Friday, December 23, 2016

ाात्रता से 20 फीट ज्यादा ऊंचा बनी प्रीमियम गुलमोहर

इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
नौ मीटर चौड़ी सड़क को 12 मीटर चौड़ी बताकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के अधिकारियों ने जिस होराइजन प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क नाम की टाउनशीप को मंजूरी दी उसमें बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हुआ है। बावजूद इसके नगर निगम के अधिकारी बिल्डर राजू टेकचंदानी और निखिल कोठारी की मनमानी को नजरअंदाज करते आ रहे हैं। शायद, इसीलिए अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई।
प्रीमियम गुलमोहर ग्यांस पार्क में हुई मनमानी का खुलासा दबंग दुनिया ने गुरुवार को ‘सड़क फैलाकर मंजूर कर दी छह मंजिला इमारत’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। खबर छपने के बाद नगर निगम तो हरकत में नहीं आई लेकिन टेकचंदानी ने जरूर नगर निगम के आला अधिकारियों व जिम्मेदारों के घर के चक्कर काटना शुरू कर दिए। उधर, लोकायुक्त में पहुंची शिकायत के अनुसार जितनी चौड़ी सड़क मौके पर थी उतनी के हिसाब से बिल्डिंग 40 फीट ऊंची बन सकती थी लेकिन अधिकारियों के खेल ने इसे 60 फीट की ऊंचाई दे दी।
निगम की टीएंडसीपी की मनमानी की पुष्टि
34 मार्च 2008 को टीएंडसीपी ने नियमों को नजरअंदाज करते हुए तीन ब्लॉक वाली इस छह मंजिला इमारत को मंजूरी दी। नगर निगम ने सड़क की चौड़ाई पर कोई आपत्ति नहीं ली। बस व्यक्तिगत लाभ अर्जित करते हुए नगर निगम के अधिकारियों ने बिल्डिंग बनाने वाली सूर्य शक्ति गृह निर्माण सहकारी संस्था को दो अतिरिक्त मंजिल बनाने की अनुमति दे दी। भवन निर्माण समिति की अनुसंशा (130/12 जनवरी 2010) पर भवन अनुज्ञा(25076) 25 जनवरी 2010 को जा की गई जो कि 15 जनवरी 2013 तक ही वैध थी। बावजूद इसके अधिकारियों से मिली खुली छूट के कारण अब तक मौके पर निर्माण किया जा रहा है।
नपती करके करें कार्रवाई
शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त से मांग की है कि टीएंडसीपी और नगर निगम द्वारा नियमों को नजरअंदाज करते हुए दी गई अनुमतियों की बारीकी से जांच हो। बिल्डिंग की नपती कराई जाए ताकि अवैध निर्माण भी सामने आए जो कि बड़े पैमाने पर हुआ है। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी पत्र लिखकर राजू टेकचंदानी व निखिल कोठारी के लाइसेंस रद्द करने व प्रकोष्ठ की बिक्री पर रोक लगाने की मांग की गई है।
पजेशन में भी परेशानी
टेकचंदानी ने जो बिल्डिंग बनाई उसके लिए लोगों से 24 महीने में पजेशन का वादा करके पैसे लिए गए थे लेकिन बिल्डिंग बनते-बनते छह साल हो चुके हैं। अब तक किसी एक फ्लैट में भी पजेशन नहीं दिया गया। शो-पीस की तरह दिखाने के लिए बनाए गए आधे-अधूरे फ्लैट को छोड़कर बाकी फ्लैट में टाइल्स तक भी नहीं लगी है।

