Thursday, December 15, 2016

एक अधिकारी ने नोटिस दिया, दूसरे ने किनारा कर लिया

इंदौर. विनोद शर्मा।
टॉवर चौराहे पर  भाजपा नेता रमेश गोधवानी के टाइम्स स्क्वेअर को 53 अवैध बताकर 8 सितंबर को नोटिस थमाने वाले जोन-18 के भवन अधिकारी का कुछ दिन बाद ही ट्रांसफर हो गया, इसीलिए अब नए भवन अधिकारी मामले में हाथ डालने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे हैं। वह भी तब जबकि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और हाईकोर्ट के निर्देशानुसार ही नगर निगम को रिमुवल की कार्रवाई करना है।
टॉवर चौराहा स्थित सिद्धि विनायक कंस्ट्रक्शन डेवलपर्स तर्फे विनीत गोधवानी के प्लॉट नं. 1 पर गोधवानी व भागीदारों ने मनमाने ढंग से टाइम्स स्क्वेअर बिल्डिंग तान दी। इसका खुलासा दबंग दुनिया ने 3 अक्टूबर को ‘फुटपाथ पर आ गया टॉवर चौराहे का टाइम्स’ शीर्षक से किया था। 53 फीसदी अवैध निर्माण करने वाले गोधवानी और उनके गुर्गों ने कार्रवाई की बारी आते ही नगर निगम के खिलाफ मई 2015 को हाईकोर्ट में याचिका (डब्ल्यूपी3093/2015) लगा दी। 1 सितंबर 2015 को फैसला देते हुए कोर्ट ने  निगम को संयुक्त निरीक्षण कर बिल्डिंग जांचने और अवैध निर्माण पर रिमूवल के आदेश दिए थे। इसके विपरीत निगम ने सिर्फ संयुक्त निरीक्षण कर मौका व पंचनामा रिपोर्ट ही बनाई।
372 दिन लग गए जांच करके नोटिस देने में
अवैध निर्माण को लेकर निगम की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1 सितंबर 2015 को हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश पर संयुक्त जांच करके रिपोर्ट तैयार करके नोटिस देने में मैदानी अमले ने 372 दिन लगा दिए। नोटिस सर्व हुआ 8 सितंबर 2016 को। इसमें स्वीकृति और निर्मित निर्माण की समीक्षा कर 286 वर्गमीटर का अंतर निकाला गया।
नोटिस दिया, अब कार्रवाई कब
जांच में 372 दिन लगाने वाले अधिकारी नोटिस देने के 97 दिन बाद भी रमेश गोधवानी और उनके गुर्गों को अवैध निर्माण ध्वस्त करने संबंधित नोटिस नहीं दे पाए। न ही किसी तरह की रिमुवल कार्रवाई की कोशिश की गई। आजकल सब नगर निगम आयुक्त ही देखते हैं यह कहते हुए भवन अधिकारी और मैदानी स्टाफ टाइम्स स्क्वेअर से किनारा करता नजर आता है।
तीन करोड़ बचाने के लिए भर रहे हैं अधिकारियों की जेब
बिल्डिंग में 3072.71 वर्गफीट निर्माण अवैध रूप से हुआ है। चूंकि मामला मूल टॉवर चौराहे का है, जहां जमीन का मार्केट दाम 10 हजार वर्गफीट से अधिक है। इस लिहाज से गोधवानी एंड टीम के मनमाने निर्माण की बाजार कीमत ही 3.07 करोड़ रुपए है। यदि इस अवैध निर्माण पर नगर निगम हथौड़े बरसाता है तो बिल्डिंग के साथ ही रमेश गोधवानी का राजनीतिक व सामाजिक गणित भी गड़बड़ा जाएगा। इसीलिए वे अफसरों की खुशियों का ध्यान रख रहे हैं ताकि उनकी खुशी बनी रहे।
यह है कंपनी के भागीदार
सिद्धि विनायक कंस्ट्रक्शन डेवलपर्स भागीदारी फर्म है। इसमें विनित गोधवानी, जयेश बुधवानी, राजेश खुबानी और कृष्णा रमानी भागीदार हैं।
10 फीसदी से ऊपर कंपाउंडिंग नहीं हो सकती
नोटिस थमाने वाले एक अधिकारी ने बताया कि गोधवानी बिल्डिंग की कम्पाउंडिंग कराना चाहता है लेकिन नियम बात की इजाजत न उन्हें देते हैं और न ही निगम को ऐसा कोई अधिकार देते हैं। क्योंकि सामान्यत: कम्पाउंडिंग सिर्फ 10 फीसदी अवैध निर्माण की हो सकती है। यहां तो अवैध निर्माण 53 फीसदी है। 

