Monday, July 18, 2016

60 हजार नए आयकर दाता बने, 4 लाख शंका के घेरे में

- हर लेन-देन और खरीदी-बिक्री पर नजर
- विशेषज्ञों के तर्कों पर भी तफ्तीश
इंदौर. विनोद शर्मा ।
आयकर से परहेज करने वालों के खिलाफ मोदी सरकार का अभियान रंग लाया। एक करोड़ नए करदाताओं के टार्गेट के मुकाबले 40 लाख नए करतदाता बने हैं। इसमें करीब 60 हजार इंदौर मुख्य आयकर आयुक्तालय के करदाता हैं। हालांकि विभाग और विभागीय विशेषज्ञों के अनुसार आयुक्तालय क्षेत्र में अब भी चार लाख लोग ऐसे हैं जो आयकर के दायरे में आ सकते हैं। इसीलिए सबंधित ठिकानों से लोगों के लेन-देन और खरीदी-बिक्री की जानकारी जुटाई जा रही है।
इंदौर सीसी क्षेत्र को 2015-16 में 1.5 लाख नए करदाता बनाने का लक्ष्य मिला था। उस वक्त करदाताओं की संख्या थी 4.63 लाख। अधिकारी-कर्मचारियों की हड़ताल व अन्य व्यस्तताओं के बावजूद करदाता बढ़ाओ  अभियान जारी रहा। इसीलिए करीब 60 हजार करदाता बढ़े और कुल करदाताओं की संख्या 5.20 लाख हो गई। हालांकि विशेषज्ञीय अनुमान के हिसाब से सीसी क्षेत्र के 16 जिलों में करीब 4 लाख लोग और आयकर की पहुंच से दूर है।
ऐसे की जा रही है तलाश
विभाग ने रीजन के लोगों की संपत्ति, जिला पंजीयक कार्यालयों से संपत्ति की खरीदी-बिक्री, स्टॉम्प शुल्क, सोने-चांदी व अन्य महंगी ज्वैलरी की खरीदी, बैंकों में जमा एफडी, पूंजी के साथ ही ब्याज व काटे जा रहे टीडीएस के रिकार्ड खंगाले जा रहे हैं। प्रॉपर्टी ब्रोकर्स व अन्य ब्रोकर्स पर भी नजर है जो दलाली से लाखों रुपया कमाते हैं। स्थानीय प्रशासन से हायर रेट जोन वाले संपत्ति करदाताओं की लिस्ट के साथ स्वीकृत होने वाले बंगलों के साथ कॉलोनी-मॉल-मार्केट-मल्टियों के नक्शे की जानकारी भी ली जा रही है ताकि वहां बिकने वाले फ्लैट, दुकान व आॅफिसों की सही गणना की जा सके।
संयुक्त प्रयास...
फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू) और सरकारी-गैरसरकारी बैंकों का सेंट्रलाइज डाटा सेंटर भी इस काम में आयकर की मदद कर रहा है। रीजनल इकानॉमिक इंटेलीजेंस कमेटी (आरईआईसी) में पुलिस, लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू, सीबीआई, वाणिज्यिक कर, सेंट्रल एक्साइज, डीआरआई, डीजीसीईआई व इनकम टैक्स एक दूसरे से इन्फॉर्मेशन एक्सचेंज कर रहे हैं जिसका फायदा भी आयकर व अन्य कर विभागों को मिला है।
फिर क्यों दूर है आयकर से
सिर्फ इंदौर में वाहनों की कुल संख्या 16 लाख से अधिक है। इसमें चार पहिया चार लाख और कमर्शियल वाहन दो लाख से अधिक है। मतलब 6 लाख। अब यदि 1 लाख घरों में दो-दो कार है तो भी फोरव्हीलर रखने वाले ही 3 लाख लोग होते हैं। कमर्शियल वाहन वाले अलग। बाकी 15 जिलों के वाहनों की संख्या अलग।
नगर निगम में सालाना 25 हजार से ज्यादा नक्शे पास होते हैं। नक्शे सिर्फ वैध कॉलोनियों में ही पास होते हैं जहां प्लॉट की कीमत औसत 2000 रुपए/वर्गफीट है। कंस्ट्रक्शन कॉस्ट 1000 रुपए/वर्गफीट। इस मान से प्लॉट सहित 1000 वर्गफीट का एक ही घर 30 लाख में तैयार होता है।
इंदौर में 350 से अधिक नई कॉलोनियां और टाउनशीप कटी है जहां प्लॉट और फ्लैट की औसत कीमत ही 10 लाख है। कुल प्लॉट और फ्लैट करीब 7 लाख हैं।
दो हजार से अधिक प्रॉपर्टी ब्रोकर है। इनमें से टैक्सपेयर हैं करीब 350 ही। बाकी लोग अपनी कमीशन पर टीडीएस भी नहीं कटवाते।
500 से ज्यादा होस्टल हैं, रजिस्टर्ड आधे भी नहीं है। यही स्थिति होटल, प्राइवेट स्कूल, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम की है।
अभी 5.20 लाख करदाता
आय करदाता
2.5 लाख से कम 3.5 लाख
2.5 से 5.5 लाख 1 लाख
5.5 से 9.9 लाख 35 हजार
10 लाख से अधिक 25 हजार

फर्जी कंपनियों से सफेद करते थे काली कमाई

एमपी एग्रो के खिलाफ इन्वेस्टिगेशन में खुलासा
 इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
इंदौर बेस जिस दलिया किंग कंपनी एमपी एग्रो न्यूट्री फुड्स प्रा.लि. और एमपी टूडे मीडिया गु्रुप के संचालकों ने दर्जनभर से ज्यादा फर्जी कंपनियां बना रखी है। इन कंपनियों का इस्तेमाल दो नंबर की कमाई को एक नंबर में रोटेट करने के लिए किया जाता है। एमपी एग्रो के खिलाफ लगातार तीन दिन तक चली इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग की छापेमार कार्रवाई के दौरान यह बात सामने आई है। कार्रवाई गुरुवार देर रात तक जारी रही। कार्रवाई के दौरान 100 करोड़ की बेनामी संपत्ति का आंकलन किया जा रहा है।
