Monday, September 20, 2010

NEMAWAR ROAD KI DASHA


बिजली मीटर बने शोपीस
विनोद शर्मा

इंदौर । एनर्जी ऑडिट के नाम पर लगाए गए मीटर शोपीस की तरह ट्रांसफार्मरों की शोभा बढ़ाने से ज्यादा काम नहीं आ रहे हैं। एकलेरेटेड पॉवर डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म प्रोग्राम (एपीडीआरपी) के तहत लगाए गए सैकड़ों मीटर बंद पड़े हैं।

बंद मीटरों से बेखबर शतप्रतिशत मॉनिटरिंग का दावा करके कंपनी बिजली कंपनी के साथ उपभोक्ताओं की आंखों में भी धूल झोंक रही है। कंपनी की मनमानी से बिजली कंपनी प्रबंधन भी वाकिफ है। हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय नेता से ताल्लुक रखने वाली इस कंपनी की मनमानियों पर लगाम कसने की हिम्मत जुटाने वाला कोई नहीं।
एपीडीआरपी के तहत मप्र की तीनों वितरण कंपनियों (पूर्व, पश्चिम और मध्य क्षेत्र) के तकरीबन 25 हजार ट्रांसफार्मरों पर मीटर लगना थे। इनमें 15 हजार मीटर ओमनी एगेट सिस्टम प्रा.लि. को लगाना थे।

बिजली के जानकारों की मानें तो एपीडीआरपी की समयसीमा खत्म हो चुकी है लेकिन कंपनी 65 प्रतिशत से ज्यादा काम नहीं कर पाई। लगाए गए 15 प्रतिशत मीटर बंद हैं। ट्रांसफार्मरों की मॉनिटरिंग करके बिजली की आपूर्ति और खपत का आंकलन हो इसके लिए ये मीटर लगाए गए थे। अब यदि 15 प्रतिशत मीटर बंद है तो कंपनी शतप्रतिशत मॉनिटरिंग का दावा कैसे कर सकती है? इसका संतोषजनक जवाब देने वाला कोई नहीं।

इसलिए मेहरबान

ओमनी एगेट सिस्टम प्रा.लि. मुलत: चैन्नई की कंपनी है। कंपनी को भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पारिवारिक संपत्ति बताया जाता है। मप्रपक्षेविविकं के अधिकारियों की मानें तो कंपनी हमेशा राजनीतिक दबाव बनाकर काम कराती है। रोक चुके हैं 70 लाख का पेमेंट
कंपनी द्वारा लगाए कई मीटर बंद है।

ऎसे मप्रपक्षेविविकं के अधिकारी भी मानते हैं कि कंपनी का काम सिर्फ मीटर लगाना नहीं था। बल्कि मीटर लगाकर उनकी मॉनिटरिंग करना और ऑब्जरवेशन रिपोर्ट देना था। अब तक कंपनी ने मीटर लगाने और मॉनिटरिंग करने दोनों ही क्षेत्र में निराश किया है। इसके लिए कंपनी को नोटिस देकर 70 लाख का पेमेंट भी रोका जा चुका है।

मॉडेम का बहाना

मनमानी को नकारने वाली कंपनी का रिलायंस से विवाद हुआ। बकाया भुगतान न होने पर रिलायंस ने कंपनी को दी सिमें बंद कर दी थी। अब कंपनी कहती है मॉडेम में खराबी से मॉनिटरिंग में दिक्कत आ रही है।

असेम्बल किए मीटर

अनुबंध के अनुसार कंपनी ब्रांडेड मीटर लगाने के बजाय यहां-वहां से सामान जुटाकर असेम्बल किए हुए मीटर लगा रही है। कारण टैक्स चोरी। इसका खुलासा 18 फरवरी 2010 को कंपनी के क्षेत्रीय कार्यालय पर हुई छापामार कार्रवाई में भी हो चुका है।

अभी तो एक्सपेरिमेंटल स्टेज है

अभी मामला एक्सपेरिमेंटल स्टेज पर है। मॉडम के माध्यम से डाटा कलेक्शन करने का काम चल रहा है। कंपनी द्वारा लगाए गए मीटरों का भौतिक सत्यापन हमारा मैदानी अमला कर रहा है। कहीं 30 प्रतिशत तो कहीं 70 प्रतिशत तक हुआ है। काम अभी जारी है।
संजय शुक्ला, सीएमडी मप्रमक्षेविविकं

