Monday, November 10, 2025

जीतू पटवारी

गरीबों का हक जीम गया जीतू

मात्र 30 सेकंड में आग का गोला बन जाती है बस

काले हिरन का शिकार

o भैया बुरा मानो या भला मैं तो चला

प्रभु मेट्रो ही नहीं हमारी सोच नियोजित है

मानवों के खिलाफ मच्छरों का निर्णायक युद्ध

धोखाधड़ी का आदि पालावत निकला कर्जा किंग


चार कंपनियों के नाम से 20 साल में लिया 116 करोड़ का लोन, 104 करोड़ अब भी बाकि
राजस्थान के जोधपुर में भी बैंक की शिकायत पर हुई कोर्ट ने कहा था केस दर्ज करें 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
जोधपुर की सीबीआई कोर्ट के आदेश की जानकारी छिपाकर झूठे शपथ-पत्र से कॉलोनाइजर लाइसेंस लेने वाला विनोद पालावत बैंकों को टोपी पहनाने में भी माहिर है। बुलढाणा अर्बन क्रेडिट सोसाइटी और पंजाब नेशनल बैंक इसके पीडित है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो 2023 से 2023 के बीच 20 साल में पालावत की कंपनियों ने 116 करोड़ से ज्यादा का लोन लिया और चुकाया सिर्फ 12 करोड़ ही। अब भी आधा दर्जन से अधिक बैंका का 100 करोड़ रुपए से ज्यादा पालावत और उनसे जुड़ी कंपनियों पर बकाया है।  
 पालावत ने अपने करियर की शुरुआत लक्ष्मी पाइप्स नाम की कंपनी से की थी। वे लक्ष्मी पाइप्स एंड फिटिंग, सोनिका इंजीनियरिंग और रिद्धि इन्फ्रास्ट्रक्चर छोड़ चुके हैं। इन कंपनियों पर 70 करोड़ से ज्यादा बकाया है। पूरा लोन तब तक ही लिया गया जब तक पालावत डायरेक्टर रहे। अब पालावत जी-9 इन्फ्राटेक, शुभांगी एस्टेट प्रा.लि. और लक्ष्मी लैंड डेवलपर्स में डायरेक्टर हैं। इन कंपनियों पर 34.50 करोड़ रुपए बकाया है। पंजाब नेशनल बैंक ने 25.25 करोड़ का लोन दिया था। ये लोन पालावत की कंपनी लक्ष्मी पाइपस एंड फिटिंग्स प्रा.लि. के नाम पर लिया गया था। इस पैसे की रिकवरी के लिए बैंक को सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई करना पड़ी। जिसे पालावत ने कोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने 10 मार्च 2022 को इसे खारिज कर दिया था।  
 दूसरी तरफ ईओडब्ल्यू पालावत और हरीश चौधरी के बुलढाणा अर्बन क्रेडिट सोसाइटी से कनेक्शन व लोन की प्रक्रिया की जांच कर रहा है। ईओडब्ल्यू के अधिकारियों का कहना है कि बुलढाणा से लोन मिलीभगत से मिला। इसमें हरीश चौधरी ने अहम रोल निभाया। 
इन कंपनियों के नाम पर किया खेल 
लक्ष्मी पाइप्स एंड फीटिंग : 1987 से पंजीबद्ध इस कंपनी को 2003 से 2009 के बीच पंजाब नेशनल बैंक की मनोरमागंज ब्रांच व अन्य शाखाओं से कुल 48.45 कराड़ का लोन मिला था। विभिन्न वेबसाइट्स के अनुसार अब तक इसमें से बमुश्किल 2 करोड़ का लोन चुकाया गया। 11 नवंबर 2011 को पालावत ने कंपनी छोड़ी थी। उनके कंपनी में रहते 48.20 करोड़ का लोन हुआ। उनके कंपनी छोड़ने से ठीक पांच महीने पहले पीएनबी ने 27.50 करोड़ का लोन रिन्यू किया था। अब कंपनी में श्रीचंद अोसवाल और छगनचंद जैन डायरेक्टर हैं। 
सोनिका इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड : ये कंपनी 2009 में बनी। भोपाल के पते पर पंजीबद्ध कंपनी जुलाई 2022 तक डायरेक्टर और एडिशनल डायरेक्टर रहे। 28 अप्रैल 2011 से 20 अगस्त 2016 के बीच कुल इलाहबाद बैंक, बैंक ऑफ बरौदा, चर्चगेट इन्वेस्टमेंट एंड ट्रेडिंग कंपनी और आंध्रा बैंक से कुल 27.13 करोड़ का लेान हुआ है। इसमें से 3.13 करोड़ का लोन ही क्लोज हुआ है जो आंध्रा बैंक से लिया था। बाकि कायम है।  
जी-9 इन्फ्राटेक प्रा.लि. : ये कंपनी 14 दिसंबर 2013 में बनी। एक लाख रुपए की पेडअप और एक लाख रुपाए की अथॉराइज्ड कैपिटल वाली इस कंपनी को 21 दिसंबर 2016 से 16 मई 2022 के बीच बुलडाना अर्बन कोऑपरेटिव सोसाइटी से 20 करोड़ का लोन मिल चुका है। इस कंपनी में विनोद के साथ पंकज चौधरी पार्टनर है जो कि हरीश चौधरी का भाई है। बड़ी बात 21 से 31 दिसंबर 2016 के बीच 10 दिन में ही 7 करोड़ का लोन मिल चुका था।  
लक्ष्मी लैंड डेवलपर्स प्रा.लि : दिसंबर 2007 में कंपनी बनी। 2.5 लाख रुपए की अथॉराइज्ड और पेडअप केपिटल के साथ बनी इस कंपनी को अब तक 24 जुलाई 2008 से लेकर 20 दिसंबर 2023 के बीच 20.77 करोड़ का लोन मिला। जो एचडीएफसी, पीएनबी, ओरिएंट बैंक, रेलीगेयर फिनवेस्ट और बुलढाणा अर्बन क्रेडिट सोसाइटी ने दिया। इसमें से 6.20 करोड़ का लोन क्लोज हो गया। 14.5 करोड़ की बुलढाणा की मेहरबानी कायम है।

