Friday, June 2, 2017

इंदौर के बॉबी का समधी है छत्तीसगढ़ का पप्पू

सालों ने संभाल रखा है 250 करोड़ का शराब कारोबार
इंदौर. विनोद शर्मा ।
छत्तीसगढ़ में जिस सोना ग्रुप के खिलाफ इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन ने धुआंधार छापेमारी की है उसके सर्वेसर्वा बलदेव ‘पप्पू’ भाटिया इंदौर के कुख्यात भू-माफिया रणवीरसिंह ‘बॉबी’ छाबड़ा के होने वाले समधी हैं। यही पप्पू हरपाल सिंह भाटिया उर्फ ‘मोनू’ और गुरमीतसिंह भाटिया ‘सोनू’ के जीजा हैं। पप्पू का पैसा मालवा-निमाड़ की शराब दुकानों में इस्तेमाल करने वाले सोनू-मोनू के माध्यम से ही बॉबी ने सोना समूह की सिमरन फीशरीज को 2013 में ऊंची बोली लगवाकर इंदिरासागर में मछली पकड़ने का ठेका दिलवाया था।
सोना समूह के साथ ही इनकम टैक्स की इन्वेस्टिगेशन विंग ने मोनू-सोनू भाटिया के सिमरन समूह पर भी कार्रवाई की थी। छापेमार कार्रवाई के दौरान सिमरन समूह में पप्पू भाटिया का खुला इन्वॉल्वमेंट सामने आया। बताया जा रहा है कि होलटाइम डायरेक्टर रहते पप्पू भाटिया ने ही सिमरन समूह को वजनदार बनाया है। मोनू-सोनू से बॉबी की नजदीकी है। उसी की सलाह से सिमरन समूह ने पोल्ट्री फार्म के आगे अपना कारोबार बढ़ाया। जनवरी 2013 में सिमरन फीशरीज प्रा.लि. नाम की कंपनी पंजीबद्ध कराई और 62.50 करोड़ की ऊंची बोली लगाकर इंदिरासागर में मछली पकड़ने का ठेका कंपनी को दिलवाया। इसके अलावा कंपनी ने बाणसागर का भी ठेका लिया। दोनों ठेके 2013 में लिए हैं जो कि 2018 तक चलेंगे।
एक तीर से दो शिकार
बॉबी ने सिमरन को ठेका दिलाकर एक तीर से दो शिकार किए। पहला ठेका दिलाकर पप्पू भाटिया परिवार में पेठ बनाई और दूसरा परम्परागत ठेका छीनकर अपने खास प्रतिद्वदी रिंकू भाटिया को नीचा दिखाने की कोशिश की। छह महीने पहले ही पप्पू के बेटे से बॉबी ने अपनी बेटी का संबंध जोड़ा। फॉर्च्यून लैंडमार्क होटल में दोनों की सगाई हुई।
मुर्गी पालन से ही आगे बढ़ी कंपनी
सिमरन समूह 1980 से स्थापित है। सिमरन फार्म लिमिटेड (एसएफएल) के नाम से कंपनी 1984 में पंजीबद्ध हुई। 1993 में प्रा.लि. कंपनी बनी। कंपनी पोल्ट्रीफार्म का बड़ा कारोकार करती रही। खंडवा रोड और सिमरोल में कई पोल्ट्रीफार्म है। मप्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू और महाराष्ट्र में कामकाज फैला हुआ है। कंपनी में सालाना ग्रोथ दर्ज की गई। इसीलिए कंपनी का कारोबार बढ़कर 444 करोड़ तक पहुंच गया। इसके बाद समूह ने सिमरन हेचरीज प्रा.लि., सिमरन लेब्स (वेटलाइन) प्रा.लि., सिमरन फुड्स प्रा.लि. और सिमरन फीड्स प्रा.लि.।
250 करोड़ का है शराब कारोबार
सोनू भाटिया जहां पोल्ट्री फार्म और फीशरीज का काम संभालते हैं वहीं मोनू भाटिया पप्पू भाटिया के शराब कारोबार को मालवा-निमाड़ में फैलाए हुए है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो मोनू की इंदौर, खरगोन और बड़वानी में तकरीबन एक दर्जन समूहों में तीस से ज्यादा दुकाने हैं। इसमें बॉम्बे हॉस्पिटल समूह की दुकानें ही 36 करोड़ से ज्यादा की ली गई थी। इसके अलावा इंदौर में मालवा मिल ग्रुप, ट्रांसपोर्टनगर ग्रुप, तेजाजीनगर-मिर्जापुर ग्रुप, चोरल ग्रुप और खंडवा नाका-पालदा ग्रुप हैं। खरगोन में बलवाड़ा और बड़वाह ग्रुप हैं। बड़वानी में तीन-चार ग्रुप और हैं। बताया जा रहा है कि 150 करोड़ की दुकानें तो इंदौर शहर में ही हैं। 100 करोड़ की अन्य दुकानें हैं। सभी दुकानों के ठेके अलग-अलग कंपनियों के नाम पर लिए गए हैं। वहीं कुछ दुकानों के लिए हरपाल सिंह भाटिया उर्फ मोनू के नाम भी इस्तेमाल किया गया है।
डमी डायरेक्टर्स के भरौसे है कंपनियां
पप्पू भाटिया ने मोनू-सोनू भाटिया को सिमरन से हटकर भी तकरीबन दो दर्जन कंपनियों में डायरेक्टर बना रखा है।  आरवीएस ट्रांसपोर्ट कंपनी एलएलपी, पेंथर ट्रांसपोर्ट एंड लॉजिस्टिक, आदिवासी डिस्टीलरीज प्रा.लि., सिम्फा लेब्स प्रा.लि. और राज इन्फ्रासिटी प्रा.लि. में मानू डायरेक्टर है। प्योरजेन बायोटेक लि. और सिमरन इन्फोटेक प्रा.लि. में सोनू डायरेक्टर है।  इसके अलावा समूह की कोलकाता और दिल्ली सहित देशभर में 100 से अधिक कंपनियां पंजीबद्ध हैं। इनमें से ज्यादातर के डायरेक्टर डमी हैं। सिर्फ केश फ्लो रोटेट करने और बैंक शीट बनाए रखने के लिए यह कंपनियां सिर्फ कागजों में चल रही है। 