पुखराज पैलेस के नक्शे में बदलाव का प्रस्ताव रद्द

इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
मुख्यमंत्री शिवराजरासिंह चौहान के हाथों प्लॉट बटवाने के बावजूद छह साल में सदस्यों को प्लाट नहीं दे पाई बसंत विहार गृह निर्माण सहकारी संस्था के नए नक्शे पर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट ने रोक लगा दी है। डिपार्टमेंट ने स्पष्ट कर दिया है कि सहकारिता विभाग से स्पष्ट निर्देश आने और नक्शे को लेकर मिल रही आपत्तियों के निराकरण के बिना नक्शा मंजूर नहीं किया जा सकता।
सबसे विवादित संस्थाओं में से एक जनकल्याण गृह निर्माण संस्था की जैबी संस्था बसंत विहार गृह निर्माण सहकारी संस्था के संचालकों ने कैस 2010 में मुख्यमंत्री के हाथों सदस्यों को प्लॉटों के आवंटन पत्र सौंपे और कैसे आज दिन तक सदस्यों को प्लॉट नहीं दे पाए? इसका खुलासा दबंग दुनिया ने 13 दिसंबर के अंक में ‘छह साल बाद भी प्लॉट नहीं दे पाई बसंत विहार’, शीर्षक से प्रकाशित खबर में किया था। इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए टीएंडसीपी के संयुक्त संचालक राजेश नागल ने सहकारिता विभाग से अभिमत मांगा।
सहकारिता विभाग : न मानें अभिमत, स्थगित रखें कार्रवाई
20 दिसंबर 2016 को जारी पत्र में सहकारिता विभाग के उपायुक्त ने कहा कि संस्था को स्वीकृत अभिन्यास के संशोधन के लिए अभिमत दिया था। बाद में शिकायतें मिली। जांच जारी है। वास्तविकता जांच रिपोर्ट में ही सामने आएगी। तब तक विभाग द्वारा दिए गए अभिमत पर टीएंडसीपी अपनी कार्रवाई को स्थगित रखे। जांच रिपोर्ट से डिपार्टमेंट को अवगत करा दिया जाएगा।
टीएंडसीपी : संसोधन स्थगित
संयुक्त संचालक नागल ने सहकारिता उपायुक्त से मिले पत्र के आधार पर 22 दिसंबर 2016 को बसंत विहार गृह निर्माण संस्था को पत्र लिखा और संशोधन स्थगित करने की जानकारी दे दी। नागल ने अपने पत्र में लिखा कि  संस्था की ग्राम निपानिया में 6.533 हेक्टेयर जमीन (सर्वे नं. 78/1, 78/3, 79/2, 77/2, 79/5, 88/2, 79/3 व 80/2) है। 129 इमली बाजार के पते पर पंजीबद्ध इस संस्था द्वारा प्रस्तावित पुखराज एवेन्यू कॉलोनी का ले-आउट 8 जुलाई 2011 को  मंजूर किया था, लेकिन विकास नहीं किया।  अगस्त 2016 में पूर्व स्वीकृत अभिन्यास में संशोधन की मांग करते हुए नया अभिन्यास मंजूरी के लिए लगाया। प्राप्त शिकायतों और सहकारिता विभाग के अभिमत के आधार पर अभिन्यास के संसोशन की कार्रवाई स्थगित की जाती है। सहकारिता विभाग से स्पष्ट जानकारी मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।