मीडिया की आड़ और नेता-अफसरों से ‘बेहतर’ संबंध के कारण आयकर की छापेमार कार्रवाई को कभी एमपी एग्रो ने दिमाग में जगह नहीं दी थी। हालांकि बीते दिनों हुई रेड ने उनकी खुशफहमी दूर कर दी। विंग ने जबरदस्त कार्रवाई की। फेक्ट जुटाए। पता चला कि सुनील जैन और शांतनु दीक्षित व उनके भागीदारों के नाम पर दर्जनभर से अधिक ऐसी कंपनियां हैं जो कि सिर्फ लिस्टेड हैं। उनका मैदानी काम कुछ नहीं है। मूल कंपनियों की काली कमाई को निवेश व खर्च के रास्ते एक नंबर करने  के लिए इन कंपनियों के नाम का इस्तेमाल किया जाता है।
करीब-करीब संपन्न
गुरुवार दिन तक कार्रवाई 5-6 स्थानों पर रह गई थी। डायरेक्टरों के घर कार्रवाई संंपन्न हो गई थी। जहां जारी थी वहां कम्प्यूटर और लेपटॉप का डाटा रिकवर किया जा रहा था। हालांकि बीच-बीच में समूह सरेंडर के प्रस्ताव देता रहा लेकिन अधिकारियों ने नकार दिए।
खर्चे किए कम, बताए ज्यादा
बताया जा रहा है कि जैन, दीक्षित और उनके भागीदारों ने अपने अकाउंट्स डॉक्यूमेंट में बोगस खर्च दिखा रखे हैं ताकि खर्चे की ऊपरी रकम के नाम पर अपनी इनकम को एक नंबर किया जा सके। फर्जी कंपनियों के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की है। इन्वेस्टमेंट के फर्जी प्रपोजल दिखाए हैं।
‘‘‘‘ करीब-करीब सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। इसीलिए यह बीते दिनों हुई कार्रवाइयों में बड़ी कार्रवाई है। हमारा दबाव सरेंडर को लेकर नहीं है, टैक्स ज्यादा से ज्यादा कलेक्ट हो इस  पर है।
आर.के.पालीवाल, पीडीआईटी


एनएचएआई सौ करोड़ में पूरा करेगा इंदौर-अहमदाबाद रोड

आईवीआरसीएल और बैंकों के हाथ टेकने के बाद
बैंकों की अनापत्ति का इंतजार
इंदौर. विनोद शर्मा ।
हैदराबाद की आईवीआरसीएल और उसको वित्त पोषित करने वाली बैंकों द्वारा घुटने टेके जाने के बाद आखिरकार नेशनल हाइवे अथॉरिटी आॅफ इंडिया (एनएचएआई) ने इंदौर-अहमदाबाद रोड को पूरा करने का मन बना लिया है। इसके लिए सौ करोड़ रुपए का प्रस्ताव बनाकर अथॉरिटी ने उन बैंकों को सौंप दिया है जिन्होंने प्रोजेक्ट फाइनेंस किया था। इंतजार है सिर्फ बैंकों की सहमति का। उम्मीद जताई जा रही है कि नवरात्रि तक काम शुरू हो जाएगा।
इंदौर-अहमदाबाद फोरलेन कब पूरा होगा? यह सवाल उठते ही इंदौर, धार, झाबुआ और अलीराजपुर से लेकर अहमदाबाद तक के लोग अथॉरिटी को कोसना शुरू कर देते हैं। वजह है निर्माण की कड़वी यादें। 2010 में 2013 तक समयसीमा के साथ 155 किलोमीटर लंबे इस हाइवे का काम 2016 तक भी पूरा नहीं हुआ। ठेका लेने वाली आईवीआरसीएल और उसकी सहयोगी बैंकों ने प्रोजेक्ट को पूरा करने के नाम पर घुटने टेक दिए हैं। अथॉरिटी के पास अब विकल्प नहीं बचा। जन जरूरत के मद्देनजर अथॉरिटी प्रोजेक्ट  की कमान अपने हाथ में लेने का मन बनाया है।
बैंक आॅफ इंडिया को भेजा 100 करोड़ का प्रस्ताव
