Tuesday, December 7, 2010

कठिन डगर पर 'कॉरिडोरÓ


-निगम के पास न वित्तीय प्रबंधन, न अतिक्रमणकर्ताओं से निपटने का जिगरा और न उन्हें विस्थापित करने की जमीन
- सीधी सपाट बीआरटीएस-फीडर रोड ने छुड़ाए पसीने

इंदौर, विनोद शर्मा।
महापौर के ऐतराज के बावजूद 90 करोड़ की मंजूरी देकर केंद्र ने रिवर साइड कॉरिडोर की नैया नगर निगम के हवाले कर दी। 284 करोड़ का प्रस्ताव देने वाले निगम को राज्य के 36 करोड़ के बाद 160 करोड़ अपना खजाने से खर्च करना होंगे वह भी उस स्थिति में जब पहले ही उसकी वित्तीय स्थिति डामाडोल है। सीवरेज प्रोजेक्ट और नर्मदा तृतीय चरण की स्वीकृत राशि और टेंडर के बीच भारी अंतर की भरपाई की मार झेल रहा निगम कॉरिडोर को किनारे लगा पाएगा ये कह पाना मुश्किल है। जानकार कहते हैं निगम पहले बाधक परिवारों की व्यवस्था करे। बाद में कॉरिडोर की। उधर, निगम प्रशासन तमाम दिक्कतों को नकार रहा है।
आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो केंद्र के 90 करोड़ और रा'य के 36 करोड़ के बाद योजना के लिए 284 करोड़ का आंकलन करने वाले निगम को 154 करोड़ रुपए जेब से लगाएगा। तमाम टैक्स और सरकारी अनुदानों के बाद सालाना 400 करोड़ का वास्तविक बजट बनाने वाली निगम के लिए रास्ता मौजूदा परिस्थितियों में मुश्किल है। क्योंकि सीवरेज 317 करोड़ की स्वीकृति अपना 30 प्रतिशत (95.1 करोड़) अंश मिलाने के बाद वर्कऑर्डर 442 करोड़ में गया। 30 प्रतिशत अंश मिलाने के बाद सीवरेज प्रोजेक्ट में 125, नमृदा तीसरे चरण में 75 करोड़, बीएसयूपी में 60 और यशवंतसागर में पांच करोड़ की भरपाई निगम की कमर तोड़ चुकी है।
वित्तीय प्रबंधन की बात छोड़ भी दें तो शहरवासी यह सोचकर परेशान हैं कि सीधे-सपाट बीआरटीएस कॉरिडोर और फीडर रोड को वक्त पर पूरा करने में नाकाम रहा प्रशासन आड़ी-तिरछी नदी पर कैसे पार पाएगा। तीन साल से 315 करोड़ की इस योजना को बनाकर बैठे निगम के पास न वोटबैंक बन चुके भागीरथपुरा-कुलकर्णी भट्टा-शेखरनगर के चार हजार लोगों को बेदखल करने का जिगरा है। न ही उन्हें विस्थापित करने के लिए जमीन।
संवारना होगी 19 ब्रिजों की सूरत
नहरभंडारा से चंद्रगुप्त प्रतिमा के बीच 14.50 किलोमीटर के टूकड़े में 19 ब्रिज बनाना होंगे। इनमें माणिकबाग, गुलजार कॉलोनी, गुरुनानक कॉलोनी, लालबाग, जयरामपुर, कड़ावघाट, म'छीबाजार, हरसिद्धि, चंद्रभागा, जवाहरमार्ग, किशनपुरा, रामबाग, लोखंडे, पोलोग्राउंड, कुलकर्णी भट्टा, भागीरथपुरा और गौरीनगर पुल शामिल हैं। कॉरिडोर के लिए इन पूलों की सूरत संवारने के साथ निगम को सैफीनगर क्रॉसिंग और लक्ष्मीनगर रेलवे अंडर ब्रिज का ध्यान भी रखना पड़ेगा।
अड़चनों की 'रिवरÓ
चंद्रगुप्त से गौरीनगर पुल :- 1.75 किलोमीटर लंबे दोनों छोर खाली।
गौरीनगर से भागीरथपुर :- 850 मीटर खाली। 1.4 किलोमीटर एक ओर से।
भागीरथपुरा से कुलकर्णी भट्टा:- 441 मीटर दोनों ओर से। 750 एक ओर से।
कुलकर्णी भट्टा से पोलोग्राउंड :- 600 मीटर दोनों ओर से। 230 मीटर में कोने पर कारखाना और होप मिल की दिवार।
पोलाग्राउंड से लोखंडे पुल:- 600 मीटर दोनों ओर। कुछ हिस्से में निर्माण।
लोखंड से रामबाग:- 600 मीटर में रामबाग की ओर निर्माण। दूसरी तरफ निगम का मटन मार्केट।
रामबाग से किशनपुरा:- 400 मीटर में पालिवाल धर्मशाला सहित निजी निर्माण तो दूसरी तरफ निगम का शिवाजी मार्केट।
किशनपुरा-जवाहरमार्ग :- 200 मीटर दोनों छोर से साफ। बाकी 200 मीटर में एक तरफ निर्माण।