सीमेंटेंड सड़क पर बना दी डामर की रोड

 इंदिरागांधीनगर में नगर निगम का चमत्कार
कमीशन के खेल की पूरी कॉलोनी विरोधी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
अपनी कॉलोनी में सड़क बनवाने के लिए जहां लोग पार्षद से लेकर सांसद तक के चक्कर काट रहे हैं, जनसुनवाई में जा रहे हैं, धरने दे रहे हैं। वहीं केसरबाग रोड पर इंदिरागांधीनगर ऐसी कॉलोनी हैं जहां लोग विरोध कर रहे हैं और नगर निगम उनके विरोध को नजर अंदाज करते हुए सड़क पर सड़क पेले जा रहा है।
कॉलोनी के लोगों की आपत्ति सड़क को लेकर नहीं है बल्कि सड़क के नाम पर नगर निगम द्वारा की जा रही फिजुल खर्ची पर है। कमीशनबाजी के खेल के चक्कर में नगर निगम दो-तीन साल पहले ही बनी चकचकाट सीमेंटेड सड़कों पर ही डामर की सड़क बना रहा है जो क्षेत्रवासियों को खल रही है। क्षेत्रवासियों की मानें तो डामर की सड़कें तो कॉलोनी में पहले भी थी लेकिन जल्दी खराब हो जाती थी इसीलिए जनसहयोग से सीमेंटेड सड़कें बनवाई थी। सड़कों की गुणवक्ता भी अच्छी है। 10-15 साल तक यहां देखने की जरूरत नहीं थी। ऐसे में समझ नहीं आता कि पार्षद को सड़क बनाने की क्या सुझी।
बिजली की गति से बनी सड़कें
सड़कों के निर्माण की गति ने जहां पूरे शहर का सिर दुखा रखा है वहीं  इंदिरागांधी की सड़कों का निर्माण सोमवार को शुरू हुआ और मंगलवार शाम तक पूरा हो गया। पूरी कॉलोनी की मेन रोड और हर गली तकरीबन लंबाई 1.2 किलोमीटर व चौड़ाई 7 से 15 मीटर बनाई गई है। सड़कें भी हल्की नहीं बनी, कहीं थिकनेस 2 इंच है तो कहीं 4-5 इंच तक।
यह सड़कें बनी है
मेन रोड : 350 मीटर
सेकंड मेन रोड : 150 मीटर
गली नंबर 1 व 2 : 70-70 मीटर। चौड़ाई 7 मीटर
गली नं. 3 व 4 : 100 व 80 मीटर। चौड़ाई 7 मीटर
गली नं. 5 व 6 : 60 व 80 मीटर। चौड़ाई 7 मीटर
गली नं. 7 व 8 : 60 व 80मीटर। चौड़ाई 7 मीटर
सीधे सवाल पार्षद विनिता धर्म से
इंदिरागांधीनगर में सीमेंटेड सड़क पर डामर की सड़क बनाने की क्या जरूरत पड़ी?
जल जमाव की दिक्कत थी। गड्ढे हो रहे थे।
पूरी कॉलोनी में जलजमाव की दिक्कत कैसे हो सकती है?
रहवासी संघ और मोहल्ला समिति ने ही मांग की थी।
कितनी लागत से सड़कें बन रही है?
लागत मुझे नहीं पता, वैसे भी हम सड़क नहीं बना रहे हैं पेंचवर्क ही कर रहे हैं।
पूरी सड़क बनाने को पेंचवर्क नहीं कहते?
पेवर वाला डामर इस्तेमाल कर रहे हैं जो लगता कम है और फैलता ज्यादा है इसीलिए सड़कें ज्यादा दिख रही है।
फाइल आपने बनवाई, लागत नहीं पता?
फाइल देखकर ही बता सकते हैं, याद नहीं रहता।
लागत का फिर भी कुछ तो अंदाजा होगा?
ज्यादा नहीं है, लाख-दो लाख रुपए का ही काम है।
हमने गड्ढे भरने का कहा था, सड़क बनाने का नहीं
इंदिरागांधीनगर रहवासी संघ का कहना है कि एक-दो सड़कों पर पाइप लाइन डालने के लिए नगर निगम ने जो खुदाई की थी उसे भरने के लिए ही कहा था। हमने कभी सड़क पर सड़क बनाने की मांग नहीं की। 