ABHINANDAN NAGAR

इंदौर से 400 करोड़ का हवाला



मुंबई से लौटकर विनोद शर्मा

इंदौर । इंदौर के एक रियल एस्टेट समूह सैटेलाइट से जुड़े कुछ लोगों के खिलाफ हवाला का बड़ा मामला पकड़ में आया है। विदेश से रकम के अवैध लेनदेन का यह आंकड़ा शुरूआती जांच में ही करीब 400 करोड़ रूपए का बताया जा रहा है। मुंबई से प्रवर्तन निदेशालय ने फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत सैटेलाइट के कर्ताधर्ताओं समेत इंदौर के 13 लोगों को इस मामले में नोटिस थमाए हैं। शहर में कई कॉलोनियां काटने वाले सैटेलाइट समूह के कर्ताधर्ता इंदौर के अजमेरा बंधु व अन्य हैं।

छापे में मिले थे सुराग
नवंबर 2009 में आयकर विभाग ने सैटेलाइट, चिराग रियल एस्टेट, मयूरी हिना हर्बल और फिनिक्स ग्रुप के इंदौर-उज्जैन व मुंबई स्थित ठिकानों पर छापा मारा था। इसी में हवाला के सुराग मिले।सैटेलाइट समूह का मुख्यालय मुंबई में है। इसके बाद मुंबई स्थित प्रवर्तन निदेशालय के अफसरों ने छानबीन की और फेमा के तहत जांच शुरू की। पहले चरण में सैटेलाइट गु्रप और उसकी सहयोगी कंपनियों से ताल्लुक रखने वाले 13 लोगों को नोटिस जारी हुए हैं।

घेरे में कई बड़े नाम
आरोपियों में सैटेलाइट समूह के कर्ताधर्ता रितेश अजमेरा उर्फ चंपू, उसका भाई निलेश अजमेरा, दीपक जैन (दिलीप सिसौदिया), हैप्पी धवन, अरूण डागरिया, चिराग शाह, वीरेंद्र चौधरी, विनोद गुप्ता, मोहन चुघ, अतुल सुराना के अलावा जमीन के बड़े खिलाड़ी शरद डोसी व अन्य हैं। एक बड़ा नाम मुंबई के ब्रजेश शाह का भी है।

इंदौर में चार टाउनशिप
अजमेरा बंधुओं और उनके सहयोगियों ने 23 फर्म बना रखी है। इनमें वे अलग-अलग डायरेक्टर हैं। इन्हीं कंपनियों में से एक है सैटेलाइट ग्रुप। इंदौर में इसकी चार टाउनशिप है। सैटेलाइट जंक्शन (पंचवटी), सैटेलाइट टाउनशिप (बिजलपुर क्षेत्र), सैटेलाइट हिल्स (बायपास) और सैटेलाइट सिटी (खंडवा रोड)। गु्रप का कारोबार 20 शहरों में फैला है।
भोपाल में कई एकड़ जमीन नकद खरीदे जाने के बाद से आयकर विभाग की निगाह इस समूह पर थी।
आयकर विभाग ने छापे में 25 करोड़ की प्रॉपर्टी के दस्तावेज, 20 लाख रूपए नकद और 80 लाख के जेवर बरामद किए थे। 13 खाते सील किए गए थे। इसके बाद ग्रुप ने 25 करोड़ रूपए सरेंडर किए।

मंदी ने ध्वस्त किए सारे मंसूबे
हवाला के इस पूरे कांड की कड़ी दुबई से जुड़ी है। अजमेरा बंधु और उनके सहयोगी दुबई में कॉलोनी काटना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने दिसंबर 2007 से जनवरी 2008 के बीच डेढ़ से दोगुना रूपए लौटाने का प्रस्ताव देकर इंदौर के नामी-गिरामी लोगों से करोड़ों रूपए जुटाए।

रूपया देने वालों में पीडीपीएल के डायरेक्टर विनोद गुप्ता सहित कई लोग शामिल हैं। पैसा इकटा होते ही अजमेरा बंधुओं ने दुबई में जमीन खरीदी और आधा पैसा चुका दिया। आधे के भुगतान के लिए चेक दिए गए। सौदे के बाद जब मंदी के कारण जमीन की कीमत में 80 फीसदी तक की गिरावट आई तो इनकी योजना ध्वस्त हो गई।

चेक बाउंस काभी आरोपी है चंपू अजमेरा
वादे के मुताबिक तय समय में जब अजमेरा बंधुओं ने पैसा नहीं दिया तो लेनदारों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया। दबाव से तंग बंधुओं ने आनन-फानन में उन्हें चेक थमा दिए जो बाद में बाउंस हो गए। नाराज लेनदारों ने अजमेरा बंधुओं के खिलाफ धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया। 70 फीसदी रकम निकालने वाले कुछ लेनदार ऎसे भी हैं जो वसूली के लिए अजमेरा पर पिस्तौल तान चुके हैं।