जवाहरमार्ग से हरसिद्धि:- एक किलोमीटर में दोनों तरफ कबूतरखाना, नार्थ तोड़ा और शेखरनगर जैसी बस्तियां। कुछ हिस्से में रोड भी।
हरसिद्धि से म'छीबाजार- 400 मीटर में एक तरफ सड़क दूसरी तरफ मार्केट।
म'छीबाजार से कड़ावघाट :- 300 मीटर में दोनों ओर बस्ती। 90 मीटर खाली।
कड़ावघाट से जयरामपुर कॉलोनी :- 400 मीटर में कहीं-कहीं निर्माण।
जयरामपुर से लालबाग:- 700 मीटर में दोनों ओर क'चे-पक्के निर्माण।
लोकमान्य से सैफीनगर :- 550 मीटर में एक तरफ निर्माण।
माणिकबाग से नहरभंडारा :- 1.25 किलोमीटर में दोनों छोर खाली।
- : सिकुड़ गई नदी :-
लालबाग से लोकमान्यनगर :- 1 किलोमीटर सकरी है नदी। कुछ निर्माण भी।
सैफीनगर से माणिकबाग :- 800 मीटर में नदी आधी सकरी। आधी के एक हिस्से में निर्माण।
भागीरथपुरा :- पुल से गौरीनगर की ओर सौ मीटर में नदी सकरी।
-: ये भी बाधा :-
-- कड़ाव घाट का डेम
-- किशनपुरा पैदल पुल
-- शिवाजीमार्केट पैदल पुल
जमीनी हकीकत से दूर है प्रोजेक्ट
मैदानी हकीकत से कोसों दूर इस प्रोजेक्ट में इंदौर का कम, नेताओ-अधिकारियों का हित ज्यादा है। न रोड की फिजिब्लीटी जांची गई। न ही जमीन अधिग्रहण की रीति-नीति तैयार की। बाधक में बस्तियों के साथ पक्के निर्माण भी है इनका क्या होगा। इसकी रणनीति नहीं। सडक का मोबेलिटी प्लान भी तैयार नहीं किया गया जो यह बता सके कि इस सडक पर कहां का ट्रेफिक चलेगा।
अतुल सेठ, इंजीनियर
मुश्किल लग रहा है, है नहीं
निगम के वित्तीय मामलों से ताल्लुक रखने वाले जानकारों की मानें तो कॉरिडोर के लिए तीन साल की समयसीमा तय है लेकिन काम पूरा करने में चार-पांच साल लगेंगे। तक आय बढ़ाकर पैसा निकालना मुश्किल नहीं है। इससे पहले नमृदा तृतीय चरण के 75 में से 60 और यशवंत सागर के पांच में से दो करोड़ भी निगम दे चुका है।
किस्मत से मिली मदद
नदी के कारण प्रदूषण बढ़ा जिससे निपटने के लिए आज नहीं तो पांच साल बाद निगम को पैसा लगाना पड़ता। शुक्र है कि आज केंद्र-रा'य से 126 करोड़ की मदद तो मिल रही है। प्रोजेक्ट में कुछ कंपोनेंट ऐसे हैं जिन पर निगम पहले ही काम कर रहा है। जैसे 19 ब्रिज में से 4 निगम बना रहा है। एक किलोमीटर में नदी जहां सकरी है वहां बसें बायपास करेंगे। रहा सवाल तीन हजार बसाहट का तो निगम बेसिक सर्विस फॉर अर्बन पुवर के तहत दो चरणों गरीबों के लिए मकान बना ही रहा है। वहां शिफ्ट कर देंगे। इसके लिए 82 करोड़ की मंजूरी मिल चुकी है। वैसे भी नदी से 30 मीटर के दायरे में निर्माण मान्य नहीं है। एफएआर बढ़ाकर क्षेत्र को कमर्शियल कॉरिडोर के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।
हितेंद्र मेहता, आर्किटेक्ट
नहीं आएगी बाधा, ये है मेरा वादा
ऐतराज के बाद हमने रिवाइज प्लान भेजा था। पहले प्रोजेक्ट 315 करोड़ का था। उसे पूरा करने जाते तो 400 करोड़ भी कम पड़ते। उधर, केंद्र 90 करोड़ रुपए देकर बैठ जाता। शुक्रवार को रिवाइज प्लान मंजूर हुआ। जिसकी लागत 205 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र और रा'य के अंशदान के बाद निगम को 45-50 करोड़ ही मिलाना पड़ेंगे। अतिक्रमण को लेकर बीआरटीएस और रिवर कॉरिडोर की तुलना नहीं की जा सकती। वहां लड़ाई स्वामित्व की जमीन की थी और यहां सरकारी जमीन पर कब्जा लेने की। इसीलिए मैं विश्वास दिलाता हूं कि प्रोजेक्ट में दिक्कत नहीं आएगी।
कृष्णमुरारी मोघे, महापौर