विधायक के नजदीकी ज्वैलर्स पर इनकम टैक्स का छापा

- महापौर गौड़ के भाई का नाम भी आया सामने
- कालेधन को सफेद करने और बैंक में बड़ी रकम जमा करने के मामले में इंटर स्टार ज्वैलर्स पर भी हुई कार्रवाई
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
नोटबंदी के बाद 1000-500 के नोटों के रूप में जमा धन को ज्वैलरी से बदले के मामले में इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने विधायक सुदर्शन गुप्ता के नजदीकी अनूप नीमा के एपी ज्वैलर्स के साथ इटर स्टार ज्वैलर पर छापेमार कार्रवाई की। बताया जा रहा है कि फर्म में मालिनी गौड़ के भाई अनिल खत्री भी भागीदार हैं। हालांकि जांच जारी होने के कारण अधिकारी इसकी पुष्टि नहीं कर रहे हैं। बहरहाल, कार्रवाई के दौरान यह भी पता चला है कि दोनों ज्वैलर्स करीब छह करोड़ की हेराफेरी की है।
इन्वेस्टिगेशन विंग ने गुरुवार को 4/5ए न्यू पलासिया पुष्परत्न सोलिटियर बिल्डिंग स्थित इंटरस्टार ज्वैलर्स और 53/3 बड़ा सराफा स्थित एपी ज्वैलर्स पर पहुंची। छापेमार कार्रवाई की। इंटरस्टार जहां योगेंद्रसिंह कीमती, रश्मी कीमती व अंकित कीमती का है जिसे इंटरस्टार वर्ल्ड प्रा.लि. के बैनर तले संचालित किया जाता है। वहीं एपी ज्वैलर्स अनूप नीमा का है जो कि विधायक गुप्ता के बेहत नजदीकी लोगों में से एक हैं। कार्रवाई नीमा के लोधीपुरा (जहां महापौर गौड़ का पुराना घर है) स्थित घर पर भी हुई। अनूप का साला हर्ष नीमा विधायक गुप्ता का पीए है।
तीन करोड़ बैंक में जमा किए
इंटर स्टार ज्वैलर्स पर हुई कार्रवाई के दौरान पता चला है कि फर्म ने नोटबंदी के बाद तकरीबन तीन करोड़ रुपए की पुरानी करंसी बैंक में जमा कराई है। जांच के दौरान मौजूदा स्टॉक का वेल्युवेशन किया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि कीमती परिवार के घर से जो ज्वैलरी निकली है उसमें भी तकरीबन एक करोड़ की ज्वैलरी ऐसी है जिसका कोई लिखित हिसाब नहीं मिला है।
मार्च में ही पंजीबद्ध हुई इंटरस्टार
जिस कंपनी के बैनर तले इंटर स्टार ज्वैलर्स का कारोबार चल रहा है वह 23 मार्च 2016 में पंजीबद्ध हुई थी। कंपनी का पता 4/5ए न्यू पलासिया है। इसके पास ही 4/5 न्यू पलासिया कीमती परिवार का निवास है। करोड़ों के कालेधन को किनारे लगाने वाली इस कंपनी की अथॉराइज्ड केपिटल और पेड केपिटल 1 लाख रुपए ही है।
महीनेभर पहले 6 ज्वैलर्स ने 13 करोड़ किए थे सरेंडर
नोटबंदी के बाद नवंबर के दूसरे सप्ताह में इन्वेस्टिगेशन विंग ने पंजाब ज्वैलर्स, आनंद ज्वैलर्स सहित आधा दर्जन ज्वैलर्स के खिलाफ इंदौर, भोपाल और रतलाम में छापेमारी की गई थी। कुल 13 करोड़ की काली कमाई ज्वैलर्स ने स्वीकारी। इसमें 9 करोड़ रुपए भोपाल में और 4 करोड़ रुपए इंदौर-रतलाम में स्वीकारे गए।
तीकड़ी है जो काम करती है
सराफा से जुड़े सूत्रों की मानें तो अनूप और अनिल खत्री सराफा में शक्तिनाथ गुप्ता के साथ मिलकर भी काम करते हैं जो रिश्ते में विधायक गुप्ता के भाई हैं। चांदी में तीनों की मास्टरी है। गुप्ता सोने और चांदी के सिक्के बनाने में माहिर है। उनकी दुकान 25 छोटा सराफा है चर्चितकुमार शक्तिनाथ के नाम से।