नावदापंथ से पिटोल बार्डर तक 155.15 किलोमीटर लंबे एनएच-59 को फोरलेन करने का ठेका आईवीआरसीएल ने 2010 में 1175 करोड़ में लिया था। बताया जा रहा है कि बैंकों के कंसोर्टियम ने प्रोजेक्ट पर अब तक करीब 1300 करोड़ का कर्ज दिया। फिर भी प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ। कंसोर्टियम में लीड बैंक है बैंक आॅफ इंडिया, मुंबई। इसीलिए एनएचएआई ने बैंक आॅफ इंडिया को ही पत्र लिखकर कहा है कि अथॉरिटी 100 करोड़ रुपए लगाकर प्रोजेक्ट पूरा करना चाहता है। प्रस्ताव पर बैंक आॅफ इंडिया बाकी बैंकों से रायशुमारी करके अपना अनापत्ति देगा।
90 फीसदी काम हुआ
अथॉरिटी का आंकलन यह है कि प्रोजेक्ट पर अब तक बर्ड सेंच्यूरी वाला हिस्सा छोड़कर 145 किलोमीटर लंबे हिस्से में से 125 किलोमीटर लंबे हिस्से में डामरीकरण हो चुका है। इसके अलावा फ्लाईओवर और व्हीकल अंडर पास अधूरे हैं जो कि यातायात के लिहाज से बेहद जरूरी है। जिस राशि का प्रपोजल दिया गया है उसमें 10 फीसदी सड़क बनाने के साथ ही आधे-अधूरे पुल-पुलिया और फ्लाईओवर्स भी पूरे किए जाएंगे।
रोड दुरुस्त करेंगे
झाबुआ से पिटोल के बीच रोड की स्थिति खराब है। वहां बरसात के दौरान लोगों को दिक्कत का सामना न करना पड़े इसीलिए रिनुअल का टेंडर निकाला है। प्रारंभिक रूप से रिनुअल की लागत एक करोड़ आंकी गई है। इसके अलावा जरूरत के अनुसार बाकी हिस्सा भी सही करेंगे। इसके लिए बीते दिनों अथॉरिटी को 9.87 करोड़ का बजट  भी मिला है।
प्रोजेक्ट पूरा करना प्राथमिकता
‘‘‘प्रोजेक्ट काफी लेट है। लोगों की परेशानी को देखते हुए प्रोजेक्ट की पूर्णता ही हमारी प्राथमिकता है। इसीलिए सौ करोड़ का प्रस्ताव दिया है। इंतजार है बैंक की अनापत्ति का जो जल्दी मिलने की उम्मीद है। अनापत्ति मिलने के बाद महीनेभर में काम शुरू कर देंगे।
सुमित कुमार, प्रोजेक्ट आॅफिसर
एनएचएआई

एमपी एग्रो पर इनकम टैक्स कार्रवाई

भोपाल में एक  पीओ, इंदौर में एक जगह कार्रवाई जारी
इंदौर. चीफ रिपोर्टर ।
दलिया बनाने वाली एमपी एग्रो न्यूट्री फुड्स और उसकी सहयोगी कंपनियों के खिलाफ इनकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विंग की सर्च तकरीबन संपन्न हो चुकी है। भोपाल में एक स्पॉट पर पीओ की कार्रवाई की गई वहीं इंदौर में वायएन रोड स्थित जैन बंधुओं के ठिकाने पर कार्रवाई जारी रही। हालांकि इस दौरान 50 करोड़ रुपए की काली कमाई सरेंडर करने की सूचना भी आती रही।
गुरुवार की शाम से ही माना जा रहा था कि सर्च शुक्रवार सुबह तक या दोपहर तक संपन्न हो जाएगी लेकिन ग्लोबल समूह के संचालक शांतनु दीक्षित आखिर तक अड़े रहे। वे काली कमाई की बात के साथ इनकम टैक्स अधिकारियों द्वारा रखे गए तथ्यों को सिरे से नकारते रहे। इस दौरान सुनील जैन और उनके सहयोगी जरूर कमजोर दिखे। उन्होंने 50 करोड़ तक की काली कमाई सरेंडर करने का प्रस्ताव भी दिया। हालांकि प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय क्या हुआ? इसकी अधिकृत पुष्टि नहीं हो पाई। अधिकारियों ने बताया कि समूह की कंपनियों के पास से तकरीबन सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। यदि राशि सरेंडर होती भी है तो असेसमेंट के दौरान अघोषित राशि सामने आएगी।