इंदौर-देवास फोरलेन ;- बदहाल सड़क पर टालम 'टोल



-- एनएचएआई ने शुरू की टोल की तैयारियां, सड़क सुधारने वाला कोई नहीं
- 49 किलोमीटर लंबा 325 करोड़ में बनेगा इंदौर-देवास सिक्सेलन

इंदौर.विनोद शर्मा ।
कहीं पेंचवर्क के पैबंद के बीच से झांकते गड्ढे तो कहीं गड्ढों की कतार नजर आती है। जिस हिस्से पर टोल वसूला जाता था वह पूरी तरह उधड़ चुका है। ये हाल है इंदौर-देवास फोरलेन के। निर्माण के दस बरस बाद तक दूसरी सड़कों के लिए आदर्श उदाहरण रही यह सड़क रिनुअल के दूसरे साल ही बदहाल है। वह भी उस वक्त जब फोरलेन को सिक्सलेन में तब्दील करने की तैयारियां करने वाला नेशनल हाई-वे अथॉरिटी ऑफ इंडिया नवंबर के अंतिम सप्ताह से यहां टोल वसूलने का ऐलान कर चुका है।
हम बात कर रहे हैं फोरलने के मांगलिया (सेंट्रल पॉइन्ट) से जवाहरनगर (देवास) के बीच 1997-99 के बीच बनाए गए 17 किलोमीटर लंबे हिस्से की। केंद्रीय मंजूरी के बाद लोक निर्माण विभाग की राष्ट्रीय राजमार्ग शाखा ने तकरीबन 10 करोड़ की लागत से इस हिस्से का नए सिरे से डामरीकरण 2008-09 में किया था। तीन साल की ग्यारंटी के साथ किया गया रिनुअल डेढ़ साल में ही जवाब दे गया। 2009 में सड़क एनएचएआई को सौंपने के बाद जिम्मेदार अब पल्ला झाड़ते नजर आते हैं। दूसरी तरफ एनएचएआई कहते हैं हमारा काम सिक्सलेन बनाना है। उधर, लोक निर्माण विभाग और एनएचएआई की आपसी टालमटौल के कारण लोग गड्ढों में हिचकौले खा रहे हैं।
उधर, लोगों की फजीहत को अनदेखा करके एनएचएआई ने इंदौर बायपास और इंदौर-देवास फोरलेन रोड पर टोल वसूलने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए सड़क के सिक्सलेनिंग का काम शुरू करने वाली डीएलएफ और गायत्री इन्फ्रास्ट्रक्चर ने मांगलिया के पास बेस बनाना शुरू कर दिया है। दरअसल, एनएचएआई ने इंदौर बायपास और देवास फोरलेन (कुल लंबाई 45 किलोमीटर) को छह लेन का बनाने का निर्णय लिया है। इसका काम शुरू हो चुका है। शर्तो के मुताबिक कांट्रेक्टर जिस दिन सिक्सलेनिंग का काम शुरू करेगा, उसी दिन से उसे रोड पर टैक्स वसूलने का अधिकार रहेगा।
पहले सड़क सुधारें बाद में टोल वसूले
नौकरी के सिलसिले में इंदौर आने-जाने वाले देवास निवासी भूपेंद्र सोनगरा ने बताया थोड़ी-बहुत रफू-रंगाई हो गई है। नहीं तो हालत यह थी कि आठ साल चकाचक सड़क पर चलने के बाद यहां आते-जाते भी शरम आती है। ऐसे में टोल शुरू करने से पहले एनएच को सड़क सुधारना चाहिए। शिप्रा निवासी अरविंद बंसल ने कहा नई रोड बनने में वक्त लगेगा। क्या तब तक लोग यूं ही हेरान-परेशान होते रहेंगे। सड़क सुधरती है तो निर्माण के वक्त यातायात बदहाल भी नहीं होगा। एमआईजी निवासी राजू अग्रवाल ने बताया नवरात्रि में बिजसन टेकरी की रोड दुरुस्त हो गई लेकिन इस सड़क पर चामुंडा देवी के दर्शनार्थी धकौले खाते रहे।
क्यों बदहाल हो गई रोड
1:- लोक निर्माण विभाग के अधिकारी कहते हैं रिनुअल में गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा?
जवाब में तकनीकी जानकार कहते हैं सामग्री की गुणवत्ता का ध्यान रखा होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ते। गड्ढे तो ठिक है कई जगह रिनुअल बहकर पुरानी रोड उभर आई है। निर्माण के वक्त ढाल का भी ध्यान नहीं रखा।
2:- बड़ी वजह बजट की कमी रही। 10 करोड़ में 17 किलोमीटर फोरलेन के रिनुअल में गुणवत्ता कैसे आएगी?
जानकार कहते हैं यदि ऐसा था तो विभाग को राशि लौटाकर नए सिरे से प्रस्ताव बनाकर भेजना था। क्यों नहीं भेजा।
3:- भारी वाहनों का भी तो दबाव है?
रिनुअल से पहले भी भारी वाहन आते-जाते थे और आज भी। हाई-वे पर भारी वाहन नहीं चलेंगे तो क्या किसी कॉलोनी की सड़क पर नजर आएंगे।

पुलक सिटी के रास्ते पर 'फिनिक्स


- पीडि़तों ने दी आईजी ऑफिस में अर्जी
- कहा :- लाखों रुपया लेने के बाद भी पजेशन नहीं

इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
मप्र सरकार के साथ दो सौ करोड़ का हवाई एमओयू साइन करने वाली फिनिक्स डेवकॉन प्रा.लि.सवा सौ से 'यादा लोगों को चार साल से फ्लैट के नाम पर भटका रही है। कंपनी के कर्ताधर्ता निलेश अजमेरा हैं। वे और उनके साथियों ने 2006-07 में पीपल्याकुमार तालाब के पास फिनिक्स ग्रांट टाउनशिप का काम शुरू किया था जो आज तक जारी है। कंपनी की हीलाहवाली के खिलाफ लोग आवाज उठाते हैं तो कर्ताधर्ता ऑफिस के अते-पते के साथ अपना फोन तक बदलकर बैठ जाते हैं। बुधवार को लिखित शिकायत देते हुए यह बात फिनिक्स के पीडि़तों ने दी।
शिकायतकर्ताओं की मानें तो बॉम्बे हॉस्पिटल के बाद रिंग रोड पर निरंजनपुर की ओर पीपल्याकुमार से लगी जो निर्माणाधीन इमारतें नजर आती हैं वही फिनिक्स ग्रांट है। कंपनी का नाम बदलकर फिनिक्स लेजर एंड लाइफ स्टाइल प्रा.लि. करने के बाद फिनिक्स डेवकॉन के कर्ताधर्ता अब टाउनशीप काम नाम भी बदलने की तैयारियों में लगे हैं। साल-डेढ़ साल में पजेशन देना थी लेकिन पजेशन या पैसे लौटाने के नाम पर कंपनी के कर्ताधर्ता सांस तक नहीं लेते। टाउनशीप के नाम पर बैंकों के फर्जी पोस्टर लगा कर बताते हैं कि लोन सुविधा उपलब्ध है लेकिन अप्लाई करने पर बैंके लोन देती ही नहीं। फिनिक्स ग्रांट में कभी शरद डोसी-मोहन चुघ के नाम माल बेचा तो कभी कैलाश गर्ग के नाम पर। चार वर्षों में एक फ्लैट की डिलीवरी भी किसी को नहीं दी। बिल्डरों के पास जाते हैं तो बदतमीजी करके हमें भगा देते हैं। कहते हैं जितना पैसा दे रखा है लो और फ्लैट-प्लॉट सरेंडर करके चलते बनो। इसके लिए उन्होंने साइट पर भी संजय बंडी को बिठा रखा है। 50 से 60 लोग डर के मारे सरेंडर कर भी चुके हैं।
नक्शा ही बदल डाला
पीडि़तों ने बताया पहले नक्शे में आठ ब्लॉक 'एÓ, 'बीÓ, 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ, 'एफÓ, 'जीÓ और 'एचÓ बताए गए थे। तिकोनी डिजाइन में एक सिरे में ब्लॉक 'एÓ और 'बीÓ थे। दूसरे में 'जीÓ और 'एचÓ। तीसरी ओर 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ और 'एफÓ थे। 'एÓ से 'सीÓ और 'डीÓ के बीच लॉन टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पुल, बास्केटबॉल कोर्ट, बेडमिंटन कोर्ट का जिक्र था। बाद में सभी ब्लॉक को इधर-उधर करके तमाम कोर्ट गायब कर दिए गए। बगीचा बना दिया।
हजम कर गए सुविधाएं
फिनिक्स ग्रांड 52 सार्वजनिक सहुलियतों की फेहरिस्त दी थी। इसमें स्वीमिंग पूल, पार्क, जिम, सुपर मार्केट और क्लब हाउस जैसी सहूलियतें शामिल थीं। बाद में कंपनी कई सुविधाएं हजम कर गईं।
आधी कीमत कर चुके है वसूल
1100 और 1900 वर्गफीट के फ्लैट 1271 रुपए/वर्गफीट के हिसाब से बुक किए गए थे। इसके एवज में बिल्डर 3.60 लाख रुपए और दूसरे चरण में 2.50 रुपए दे चुके हैं। कंपनी का रवैया देखने के बाद बाकी किश्त रोक दी। पहले पजेशन फिर पैसा।
फिनिक्स ग्रांट:- एक नजर में
कुल पांच लाख वर्गफीट जमीन
--- टाउनशिप की बाउंड्रीवॉल के आधार पर जमीन तिकोनी है। तालाब के पास चौड़ाई 395 फीट से 'यादा है। रिंग रोड की ओर लंबाई 1350 फीट है जबकि पीपल्याकुमार की ओर तकरीबन 1200 फीट।
--- ब्लॉक- आठ 'एÓ, 'बीÓ, 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ, 'एफÓ, 'जीÓ और 'एचÓ ('डीÓ और 'एफÓ सहित बने चार ब्लॉक ही हैं।)
--- मास्टर प्लान के नियमानुसार किसी भी तालाब की पाल से साठ मीटर की दूरी तक निर्माण नहीं किया जा सकता। वहीं यहां एक ब्लॉक पीपल्याकुमार तालाब की पाल से बमुश्किल 30 फीट दूर है।
--- बेचे गए कुल फ्लैट- 154/ तकरीबन साठ से सरेंडर कराए।
--- कीमत- 1271 रुपए/वर्गफीट
--- कुल कीमत वसूली- 9 करोड़
--- पजेशन- किसी को नहीं।
--- कंपलीट फ्लैट- एक भी नहीं।
छह महीनों में पजेशन दे देंगे
लोगों ने फ्लैट बुक कराने के बाद किश्ते ही नहीं दी। इसीलिए वित्तीय प्रबंधन गड़बड़ाया और काम में देर हुई। काम जारी है। हमने अभी तक किसी की रजिस्ट्री नहीं की है। लोग जैसे ही पैसा देते हैं उन्हें रजिस्ट्री करके फ्लैट की पजेशन दे देंगे। महीने-दो महीने का वक्त और लगेगा। बाकी बातें झूठी है। रहा सवाल सहुलियतों का तो हमने वादा किया है तो सहुलियतें तो देना पड़ेगी।
रितेश उर्फ चंपू अजमेरा
जांच कराकर कार्रवाई करेंगे
मैं इंदौर से बाहर था इसलिए मुझे शिकायत की जानकारी नहीं है। ऑफिस में शिकायत दर्ज हो गई होगी। मैं कल देखता हूं क्या शिकायत है? कैसे निराकरण किया जा सकता है? अन्यथा जांच कराकर मुकदमा तो दर्ज करेंगे।
संजय राणा, आईजी

पुलक सिटी के रास्ते पर 'फिनिक्सÓ

- पीडि़तों ने दी आईजी ऑफिस में अर्जी
- कहा :- लाखों रुपया लेने के बाद भी पजेशन नहीं

इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
मप्र सरकार के साथ दो सौ करोड़ का हवाई एमओयू साइन करने वाली फिनिक्स डेवकॉन प्रा.लि.सवा सौ से 'यादा लोगों को चार साल से फ्लैट के नाम पर भटका रही है। कंपनी के कर्ताधर्ता निलेश अजमेरा हैं। वे और उनके साथियों ने 2006-07 में पीपल्याकुमार तालाब के पास फिनिक्स ग्रांट टाउनशिप का काम शुरू किया था जो आज तक जारी है। कंपनी की हीलाहवाली के खिलाफ लोग आवाज उठाते हैं तो कर्ताधर्ता ऑफिस के अते-पते के साथ अपना फोन तक बदलकर बैठ जाते हैं। बुधवार को लिखित शिकायत देते हुए यह बात फिनिक्स के पीडि़तों ने दी।