पैसा देकर पछता रहे विनोद गुप्ता ने भी अजमेरा बंधुओं के खिलाफ मुकदमा ठोंक रखा है। "पत्रिका" को गुप्ता ने बताया, जनवरी 2008 को चेक से 2.5 करोड़ रूपए रितेश-निलेश को दिए थे। उन्होंने दो महीने में पैसा लौटाने को कहा, लेकिन आज तक नहीं लौटाया। पैसा सामान्य कर्ज के रूप में दिया था। पैसे का उन्होंने क्या किया? इसकी मुझे जानकारी नहीं है।

कहां से आई इतनी रकम?
हवाला कारोबार की रकम चार सौ करोड़ रूपए बताई जा रही है। ऎसे में सवाल यह है कि एक दशक पहले तक मेहंदी का कारोबार करने वाले अजमेरा बंधुओं की अरबों रूपए की हैसियत कैसे हो गई? ऎसे ही सवालों के जवाब तलाशने के लिए प्रवर्तन निदेशालय कडियां तलाश रहा है। किस-किसने उन्हें पैसा उपलब्ध कराया? और क्यों? उनका निजी हित क्या था?
मुसीबत के हाईवे


विनोद शर्मा


इंदौर। एक फीट से गहरे गड्ढों का जख्म...। डामर के इंतजार में बिखरती गिट्टी-चूरी...। यह व्यथा है इंदौर को धार-झाबुआ-रतलाम, मंदसौर, नीमच ही नहीं, गुजरात-राजस्थान से जोड़ने वाले एनएच-59 (इंदौर-लेबड़) की। एक तरफ औद्योगिक क्षेत्रों का हवाला देकर सरकार निवेशकों को पीले चावल दे रही है, वहीं इन्हें जोड़ने वाली यह रोड खत्म हो चुकी है।

तीन दिन पहले यहां लगे जाम का कारण तलाशने पहुंचे तो हकीकत यही नजर आई। लोगों ने बताया पांच किमी पार करने में एक घंटा भी कम पड़ता है। दुर्दशा दूर करने की बात करते ही अधिकारी इंदौर-अहमदाबाद रोड की निर्माणाधीन योजना का हवाला देने बैठ जाते हैं। ऎसे में सवाल यह उठता है कि क्या नई सड़क नहीं बनेगी, तब तक लोग यूं ही परेशान होते रहेंगे।

दिया एक और विकल्प
एनएच-59 के निर्माणाधीन विस्तार और दो दिन पहले लगे जाम से सबक लेते हुए अब एबी रोड जाने वाली गाडियों को नागदा से स्टेट हाइवे (एसएच)-31 (नागदा, धार-मांडव रोड होते हुए गुजरी) पर छोड़ा जा रहा है। ट्रक ड्राइवर मो. सईद और शहजाद खान ने बताया इस रूट से एबी रोड पहुंचने के लिए 40 किलोमीटर से ज्यादा का अतिरिक्त सफर तय करना होगा। रूट वैसे तो पुराना है लेकिन इसकी दुर्दशा ने ही लोगों को नागदा, लेबड़, घाटा बिल्लौद, पीथमपुर होते हुए एनएच-3 पहुंचने का ये नया रास्ता दिखाया था।

उनकी दिक्कत, इनका धंधा
- गाडियों की दुर्दशा ने बढ़ाए क्षेत्र में गैरेज।
- पंक्चर गाडियों की संख्या के साथ पंक्चर जोड़ने वाले भी बढ़े।
- जेक भी मिलते हैं भाड़े पर।
- लेबड़ और घाटा बिल्लौद में के्रन भी मिलती है तैयार।

कहां खराब
घाटा बिल्लौद से लेबड़ पांच किमी पूरी तरह उखड़ा। नेशनल स्टील्स के सामने सड़क उखड़कर नाला बन गई। दिनभर पानी बहता है।
चंबल पर बना पुल उखड़ने लगा।
घाटा बिल्लौद माता मंदिर के सामने एक-डेढ़ फीट गहरे गड्ढे।

भारी यातायात
पीथमपुर, स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) और नए-नवेले इंदौर-खलघाट रोड के कारण घाटा बिल्लौद से एक घंटे में 700 से ज्यादा वाहन गुजरते हैं। इनमें 50 फीसदी भारी वाहन हैं। पीथमपुर-महू रोड की हालत धार रोड से बेहतर होने से 60 प्रश यातायात पीथमपुर फाटा से पीथमपुर मुड़ जाता है। बाकी 40 प्रतिशत इंदौर की ओर।

नई सड़क बनने तक ऎसे ही होंगे परेशान?
एनएच-59 (इंदौर-लेबड़)
आखिरी बार बनी : 2007-08 में
लागत : 8 करोड़ रूपए।
16 हजार से ज्यादा वाहन रोज
इंदौर से चलती हैं 200 बसें।
15 हजार से ज्यादा यात्री

इंदौर-भोपाल : 185 किलोमीटर का सफर 3 से साढ़े तीन घंटे।
इंदौर-लेबड़ : 40 किलोमीटर और सफर दो घंटे का?