500 जनधन खातों में जमा हुए 100 करोड़

नोटबंदी का असर
औसत हर खाते में पहुंचे 20 लाख
10 लाख से अधिक जमाकरने वाले करीब एक हजार लोग इनकम टैक्स के निशाने पर
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
नोटबंदी की घोषणा के बाद इंदौर में भी गरीबों के खातों में कुबेरों ने जबरदस्त खेल किए। इसका बड़ा उदाहरण है आयकर की राडार पर आए 500 से अधिक जनधन खाते। इन खातों में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा केश जमा हुआ है। यानी हर खाते में औसत 20 लाख रुपए। बहरहाल, रकम किसकी है इस संबंध में आयकर ने छानबीन शुरू कर दी है।
नोटबंदी के बाद 17 दिसंबर को शुरू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना को लेकर पत्रकारों से रुबरू हुए मुख्य आयकर आयुक्त वी.के.माथुर ने यह जानकारी दी। माथुर ने बताया कि जनधन के जो खाते अब तक खाली पड़े थे उनमें यकायक पैसा आया है। किसी में दो लाख रुपए जमा है तो किसी में उससे कहीं ज्यादा। उन्होंने कहा कि एक-एक खाते की बारीकी से जांच की जा रही है। जल्द ही नोटिस की कार्रवाई की जाएगी।
500 से ज्यादा खातों में एक करोड़ से ज्यादा
माथुर ने बताया कि इनकम टैक्स ने चीफ कमिश्नरेट में 768 बैंक खातों को चिह्नित किया है जिनमें 8 नवंबर को हुई नोटबंदी के बाद 10 लाख रुपए से अधिक रकम जमा की गई है। इनमें 350 ऐसे खाते हैं जिनमें एक करोड़ से ज्यादा राशि जमा की गई। के्रेडिट को-आॅपरेटिव बैंक, सहकारी साख संस्था और मल्टी स्टेट को-आॅपरेटिव बैंकों में संचालित हो रहे 150 ऐसे खाते भी सामने आए हैं जिनमें एक करोड़ से 10 करोड़ तक की रकम जमा हुई है। इनमें 50 फीसदी कंपनियों के अकाउंट्स है और 50 फीसदी इंडिविजुअल्स।
60 बैंकें और 300 खातें भी आए सामने
इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग के अधिकारियों के साथ माथुर ने बताया कि हमने 60 को-आॅपरेटिव बैंकों को नोटिस देकर बड़े खातेदारों की सूची मांगी थी। 22 दिसंबर की शाम को ही बैंकों से तकरीबन 300 खातों की सूची मिली है जिनमें 10 लाख से लेकर 10 करोड़ रुपए तक जमा हुए हैं।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना आखिरी मौका
माथुर ने बताया कि नोटबंदी के बाद जिन लोगों ने 500 और 1000 के नोटों में जमा अपना कैश इन हैंड बैंक खातों में जमा कर दिया है या आयकर के डंडे के चक्कर से बचने के लिए जमा कर नहीं पा रहे हैं उनके लिए सरकार ने 17 दिसंबर से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना शुरू की है जो कि 31 मार्च 2017 तक चलेगी। इसके तहत हुए खुलासे पर 50 फीसदी टैक्स और जुमार्ना लगेगा। बाकी की 25 फीसदी रकम 4 साल के लिए बैंक में ही जमा रहेगी जिस पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा। अगर गरीब कल्याण योजना के बाद काले धन का पता चला और आय के स्रोत की जानकारी नहीं मिली तो 77.25 फीसदी पैसा सरकार ले लेगी। अगर आय का स्रोत साबित नहीं कर सके तो 85 फीसदी पैसा भरना होगा। योजना के बाद छापा पड़ने पर काला धन मिलने पर 60 फीसदी पैसा भरना होगा। अगर छापा पड़ा और काले धन होने की बात स्वीकारी तो 90 फीसदी पैसा सरकार को देना पड़ेगा। पहले पेनल्टी सहित टैक्स जमा करना होगा उसके बाद ही योजना का लाभ ले पाएंगे।
ताकि खत्म हो पेंडिंग मामले
1 जून से  डायरेक्ट टैक्स डिस्प्यूट रिजोल्यूशन स्कीम 2016 योजना शुरू की गई थी ताकि टैक्स और पेनल्टी के पेंडिंग केसेस का निराकरण किया जा सके। स्कीम के तहत 10 लाख तक के मामलों में टैक्स और पेनल्टी लगेगी। 10 लाख से अधिक के मामलों टैक्स और ब्याज के साथ 25 फीसदी पेनल्टी लगेगी। पेनल्टी के अपील प्रकरणों में 25 फीसदी राशि देकर 75 फीसदी से छूटकारा मिल सकता है। 31 दिसंबर तक चलने वाली स्कीम उनके लिए है जो सेटलमेंट चाहते हैं। अभी इंदौर परिक्षेत्र में 3000 से ज्यादा प्रकरण पेंडिंग हैं।