मदद में मांगी 50% हिस्सेदारी, नहीं मिली तो राशि सरकार को लौटा दी

सिनर्जी हॉस्पिटल का नया कारनामा
दो महीने से 75 हजार जमा है फिर भी नहीं की पप्पू की सर्जरी
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जनसेवा के नाम पर इंदौर विकास प्राधिकरण से रियायती जमीन लेकर अस्पताल खड़ा करने वाले सिनर्जी हॉस्पिटल प्रबंधन ने मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से मिलने वाली राशि को कमाई का जरिया बना लिया है। मद से 75 हजार रुपए मिलने के बाद भी रिंगनोदिया के मुक-बधिर विकलांग पप्पू परमार को डेÑेसिंग करके चलता करते आ रहे सिनर्जी पर इससे पहले कमलेश गांधी भी अमानत में खयानत का आरोप मढ़ चुके हैं।  सरकारी जांच में आरोप की पुष्टि होने के बाद भी  स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने सिनर्जी पर कोई कार्रवाई नहीं की।
स्वेच्छानुदान को लेकर सिनर्जी की बदनीयती का खुलासा दबंग दुनिया ने 30 मई को ‘सिनर्जी ने नहीं की सर्जरी’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में किया था। खुलासे के बावजूद जहां पप्पू को लेकर हॉस्पिटल मैनेजमेंट का मन नहीं पसीजा वहीं मैनेजमेंट की मनमानी के मारे लोग दबंग दुनिया पहुंचे और आप बीती सुनाई। मामले में सबसे रोचक कहानी सामने आई पश्चिम क्षेत्र में रहने वाले कमलेश गांधी की। 21 जून 2015 को हुए सड़क हादसे में गांधी के पैर और सिर में चोट आई थी। गंभीर अवस्था में पहले एमवायएच ले जाया गया वहां से  कनक हॉस्पिटल। कनक हॉस्पिटल ने सिनर्जी रेफर कर दिया। सिनर्जी में दस दिन ईलाज चला जिस पर तकरीबन 2.64 लाख रुपए खर्च हुए। इसके बदले गांधी परिवार के आवेदन पर मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से डेढ़ लाख रुपए मंजूर हुए। मैंनेजमेंट ने पहले 30 फीसदी हिस्सेदारी मांगी। फिर 50 फीसदी। गांधी परिवार के मना करने  पर यह कहते हुए हाथ खड़े कर कि राशि लौटा दी जबकि राशि ऐसा कहने के महीनेभर बाद तक अस्पताल द्वारा इस्तेमाल की जाती रही।
यूं बढ़ता रहा अस्पताल का बिल
कनक से गांधी को सिनर्जी में सीधे आईसीयू में भर्ती किया गया था। दो दिन तक बेहोश रहा। हर दिन 25 हजार रुपए लगे। आठवें दिन पैर का आॅपरेशन हुआ। शुरू में आॅपरेशन के 35 हजार बताए। बाद में 85 हजार वसूले। सिर और पैर पर कुल 2.64 लाख रुपए खर्च हुए। गांधी को बचाने के लिए परिवार ने 4 प्रतिशत ब्याज का कर्ज लेकर राशि जुटाई और अस्पताल में जमा की।
मदद मिली तो आपकी जमा रकम लौटा देंगे
मैनेजमेंट ने गांधी परिवार से कहा ईलाज के लिए खर्च जरूरी है। अभी आप जोड़तोड़ करके खर्च उठा लो। मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान से  मदद मिलेगी तो हम आपको दे देंगे। इसी भरौसे के साथ गांधी परिवार ने खर्च चुकाया। 23 जुलाई 2015 को 1.50 लाख की सहायता राशि मंजूर हुई। 10 अगस्त तक अस्पताल के खाते में पहुंच गई। तब तक गांधी की छूट्टी हो चुकी थी। 13 अगस्त को परिवार पहुंचा तो आश्वासन मिला कि एक-दो दिन में चेक बना देंगे।
फिर काटते रहे चक्कर
13 अगस्त के बाद परिवार  24 अगस्त को फिर अस्पताल पहुंचा उसी आश्वासन के साथ लौट आया। 30 अगस्त को तीसरी बार गए। इस बार मैनेजमेंट ने कहा 30 प्रतिशत राशि हम काटेंगे। परिवार ने हां कर दी। मैनेजमेंट ने कहा दो-तीन बाद आकर चेक ले जाना। बाद में जब परिवार पहुंचा तो मैनेजमेंट ने कहा कि 50-50 बटेगा पैसा। इस बार परिवार ने मना कर दिया। इससे खिसयाये मैनेजमेंट ने राशि सरकार को लौटा दी।
हर जगह हुई शिकायत
मामले की शिकायत गांधी परिवार ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181, प्रभारी मंत्री रहे भूपेंद्र सिंह, संभागायुक्त संजय दुबे, कलेक्टर पी.नरहरि, सीएमएचओ रहे डॉ.पोरवाल, डीआईजी और विजयनगर थाने में की।
जांच में हुई आरोपों की पुष्टि
मामले में तीन लोगों की जांच कमेटी बनाई गई। जांच पीसी.सेठी हॉस्पिटल के चिकित्सा अधिकारी डॉ. माधव हासानी, जिला स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण अधिकारी  जी.एल.सोढ़ी और जिला मलेरिया अधिकारी डॉ. एम.सी.जिनवाल ने की। तीनों ने 18 दिसंबर 2015 को जांच रिपोर्ट सबमिट की जिसमें अस्पताल पर लगाए गए आरोप सत्य पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल प्रबंधन द्वारा 12 अक्टूबर 2015 को चेक (क्रमांक 267) के माध्यम से स्वेच्छानुदान की राशि शासन को लौटाना बताया गया लेकिन यह राशि खाते से 21 अक्टूबर 2015 को अस्पताल द्वारा निकाली जाना पाई गई।  दस्तावेजों की जांच में पता चला कि अस्पताल के खाते में यह राशि दो महीने तक पड़ी रही जबकि एक महीने तक ही रख सकता है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत में जिस अवधि का उल्लेख किया गया था उस अवधि में यह राशि चिकित्सालय के खाते में ही उपलब्ध थी। यह भी पाया गया कि कमलेश के ईलाज के बाद परिवार द्वारा बिल भुगतान किए जाने के बाद भी मैनेजमेंट दो महीने तक यह राशि अपने खाते में रखकर बैठा रहा जिससे उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है। 

