प्रबंधन कहता है पुराना खाता बंद करो। नए सिरे से लोन लो तब कहीं रियायत देंगे।
8- इंदौर बैंक के स्टॉफ की वरिष्ठता भी कम हुई है। आला प्रबंधन की तीन साल और वरिष्ठ श्रेणी की दो साल और कनिष्ठ श्रेणी के लोगों की सीनियरिटी एक साल कम कर दी।
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