स्वीमिंग पूल में धूल ही धूल


प्रगति पथ पर खत्म नहीं हो रहा नेहरू पार्क और अटल पूल के जीर्णोद्धार का सफर 
विश्राम बाग का पूल प्रगति पर, पुष्कर में ही तरण सुविधा
आईडीए का पूल ठेके पर 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
स्वच्छता में आठ साल से नंबर-1 आ रहा इंदौर अद्भूत इंजीनियरिंग, विकास कार्यों की गति और विकास के नाम पर फिजुलखर्ची में भी ऊंचाई छू रहा है। शहर के कई सरकारी मुजस्समें इसका उदाहरण है। हालांकि हम आज बात करेंगे सिर्फ स्वीमिंग पुल की। जो कि सरकारी अनदेखी और हिलाहवाली के कारण मुफलिसी में हैं। 4 करोड़ की लागत से नेहरूपार्क स्वीमिंग पुल का रिनोवेशन शुरू तो हुआ लेकिन निगम समय पर काम पूरा कराने में नाकाम रहा। दूसरी तरफ अटल खेल संकूल में बना स्वीमिंग पुल है जो 20 साल से उद्घाटन के इंतजार में बदहाल है।  
 सबसे पहले बात नेहरू पार्क स्वीमिंग पुल की। 4 करोड़ की लागत से इस पूल का जीर्णोद्धार हो रहा है। भोपाल की कंपनी काम कर रही है। जीर्णोद्धार का मकसद है पूल को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करना है। हालांकि नगर निगम के अधिकारी यह भूल गए कि इंदौर विकास प्राधिकरण पहले ही रिंग रोड पर अंतरराष्ट्रीय मानकों वाला पूल बना चुका है। ये बात अलग है कि अब तक अंतरराष्ट्रीय हुई नहीं। ऐसे में नेहरू पार्क पूल पर इतना पैसा लगाने की जरूरत तो नहीं थी। थोड़ी-बहुत साज-सजावट हो जाती, पूल संवर जाता। खैर, काम शुरू हुआ ठीक है, अप्रैल 2025 तक खत्म होना था लेकिन कार्य लगातार प्रगति पर ही है।   
 शनिवार को महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मौके पर पहुंचकर कंपनी के कर्मचारियों की खिंचाई की। काम जल्दी पूरा करने को कहा है। जब भार्गव मौके पर पहुंचे तो देखा कि टाइल्स लगाने में मनमानी की जा रही है। इससे पहले एमआईसी सदस्य नंदकिशोर पहाड़िया भी कंपनी की क्लास लगा चुके हैं लेकिन कंपनी को सबक नहीं मिला।  
20 साल से तैराकों का इंतजार है... 
स्कीम-78 में बड़ा भारी अटल खेल संकूल बना है। इस संकूल में 2005-06 में इस परिसर में 3800 वर्गफीट का स्वीमिंग पूल बनाया था। तब तकरीबन 65 लाख रुपए की लागत से बने इस स्वीमिंग पूल के साथ चैंजिंग रूम और खिलाड़ियों ठहरने के लिए भी कमरे बने थे। मौजूदा सभापति मुन्नालाल यादव जब वार्ड 10 के पार्षद थे तब ये बना था। इसके बाद एक बार और पार्षद रह लिए। इससे पहले उनके खास छाया देशमुख, जितेंद्र बुंदेला भी पार्षद रह लिए। अभी राजेंद्र राठौर जैसे कद्दावर पार्षद हैं लेकिन पूल की दशा है कि सुधरती नहीं। 2022 में निकाय चुनाव से पहले आप नेताओं ने प्रदर्शन करके स्वीमिंग पूल चालू करने की मांग की थी। अब भी हालात यह है कि बरसात का पानी ही जमा मिलता है। उसे निकालने की भी व्यवस्था नहीं है। 
जल्द मिलेंगे दोंनों पूल 
नेहरू पार्क और अटल पूल का जीर्णोद्धार जारी है। जल्द ही अत्याधुनिक सुविधाओं से लेस पूल तैयार हो जाएंगे। अन्य खेल गतिविधियों का भी विस्तार होगा। कंपनियों को स्पष्ट कर दिया है काम में गति लाएं। 
राजेंद्र राठौर, प्रभारी 
जनकार्य 
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महू नाका पूल में मनमानी 
महू नाका पर जो तरण पुष्कर है। जो 1969 में बना था। महू नाका पर जो फ्लाईओवर बनना है पुल उसके अलाइनमेंट में आ रहा है। इसीलिए उसके टुटने की संभावना बढ़ गई है। पूर्व महापौर मालिनी गौड़ और आयुक्त प्रतिभा पाल इसकी विधिवत घोषणा कर चुके थे। इस पुल पर पिछले दिनों ही रंगाई-पुताई पर खर्च हुआ है। यहां 800 लोग रोज स्वीमिंग के लिए आते हैं। एक व्यक्ति 1240 रुपए महीने देता है। पूल ने हाल ही में उत्तराखंड में संपन्न हुई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में 2 मैडल दिए हैं।  
आराम से बन रहा है विश्राम पूल 
2018 में विश्राम बाग में अंतराष्ट्रीय स्तर के स्वीमिंग पूल का काम शुरू हुआ था जो अब तक पूरा नहीं हुआ है। काम आराम से चल रहा है। 50 मीटर लंबे व 25 मीटर चौड़े इनडोर स्विमिंग पूल में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं कराए जाने के दावे किए जाते रहें हैं लेकिन यहां एक ही पूल बना है। एक पूल छोटा है, जिसमें घुटने तक भी पैर नहीं डूबेंगे। इसीलिए इसे फ़ेडरेशन इंटरनेशनेल डी नैटेशन ( फिना) की मान्यता प्राप्त होना मुश्किल है। जैसी कि आईडीए के स्वीमिंग पूल को मिली है।