1979 में जिस सईद का इंतकाल हुआ उसी ने 2014 में पॉवर साइन कर दिया

चंदननगर के सदाकत ने साजिश ने छीनी बेवा-बेटे की जमीन
इंदौर. विनोद शर्मा ।
पैसा और सरकारी ‘पॉवर’ पास हो तो असंभव भी संभव हो सकता है। कुछ ही करिश्मा कर दिखाया है चंदननगर निवासी सदाकत कुरैशी ने जिसने 1979 में अल्लाह को प्यारे हो चुके मो.सईद पिता मुस्तकीम को 2014 में जमीन पर उतारा और उससे लगभग 64 बीघा जमीन के पॉवर अपने नाम करवा लिए! किसी को इस करिश्मे पर यकीन हो या न हो लेकिन सदाकत के इस करिश्मे ने मो.सईद की बेवा हसीना बी और बेटे शाहीद के हक की जमीन छीन ली। पूरे फर्जीवाड़े की शिकायत रावजीबाजार थाने से लेकर जिला पंजीयक इंदौर/धार तक को की जा चुकी है लेकिन अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई।
मामला धार जिले की सरदारपुर तहसील के ग्राम अमझेरा का है। जहां सर्वे नं. 1199 (रकबा-2.592), 1200/1 (रकबा-4.233), 1201/1 (रकबा- 5.413) और 1205 (रकबा-1.630) की कुल 13.630 हेक्टेयर (147 बिघा, 12 बिसवा) जमीन का है। यह जमीन शेख चीतू और मो.मुस्तकीम की 50-50 फीसदी हिस्सेदारी के शामिल खाते की थी। इस मान से मो.मुस्तकीम के पांच लड़के हैं अब्दूल अजीज, अब्दुल रउफ, अब्दुल शकूर, अब्दुल रशीद, अब्दुल
सईद। सभी के हिस्से कुल 73.5 बिघा जमीन आना थी। इसमें से 59 मल्हार पल्टन निवासी अब्दुल सईद का इंतकाल 27 दिसंबर 1979 को हो गया था। इन्हें शेख चीतू के बेटे नजरउल्ला कुरैशी के बेटे सदाकत उल्ला ने 23 अपै्रल 2014 में जिंदा करके पूरे परिवार के फर्जी फोटो लगाकर पॉवर करवा लिया। इसी पॉवर के आधार पर 64 बीघा जमीन का सौदा कर दिया।
ऐसा था फर्जी पॉवर
23 अपै्रल 2014 को सदाकत उल्ला ने अपने फेवर में जो पॉवर बनवाया था उसमें मो.मुस्तकीम के बेटों और उनके परिजन के नाम तो लिखे गए लेकिन फोटो किन्हीं और के लगाए गए। अब्दुल सईद चूंकि उनकी मौत 22-23 वर्ष की उम्र में ही थी इसीलिए सदाकत ने इसी उम्र के बंदे का फोटो लगाया। ऐसे ही सईद की पत्नी हसीना बी और बेटे शाहीद के नाम के आगे किसी और के फोटो लगाए गए। अब्दुल सलाम, फरजराना बी पिता अब्दुल रशीद और सलीम पिता अब्दुल शकूर के नाम के आगे भी फर्जी फोटो इस्तेमाल किए गए।
बना बना इंदौर में, इस्तेमाल हुआ धार में
फर्जीवाड़ा करके पॉवर जिला पंजीयक कार्यालय इंदौर में बनाया गया है जबकि जमीन बेची गई धार जिले के अमझेरा में जो कि उप जिला पंजीयक सरदारपुर के क्षेत्राधिकार में आता है। बेचने वालों में नजरउल्ला के बेटे अमानतउल्ला, सदाकत उल्ला, रेहाना आशिकउल्ला, गजला पिता फरहातउल्ला, शकिला पति फरहतउल्ला, राहतुल्ला पिता फरहतउल्ला, वजाहतउल्ला तिपा फरहतउल्ला के नाम शामिल हैं।
दो रजिस्ट्री हुई। पहली रजिस्ट्री 9 जनवरी 2015 को  हुई। इसमें सर्वे नं. 1200/1 और 1201/1  की 9.646 हेक्टेयर जमीन का सौदा 78.07 लाख में किया। जमीन खरीदी साधना पति प्रवीण, ललीता पति गोपाल, सारिका पति मनोज निवासी अमझेरा ने।
दूसरी रजिस्ट्री 12 जनवरी 2015 को हुई। सर्वे नं. 1199 और 1200/1 की कुल 3.320 हेक्टेयर जमीन का सौदा 31.77 लाख में किया। खरीदी अश्विन पिता औंकारलाल शर्मा, वीणा पति अश्विन, कु.अवनि पिता अश्विन, आनंद पिता अश्विन  और वृशाली पिता अभय देशमुख ने।
15 बीघा जमीन की आड़ में किया सौदा
मो.मुस्तकीम के बेटे अब्दूल अजीज ने 1972 में 15 बीघा जमीन नजरउल्ला को बेची थी। इसी विक्रय पत्र में छेड़कानी करके सदाकत ने पूरी जमीन हड़पने की साजिश रची।
 कुछ भी नहीं है हाथ में
एडीजी कार्यालय में की गई शिकायत में हसीना बी और उनके बेटे शाहीद ने बताया कि मामले की शिकायत रावजीबाजार थाने से लेकर धार कलेक्टर तक को कर चुके हैं। पुलिस ने फर्जीवाड़ा माना भी लेकिन कोई कायमी नहीं की। कोर्ट में भी अपील विचाराधीन है। आज परिवार के पास जरा भी जमीन नहीं बची है। हक की लड़ाई मरते दम तक लड़ते रहेंगे।