शिकायतकर्ताओं की मानें तो बॉम्बे हॉस्पिटल के बाद रिंग रोड पर निरंजनपुर की ओर पीपल्याकुमार से लगी जो निर्माणाधीन इमारतें नजर आती हैं वही फिनिक्स ग्रांट है। कंपनी का नाम बदलकर फिनिक्स लेजर एंड लाइफ स्टाइल प्रा.लि. करने के बाद फिनिक्स डेवकॉन के कर्ताधर्ता अब टाउनशीप काम नाम भी बदलने की तैयारियों में लगे हैं। साल-डेढ़ साल में पजेशन देना थी लेकिन पजेशन या पैसे लौटाने के नाम पर कंपनी के कर्ताधर्ता सांस तक नहीं लेते। टाउनशीप के नाम पर बैंकों के फर्जी पोस्टर लगा कर बताते हैं कि लोन सुविधा उपलब्ध है लेकिन अप्लाई करने पर बैंके लोन देती ही नहीं। फिनिक्स ग्रांट में कभी शरद डोसी-मोहन चुघ के नाम माल बेचा तो कभी कैलाश गर्ग के नाम पर। चार वर्षों में एक फ्लैट की डिलीवरी भी किसी को नहीं दी। बिल्डरों के पास जाते हैं तो बदतमीजी करके हमें भगा देते हैं। कहते हैं जितना पैसा दे रखा है लो और फ्लैट-प्लॉट सरेंडर करके चलते बनो। इसके लिए उन्होंने साइट पर भी संजय बंडी को बिठा रखा है। 50 से 60 लोग डर के मारे सरेंडर कर भी चुके हैं।
नक्शा ही बदल डाला
पीडि़तों ने बताया पहले नक्शे में आठ ब्लॉक 'एÓ, 'बीÓ, 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ, 'एफÓ, 'जीÓ और 'एचÓ बताए गए थे। तिकोनी डिजाइन में एक सिरे में ब्लॉक 'एÓ और 'बीÓ थे। दूसरे में 'जीÓ और 'एचÓ। तीसरी ओर 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ और 'एफÓ थे। 'एÓ से 'सीÓ और 'डीÓ के बीच लॉन टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पुल, बास्केटबॉल कोर्ट, बेडमिंटन कोर्ट का जिक्र था। बाद में सभी ब्लॉक को इधर-उधर करके तमाम कोर्ट गायब कर दिए गए। बगीचा बना दिया।
हजम कर गए सुविधाएं
फिनिक्स ग्रांड 52 सार्वजनिक सहुलियतों की फेहरिस्त दी थी। इसमें स्वीमिंग पूल, पार्क, जिम, सुपर मार्केट और क्लब हाउस जैसी सहूलियतें शामिल थीं। बाद में कंपनी कई सुविधाएं हजम कर गईं।
आधी कीमत कर चुके है वसूल
1100 और 1900 वर्गफीट के फ्लैट 1271 रुपए/वर्गफीट के हिसाब से बुक किए गए थे। इसके एवज में बिल्डर 3.60 लाख रुपए और दूसरे चरण में 2.50 रुपए दे चुके हैं। कंपनी का रवैया देखने के बाद बाकी किश्त रोक दी। पहले पजेशन फिर पैसा।
फिनिक्स ग्रांट:- एक नजर में
कुल पांच लाख वर्गफीट जमीन
--- टाउनशिप की बाउंड्रीवॉल के आधार पर जमीन तिकोनी है। तालाब के पास चौड़ाई 395 फीट से 'यादा है। रिंग रोड की ओर लंबाई 1350 फीट है जबकि पीपल्याकुमार की ओर तकरीबन 1200 फीट।
--- ब्लॉक- आठ 'एÓ, 'बीÓ, 'सीÓ, 'डीÓ, 'ईÓ, 'एफÓ, 'जीÓ और 'एचÓ ('डीÓ और 'एफÓ सहित बने चार ब्लॉक ही हैं।)
--- मास्टर प्लान के नियमानुसार किसी भी तालाब की पाल से साठ मीटर की दूरी तक निर्माण नहीं किया जा सकता। वहीं यहां एक ब्लॉक पीपल्याकुमार तालाब की पाल से बमुश्किल 30 फीट दूर है।
--- बेचे गए कुल फ्लैट- 154/ तकरीबन साठ से सरेंडर कराए।
--- कीमत- 1271 रुपए/वर्गफीट
--- कुल कीमत वसूली- 9 करोड़
--- पजेशन- किसी को नहीं।
--- कंपलीट फ्लैट- एक भी नहीं।
छह महीनों में पजेशन दे देंगे
लोगों ने फ्लैट बुक कराने के बाद किश्ते ही नहीं दी। इसीलिए वित्तीय प्रबंधन गड़बड़ाया और काम में देर हुई। काम जारी है। हमने अभी तक किसी की रजिस्ट्री नहीं की है। लोग जैसे ही पैसा देते हैं उन्हें रजिस्ट्री करके फ्लैट की पजेशन दे देंगे। महीने-दो महीने का वक्त और लगेगा। बाकी बातें झूठी है। रहा सवाल सहुलियतों का तो हमने वादा किया है तो सहुलियतें तो देना पड़ेगी।
रितेश उर्फ चंपू अजमेरा
जांच कराकर कार्रवाई करेंगे
मैं इंदौर से बाहर था इसलिए मुझे शिकायत की जानकारी नहीं है। ऑफिस में शिकायत दर्ज हो गई होगी। मैं कल देखता हूं क्या शिकायत है? कैसे निराकरण किया जा सकता है? अन्यथा जांच कराकर मुकदमा तो दर्ज करेंगे।
संजय राणा, आईजी

सरकारी सुस्ती की 'रिंगÓ में उलझी 'रोडÓ


-- भूमि पूजन के सवा दो साल बाद नहीं हुआ पश्चिमी रिंग रोड का श्रीगणेश
- लागत 54 से बढ़कर 81 करोड़ पहुंची
- मुद्दा चंदननगर से मोहताबाग के बीच दो किलोमीटर लंबे हिस्से का

इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
इंदौर को महानगर का सपना दिखाने वाली रा'य सरकार दो बरसों के लंबे इंतजार के बावजूद पश्चिमी रिंग रोड के निर्माण को हरी झंडी नहीं दे पाई। मंजूरी के इंतजार में लंबे समय से अटके पड़े पश्चिमी रिंग रोड के दो किमी हिस्से के लिए इंदौर विकास प्राधिकरण ने रा'य शासन को रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेज रहा है। बावजूद इसके बात तो नहीं बनी। उलटा दो साल में प्रोजेक्ट की लागत 54 से बढ़कर जरूर 81 करोड़ हो गई। उधर, सरकारी सुस्ती का खामियाजा बदहाल यातायात के कारण आम नागरिकों को जान देकर चुकाना पड़ रहा है।
दर्जनों घोषणाएं, भूमि पूजन के बाद सवा दो साल का इंतजार और आखिर में हाथ लगी निराशा। ये हाल है रिंग रोड की उस रिंग की जो आज तक अधूरी है। विधानसभा चुनाव-2008 के ठिक दो महीने पहले सितंबर में लोक निर्माण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तत्कालीन प्राधिकरण अध्यक्ष मधु वर्मा ने लंबे-चौड़े वादों के साथ मोहताबाग के पास भूमि पूजन करते हुए जो शिलालेख लगाया था उसे ही लोग उखाड़ ले गए। सरकार की बेरूखी देख प्राधिकरण ने भी पैर खींचे और दिया हुआ वर्कऑर्डर निरस्त कर दिया। सड़क कब बनेगी? अब इसके जवाब में प्राधिकरण सरकार की तरफ इशारा करता है तो सरकार प्राधिकरण की तरफ। कुल मिलाकर सरकार-प्राधिकरण के दोराहे पर सड़क का मकसद चकरघिन्नी हो चुका है।
इस लेटलतीफी के चलते रोड निर्माण की अनुमानित लागत 27 करोड़ तक बढ़ गई। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 2008 में जो लागत 54 करोड़ आंकी गई थी वही आज 81 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। हाल यह है कि उस वक्त सड़क के बाधक 850 मकानों को हटाने के लिए मुआवजा 15 करोड़ देना था आज मुआवजे की लागत भी बढ़कर 18 करोड़ के पार हो चुकी है।
क्या है लड़ाई
-- 2008 में सड़क की लागत 54 करोड़ थी। इसमें 10 करोड़ रुपए प्राधिकरण को अपनी ओर से देना थे जबकि बची राशि शासन को। दो बरसों में न सरकार ने राशि दी और न ही यह स्पष्ट किया कि उक्त अनुदान रोड के लिए है। या प्रभावितों को दिए जाने वाले मुआवजे के लिए। पूरा मामला शासन के आवास और पर्यावरण विभाग के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
-- अब नया झगड़ा यह भी है कि उस वक्त 18.50 प्रतिशत की दर से प्राधिकरण को 10 करोड़ रुपए देना थे। चूंकि लागत बढ़ चुकी है ऐसे में यदि पुराने अनुपात के आधार पर बंटवारा किया जाता है तो प्राधिकरण को 15 करोड़ रुपए देना पड़ेंगे। देरी सरकार की ओर से हुई तो प्राधिकरण यह कीमत चुकाने के लिए तैयार होगा इसकी ग्यारंटी भी कम है।
क्यों जरूरी है
-- बिजलपुर क्रॉसिंग से लेकर चंदननगर तक पश्चिमी रिंग रोड तकरीबन पांच किलोमीटर लंबा बना है। चंदननगर तक हल्के-भारी वाहन गंगवाल की ओर आकर धार रोड का दबाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से कई हादसे पहले भी हो चुके हैं।
-- दो किलोमीटर लंबे इस टुकड़े के न बनने से लोगों को चार किलोमीटर घुमकर मोहताबाग जाना पड़ता है। रास्ता बनता है तो पोलाग्रांउड और सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र आने-जाने वाले भारी वाहन गंगवाल-बड़ा गणपति क्षेत्र में दबाव बढ़ाए ही चंदननगर से एरोड्रम और एरोड्रम रोड से वीआईपी रूट होते हुए मरीमाता आ-जा सकेंगे।
बाधा क्या है
-- चंदननगर से मोहताबाग (एरोड्रम रोड) और मोहताबाग तक काम होना है। बीच में चंदननगर, नंदननगर, हुजुरगंज, गंगानगर, ग्रेटर तिरूपति और राजनगर के 850 निर्माण हटाए जाना है। इनके मुआवजे की लागत ने बढ़ाई दिक्कतें।
-----------------
मामला मंजूरी के लिए सरकार के पास विचाराधीन है। हम रिमाइंडर भेज रहे हैं। सरकार की मंजूरी मिलते ही काम शुरू कर देेंगे।
चंद्रमौली शुक्ला, सीईओ प्राधिकरण
मामला केबिनेट की मंजूरी के इंतजार में है। जो फैसला होगा उसके आधार पर निर्णय लेंगे।
जयंत मलैया, आवास एवं पर्यावरण मंत्री
--------------
अगले वित्तवर्ष में शुरू कराएंगे काम
रिंग रोड की रिंग आज तक क्यों पूरी नहीं हुई?
- सरकार और प्राधिकरण के बीच का विवाद है।
पांच साल से प्राधिकरण से लेकर सरकार तक आपकी रही फिर आपने बतौर क्षेत्रीय विधायक क्या किया?
- मैंने तीन बार विधानसभा में मुद्दा उठाया। एक बार ध्यानाकर्षण भी लगाया।
नतीजा तो कुछ निकला ही नहीं?
- आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था यदि प्राधिकरण पैसा नहीं लगाता तो हम अगले वित्त वर्ष में सड़क के लिए बजट प्रावधानित कर देंगे।
प्राधिकरण पर कभी जोर नहीं दिया?
- दिया लेकिन उसकी स्थिति खराब होने के कारण बात नहीं बनी।
प्राधिकरण के पास स्कीम-134, 140 और 136 के विकास के लिए पैसा था रिंग रोड के लिए नहीं?
- ये आईडीए को समझना चाहिए।
सड़क बनने के बाद यहां कौनसी स्कीम विकसीत होना है जो पैसा लगाए? आईडीए की सोच तो नहीं है?
- जनहित में फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता। वैसे भी प्राधिकरण ने कई काम किए हैं।
कुल मिलाकर शहर आपसे और आपकी सरकार से क्या अपेक्षा रखे?
- अगले वित्त वर्ष में बजट मंजूर कराने के साथ काम शुरू कराकर रहेंगे।
सुदर्शन गुप्ता, क्षेत्रीय विधायक