एक पीओ, एक जगह जारी कार्रवाई
कुल 35 स्थानों पर कार्रवाई हुई थी। इसमें से शुक्रवार शाम तक तकरीबन 32 ठिकानों पर कार्रवाई संपन्न हो गई। इसमें भोपाल में एक स्थान पर कार्रवाई को अल्प विराम देते हुए प्रोबेसरी आॅर्डर (पीओ) लगा दिया।

सिर्फ पीपल्यहाना ही क्यों, बचे हर तालाब har 3 km me 1 talab

1956 के राजस्व रिकॉर्ड से सीमांकन कराने की मांग
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जनता और जनप्रतिनिधियों के संयुक्त प्रयास से बचे पीपल्याहाना तालाब ने बेफिके्र शहरवासियों को बाकी तालाबों के लिए फिकरमंद बना दिया है। अब 1956 के राजस्व रिकॉर्ड और ज्योग्राफिकल सर्वे आॅफ इंडिया की टोपोशीट के आधार पर बाकी तालाबों के सीमांकन की भी मांग उठने लगी है। यदि सर्वे होता है तो न सिर्फ मौजूदा तालाबों का वाजिब सीमांकन होगा बल्कि कई ऐसे तालाब भी सामने आएंगे जिनका अस्तित्व सिर्फ राजस्व दस्तावेजों में ही नजर आता है।
जलस्रोतों को लेकर इंदौर की स्थिति मजबूत है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो यहां शहरसीमा में हर तीसरे-चौथे गांव में तालाब है। इनका जिक्र राजस्व रिकॉर्ड में भी है। यह बात अलग है कि सरकारी अनदेखी से खजराना, छोटा बांगड़दा, पीपल्याकुमार, छोटा सिरपुर जैसे तालाब सिकुड़ गए। वहीं खजराना के तीन और कस्बा इंदौर के एक तालाब सहित आधा दर्जन तालाबों का अस्तित्व राजस्व रिकॉर्ड में ही है।
चोरी हो गए तालाब
खजराना : राजस्व रिकार्ड और क्षेत्रवासियों की मानें तो खजराना में  किसी वक्त चार तालाब हुआ करते थे। आज अस्तित्व में सिर्फ एक ही तालाब है, मटमेला। तीन तालाब चोरी हो गए। सर्वे नं. 435/1/1 (खजराना थाने के पास) की जमीन में से पांच एकड़ पर तालाब था। बाद में जमीन एक गृह निर्माण संस्था को सरकार ने दे दी। बाकी दो जगह कॉलोनी कट चुकी है।
नैनोद : यहां तालाब सर्वे नं. 314 पर उल्लेखित है जबकि यह पाल की तरह की जमीन है जो कब्जाग्रस्त है। खसरा नक्शे में सर्वे नं. 313 की जमीन तालाब की तरह नजर आती है जो कई टुकड़ों में बिक चुकी है। गांव के लोग कहते हैं यही तालाब था।
पीपल्याकुमार : यहां सर्वे नं. 138 में तालाब साफ नजर आता। पाल भी बनी है लेकिन जमीन को तालाब की नहीं माना जाता। बड़े हिस्से में लोगों ने कब्जे किए।
सिरपुर : यहां सर्वे नंबर-2 पर गांव का पुराना तालाब है जो सिर्फ भू-माफियाओं के कब्जों तले दफन हो चुका है।  छोटा सिरपुर तालाब राजस्व रिकॉर्ड में करीब 160 एकड़ का तालाब है लेकिन मौके पर तालाब आधा भी नजर नहीं आता। बड़े हिस्से पर नगर निगम ने कॉलोनी बसा दी।