बॉबी की आकाश के अध्यक्ष संजय को कलेक्टर ने भेजा हवालात

कोर्ट के फैसले और सरकारी आदेश के बाद भी नहीं दे रहा है सच्चिदानंनगर में प्लॉट
इंदौर. विनोद शर्मा ।
हाउसिंग सोसायटियों को लेकर कलेक्टर पी.नरहरि का रवैया कितना सख्त है इसका उदाहरण मंगलवार को उस वक्त देखने को मिला जब हाईकोर्ट और सहकारिता उपायुक्त के आदेश के बावजूद सदस्य को प्लॉट देने में आनाकानी करते आ रहे आकाश गृह निर्माण संस्था के अध्यक्ष संजय यादव को पुलिस के हवाले कर दिया। इससे पहले कलेक्टर ने पुलिस के आने तक जनसुनवाई के दौरान ही यादव को अपने रीडर के कक्ष में बंद करवा दिया। बाद में उनके निर्देश पर रावजीबाजार पुलिस ने कायमी करके यादव को हवालात पहुंचा दिया। आकाश कुख्यात भू-माफिया रणवीरसिंह उर्फ बॉबी छाबड़ा की जैबी संस्था है।
मामला मंगलवार का है। जब लगातार दूसरे मंगलवार सुदामानगर निवासी देवेंद्र तोतला जनसुनवाई में पहुंचे। तोतला ने कलेक्टर और उपायुक्त सहकारिता से कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सच्चिदानंदनगर में अब तक प्लॉट नं. 25 की रजिस्ट्री मेरे नाम पर नहीं हुई है। बीते सप्ताह मामला संज्ञान में आने के बाद कलेक्टर ने सहकारिता निरीक्षक संजय कुचनकर को फटकार लगाते हुए तीन दिन में रजिस्ट्री कराने के निर्देश दिए थे। अपने इसी आदेश की अवहेलना पर पहले कलेक्टर ने उपायुक्त और नरीक्षक को जमकर फटकार लगाई। फिर सख्त रवैया अख्तियार करते हुए कहा संस्था अध्यक्ष जो भी है उसे 2 बजे तक बुलवाया जाए।
फैसला आॅन द स्पॉट
सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने बॉबी और उसके भाई सतबीरसिंह छाबड़ा ‘जो कि पूर्व अध्यक्ष रहे हैं संस्था के’, को फोन करके मौजूदा अध्यक्ष संजय यादव से संपर्क किया। शाम 4 बजे यादव कलेक्टर आॅफिस पहुंचा। यादव ने कलेक्टर के पूछने पर कहा कि जल्द ही प्लॉट दे देंगे। इस पर कलेक्टर बोले जल्द ही दे देंगे क्या होता है? ऐसा करते-करते तुम लोगों ने वर्षों से परेशान कर रखा है पीड़ित को। इस पर यादव बहानेबाजी और बहस करने लगा। इससे नाराज कलेक्टर ने कहा कि तुम ऐसे नहीं मानोंगे। उन्होंने निर्देश देते हुए कहा कि यादव को पुलिस के हवाले कर दो।
भागे नहीं इसीलिए कमरे में कर दिया बंद
मामले की सूचना रावजीबाजार पुलिस को दी गई। पुलिस के आने से पहले यादव भाग न जाए इसी आशंका के साथ उसे एक कमरे में बंद कर दिया गया। कुछ ही देर में रावजीबाजार  थाने के पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और यादव को थाने ले गए। कलेक्टर के निर्देश पर धारा 151 की कायमी की गई।
30 साल से परेशान है तोतला परिवार
सच्चिदानंदनगर में 1987 में तोतला के नाम प्लॉट आवंटित हुआ था। 1993 में संस्था ने प्लॉट देने से मना कर दिया। आखिरी केस जीते 3 मई 2016 को। 29 बरस के इंतजार, हाई कोर्ट से जीते नौ मुकदमों और सहकारिता विभाग में इंदौर से लेकर भोपाल तक लिखी 500 से ज्यादा चिट्ठियों के बाद भी प्लॉट नहीं मिला। कलेक्टर और डीआईजी को मामले की जानकारी देकर 9 फरवरी 2015 को तोतला दंपति गांधी प्रतिमा पर धरना भी दे चुके हैं।
151 की धारा लगाकर किया था बंद
कलेक्टर के निर्देश पर संजय यादव को पकड़ा था उसके खिलाफ प्रतिबंधात्मक धारा के तहत मामला दर्ज किया था।
आर.डी.कानवा, टीआई
रावजीबाजार थाना
अब उम्मीद है प्लॉट मिल जाएगा
कलेक्टर साहब ने मामले को जिस गंभीरता से लिया है उसे देखते हुए लगता है कि तीस बरस का इंतजार जल्द खत्म होगा और प्लॉट मिलेगा। बॉबी और उसकी टीम ने इसे निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है इसीलिए अब तक तमाम पक्ष में फैसले और पत्राचार होने के बाद भी प्लॉट नहीं मिला। एक-दो नहीं नौ मुकदमें जीते हैं हाईकोर्ट से।
देवेंद्र तोतला, पीड़ित