राजधानी पहुंचा पुलक सिटी का 'रास्ताÓ

- मुख्यमंत्री सहित संबंधित मंत्रियों ने दिए जांच के निर्देश
इंदौर, सिटी रिपोर्टर ।
पुलक सिटी में अजमेरा बंधुओं द्वारा किए गए चमत्कार की शिकायत राजधानी तक पहुंच चुकी है। मुख्यमंत्री निवास तक शिकायत मिलने की सुग-बुगाहट लगते ही संबंधित विभाग के मंत्रियों ने भी जांच के आदेश दिए हैं। इधर, जिला प्रशासन में भी मंगलवार को पुलक सिटी की अप्रोच रोड चर्चाओं में रही।
कॉलोनी की अप्रोच रोड की वैधता को लेकर अनुराग इनानी ने शिकायत के साथ संबंधित विभागों के मंत्रियों और प्रमुख सचिवों को कानूनी नोटिस दिया था। मंगलवार को नोटिस का खुलासा होने के बाद कॉलोनी के कर्ताधर्ताओं के साथ मुनाफे के लालच में बल्क में कॉलोनी के प्लॉट-फ्लैट बिकवाने वाले दलालों के फोन दिनभर घन-घनाते रहे। सभी खरीदारों को अपने-अपने हिसाब से जवाब देते रहे। सूत्रों की मानें तो पूरी कॉलोनी के प्लॉट-फ्लैट बिक चुके हैं। उधर, शिकायत भोपाल में भी चर्चा में रही। मंगलवार को पुष्प रतन पैराडाइज में हुई तोडफ़ोड़ के बाद से अजमेरा बंधुओं के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे लोगों ने ताबड़तोड़ शिकायत की जानकारी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी दे दी। इस संबंध में चौहान ने संबंधित विभागों को शिकायत के तथ्यों की जांच के निर्देश भी दिए हैं।
उधर, शिकायत मिलते ही राजस्व मंत्री करणसिंह वर्मा और आवास मंत्री नरोत्तम मिश्रा भी सक्रीय हो गए जबकि आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया का कहना है कि उन्हें शिकायत अब तक मिली नहीं है। मिलती है तो तत्काल जांच कराकर आवश्यक भी करेंगे।
निशाने पर अफसर
सूत्रों की मानें तो जांच होती है तो निशाने पर कॉलोनी की डायवर्शन-डेवलपमेंट मंजूरी देने वाले अधिकारी होंगे। फिर आईडीए-नजूल-सीलिंग की एनओसी देखे बगैर कॉलोनी का ले-आउट को मंजूरी देने वाले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के कर्ताधर्ता हों या बगैर मौका रिपोर्ट के डायवर्शन-डेवलपमेंट की मंजूरी देने वाले जिला प्रशासन के अधिकारी। कॉलोनी की अप्रोच रोड की वैधता के मामले में क्षेत्रीय पटवारी दिनेश पटेल ने बताया पुलक सिटी मुंडी की जमीन पर है जबकि कॉलोनी की अप्रोच रोड राऊ की जमीन पर। अब इसके लिए जमीन खरीदी या नहीं इसकी मुझे जानकारी नहीं है। यह भी सही है कि यहां प्राधिकरण की स्कीम प्रस्तावित है।
सरैया की भूमिका पर सवाल
नियमानुसार डायवर्शन-डेवलपमेंट की मंजूरी से पहले राजस्व निरीक्षक (आरआई) मौका मुआयना करके रिपोर्ट देता है कि मौके पर जमीन की स्थिति क्या है। निर्माण है या नहीं। यदि निर्माण है तो मंजूरी नहीं दी जा सकती लेकिन कॉलोनी की मौका रिपोर्ट के संबंध में आरआई रवि सरैया का कहना था कि उनकी रिपोर्ट की यहां जरूरत नहीं पड़ी। वे जो भी कारण गिनाएं लेकिन हकीकत यही है कि मौके पर जाते तो उन्हें वहां मंजूरी से पहले ही शुरू हो चुके निर्माण नजर आ जाते।

पुलक सिटी पर शिकायतों का साया


इंदौर, विनोद शर्मा ।
आवास एवं पर्यावरण मंत्री, आवास मंत्री और राजस्व मंत्री के साथ कलेक्टर सहित 11 लोगों को एक व्यक्ति ने डिमांड ऑफ जस्टिस का नोटिस दिया है। नोटिस राऊ में प्रस्तावित पुलक सिटी की एप्रोच रोड की वैधता और उसकी मंजूरी पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए दिया गया है। कॉलोनी बीते मंगलवार पुष्प रतन पैराडाइज में हुई तोडफ़ोड़ के बाद से विवादों में उलझे अजमेरा बंधुओ और उनके सहयोगियों की है। उन्होंने तमाम आरोपों को सिरे से नकारते हुए स्पष्ट कर दिया कि कॉलोनी और उसकी एप्रोच रोड सौ प्रतिशत वैध है।
नोटिस देकर न्याय की मांग 103 साकार टेरेस-न्यू पलासिया निवासी अनुराग पिता शानप्रकाश इनानी ने की है। नोटिस में इनानी ने स्पष्ट कर दिया कि पुलक सिटी को मुख्य मार्ग से जोडऩे वाली एप्रोच रोड पूरी तरह गैरकानूनी है। रोड ग्राम राऊ स्थित खसरा नं. 1058 (रकबा-2.371 हेक्टेयर), 1059 (रकबा-1.542 हेक्टेयर) और 1062 (रकबा-0.943 हेक्टेयर) से निकाली गई है। ये जमीन किसानों की है। सीलिंग से प्रभावित इस जमीन के मालिकाना हक को किसान और प्रशासन के साथ किसान और इनानी बंधुओं के बीच पहले से विवाद चल रहा है।
राजस्व रेकॉर्ड में सरकारी
पुलक सिटी और किसानों की जमीन के बीच 415 मीटर लंबी और 28 मीटर चौड़ी जमीन की चिंदी है। खसरा नं. 1061 (रकबा-0.741 हेक्टेयर) स्थित ये जमीन राजस्व रेकॉर्ड में सरकारी है। प्राधिकरण ने यहां स्कीम-165 का जिक्र कर रखा है। हमारी जमीन के बाद एक जमीन ओर है जहां एप्रोच रोड जाती है, यहां हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनी प्रस्तावित है।
किस-किस को नोटिस
राजस्व मंत्री करणसिंह वर्मा, आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया, आवास मंत्री नरोत्तम मिश्रा, प्रमुख सचिव राजस्व, प्रमुख सचिव आवास, प्रमुख सचिव आवास एवं पर्यावरण, कलेक्टर इंदौर, सीईओ इंदौर विकास प्राधिकरण, चीफ इंजीनियर मप्र हाउसिंग बोर्ड और उप पंजीयक पंजीयन कार्यालय के साथ क्षेत्रीय विधायक।
चंपू का चमत्कार
अजमेरा बंधुओं द्वारा 22 अक्टूबर को दिए गए विज्ञापनों की मानें तो 19 अक्टूबर 2010 को जिला प्रशासन ने डायर्वशन (29/अ-2/10-11) मंजूरी दी। 20 अक्टूबर 2010 यानी अगले ही दिन जिला प्रशासन के अधिकारियों ने डेवलमेंट की मंजूरी (49/2010) भी दे दी। 21 अक्टूबर 2010 को अजमेरा बंधुओं ने अखबारों के लिए विज्ञापन भी जारी कर दिए जिसमें 12 मीटर चौड़ी निर्माणाधीन एप्रोच रोड के साथ निर्माणाधीन क्लब हाउस सहित दूसरे निर्माणाधीन कार्यों का फोटो सहित जिक्र भी कर दिया। जिला प्रशासन के अधिकारियों के सुस्त रवैये के बीच ये चमत्कार चंपू और उसकी चौकड़ी ही कर सकती थी।
सवाल जिनमें उलझे अजमेरा बंधु
- डायवर्शन के दूसरे दिन विज्ञापनों में जिन निर्माणाधीन कामों का जिक्र किया गया, उन्हें एक दिन में उस स्थिति में नहीं लाया जा सकता जितना फोटो में बताया गया था। यानी काम पहले शुरू हुआ, डायवर्शन और डेवलपमेंट की मंजूरी बाद में ली गई।
- यदि अजमेरा बंधु कहते हैं कि विज्ञापन में दिए गए फोटो पुलक सिटी के नहीं बल्कि दूसरी साइट के हैं तो ये लोगों के साथ धोखा किया गया।
- यदि वे कहते हैं कि शहर में चल रही क्रशर मशीनों और बड़ी मशीनरी का उपयोग करके उन्होंने एक दिन में इतना काम कर दिखाया तो वे उन कंपनियों का नाम बताएं या विकास की जल्दबाजी का कारण बताएं।
- वे खसरा नं. 1058, 1059 और 1062 की सीलिंग से प्रभावित जमीन भी नहीं खरीद सकते।