पात्रता से 20 फीट ज्यादा ऊंचा बनी प्रीमियम गुलमोहर

इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
नौ मीटर चौड़ी सड़क को 12 मीटर चौड़ी बताकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के अधिकारियों ने जिस होराइजन प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क नाम की टाउनशीप को मंजूरी दी उसमें बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हुआ है। बावजूद इसके नगर निगम के अधिकारी बिल्डर राजू टेकचंदानी और निखिल कोठारी की मनमानी को नजरअंदाज करते आ रहे हैं। शायद, इसीलिए अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई।
प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क में हुई मनमानी का खुलासा दबंग दुनिया ने गुरुवार को ‘सड़क फैलाकर मंजूर कर दी छह मंजिला इमारत’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। खबर छपने के बाद नगर निगम तो हरकत में नहीं आई लेकिन टेकचंदानी ने जरूर नगर निगम के आला अधिकारियों व जिम्मेदारों के घर के चक्कर काटना शुरू कर दिए। उधर, लोकायुक्त में पहुंची शिकायत के अनुसार जितनी चौड़ी सड़क मौके पर थी उतनी के हिसाब से बिल्डिंग 40 फीट ऊंची बन सकती थी लेकिन अधिकारियों के खेल ने इसे 60 फीट की ऊंचाई दे दी।
निगम की टीएंडसीपी की मनमानी की पुष्टि
34 मार्च 2008 को टीएंडसीपी ने नियमों को नजरअंदाज करते हुए तीन ब्लॉक वाली इस छह मंजिला इमारत को मंजूरी दी। नगर निगम ने सड़क की चौड़ाई पर कोई आपत्ति नहीं ली। बस व्यक्तिगत लाभ अर्जित करते हुए नगर निगम के अधिकारियों ने बिल्डिंग बनाने वाली सूर्य शक्ति गृह निर्माण सहकारी संस्था को दो अतिरिक्त मंजिल बनाने की अनुमति दे दी। भवन निर्माण समिति की अनुसंशा (130/12 जनवरी 2010) पर भवन अनुज्ञा(25076) 25 जनवरी 2010 को जा की गई जो कि 15 जनवरी 2013 तक ही वैध थी। बावजूद इसके अधिकारियों से मिली खुली छूट के कारण अब तक मौके पर निर्माण किया जा रहा है।
नपती करके करें कार्रवाई
शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त से मांग की है कि टीएंडसीपी और नगर निगम द्वारा नियमों को नजरअंदाज करते हुए दी गई अनुमतियों की बारीकी से जांच हो। बिल्डिंग की नपती कराई जाए ताकि अवैध निर्माण भी सामने आए जो कि बड़े पैमाने पर हुआ है। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी पत्र लिखकर राजू टेकचंदानी व निखिल कोठारी के लाइसेंस रद्द करने व प्रकोष्ठ की बिक्री पर रोक लगाने की मांग की गई है।
पजेशन में भी परेशानी
टेकचंदानी ने जो बिल्डिंग बनाई उसके लिए लोगों से 24 महीने में पजेशन का वादा करके पैसे लिए गए थे लेकिन बिल्डिंग बनते-बनते छह साल हो चुके हैं। अब तक किसी एक फ्लैट में भी पजेशन नहीं दिया गया। शो-पीस की तरह दिखाने के लिए बनाए गए आधे-अधूरे फ्लैट को छोड़कर बाकी फ्लैट में टाइल्स तक भी नहीं लगी है। 