Thursday, December 15, 2016

सेंट्रल ब्यूरो आॅफ नार्कोटिक्स में अधिकारियों की मनमानी

वर्दी को बना दिया कमाई का जरिया
इंदौर. विनोद शर्मा ।
रिश्वत के मामले में सीबीआई ने जिस सेंट्रल ब्यूरो आॅफ नॉर्कोटिक्स (सीबीएन) के आॅफिस में रेड की उसे मीणा और खत्री ने कमाई का जरिया बना लिया है। यहां कार्रवाई कम और कमाई ज्यादा होती है। इससे पहले भी सीबीआई डी.एस.मीणा पर एक नहीं बल्कि दो बार रिश्वत मामले को लेकर कार्रवाई कर चुकी है। आखिरी बार 2011 में वे 10 लाख की रिश्वत के साथ गिरफ्तार हुए थे।
सीबीएन का मुख्यालय ग्वालियर है और प्रदेश का सबसे कमाऊ ईलाका नीमच, मंदसौर, जावरा, गरोठ, रतलाम है। क्योंकि यहां अफीम की खेती होती है। इसी तरह इसी क्षेत्र से लगे राजस्थान के कोटा के अधिकारियों का रुतबा भी बरकरार है। जिसका फायदा उठाने में सीबीएन के ये वर्दीधारी किसी भी हद को पार कर जाते हैं। नार्कोटिक्स की बड़ी-बड़ी खेप हाथ से निकल जाती है और छोटी खेप पर की गई कार्रवाई को बड़ा बता दिया जाता है। सोमवार को जिन दोनों अधिकारियों पर सीबीआई ने छापेमार कार्रवाई की है उनमें से एक अधीक्षक डी.एस.मीणा पर सीबीआई अपै्रल 2011 में भी छापेमार कार्रवाई कर चुकी है। मामला ट्रायल पर है।
मांगी थी 10 लाख की रिश्वत, मिले थे 7 लाख
-- 11 अपै्रल 2011 को सीबीआई ने मंदसौर में पदस्थ रहे इंस्पेक्टर डी.एस.मीणा ‘जो अब कोटा सीबीएन में अधीक्षक हैं’, को गिरफ्तार किया था। एक मामले की छानबीन में सीबीआई को पता चला था कि मीणा ने ओमप्रकाश पाटीदार से 10 लाख की रिश्वत मांगी थी। केस को रफादफा करने के लिए। बाद में पाटीदार गिरफ्तार हो गया। ना-नुकुर के बाद पाटीदार ने कबूला कि मीणा ने 10 लाख रुपए मांगे थे जिसमें से वह 7 लाख रुपए दे चुका है। इसी आधार पर मीणा के अड्डे पर रेड हुुई और सात लाख रुपए के साथ 61 ग्राम अफीम भी बरामद की गई। इस अफीम का उपयोग लोगों को झूठे केस में फंसाने का डर बताने के लिए किया जाता था।
-- इसी डी.एस.मीणा पर एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी), राजस्थान ने रिश्वत के आरोप में केस दर्ज किया था। सेंट्रल ब्यूरो आॅफ नार्कोटिक्स की तरफ से अभियोजन की स्वीकृति न मिलने के बाद जांच एजेंसी ने मामले खात्मा पेश कर दिया।
एक आरोपी दे चुका है मीणा की कस्टडी में जान
25 सितंबर 2016 को चंद्रशेखर पाटीदार (34) ने सीबीएन, कोटा के लॉकअप में आत्महत्या कर ली। इस सर्कल के इंचार्ज भी धर्मसिंह मीणा है।  पाटीदार को स्मगलिंग के एक मामले में 20 सितंबर को 5 करोड़ की ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया गया था। पूछताछ के लिए 28 सितंबर तक पाटीदार कस्टडी में रहना था। चंद्रशेखर ओमप्रकाश पाटीदार से ताल्लुक रखता था जिससे सात लाख की रिश्वत लेकर मीणा सलाखों के पीछे तक गए थे।
जून में इंदौर से उज्जैन पहुंचे है खत्री
मीणा के बेहाफ पर अज्ञात शिकायतकर्ता से 25 लाख रुपए की मांग करने वाले खत्री मुलत: इंदौर के वासी हैं। 12 फरवरी 1972 को जन्में खत्री केंद्रीय विद्यालय इंदौर से पढ़ाई की। 10 जनवरी 1997 को वे बतौर इंस्पेक्टर सीबीएन से जुड़े। 12 सितंबर 2012 को वे अधीक्षक बनाए गए। जून 2016 में ही उनका ट्रांसफर बतौर अधीक्षक इंदौर से उज्जैन हुआ है। रिश्वत मामले में उनके खिलाफ शिकायतें तो कई मिली लेकिन सीबीआई की टीम पहली बार उन तक पहुंची।