सुबोध जैन के सिनर्जी ने ‘शिवराज’ से किया धोखा

- इंदौर से लेकर राजगढ़ तक है पीड़ितों की फेहरिस्त
- कलेक्टर और सीएमएचओ सिर्फ जांच करते हैं, कार्रवाई नहीं करते
इंदौर. विनोद शर्मा।
गरीबों की मदद के नाम पर इंदौर विकास प्राधिकरण से ओनपोने दामों पर बेशकीमती जमीन लेकर बने सिनर्जी हॉस्पिटल को मैनेजमेंट ने लूट का अड्डा बना लिया है। फिर मामला मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मिलने वाली राशि को लेकर बदनियती का हो या फिर मनमाना चार्ज लगाकर बिल बढ़ाने का। मैनेजमेंट पीड़ितों की फहरिस्त में इंदौर के पप्पू परमार और कमलेश गांधी से लेकर राजगढ़ जिले के नृसिंहगढ़ में रहने वाले रामेश्वर दांगी तक का नाम शामिल है।
नृसिंहगढ़ तहसील के भवानीपुर गांव निवासी रामेश्वर पिता लक्ष्मीनारायण दांगी को यूरीन ब्लेडर के ईलाज के लिए भरौसे के साथ 3 नवंबर 2014 को सिनर्जी हॉस्पिटल भर्ती कराया था। ईलाज पर कुल खर्च आया 1 लाख 36 हजार रुपए। दांगी परिवार ने मामले में मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से मदद की अपील की। हालांकि क्षेत्र में कोई चुनाव आने के कारण स्वेच्छानुदान की राशि मिलने में थोड़ा वक्त लगा। मैनेजमेंट ने कहा कि आप अभी राशि जमा करवा दो, जब जितनी सरकारी मदद मिलेगी उतनी राशि बाद में आपको लौटा दी जाएगी। 14 नवंबर को दांगी को डिस्चार्ज कर दिया गया।
खाते में आई मदद को नकारता रहा अस्पताल
डिस्चार्ज होने के तीन दिन पहले यानी 10 नवंबर 2014 को डेढ़ लाख रुपए की राहत मांग के मुकाबले मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से अगले ही दिन राशि अस्पताल के खाते में जमा हो गई। बावजूद इसके मैनेजमेंट ने मदद मिलने की बात नकार दी और दांगी परिवार पर राशि भुगतान का दबाव बनाए रखा। कहा कि पहले आप जमा कर दो, जब राशि मंजूर हो जाएगी तो आप को दे देंगे। 14 को पूरा पेमेंट लेकर छूट्टी कर दी।
टालते रहे मदद
मैंनेजमेंट के आश्वासन पर लगातार महीनेभर तक दांगी परिवार नृसिंहगढ़ से लेकर इंदौर तक सरकारी अधिकारियों के चक्कर काटते रहे। मामले में 16 दिसंबर 2014 को कलेक्टर राजगढ़ ने लिखित जवाब (9258) देते हुए कहा कि राशि अस्पताल के अकाउंट 883725110000001 में कलेक्टर के डीडीओ कोड 3000701001 से ई-भुगतान किया गया है। राशि 11 दिसंबर 2014 को अस्पताल के खाते में पहुंची। इसके बाद भी मैनेजमेंट ने राशि मिलने की बात नकार दी।  भटकाते रहे।
शिकायत की तो कहा कि 25 प्रतिशत पैसा देना पड़ेगा
दांगी परिवार ने मामले की शिकायत इंदौर कलेक्टर और सीएमएचओ को की। मुख्यमंत्री हैल्पलाइन पर भी शिकायत (879204) की। इसके बाद पहले अस्पताल मैंनेजमेंट ने कहा कि 25 प्रतिशत राशि काटकर पैसा दे देते हैं। यह राशि कलेक्टर आॅफिस के कर्मचारी रवि को भी देना पड़ती है जो कि मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान का काम देखता है। दांगी परिवार ने नृसिंहगढ़ के विधायक से भी बात कराई लेकिन मनमानी पर आमादा मैनेजमेंट नहीं माना। कलेक्टर के निर्देश पर सीएमएचओ ने पीसी.सेठी हॉस्पिटल के चिकित्सा अधिकारी डॉ. माधव हासानी, जिला स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण अधिकारी  जी.एल.सोढ़ी और जिला मलेरिया अधिकारी डॉ. एम.सी.जिनवाल को जांच की जिम्मेदारी सौंपी। रिपोर्ट में मैनेजमेंट दोषी पाया गया। सीएमएचओ और कलेक्टर ने मैनेजमेंट को राशि दांगी परिवार को देने के निर्देश दिए लेकिन अब तक यह राशि परिवार को नहीं मिली है।
सुबोध जैन की नीयत ही खराब है
हमने भरौसा करके सिनर्जी हॉस्पिटल में ईलाज करवाया था। हमें कहा था कि आप अभी रकम जुटा लो जब पैसा मंजूर होगा हम आपको दे देंगे। पैसा मंजूर हुआ लेकिन अस्पताल ने नहीं दिया। अस्पताल के संचालक सुबोध जैन की दादागिरी इतनी है कि कलेक्टर और सीएमएचओ के आदेश के बाद भी पैसा नहीं मिला है।
रामेश्वर दांगी