Friday, November 4, 2016

गौशाला की जमीन जीम गए शुक्ला

- बेची छह एकड़, दी ढ़ाई एकड़, नहीं छूट रही साढ़े तीन एकड़
- 17 साल से मानव भूमि ट्रस्ट का संघर्ष जारी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एक दशक से बारोली और अलवासा की पहाड़ी में सेंधमारी करते आया शुक्ला परिवार ने उस जमीन को भी नहीं बख्शा जो उन्हीं ने मानव भूमि गौरक्षा ट्रस्ट को बेची थी। साढ़े तीन एकड़ जमीन के लिए ट्रस्ट 17 साल से संघर्षरत है। दर्जनों शिकायतों और दो सीमांकन के बाद शुक्ला परिवार ने जमीन की जगह पहाड़ नापकर दे दिया और बाद में उसमें भी मुरम खुदाई शुरू कर दी। कब्जाई गई जमीन की गाइडलाइन कीमत ही साढ़े सात करोड़ है।
मामला बारोली गांव का है। जहां प्रतिबंध के बावजूद शुक्ला परिवार और वीरसिंह नरवरिया की अवैध मुरम खदान चल रही है। खदान को लेकर दबंग दुनिया ने जब सरकारी दस्तावेज खंगाले तो शुक्ला परिवार की कब्जा कहानी सामने आ गई। दस्तावेजों के लिहाज से बात करें तो 1998-99 में शुक्ला परिवार ने 1990 में रजिस्टर्ड (286/1990) हुए मानव भूमि गौरक्षा ट्रस्ट को सर्वे नं. 4/1/2, 4/2/2, 9/3/2, 14/2/2, 15/2/1 और  15/2/2/2 की 25 लाख रुपए में छह एकड़ (261360 वर्गफीट) जमीन बेची थी। शुक्ला परिवार की रंगदारी के कारण सौदे और तमाम प्रयासों के बावजूद ट्रस्ट को सिर्फ 1.25 लाख वर्गफीट जमीन ही मिली जहां 2001-02 में गौशाला की स्थापना की गई। बाकी 136360 वर्गफीट जमीन के लिए ट्रस्ट की टेंशन जारी है।
साढ़े सात करोड़ है जमीन
जिस जमीन पर कब्जा है वहां सरकारी गाइडलाइन प्लॉट की 550 रुपए/वर्गफीट है जबकि कृषि भूमि की कीमत 82 लाख रुपए/हेक्टेयर है। हेक्टेयर के हिसाब से भी शुक्ला परिवार के कब्जे की 1.266 हेक्टेयर जमीन की कीमत 1 करोड़ 03 लाख 81 हजार 200 रुपए है जबकि 136360 वर्गफीट की कीमत 7 करोड़ 49 लाख 98 हजार है।