धूल से मुक्ति दिलाने की कर दी भूल

हे भगवान ! ये क्या किया...?

दिवाली पर संवरना थी सड़कों की सूरत, 70 प्रतिशत बड़ी सड़कें अब भी बदहाल
निर्माणाधीन फ्लाईओवर की "सर्विस" ले रही शहरवासियों की सांसों की परीक्षा 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
रविवार की सुबह बेमौसम बरसात करके भगवान ने नगर निगम की करी-कराई महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया...। जैसे-तैसे सड़कें उधड़ी थी...चूरी बिखरी थी...धूल का गुबार बनने लगा था...वाहनों की गति थमी थी...कोरोना के बाद से ठंडी पड़ी मास्क की डिमांड ने रफ्तार पकड़ी ही थी...कि अचानक हुई बेमौसम बरसात ने लोगों को फौरी ही सही लेकिन बड़ी राहत दे दी। कमसकम एक-दो दिन तो धूल नहीं उड़ेगी।
 देश के सबसे साफ शहर इंदौर की सड़कों की मौजूदा दशा दिग्विजय शासन की याद दिला रही है जिसे भुनाकर भाजपा ने जनता के दिलों में जगह बनाई थी। एबी रोड पर देवास नाका और सत्यसाईं फ्लाईओवर बन रहे हैं। मेनरोड पर काम जारी है। वहीं सर्विस रोड पूरी तरह बर्बाद है। यही हाल रिंग रोड का है। जहां रेडीसन से लेकर खजराना तक मेट्रो का काम चल रहा है। सड़क पर गड्ढे ज्यादा हैं। धूल उड़ रही है। 
 बायपास की हालत सबसे जुदा है। ये रोड नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की जद में आता है। अब तक एनएचएआई को उसके काम की गति और गुणवत्ता के लिए जाना जाता था लेकिन इंदौर के अफसर इस बार अर्जुन बरौदा, बेस्ट प्राइज, रालामंडल फ्लाईओवर के नाम पर लेटलतीफी का इतिहास रच रहे हैं। जिसका खामियाजा लोगों को धूल और धूल के साथ उड़ती रेती के रूप में चुकाना पड़ रही है। लोर्कापण के कुछ ही महीनों बाद धूलपूर बने राऊ फ्लाईओवर ने गुणवत्ता के गुणगान पर ब्रेक लगा दिया।  
 भरी बरसात में नगर निगम जो पेंचवर्क करने की मशीन लाया था, वह लापता है। कहां के गड्ढे भर रही है, राम जाने। हर बरसात में सड़कें खराब होती है लेकिन दिवाली तक 70 प्रतिशत संवर भी जाती है। यह पहली बार है कि दिवाली के बाद भी 70 प्रतिशत सड़कें खराब है। जहां धूल बड़ी समस्या है इसीलिए जरा भी बेमौसम बरसात होती है और लोग भगवान का धन्यवाद अदा करने लगते हैं।  
सर्विस रोड बाद में बनाने का नया सिस्टम