मेट्रो की मल्टी पर चला बुलडोजर

दबंग इम्पैक्ट
चार घंटे चली कार्रवाई, बड़ा अवैध निर्माण ध्वस्त
इंदौर.  चीफ रिपोर्टर ।
शहर के रसूखदार बिल्डरों में से एक रमेश मेट्रो ने मप्र भूमि विकास अधिनियम और मास्टर प्लान 2021 के प्रावधानों को नजरअंदाज करके जो अवैध मल्टी बनाई है उस पर गुरुवार को नगर निगम ने रिमूवल कार्रवाई की। सुबह 9 से लेकर दोपहर 1 बजे तक बिल्डिंग पर हथौड़े बरसाए गए। बुलडोजर से अवैध हिस्सा डहाया गया। नेताओं और रसूखदारों की रिकमेंड निगम दस्ते के आगे बिल्कुल नहीं चली। आखिरकार बिल्डर द्वारा 15 दिन में अवैध निर्माण स्वयं द्वारा तोड़े जाने का लिखित आश्वासन मिलने के बाद 15 जून तक का वक्त दिया गया।
नगर निगम का दस्ता 22/1 पागनीसपागा पहुंचा। यहां रमेश, विष्णु और बाला पिता अमरसिंह कछवाह द्वारा मनमाने ढंग से कैसे बी+जी+4 बिल्डिंग बनाई है? इसका खुलासा दबंग दुनिया द्वारा बीते दिनों में लगातार किया जाता रहा। दबंग दुनिया की खबरों का ही असर था कि हरसिद्धि जोन के अधिकारियों ने 27 मई 2017 को कछवाह परिवार को रिमूवल नोटिस जारी कर दिया था। इसी नोटिस में दी गई समयसीमा के अनुसार निगम टीम मौके पर पहुंची और कार्रवाई शुरू कर दी जो कि दोपहर बजे तक चली। इस दौरान मार्जिनल ओपन स्पेस (एमओएस) में किया गया अवैध निर्माण तोड़ा।
नहीं चली नेतागिरी
इस दौरान मेट्रो और उसके भागीदारों ने पूर्व सांसद सज्जनसिंह वर्मा के भतीजे अभय वर्मा से लेकर सत्तापक्ष के एक पार्षद जो कि एमआईसी सदस्य है उनकी भी मदद ली लेकिन बात नहीं बनी। मामले में लगातार निगमायुक्त मनीष सिंह अपडेट लेते रहे।
दो गुना है अवैध निर्माण
दस्तावेजों के अनुसार बात की जाए तो 22/1 पागनीसपागा पर रमेश, विष्णु और बाला पिता  अमरसिंह कछवाह के 13901 के वर्गफीट के प्लॉट पर 30 प्रतिशत ग्राउंड कवरेज के साथ 950 वर्गमीटर (9988 वर्गफीट) बिल्डिंग निर्माण की मंजूरी दी गई थी। जांच अधिकारियों के अनुसार इसके विपरीत कछवाहा परिवार ने तकरीबन 22 हजार वर्गफीट निर्माण किया है।
न एमओएस छोड़ा, न पार्किंग
26 जुलाई 2016 को नगर निगम द्वारा थमाए गए नोटिस ( 846) के अनुसार प्लॉट पर 27 जून 2015 को बिल्डिंग पर्मिशन (1861) जारी हुई थी। इसमें कुल 950 वर्गमीटर निर्माण की अनुमति दी गई थी। नोटिस में अवैध निर्माण का उल्लेख करते हुए बताया कि आगे पार्किंग के स्थान पर दुकानें बढ़ाकर बना दी गई है। साईड में एमओएस में रैंप बनाया गया जो कि मास्टर प्लान 2021 के नियम-76 का उल्लंघन है। इसके अलावा चारों तरफ हेंगिंग करके बिल्डिंग का कवरेज एरिया बढ़ाया गया है। इतना ही नहीं स्वीकृत फ्लोर एरिया रेशो (एफएआर) से अधिक निर्माण किया गया है।
तोड़ लेते हैं तो ठीक, वरना 15 दिन बाद फिर कार्रवाई
मौके पर मौजूद नगर निगम के भवन निरीक्षक जे.पी.सिंह ने बताया कि नगर निगम द्वारा लगातार दिए गए नोटिसों के बाद भी कछवाह परिवार लगातार बिल्डिंग बनाते रहा। मामले की शिकायत आर्थिक अपराध अन्वेशण ब्यूरो (ईओडब्लयू) में भी हुई है जिसके बाद कार्रवाई को अंजाम दिया गया।