्रफतनखेड़ी : सर्वे नं. 30/1/3 से 30/2/1, 35/1 और 40 नंबर की जमीन के साथ ही सर्वे नं. 139 की बड़ी जमीन पर भी किसानों ने कब्जा कर रखा है।
1956 के दस्तावेजों से सीमांकन कर दे, हम सहेज लेंगे
पीपल्याहाना तालाब ने जनता और जनप्रतिनिधियों को एक कर दिया है। पर यह लड़ाई सिर्फ पीपल्याहाना तक ही सीमित न रहे। कलेक्टर और निगमायुक्त 1956 के दस्तावेज से शहरसीमा के सभी तालाबों का सीमांकन कर दे। इससे तालाबों की वास्तविक स्थिति तो सामने आएगी ही, जो खत्म हो चुके हैं वे तालाब भी सामने आ सकते हैं। सीमांकन के बाद लोगों के क्षेत्रवासियों के सहयोग से तालाब सहेजेंगे। पाल पर पौधारोपण करेंगे। इससे भू-जलसंवर्धन के साथ पर्यावरण भी मजबूत होगा। लोगों को नए पिकनिक स्पॉट भी मिल सकते हैं।
उषा ठाकुर, विधायक
यह है शहरसीमा के तालाब
गांव सर्वे नं. रकबा
मुंडला नायता 425 1.966
अरंडिया 126/1 1.721
मायाखेड़ी 185 0.918
लसूड़िया 87 7.486
तलावली 146 13.688
निरंजनपुर 326 4.000
निपानिया 184 3.560
212 0.293
खजराना 251 0.421
425 0.344
902 3.137
कस्बा इंदौर 193 0.781
पीपल्याराव 234/3, 236/3,262   26.061
लिम्बोदी 17/1,117,127,131 13.963
रालामंडल 26/27/1,26/27/2 33.28
असरावद खुर्द 155 व अन्य 26.904
छोटा बांगड़दा 35, 127/1, 127/2 7.097
नैनोद 314 3.496
सिंहासा 27/258 0.866
136/1/मिन-1 8.565
बांक(बड़ा सिरपुर) 184/1 27.891
अहिरखेड़ी 182 0.522
बिसनावदा 75 5.860
68 5.237
नावदापंथ 253, 256/1, 256/4 5.241
Ñझलारिया 139 3.153
सिरपुर 2 0.466
(बड़ा सिरपुर) 427,  428 22.500
(छोटा सिरपुर) 429, 430 64.794
बिलावली(छोटा) 138/5/मिन-2 16.772
फतनखेड़ी(बड़ा बिलावली) 1/1, 1/2/1 216.41


326 करोड़ के कर्जे ने निकाला ‘कैलाश’ का दिवाला

अम्बिका सॉल्वेक्स के प्लांट, गोदाम और जमीन के साथ गर्ग परिवार के घर भी बैंकों के निशाने पर
इंदौर. विनोद शर्मा ।
सोयाबीन और सोया आॅइल के बड़े कारोबारियों में से एक कैलाशंचद्र गर्ग दिवालियेपन की दहलीज पर है। अम्बिका सॉलवेक्स और लक्ष्मी आॅइल्स को ऊंचाई देने वाले गर्ग आज बैंकों के कर्जे के बोझ से दब चुके हैं। सेटेलाइट हिल्स की जमीन गिरवी रखकर कर्जा देने वाली तीन बैंके जहां 123.56 करोड़ की लेनदारी निकालकर बैठी है वहीं गर्ग पहले से ही स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के बड़े कर्जेदारों की लिस्ट में शामिल है।
फरवरी 2016 में बैंकों ने विलफुल डिफॉल्टरों (जानबुझकर कर्जा चुकाने से बचते आ रहे लोग) की सूची जारी की थी। इस सूची में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के डिफाल्टर कैलाशचंद्र गर्ग का भी नाम है। गर्ग ने बैंक से बड़ा लोन लिया था जो 30 सितंबर 2012 तक बढ़कर 202 करोड़ 67 लाख  36 हजार 052 रुपए हो गया था। 3 जनवरी 2015 को कंपनी की तमाम संपत्ति बेचने के लिए एसबीआई आॅक्शन विज्ञप्ति भी जारी कर चुकी है। इधर, पिछले तीन साल से यूको बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक भी परेशान हैं जिन्होंने नायता मुंडला स्थित सेटेलाइट हिल्स की जमीन गिरवी रखकर गर्ग को 2010 में 110.5 करोड़ का कर्जा दे दिया था जो गर्ग के आॅफिस, विद्यानगर के दो प्लॉट बेचकर रिकवरी करने के बावजूद 123.56 करोड़ रुपए बाकी है।
