Monday, November 10, 2025

धूल से मुक्ति दिलाने की कर दी भूल

हे भगवान ! ये क्या किया...?

दिवाली पर संवरना थी सड़कों की सूरत, 70 प्रतिशत बड़ी सड़कें अब भी बदहाल
निर्माणाधीन फ्लाईओवर की "सर्विस" ले रही शहरवासियों की सांसों की परीक्षा 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
रविवार की सुबह बेमौसम बरसात करके भगवान ने नगर निगम की करी-कराई महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया...। जैसे-तैसे सड़कें उधड़ी थी...चूरी बिखरी थी...धूल का गुबार बनने लगा था...वाहनों की गति थमी थी...कोरोना के बाद से ठंडी पड़ी मास्क की डिमांड ने रफ्तार पकड़ी ही थी...कि अचानक हुई बेमौसम बरसात ने लोगों को फौरी ही सही लेकिन बड़ी राहत दे दी। कमसकम एक-दो दिन तो धूल नहीं उड़ेगी।
 देश के सबसे साफ शहर इंदौर की सड़कों की मौजूदा दशा दिग्विजय शासन की याद दिला रही है जिसे भुनाकर भाजपा ने जनता के दिलों में जगह बनाई थी। एबी रोड पर देवास नाका और सत्यसाईं फ्लाईओवर बन रहे हैं। मेनरोड पर काम जारी है। वहीं सर्विस रोड पूरी तरह बर्बाद है। यही हाल रिंग रोड का है। जहां रेडीसन से लेकर खजराना तक मेट्रो का काम चल रहा है। सड़क पर गड्ढे ज्यादा हैं। धूल उड़ रही है। 
 बायपास की हालत सबसे जुदा है। ये रोड नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की जद में आता है। अब तक एनएचएआई को उसके काम की गति और गुणवत्ता के लिए जाना जाता था लेकिन इंदौर के अफसर इस बार अर्जुन बरौदा, बेस्ट प्राइज, रालामंडल फ्लाईओवर के नाम पर लेटलतीफी का इतिहास रच रहे हैं। जिसका खामियाजा लोगों को धूल और धूल के साथ उड़ती रेती के रूप में चुकाना पड़ रही है। लोर्कापण के कुछ ही महीनों बाद धूलपूर बने राऊ फ्लाईओवर ने गुणवत्ता के गुणगान पर ब्रेक लगा दिया।  
 भरी बरसात में नगर निगम जो पेंचवर्क करने की मशीन लाया था, वह लापता है। कहां के गड्ढे भर रही है, राम जाने। हर बरसात में सड़कें खराब होती है लेकिन दिवाली तक 70 प्रतिशत संवर भी जाती है। यह पहली बार है कि दिवाली के बाद भी 70 प्रतिशत सड़कें खराब है। जहां धूल बड़ी समस्या है इसीलिए जरा भी बेमौसम बरसात होती है और लोग भगवान का धन्यवाद अदा करने लगते हैं।  
सर्विस रोड बाद में बनाने का नया सिस्टम
इंदौर को राजनीतिक-प्रशासनिक नवाचारों की लत लग गई है। इसीलिए तो नवाचार शुरू करते हुए विकास के नाम पर पहले मैन रोड को उखाड़ा जाता है। ट्रेफिक सर्विस रोड पर छोड़ा जाता है। सरकार की इस "सर्विस" से लोगों की "स्लीप" और "सांसों" के साथ गाड़ियों की " सर्विसिंग" सांसत में है। जब विकास पूर हो जाता है और लोगों के लिए सर्विस रोड की जरूरत नहीं रह जाती तब जाकर उसका जीर्णोद्धार शुरू करने की अद्भूत परम्परा इंदौर ने शुरू की।
यूं खराब नहीं हो जाती सड़कें..मेहनत लगती है
इंदौर मालवा में है और मालवा की मिट्टी काली है। काली मिट्टी बरसात होते ही फूलती है और मिट्टी फूलते ही डामर की सड़क में गड्ढे और दरारें आ जाती है...। इंजीनियरों की इन बेहुदा दलिलों और उम्रदराजी के लम्बे दावों ने इंदौर को सीमेंटेड सड़कों का गढ़ बना दिया। ये बात अलग है कि तीन-चार साल बाद ही कांक्रिड की सड़क भी उधड़ने लगी और अफसरों को डामर बिछाकर दरारें छिपाना पड़ी। 
अब ये कोई नहीं समझा पा रहा है कि कांक्रिट की सड़कें कैसे उखड़ी। चलो उखड़ गई तो भी उस पर जो डामर की सड़क बनी वह कैसे उखड़ गई उसके नीचे तो काली मिट्टी भी नहीं थी? जैसे सवालों के जवाबों से बचने के लिए अफसरों ने फ्लाईओवर पर ऐसे काम किए हैं जो जारी सी बरसात में गड्ढे बन जाते हैं। जबकि वहां तो पानी भी नहीं रूकता।

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