कैंसर और एड्स पीड़ितों के नाम पर ठग रही है इंदौरी चंदागैंग

- उज्जैन, आगर, झाबुआ, धार, अलीराजपुर, देवास में करोड़ों की ठगी
- झाबुआ में पकड़े जा चुके हैं गैंग के गुर्गे
- सरगना संदीप अब भी पुलिस की पकड़ से दूर
इंदौर. विनोद शर्मा ।
कैंसर और एड्स के पीड़ितों की मदद के नाम पर लोगों से चंदा वसूली को इंदौर के आधा दर्जन युवाओं ने अपना धंधा बना लिया है। इनमें से तीन युवाओं को जुलाई के महीने में झाबुआ पुलिस कैंसर व एड्स केअर सोसायटी के फर्जी रसीद कट्टों के साथ गिरफ्तार भी कर चुकी है। हालांकि पुलिस इस खेल के मास्टर माइंड तक नहीं पहुंच सकी। संदीप चौधरी नाम का यह शख्स विजयनगर इंदौर में रहता है। यह चंदागैंग न सिर्फ झाबुआ बल्कि इंदौर, धार, अलीराजपुर, उज्जैन, आगर और शाजापुर में भी हजारों रसीदें काटकर 10 करोड़ से ज्यादा की उगाही कर चुकी है।
17 जुलाई को व्यावसायी योगेश सालेचा की शिकायत पर राणापुर (झाबुआ) पुलिस ने कैंसर एड्स क्योर नामक संस्था की रसीदें काटकर चंदा वसूलने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें सचिन पिता राजवीर मलिक (32), राघव पिता रामसिंह गुर्जर (25) और अमित पिता उत्तमसिंह सिसोदिया (28) शामिल थे। पुलिस की पूछताछ में इन्होंने संदीप का नाम नहीं कबूला क्योंकि वह बाहर रहकर इन्हें छुड़वाने का काम करता है। ऐसे ही एक मामले में वह जुलाई में ही आगर पुलिस स्टेशन से भी इन्हें छुड़वा चुका है। हालांकि तफ्तीश के दौरान दबंग दुनिया के सामने अमित ने संदीप के नाम का खुलासा कर दिया।
ऐसे आए थे पकड़ में
राणापुर के व्यावसायी योगेश सालेचा ने बताया कि तीनों चंदा लेने उनके पास पहुंचे। उन्होंने 500 रुपए का चंदा दिया भी। वे रसीद दे रहे थे तभी चंदा दे चुके वहीं के तीन लोग धर्मेश जैन, राजेश व कैलाश भी पहुंचे। उन्होंने रसीद पर पंजीयन नंबर न होने की बात बताई। चारों ने पंजीयन नंबर के बारे में पूछताछ शुरू की तो तीनों भाग गए। मामले की सूचना तत्काल राणापुर पुलिस को दी। पुलिस ने घेराबंदी के बाद तीनों को उनकी कार (अल्टो 800 जिसका नंबर यूपी17सी8717) के साथ पकड़ा। थाना प्रभारी भीमसिंह सिसोदिया ने तीनों के खिलाफ भादवि की धारा 34 और 420 के तहत धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया। कुछ दिन पहले ही जमानत मिली। 8 और 10 नवंबर को मामले की सुनवाई झाबुआ कोर्ट में भी थी।
ऐसे पहुंचे संदीप तक
मामले की जानकारी मिलने के बाद दबंग दुनिया ने सरगना की तलाश शुरू कर दी। पहली कड़ी हाथ लगी 28 अक्टूबर 2016 को जब अमित सिसोदिया से उसके कबीटखेड़ी स्थित घर पर मुलाकात हुई। बातचीत में अमित ने बताया कि मैं राऊ बायपास पर ईडन गार्डन नाम की निर्माणाधीन टाउनशीप में कंस्ट्रक्शन से जुड़ा काम करता था। जून में नौकरी छोड़ दी। चूंकि संदीप के साथ सात-आठ साल पहले मैं काम कर चुका था। इसीलिए मैंने उनसे नौकरी की बात की। उन्होंने कहा ठीक है देशभक्त सेवा ट्रस्ट के नाम से एनजीओ शुरू कर रहे हैं उससे जोड़ लेंगे। फिलहाल तो कैंसर व एंड्स केअर संस्था का काम करो। सचिन और राधव ‘जो कि पहले से संदीप के लिए काम करते थे’, के साथ मैंने काम शुरू किया ही था कि झाबुआ पुलिस ने पकड़ लिया। मैं इनके चक्कर में फंस गया। पूरा परिवार परेशान हुआ है।
ऐसे चल रही चंदा गैंग
-- संदीप चौधरी मुलत: मेरठ से है। झाबुआ पुलिस द्वारा पकड़ा गया सचिन मलिक उसके रिश्ते में है जो भी मेरठ का रहने वाला है। दोनों ऐसे एनजीओ तलाशते हैं जो कि अर्से से निष्क्रिय है। बाद में उनके रसीद कट्टे छपवाते हैं। एनजीओ में नौकरी के नाम पर लड़कों को कट्टा पकड़ाकर चंदा वसूली के लिए छोड़ देते हैं।
-- लड़के ऐसे ढूंढे जाते हैं जो कि पड़े लिखे हों ताकि चंदा लेते वक्त वे चंदा देने वाले को ट्रस्ट के बारे में ज्यादा अच्छे से समझा सके।
-- जिसे पुलिस रिकार्ड में राघव पिता रामसिंह गुर्जर बताया गया है असल में उसका नाम अक्षय सिंह गुर्जर है। 1 जनवरी 1996 को जन्मा राघव यूं तो ज्ञानशीला डेवलपर्स लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेंट सेल्स एंड मार्केटिंग है लेकिन उसके खिलाफ और भी आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज हैं। उसके नजदीकी मित्रों के अनुसार वह बड़ा अपराधि बनना चाहता है। 