कलेक्टर की हिम्मत से हुआ सीमांकन
जिला प्रशासन में शुक्ला परिवार के खिलाफ ट्रस्ट द्वारा की गई शिकायतों का पूरा पुलिंदा पड़ा है। शिकायतें 1999 से 2011-16 तक प्राप्त हुई। 2011-12 तक तो कलेक्टर सीमांकन के आदेश तो देते थे लेकिन शुक्ला के सिपाहसालारों के डर से सीमांकन करना तो दूर पटवारी जमीन तक जाना भी पसंद नहीं करते थे। 2011-12 में पहली बार कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने सख्ती की और सीमांकन हुआ।
सीमांकन से भी नहीं सहमे...
2011-12 में हुए सीमांकन के बावजूद शुक्ला परिवार गौशाला की जमीन पर काबिज रहा। ट्रस्ट शिकायतें करता रहा। पटवारी और आरआई रिपोर्ट देते रहे। बावजूद इसके शुक्ला परिवार ने जमीन नहीं छोड़ी।
जमीन मांगी तो नपवा दिया पहाड़
विधायक उषा ठाकुर के जुड़ने से ट्रस्ट की उम्मीदें जागी। जून में ठाकुर के नेतृत्व में ट्रस्ट ने फिर प्रयास किए। इस बार साथ दिया कलेक्टर पी.नरहरि ने। जमीन का सीमांकन हुआ लेकिन शुक्ला परिवार ने अपनी जमीन नहीं छोड़ी। बल्कि ट्रस्ट के नाम पर पहाड़ का हिस्सा नपवा दिया।
पहाड़ देकर भी बाज नहीं आए ‘बड़े’
जून में हुए सीमांकन और विधायक की पहल पर प्रशासनिक स्तर पर शुरू हुई गौपर्वत की तैयारियों के बावजूद शुक्ला परिवार ने कदम पीछे नहीं खींचे। जहां मानव भूमि गौरक्षा ट्रस्ट के बोर्ड लगे थे या पत्थरों पर नाम लिखा था वहीं मुरम की खुदाई शुरू कर दी।
विधायक-कलेक्टर, सबसे बात कर ली, अब कहां जाएं
ट्रस्ट का कहना है कि हम शुक्ला परिवार के खिलाफ खुलकर मोर्चा नहीं खोल सकते। जमीन को लेकर विधायक से लेकर कलेक्टर तक से बात कर चुके हैं, सीमांकन हो गया, अब क्या करें? देखते हैं जमीन मिलेगी या नहीं।
एक नजर में गौशाला
पंजीयन : 1990
जमीन खरीदी- 1999
शुरू : 14 जनवरी 2002
गाय की संख्या : शुरूआत में 160, अब 250