Friday, January 20, 2017

झंवर परिवार के हित में उलझी मोर्या हिल्स

सेटेलाइट से दिखता है मोर्या हिल्स पर झंवर का झूठ
जानबÞुझकर फंसाया पेंच, ताकि बाद में बीजी कंपनी को ही मिल जाए जमीन
इंदौर. विनोद शर्मा ।
जिस बीजी कंपनी के खिलाफ प्लॉटधारक अपने हक के लिए बार-बार कलेक्टर और डीआईजी का दरवाजा खटखटा रहे हैं उसने ‘मोर्या हिल्स’ की प्लानिंग ही ऐसी तगड़ी की थी कि लोगों को प्लॉट पाने में पसीने आ जाए। शिकायतकर्ताओं के माध्यम से ‘सरकार’ तक पहुंचे दस्तावेजों के अनुसार कंपनी और उसके सर्वेसर्वा उत्तम झंवर ने सुविधाओं का सब्जबाग दिखाकर कॉलोनी तो काटी लेकिन प्लॉटों की रजिस्ट्री कृषि भूमि के रूप में कर दी।
खजराना के सर्वे नं. 1429/1/1, 1429/1/2 और 1429/1/3 की 133.30 एकड़ जमीन पर बी.जे.कंपनी प्रा.लि. ने मोर्या हिल्स नाम की कॉलोनी 1997 में काटी थी। प्लॉटधारकों को लुभाने के लिए स्वीमिंग पुल, क्लब, बगीचे, लैंडस्केपिंग और 24 घंटे सुरक्षा जैसी सहुलियतें गिनाई। जमीन और जालसाजी की अच्छी समझ रखने के बावजूद शहर के संभ्रांत परिवारों ने झंवर परिवार के भरौसे प्लॉट खरीदे। यही उनकी भूल भी थी जिसकी सजा वे 20 साल से प्लॉट के लिए झंवर बंधुओं और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर भुगत रहे हैं।
इन जमीनों को बांटा
सर्वे नं कुल जमीन (एकड़) प्लॉट (बटांकन)
1429/1/1 44 56
1429/1/2 44 141
1429/1/3 45.30 94
कुल 133.30 291
हर प्लॉट सवा दो करोड़ का
इसमें से एक दर्जन खसरे अब भी बीजी कंपनी प्रा.लि. और झंवर परिवार के नाम ही दर्ज है। 133 एकड़ में बसी इस कॉलोनी का नेट प्लॉट एरिया 78.47 एकड़ था। यदि कंपनी के खसरें जोड़ लें तो भी हर एक प्लॉट 11746 वर्गफीट का है। इतनी जमीन की मौजूदा कीमत 2 करोड़ 34 लाख 92 हजार 461 रुपए है। मतलब 291 प्लॉटों की जमीन का खेल 680.94 करोड़ का है। बाकी 54 एकड़ जमीन अलग।
झंवर परिवार ने ऐसे खेले खेल
-- 1975 के मास्टर प्लान में जमीन का भू-उपयोग आवासीय नहीं था। इसीलिए यहां कॉलोनी की अनुमति नहीं मिल सकती थी। यही वजह थी कि बीजी कंपनी की मोर्यो हिल्स का अनुमोदन भी नहीं हुआ।