हृदयेश दीक्षित : आठ साल, दो छापे, 2000 करोड़ का काला कारोबार उजागर

प्रदेश टूडे को बनाया सरकारी नजर से का जरिया
मेडिकल और मिड डे मिल से लेकर व्यापमं और खदानों के खेल तक में है दीक्षित का हाथ
इंदौर. विनोद शर्मा ।
बीते दिनों चिरायू हॉस्पिटल में हुई छापेमार कार्रवाई के दौरान सीबीआई के हाथ लगे दस्तावेजों में जिस हृदयेश दीक्षित का नाम था उसके खिलाफ 2007 से 2016 के बीच दो बार इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग की छापेमार कार्रवाई हुई। 2007 की छापेमारी ने जहां दवा व मेडिकल उपकरण की सप्लाई का गौरखधंधा बंद करवा दिया था वहीं 2016 की छापेमारी ने दीक्षित और उनके वित्तीय आकाओं की जड़े हिला दी। बहरहाल, आयकर की मार से बौखलाया दीक्षित मामले को सेटल करने के लिए अधिकारियों पर दबाव बना रहा है।
1989 में स्पूतनिक में बतौर फ्री लांस रिपोर्टर अपना करियर शुरू करने वाले दीक्षित ने व्यापमं के आरोपी पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, खदान माफिया सुधीर शर्मा और दलिया माफिया सुनील जैन के वित्तीय सहयोग से प्रदेश टूडे की नींव रखी।  मकसद व्यापमं, अवैधानिक खनीज उत्खनन और दलिये के काले कारोबार को अखबार की आड़ देना था ताकि सरकारी नजरों से बचा जा सके। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन विंग ने तमाम तथ्यों को जानने और दीक्षित बंधुओं को टॉप कनेक्शन को समझने के बाद भी धमाकेदार कार्रवाई की।
2008 : छापे ने उजागर किया दवा सप्लाई रैकेट
30 मई 2008 को इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अजय विश्नोई के भाई अभय विश्नोई,  स्वास्थ्य सचिव  राजेश राजौरा, रिटायर्ड आईएएस यूके सामल और हृदयेश दीक्षित के खिलाफ छापेमार कार्रवाई की। कुल 56 जगह छापे मारे थे। कार्रवाई में लघू उद्योग निगम के माध्यम से किए जा रहे 1000 करोड़ के दवा व मेडिकल उपकरणों की सप्लाई का भंडाफोड़ हुआ। 7 सितंबर 2007 को हैल्थ डायरेक्टर रहे योगीराज शर्मा के घर हुई इनकम टैक्स की कार्रवाई में स्पलाई घोटाले के सुराग डिपार्टमेंट के हाथ लगे थे। इसका जिक्र 1 फरवरी 2008 को विधानसभा में नेताप्रतिपक्ष जमूना देवी ने भी किया था। दीक्षित अशोक शर्मा के रिश्तेदार हैं और उनके भाई अवधेश दीक्षित मेडिकल सप्लायर थे।
2016 : 800 करोड़ का मिड डे मिल घोटाला उजागर
12 जुलाई 2016 को एक बार फिर इनकम टैक्स ने दीक्षित बंधुओं और  एमपी एग्रो के सुनील जैन के खिलाफ छापेमार कार्रवाई की। कार्रवाई मिड डे मिल में दलिये की सप्लाई घोटाले की शिकायतों के बाद हुई। एमपी एग्रो और महिला एवं बाल विकास विभाग के बीच सालाना 800 करोड़ का कांट्रेक्ट था। कार्रवाई में सुनील जैन ने 50 करोड़ की काली कमाई स्वीकारी और पत्रकारिता के तथाकथित पुरौधा दीक्षित ने 5 करोड़ सरेंडर किए।  
पत्रकार से अखबार मालिक तक का सफर...
शिक्षक माता-पिता के घर के जन्में दीक्षित ने 1988-89 में स्पूतनिक से फ्री लांसर के रूप में पत्रकारिता शुरू की। कुछ दिन नवभारत में रहे। जो विवाद के बाद छोड़ा। फिर चेतना व दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग की। बतौर पत्रकार राजनीतिक गलियारों में पकड़ बनाई। इसी दोरान पिता ने बिजासन के पास पुश्तैनी जमीन बेची। करीब एक करोड़ रुपया आया। भाई अवधेश दीक्षित को पहले नगर निगम इंदौर का ठेकेदार बनाया। बाद में खुद ने भोपाल ट्रांसफर लिया। जीन्यूज, सहारा समय और 2008-09 तक राज एक्सप्रेस में भी पत्रकारिता की। 2008 में जिस वक्त छापा पड़ा था उस वक्त वे राज एक्सप्रेस में ही थे।
इस दौरान सरकार में अपने संबंधों और मीडिया में अपनी धाक को भुनाते हुए दीक्षित ने अपने भाई को नगर निगम से निकालकर दवाइयों व मेडिकल उपकरणों का बड़ा सप्लायर बना दिया।
मिलेजुले पैसे से पनपा प्रदेश टूडे
इसी दौरान आईएएस व मंत्रियों से वित्तीय मित्रता भी हो गई। जिसका फायदा उन्हें 2009- 10 में मिला जब प्रदेश टूडे पहले मेग्जीन के रूप में निकाला। सालभर बाद अखबार के रूप में। इसमें पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, खदान माफिया सुधीर शर्मा, चिरायू वाले डॉ. अजय गोयनका, दलिया वाले सुनील जैन व कुछ आईएएस की भूमिका अहम रही। कई के नाम इनकम टैक्स की हालिया सर्च में भी सामने आए हैं। बाद में राज एक्सप्रेस में अपने ही साथ काम करने वाले लोगों को तोड़ा और प्रदेश टूडे में ऊंचे ओहदे पर रखा।
पत्रकारों को बना दिया फर्जी डायरेक्टर
दीक्षित बंधुओं की एक कंपनी डमी डायरेक्टरों में देवेश कल्याणी का नाम भी शामिल है जो अखबार के भोपाल संस्करण के संपादक हैं। कल्याणी ग्लोबल रियलकॉन प्रा.लि. में शांतनु दीक्षित के साथ डायरेक्टर हैं। कंपनी लैंडमार्क बिल्डिंग न्यू लिंक रोड अंधेरी, मुंबई के पते पर पंजीबद्ध है।
ऐसा ही एक नाम है सतीश पुरुषोत्तम पिंपले का जो भी प्रदेश टूडे में डायरेक्टर है। यह भी दीक्षित के साथ राज एक्सप्रेस में रहा है। फिलहाल यह अवधुत मीडिया प्रा.लि. में भी डायरेक्टर हैं। 