इनकम टैक्स ने 2011 में समूह पर छापा मारा था। छापेमारी के दौरान फर्जी कर्जे के किस्से दस्तावेजी प्रमाण के साथ उजागर हुए।  दस्तावेजों से यह भी पता चला था कि कंपनी ने संभवत: 1000 करोड़ की हेराफेरी की है।
एसबीआई ने निकाली विज्ञप्ति पीएनबी ने बेच दिया आॅफिस
90/47 स्नेहनगर(सपना-संगीता) में सत्यगीता अपार्टमेंट बिल्डिंग है इस बिल्डिंग में आॅफिस नंबर 304 अम्बिका सॉलवेक्स प्रा.लि. और नारायण निर्यात इंडिया प्रा.लि. का पंजीकृत पता है। इसका क्षेत्रफल 500 वर्गफीट है। जनवरी 2015 में एसबीआई ने इसकी विज्ञप्ति निकाली थी लेकिन नहीं बिका लेकिन बीते दिनों पीएनबी ने इसे कुर्क करके बेच दिया।
एक ही जगह पर चार बैंकों की नजर
गर्ग से कर्ज वसूली के मामले में नाकाम रही पीएनबी, यूको और कॉर्पोरेशन बैंक नायता मुंडला की जमीन 123.56 करोड़ की डिमांड के मुकाबले 18 करोड़ में भी नहीं बेच पा रही है। बैंकों की निगाह बाकी रकम के लिए कंपनी की फेक्टरियों व अन्य संपत्तियों पर थी लेकिन एसबीआई पहले ही उनके लिए आॅक्शन नोटिस जारी कर चुकी है। उधर, एसबीआई को उम्मीद नायता मुंडला की जमीन से थी लेकिन तीनों बैंकें पहले ही वहां नजर घड़ाकर बैठी है।
एसबीआई ने संपत्ति जो लगाई दाव पर...
17.32 करोड़ : अकोला महाराष्ट्र में 24.111 एकड़ पर फैली फेक्टरी।
16.46 करोड़ : चाकरोद, कालापीपल(शाजापुर) की 2.853 हेक्टेयर जमीन पर स्थित प्लांट।
12.03 करोड़ : पठारिया, दमोह में 10.48 हेक्टेयर जमीन पर स्थित कंपनी।
11.80 करोड़ : प्लॉट नं. 32, महू-नीमच रोड जावरा( रतलाम) में 3.5 एकड़  पर बना प्लांट। जमीन डीआईसी से अम्बिका सॉल्वेक्स ने लीज पर ले रखी है।
29 लाख : सपना-संगीता रोड स्थित कंपनी का आॅफिस।
23.32 करोड़ : पूणे में 6.48 हेक्टेयर गैर कृषि भूमि। यह जमीन नारायण अम्बिका इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम है जिसे 2008 में सेटेलाइट हिल्स के डेवलपमेंट की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब कंपनी के डायरेक्टर रितेश उर्फ चंपू अजमेरा भी थे।
पीएनबी-यूको-कॉर्पोरेशन बैंक का दाव
अम्बिका सॉलवेक्स की 7.12 एकड़ जमीन
एवलांचा रिएल्टिी  की 9.02 एकड़ जमीन
दौलतवाला एक्जिम की 12 एकड़ जमीन
मंदसौर में डेढ़ एकड़ जमीन है।
जावरा में एक मकान भी।
(कुल 123.56 करोड़ की लागत। नहीं बिक रही 18 करोड़ में )

भाजपा नेता मंगवानी के रिश्तेदार ने तानी तीन मंजिला अवैध बिल्डिंग

खातीवाला टैंक में मनमानी