-- भू-उपयोग भिन्न होने के कारण मोर्या हिल्स के प्लॉटों का सौदा कृषि भूमि बताकर किया जैसे कि फार्म हाउस के लिए होता है। चूंकि प्लॉट की साइज बढ़ी थी इसीलिए कृषि भूमि या फार्म हाउस बताने में कंपनी को कोई दिक्कत नहीं हुई।
-- तय हुआ था कि कॉलोनी का विकास नए मास्टर प्लान-21 के अनुसार होगा। 2008 में प्लान लागू हो गया। जमीन का भू-उपयोग आवासीय हो गया लेकिन तब तक जमीन के भाव बढ़ चुके थे इसीलिए झंवर परिवार की नियत डोल गई। उन्होंने सोचा कि 11 साल पुरानी प्लानिंग को आगे बढ़ाने से अच्छा से है उसे अटकाए रखना। इसीलिए टीएनसी नहीं कराई।
-- चूंकि टीएनसी हो जाती तो नक्शे में स्कूल, हॉस्पिटल, क्लब हाउस, पार्क प्ले ग्राउंड के रूप में छोड़ी गई 16.89 एकड़ जमीन से कंपनी का अधिपत्य चला जाता। क्योंकि नक्शे के अनुरूप न सिर्फ जमीन छोड़ना पड़ती बल्कि इन सुविधाओं को विकसित करके भी देना पड़ता।
-- आज की स्थिति में पूरी जमीन पर एकीकृत तार फेंसिंग है। झंवर परिवार के अलावा अन्य कोई अंदर नहीं जा सकता।
ऐसे आते हैं पकड़ में
-- कंपनी ने जो नक्शा दिखाकर प्लॉट बेचे थे शिकायतों के साथ वह नक्शा भी कलेक्टर और डीआईजी के पास पहुंच चुका है। नक्शे में कॉलोनी की प्लानिंग साफ नजर आती है।
-- कंपनी ने 1997 में इसी नक्शे के अनुसार मुरम की रोड, डेÑनेज लाइन और बिजली के खम्बे लगाए थे। मौके पर ड्रेनेज लाइन, तिराहो या चौराहों पर बनी रोटरी के साथ ही सड़क भी साफ नजर आती है।
-- इस सड़क को गुगल अर्थ के साथ ही गुगल ट्रेफिक मेप पर भी आसानी से देखा जा सकता है।
-- राजस्व विभाग का जो आॅनलाइन भू-नक्शा है उस पर जमीन के बटांकन और  उनके पास से निकली हुई रोड साफ नजर आती है।
-- कंपनी अब यह समझाने में असमर्थ है कि कृषि भूमि के रूप में बेची गई जमीन पर सड़क, सीवरेज, रोटरी, बिजली के खम्बे और पानी के ओवर हेड टैंक की क्या जरूरत पड़ी थी।
((नीचे वाला हिस्सा कल भी लिया जा सकता है)
यह थी कॉलोनी की प्लानिंग
कुल जमीन 133 एकड़
प्लानिंग एरिया 113.02 एकड़
कनाड़िया रोड में जमीन 3.05 एकड़
नेट प्लानिंग एरिया 109.97 एकड़
प्लॉट एरिया 78.47 एकड़
क्लब हाउस 2.48 एकड़
हॉस्पिटल 1.52 एकड़
स्कूल 1.50 एकड़
पार्क/गार्डन/वॉटर 11.39 एकड़
रोड 14.61 एकड़