टैक्स चोर ह्दयेश दीक्षित अब आयकर को दिखाने लगा आंख

जुलाई में हुई छापेमार कार्रवाई को हाईकोर्ट में दी फर्जी तथ्यों से चुनौती
कहा : मैं आईडीएस में काली कमाई स्वीकारना चाहता था, विंग ने छापा मारकर इज्जत खराब कर दी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
एक कहावत है, उलटा चोर, कोतवाल को डांटे, जो कि पत्रकारिता की आड़ में सरकारी दलाली करते आ रहे ह्रदयेश दीक्षित पर सटीक बैठती है। क्योंकि अगस्त में इनकम टैक्स की छापेमार कार्रवाई में दीक्षित ने पांच करोड़ की काली कमाई स्वीकारी और अक्टूबर में उसी कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। मकसद है, कार्रवाई को गलत साबित करके इनकम टैक्स के आला अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करना।
12 जुलाई को इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने दलिया माफिया सुनील जैन और पत्रकारिता की आड़ में मिड डे मिल घोटाले को पोषित करते आए प्रदेश टूडे के मालिक ह्रदयेश दीक्षित के 35 ठिकानों पर दबिश दी थी। प्रोबेशरी आॅर्डर (पीओ) के कारण कार्रवाई अगस्त के दूसरे सप्ताह तक चली। पहले जैन ने 50 करोड़ की काली कमाई स्वीकारी। इसके बाद आयकर अधिकारियों को अपने राजनीतिक और प्रशासनिक संबंधों से प्रभावित करने में बूरी तरह नाकाम रहे दीक्षित बंधुओं ने 5 करोड़ की अघोषित आय सरेंडर की।
अब इनकम टैक्स को दिखा रहे हैं आंख...
66 भक्त प्रहलादनगर निवासी अवधेश पिता मोहनलाल दीक्षित ने 26 सितंबर को रीट पिटिशन(डब्ल्यूपी) 6648/2016  फाइल की और इनकम टैक्स की कार्रवाई को चुनौती दी। पिटिशन में दीक्षित बंधुओं ने मिनिस्ट्री आॅफ फाइनेंस, डायरेक्टर इनकम टैक्स (इन्वेस्टिगेशन), भोपाल और प्रिंसिपल कमिश्नर इनकम टैक्स, आयकर भवन इंदौर को पार्टी बनाया।
इनकम टैक्स पर आरोप, अवैध तरीके से मारा छापा
संविधान के आर्टीकल 226 और 227 के तहत फाइल की गई इस याचिका में इनकम टैक्स एक्ट की धारा 132 को चुनौती दी गई जिसके तहत दीक्षित बंधुओं के घर पर छापेमार कार्रवाई की गई थी। 29 सितंबर 2016 को हाईकोर्ट ने याचिका पर मिनिस्ट्री आॅफ फाइनेंस, डायरेक्टर इनकम टैक्स (इन्वेस्टिगेशन), भोपाल और प्रिंसिपल कमिश्नर इनकम टैक्स, आयकर भवन इंदौर को नोटिस जारी कर दिए। सुनवाई के लिए अगली तारीख 20 दिसंबर 2016 मुकरर्र कर दी।
इस याचिका के माध्यम से दीक्षित बंधुओं का यह कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 1 जून से इनकम डिस्क्लोज स्कीम (आईडीएस) लांच की थी ताकि कोई भी व्यक्ति अपनी काली कमाई स्वत: ही स्वीकार ले। हम भी इस योजना का लाभ लेकर अपनी काली कमाई स्वीकारना चाहते थे लेकिन इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग ने बीच में ही छापेमार कार्रवाई कर दी। कार्रवाई का मकसद सिर्फ और सिर्फ हमें परेशान करना था। ताकि हमारी छवि हो।