उज्जैन में बैठेंगे ग्वालियर सेंट्रल एक्साइज कमिश्नर

 उद्योगपतियों की मांग पर उज्जैन होगा मुख्यालय, नहीं तय करना होगा 300 से 600 किलोमीटर का सफर
इंदौर. विनोद शर्मा ।
उज्जैन और देवास सहित आसपास के तमाम उद्योगों के लिए अच्छी खबर यह है कि कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट का मुख्यालय ग्वालियर से अब उज्जैन हो चुका है। इससे न सिर्फ डिपार्टमेंट की वर्किंग एफिसिएंसी बढ़ेगी बल्कि उज्जैन संभाग के तमाम जिलों में स्थापित उद्योगों को अपनी बात रखने के लिए ग्वालियर नहीं जाना पड़ेगा। बल्कि ग्वालियर वालों को उज्जैन आना होगा। मप्र में यह पहला मौका भी होगा जब दो कमिश्नरेट के बीच की दूरी बमुश्किल 50 किलोमीटर ही होगी।
सेंट्रल बोर्ड आॅफ एक्साइज एंड कस्टम (सीबीईसी) ने कस्टम, सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स की केडर री-स्ट्रक्चरिंग करते हुए उज्जैन और ग्वालियर संभाग के लिए ग्वालियर में अलग कमिश्नर की व्यवस्था कर दी थी। इससे पहले दोनों संभाग इंदौर कमिश्नरेट का हिस्सा था। री-स्ट्रक्चरिंग में इंदौर को प्रिंसिपल कमिश्नर का दर्जा दिया। हालांकि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ग्वालियर कमिश्नर दो साल से इंदौर माणिकबाग मुख्यालय में बैठकर ही काम निपटाते रहे। इस बीच ग्वालियर कमिश्नर के मुख्यालय को  लेकर खींचतान चलती रही। इस बीच बोर्ड ने इशारा कर दिया कि ग्वालियर कमिश्नर का मुख्यालय उज्जैन ही होगा। दो-तीन दिन से कमिश्नर वी.पी.शुक्ला ने उज्जैन में बैठना भी शुरू कर दिया है।
तो सामने आया उज्जैन...
केडर री-स्ट्रक्चरिंग के बाद ग्वालियर को मिले कमिश्नर से संभाग के उद्योगों को तो राहत मिली लेकिन इंदौर मुख्यालय के नजदीक रहे उज्जैन संभाग के नौ जिलों के उद्योगों की ग्वालियर जाने के नाम से ही जमीन हिल गई। वह भी तब जब देवास में टाटा और रेनबेक्सी जैसी बड़ी कंपनियां हैं। इसीलिए औद्योगिक संगठनों ने मांग की कि कमिश्नर के बैठने की व्यवस्था ग्वालियर में नहीं, उज्जैन में हो। मामला कोर्ट तक पहुंचा। निर्णय के इंतजार में कमिश्नर को इंदौर बैठना पड़ा। इसी बीच तय हुआ कि इंदौर और ग्वालियर के बीच उज्जैन डिविजन ही है जहां कमिश्नर बैठ सकते हैं।
तो विकसित भी हो जाएगा मुख्यालय
री-स्ट्रक्चरिंग में ग्वालियर को कमिश्नर तो मिला लेकिन सिर्फ नाम का। ग्वालियर कमिश्नर इंदौर से ही काम निपटाते रहे। इस चक्कर में अब तक न मुख्यालय बन पाया, न ही डिपार्टमेंटल वेबसाइट। न ही कमिश्नरेट के दायरे का कन्फ्यूजन दूर हुआ। अलग मुख्यालय बनने से विस्तार की संभावनाएं भी बनेगी।
क्यों जरूरी था उज्जैन...
सिर्फ उज्जैन एकेवीएन के अंतर्गत ही उज्जैन का ताजपुर, देवास का औद्योगिक क्षेत्र 2-3, सिरसोदा, नेमावर, शाजापुर का मक्सी, मंदसौर का आईआईडीसी और एफपीपी, रतलाम का करमड़ी औद्योगिक क्षेत्र आता है।  यहां ग्वालियर संभाग से ज्यादा और बड़ी कंपनियां हैं।
विभागीय स्ट्रक्चरिंग के हिसाब से ग्वालियर डिविजन में रेंज-1 व 2 ग्वालियर, रेंज-1 व 2 मालनपुर, रेंज बनमोर, गुना और डबरा हैं। मतलब सात रेंज। जबकि उज्जैन डिविजन में रेंज-उज्जैन, रेंज-1, 2, 3 व 4 देवास हैं। रतलाम डिविजन में रेंज-1 व 2, रेंज-1 व 2 नागदा और मंदसौर हैं। मतलब 10 रेंज यानी ग्वालियर डिविजन से ज्यादा मजबूत है उज्जैन-रतलाम।
उज्जैन संभाग में शाजापुर-आगर और देवास आते हैं जिनकी ग्वालियर से दूरी 350 से 450 किलोमीटर है। वहीं नीमच-मंदसौर और रतलाम भी संभाग का हिस्सा हैं जिनसे ग्वालियर की दूरी 426 से 578 किलोमीटर है। 