जिम्मेदारों का गैरजिम्मेदाराना कारनामा
- किसी भी कॉलोनी का ले-आउट मंजूर करने से पहले आईडीए-नजूल-हाउसिंग बोर्ड-सीलिंग जैसे विभागों की एनओसी देखी जाती है जो टीएंडसीपी के अधिकारियों ने नहीं देखी।
- आईडीए ने न एनओसी दी। न आपत्ति ली।
- डायवर्शन-डेवलपमेंट मंजूरी से पहले आरआई मौका रिपोर्ट देता है लेकिन पुलक सिटी की मौका रिपोर्ट में आरआई रवि सरैया पहले से शुरू हो चुका निर्माण हजम कर गए।
- यदि आरआई की रिपोर्ट में पहले से शुरू हो चुके निर्माण का जिक्र था तो एसडीएम मनोज पुष्प ने डायवर्शन-डेवलपमेंट मंजूरी कैसे दे दी?
---------
000000
मेरी मौका रिपोर्ट नहीं लगती। एसडीएम साहब का मामला था।
रवि सरैया, आरआई

कोर्ट में विचाराधीन मामला है तो सीलिंग की एनओसी नहीं दे सकते हैं।
अशोक खेड़े, बाबू-सीलिंग

न मुझे टाउनशिप का नाम याद है न मंजूरी या निर्माणाधीन कार्यों से संबंधित कुछ अन्य जानकारी।
मनोज पुष्प, एसडीएम

प्राधिकरण ने स्कीम-165 प्लान की है। जमीन अभी किसानों के पास है। यदि कोई जमीन सरकारी है तो उस पर निर्माण न हो, ये देखना जिला प्रशासन का काम है। वैसे हमने किसी को कोई एनओसी नहीं दी।
चंद्रमौली शुक्ला, सीईओ-प्राधिकरण

क्या कहते हैं जिम्मेदार
क्या है शिकायत?
जिस जमीन पर एप्रोच रोड बनी है वह कॉलोनी की नहीं बल्कि किसी अन्य की है।
किनकी है?
किसानों की।
आपने शिकायत क्यों की?
किसानों से मैंने अनुबंध कर रखा है।
एप्रोच रोड और किसकी जमीन से जाती है?
खसरा नं. 1061 से जो सरकारी जमीन है, जो प्राधिकरण की प्रस्तावित स्कीम का हिस्सा है।
अजमेरा बंधु कहते हैं आपके तथ्य झूठे हैं? जहां आप आईडीए की प्रस्तावित स्कीम बता रहे हैं वहां 30 मीटर चौड़ी रोड प्रस्तावित है?
मैंने कागज के टुकड़े पर शिकायत नहीं की, बल्कि लीगल नोटिस दिया है। मैं अपने तथ्यों के साथ कॉलोनाइजर को कोर्ट में चुनौती दूंगा। वहां मैं गलत हुआ तो कोर्ट मुझे दंड देगी। ये गलत हुए तो इन्हें।
अनुराग इनानी, शिकायतकर्ता

शिकायत भी फर्जी, शिकायतकर्ता भी
एप्रोच रोड प्राधिकरण और सीलिंग की जमीन पर है?
जिस किसान से पुलक सिटी की जमीन खरीदी। उसका इस जमीन से 70 बरस से आना-जाना था। 1986 से दस्तावेजों में भी सड़क ही है।
प्राधिकरण की स्कीम पर कैसे सड़क बना दी?
वहां प्राधिकरण की कोई स्कीम है ही नहीं। चिंदी असल में मुंडी और राऊ के बीच का कांकड़ है। मास्टर प्लान में यहां प्रस्तावित 30 मीटर चौड़ी रोड है।
ये रोड कहां से कहां तक जाती है?
रोड सिलीकॉन सिटी के पास से बायपास तक जाती है। मेरी कॉलोनी के मंजूर ले-आउट में इसका जिक्र भी है।
बाकी सीलिंग वाली जमीन?
जिन खसरों का जिक्र किया गया है वहां हमारी एप्रोच रोड जाती ही नहीं है। यह मनगढ़ंत कहानियां हैं।
डायवर्शन-डेवलपमेंट के दूसरे ही दिन कैसे बन गई सड़कें?
हमने विज्ञापन में प्रस्तावित लिखा था। निर्माणाधीन पिं्रट डिजाइनर की गलती। अभी तक कोई काम नहीं किया।
यानी आपकी फर्जी शिकायतें की जा रही है?
बिल्कुल, आप चाहो तो दस्तावेज भी देख लो। ऐसी शिकायतें पहले भी कई हो चुकी हैं।
कोई आपकी फर्जी शिकायत क्यों करेगा?
इनानी बंधु मुझे ब्लैकमेल करने आए थे, मैं सही हूं। उनकी बात नहीं सुनी। इसीलिए वे शिकायत कर रहे हैं।
रितेश अजमेरा, पुलक सिटी