हां मैं टैक्स चोर हूं.... दीक्षित
कालेधंधे को बचाए रखने के लिए निकाले जा रहे प्रदेश टूडे में उद्योगपतियों को टैक्स चोर बताते आए दीक्षित बंधुओं ने अगस्त में 5 करोड़ की काली कमाई सरेंडर करके यह स्वीकारा कि उन्होंने टैक्स चोरी करके भारीभरकम काली कमाई संग्रह की। इसके बाद जो याचिका लगाई है उसमें भी साफ लिखा है कि हम तो आईडीएस के तहत अपनी अघोषित आय स्वीकारना चाहते थे। उधर, आयकर विभाग से जुड़े जानकारों की मानें तो  अघोषित आय / काले धन को उजागर करने के लिए आयकर अधिनियम, 1961 की धाराए 132 व 133अ के तहत आयकर प्राधिकारीगण आयकर सर्च व सर्वे की कार्यवाही को अंजाम दिया जाता है। इसमें सरेंडर कराने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन असेसी बड़ी कार्रवाई से बचने के लिए कार्रवाई के दौरान स्वीकार लेता है उसने फला-फला रकम गलत तरीके से अर्जित की। जिसकी जानकारी उसने अकाउंट बुक्स में नहीं दी थी ताकि टैक्स चोरी की जा सके। इसीलिए इसे अघोषित आय कहते हैं जिसे सरेंडर करने के बाद दीक्षित जैसे लोगों को न सिर्फ आयकर बल्कि पेनल्टी भी चुकाना पड़ती है।
अगली तारीख तय नहीं
अवधेश दीक्षित ने इनकम टैक्स की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। अभी नोटीस जारी हुए हैं। बीच में एक तारीख लगी थी लेकिन नंबर नहीं आया। अगली तारीख तय नहीं हुई है। तब तक विभाग भी अपना रिप्लाय फायल कर देगा। प्रथम दृष्टया ही दीक्षित बंधुओं का केस और तर्क कमजोर हैं।
वीना मांडलिक
इनकम टैक्स की एडवोकेट
दम नहीं है दीक्षित की चुनौती में...
1- सरकार ने आईडीएस की स्कीम घोषित की थी लेकिन ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई गई कि स्कीम समयसीमा में इनकम टैक्स की टीम सर्च या सर्वे की कार्रवाई नहीं कर सकती।
2- स्कीम 1 जून से लागू हुई। छापा पड़ा 12 जुलाई को। मतलब स्कीम लागू होने के बाद 42 दिन बाद। इन 42 दिनों में दीक्षित बंधुओं ने काली कमाई क्यों नहीं स्वीकारी। किस बात का इंतजार करते रहे?
3- 12 जुलाई को हुई कार्रवाई। 12 अगस्त को सरेंडर किए पांच करोड़। कार्रवाई को चुनौती 77 दिन बाद चुनौती क्यों दी? क्या इस दौरान मजबूत फैक्ट्स नहीं थे?
4- कार्रवाई यदि अवैध थी तो फिर पांच करोड़ की काली कमाई सरेंडर क्यों की?
5- 2008 में भी कार्रवाई हुई थी। मतलब आप आदतन टैक्स चोर हैं। इसीलिए इसीलिए सरकार से राहत के पात्र भी नहीं है। फिर सहानुभूति की उम्मीद क्यों?