इन्हें जोड़ता है रोड
एनएच-59 : धार, झाबुआ, अहमदाबाद
एनएच-79 : नागदा, नीमच, मंदसौर, कोटा
एसएच-31 : नागदा, धार, गुजरी
सौ करोड़ में संवरेगा इंदौर-बैतूल मार्ग




इंदौर। हादसों का हाईवे बन चुके इंदौर-बैतूल रोड (एनएच-59 "ए") पर 2013 तक खंडवा रोड की तरह गाडियां दौड़ती नजर आएंगी। पूरी तरह उधड़ चुके इस रोड की दशा सुधारने के लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी (एनएचएआई) ने करीब सौ करोड़ की तीन योजनाओं पर काम शुरू कर दिया है। पहले चरण में 35 करोड़ के टेंडर निकालने के बाद एनएचएआई ने इंदौर-डबल चौकी मार्ग के लिए 35 करोड़ और रपटों को पुल में तब्दील करने के लिए करीब 30 करोड़ की योजनाओं का खाका बनाना शुरू कर दिया है।

दस साल पहले नेशनल हाईवे का दर्जा पाने एनएच-59"ए" को लेकर एनएचएआई अब गंभीर है। वह अब तक 288 किमी लंबी इस सड़क के 37 किलोमीटर लंबे हिस्से में टू-लेन निर्माण के लिए 35 करोड़ के टेंडर निकाल चुका है। निर्माण किलोमीटर 42 (चापड़ा) से 77 (कलवार) के बीच 35 किमी और किलोमीटर 124 से 126 के बीच 2 किमी पर होना है।

इससे पहले कलवार से कन्नौद किमी 77 से 123 तक दो-लेन रोड बनाई जा चुकी है, हालांकि उसकी हालत अभी से बिगड़ने लगी है। अब बारी है इंदौर से डबल चौकी (किमी 0 से 30 किमी) रोड की। इसका सर्वे हो चुका है। प्रस्ताव बनाया जा रहा है। लागत 35 करोड़ आंकी जा रही है। अधिकारियों की मानें तो केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री कमलनाथ की मंशानुरूप मंत्रालय से अनुमोदित हुई इस रोड के निर्माण की तमाम कवायदें दिल्ली से चल रही हैं। सर्वे से लेकर वर्कऑर्डर तक सभी वहीं के अधिकारियों की निगरानी में होगा।

टोल-फ्री होगी सड़क
सड़क की लागत 90-95 लाख रूपए प्रति किमी आएगी। उधर, केंद्रीय सड़क-परिवहन मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार उन सड़कों पर टोल नहीं लगेगा, जिनकी लागत एक करोड़ रूपए प्रति किलोमीटर से कम हैं। हालांकि मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस रोड के निर्माण की गुणवत्ता टोल वाली सड़कों से उन्नीसी नहीं होगी।

इसलिए जरूरी है निर्माण
- 1200 करोड़ की लागत से इंदौर-अहमदाबाद मार्ग के साथ यह रोड बनती है तो यह तीन राज्यों (गुजरात, मप्र और महाराष्ट्र) को जोड़ेगी।
- बैतूल, होशंगाबाद और इटारसी से आने वाले वाहनों को भोपाल होकर इंदौर नहीं आना पड़ेगा। उनका 150 किमी से ज्यादा चक्कर बचेगा।
- इंदौर से आष्टा-कन्नौद होते हुए नेमावर जाकर 40 किमी लंबा चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
- रोड बनने के बाद इंदौर आसपास के हर शहर से दोलेन और चारलेन से जुड़ेगा। सिंगल ट्रैक खत्म होगी।

रपटें होंगी खत्म, बनेंगे पुल
खातेगांव में हुए बागदी बस हादसे और एक दशक में सड़क पर हुए ऎसे अन्य हादसों से सबक लेते हुए एनएचएआई ने तमाम रपटों को पुल में तब्दील करने का मन भी बनाया है। दुधिया नाला, शिप्रा नदी, कालापाठा नाला, सतखालिया, उमरिया खाल, कालीसिंध नदी, करनावत नाला और बागदी नदी सहित रोड पर दर्जनभर से ज्यादा नदी-नालों पर मौजूदा रपटें तोड़कर ऊंचे-व्यवस्थित पुल बनाए जाना है। बागदी बस हादसे के बाद "पत्रिका" ने नेमावर रोड की रपटों और उनकी दुर्दशाओं के साथ वहां हुए हादसों की तस्वीर बयां की थी। पुल बनाने की तैयारियां उसके बाद ही शुरू हुई।

विनोद शर्मा