चुहे कुतर रहे हैं गांधीजी के पैरों तले की जमीन

- संकट में रीगल रोटरी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
वर्षों से शहर के जश्न में शामिल और व्यवस्था से नाराज लोगों की नारेबाजी झेलते आए ‘गांधीजी’ की जमीन संकट में है! वजह है कबुतर और तोलों के लिए डाला जाने वाला दाना। दाने की चाह में पनपे चुहों ने सेंधमारी करके बापू की जमीन पोली कर दी है। मौका स्थिति और जानकारों की मानें तो जल्द ही एहतियाती कदम नहीं उठाए गए तो गांधीजी के पैरों तले से जमीन खीसक सकती है।
रीगल चौराहा सिर्फ एक चौराहा नहीं बल्कि शहरवासियों की अभिव्यक्ति का केंद्र है। वजह है यहां रोटरी में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा।  जिनके साथ शहर की आवाम अपना सुख-दुख साझा करती है। बहरहाल, नगर निगम द्वारा विकसित की गई 34 डायमीटर वाली इस रोटरी को कुतर-कुतर के चुहों ने पोला कर दिया है। इसीलिए पैर रखते ही पेवर तक धसने लगे हैं। कुछ पेवर तक कुतर दिए हैं चुहों ने। उबड़-खाबड़ हो चुके पेवर इसका बड़ा उदाहरण हैं भी। जिम्मेदार महकमे के जिम्मेदार अधिकारियों तक भी यह बात पहुंच चुकी है। वे  भी इसी मंथन में लगे हैं कि आखिर चुहों से गांधीजी को कैसे बचाया जाए।
महंगी पड़ रही शांति प्रतीक की सेवा
चूंकि पुलिस मुख्यलाय परिसर हराभरा है। नेहरू पार्क भी पास में है। इसीलिए यहां शांति के प्रतीक कबूतर और तोतों की संख्या ज्यादा है। इन पक्षियों के पेट की चिंता करते हुए सरकार और सामाजिक संगठन    रोटरी के दो आधे चांद (गांधीजी की प्रतीमा के दोनों ओर) आकार वाले हिस्सों में दाना डालना शुरू कर दिया। दाने के लालच ने यहां चुहों की तादाद बढ़ा दी।
ऐसे बचे रोटरी, मिले दाना
प्रतीमा के दोनों ओर जो आधे चांद जैसे हिस्से हैं चूंकि वह कच्चे हैं, वहां पेवर फिटिंग पूरी तरह नाकाम रही है। इसीलिए पेवर हटाकर जमीन से एक-डेढ़ फीट ऊपर चांद आकार की ही कांक्रीट स्लैब डाली जाना चाहिए। ताकि इस पर दाना भी डले और धरती भी पोली न हो। स्लैब पिज्जा पीस की तरह टुकड़ों में भी डल सकती है। हालांकि इसके लिए रोटरी में विकसित हुई हरियाली जरूर प्रभावित होगी। हालांकि इस हरियाली को स्लैब पर गमले लगाकर आकर्षित भी बनाया जा सकता है।
तो कार्यक्रम मुश्किल हो जाएंगे...
अभी समतल होने के कारण रोटरी में आए दिन कुछ न कुछ कार्यक्रम होते रहते हैं। कांक्रीट स्लैब बनने के बाद जो मुश्किल हो जाएंगे। हालांकि स्लैब को इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि कार्यक्रम में दिक्कत न हो।