मंजूरी से ज्यादा निर्माण, संपत्ति के खाते में अब भी ग्राउंड फ्लोर ही
इंदौर. विनोद शर्मा ।
मनमाना निर्माण खातीवाला टैंक की पहचान बन चुका है। इसका बड़ा उदाहरण है प्लॉट नं. 557 जहां नगर निगम के राजस्व दस्तावेजों के अनुसार अब भी प्लॉट है लेकिन मौके पर तीन मंजिला इमारत नजर आती है। कृष्णाज बिल्डकॉम तर्फे श्री रितेश पिता श्री गणेशलाल मंघरानी के नाम पर प्लॉट का नक्शा पास है लेकिन मौके पर जो निर्माण है वह नक्शे से मेल नहीं खाता। मंघरानी पूर्व जनकार्य समिति प्रभारी और वार्ड-65 की मौजूदा पार्षद सरीता मंघवानी के पति जवाहर मंघवानी के रिश्तेदार हैं। नक्शा उन्हीं के जनकार्य समिति प्रभारी रहते मंजूर हुआ था।
मामले का खुलासा 15वें  अपर जिला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए गए वाद के बाद हुआ। शिकायत के अनुसार प्लॉट नं. 557 खातीवाला टैंक का क्षेत्रफल 2992 वर्गफीट है। मंघरानी के आवेदन पर 14 नवंबर 2014 को जी+3 की बिल्डिंग पर्मिशन जारी की गई। उस वक्त बिल्डिंग पर्मिशन शाखा के इंचार्ज मंगवानी ही थे। बिल्डिंग की अधिकतम ऊंचाई 12.45 मीटर तय की गई जबकि मौके पर जी+3 और पेंटहाउस का निर्माण किया गया है।
यह थी मंजूरी
नक्शे के अनुसार 2992 वर्गफीट प्लॉट एरिया पर निर्माण के दौरान 34.45 प्रतिशत यानी 1031 वर्गफीट (95.82 वर्गमीटर ) ग्राउंड कवरेज किया जा सकता था।
ग्राउंड फ्लोर पर 270 वर्गफीट निर्माण होना था लेकिन हुआ एक हजार वर्गफीट के लगभग। इसी तरह पहली, दूसरी और तीसरी मंजिल पर औसत 95.81 वर्गमीटर यानी 1031 वर्गफीट निर्माण होना था। कुल निर्माण मंजूर हुआ था 312.75 वर्गमीटर (3366 वर्गफीट) ही।
बनी ऐसी...
-- 60 फीसदी ग्राउंड कवरेज करीब 1795.2 वर्गफीट। सीवरेज के चेम्बर पर बाउंड्रीवाल बना दी। मेन रोड का स्लोप में बिजली के खम्बे भी समाहित कर लिए।
-- ऊपरी मंजिलों का क्षेत्रफल दो-दो हजार वर्गफीट है जो मंजूरी से दोगुना है। तीसरी मंंजिल के बाद कोई निर्माण मंजूर नहीं है जबकि ऊपर 1000 वर्गफीट का पेंट हाउस भी बना दिया है।
संपत्ति कर में भी हेरफेर...
संपत्ति करदाताओं की सूची में मंघरानी का भी नाम है लेकिन जिस प्लॉट का नक्शा नगर निगम ने नवंबर 2014 में मंजूर किया था और जहां बिल्डिंग बने छह महीने हो चुके हैं उस प्लॉट के संपत्ति कर खाते में सिर्फ ग्राउंड फ्लोर का जिक्र ही है। यहां प्लॉट का एरिया 2991 वर्गफीट दर्ज है।
राजनीतिक संरक्षण की स्थिति यह है कि संपत्ति कर में भी निगम के मैदानी अमले के साथ मिलकर हेरफेर की गई है। प्लॉट नं. 557 के संपत्ति कर की गणना 15 रुपए/वर्गफीट की दर से की गई है जबकि  ललित शर्मा के प्लॉट नं. 556 और कांता सेवाराम लालवानी के प्लॉट नं. 558 की गणना 26 रुपए/वर्गफीट से हुई। पूरी कॉलोनी का रेट जोन एक ही होता है। प्लॉट नंबर वार नहीं रहता।