इंदौर को राजनीतिक-प्रशासनिक नवाचारों की लत लग गई है। इसीलिए तो नवाचार शुरू करते हुए विकास के नाम पर पहले मैन रोड को उखाड़ा जाता है। ट्रेफिक सर्विस रोड पर छोड़ा जाता है। सरकार की इस "सर्विस" से लोगों की "स्लीप" और "सांसों" के साथ गाड़ियों की " सर्विसिंग" सांसत में है। जब विकास पूर हो जाता है और लोगों के लिए सर्विस रोड की जरूरत नहीं रह जाती तब जाकर उसका जीर्णोद्धार शुरू करने की अद्भूत परम्परा इंदौर ने शुरू की।
यूं खराब नहीं हो जाती सड़कें..मेहनत लगती है
इंदौर मालवा में है और मालवा की मिट्टी काली है। काली मिट्टी बरसात होते ही फूलती है और मिट्टी फूलते ही डामर की सड़क में गड्ढे और दरारें आ जाती है...। इंजीनियरों की इन बेहुदा दलिलों और उम्रदराजी के लम्बे दावों ने इंदौर को सीमेंटेड सड़कों का गढ़ बना दिया। ये बात अलग है कि तीन-चार साल बाद ही कांक्रिड की सड़क भी उधड़ने लगी और अफसरों को डामर बिछाकर दरारें छिपाना पड़ी। 
अब ये कोई नहीं समझा पा रहा है कि कांक्रिट की सड़कें कैसे उखड़ी। चलो उखड़ गई तो भी उस पर जो डामर की सड़क बनी वह कैसे उखड़ गई उसके नीचे तो काली मिट्टी भी नहीं थी? जैसे सवालों के जवाबों से बचने के लिए अफसरों ने फ्लाईओवर पर ऐसे काम किए हैं जो जारी सी बरसात में गड्ढे बन जाते हैं। जबकि वहां तो पानी भी नहीं रूकता।

'सरकार' के हटते ही तोड़फोड़ बंद

फिर अटकी बीआरटीएस की बिदाई

आज आएंगे एजेंसी मालिक, जानेंगे काम क्यों बंद हुआ
इंदौर. विनोद शर्मा । बीआरटीएस तोड़ने के लिए नगर निगम को एजेंसी भी अपने जैसी ही मिली है। जैसे नगर निगम के कर्मचारियों से कोई काम लेना है तो उनके सामने खड़े रहना जरूरी है। जैसे ही आप हटे, निगमकर्मी फुर्र। ऐसे ही खुजनेर की एजेंसी ने रविवार को तब तक ही बीआरटीएस का तोड़ा जब तक जनप्रतिनिधि और मीडिया के लोग वहां खड़े थे। जैसे ही सब गए, वैसे ही काम बंद। 
 बीआरटीएस हटाने को लेकर नगर निगम कितना गंभीर है? इसका अंदाजा हाईकोर्ट के आदेश और काम शुरू होने के बीच के नौ महीनों की गेप से लगाया जा सकता है। बीआरटीएस तोड़ने का ठेका दिनेश यादव 'बाबा' ने लिया है। जो खुजनेर के ठेकेदार हैं। इतना ही नहीं खजुनेर विधायक अमरसिंह यादव के भांजे भी हैं। दिनेश यादव एंड कंपनी ने देव उठनी ग्यारस पर जीपीओ से बीजेपी कार्यालय के बीच उस हिस्से को तोड़ना शुरू कर दिय था जहां हाईकोर्ट से मिले आदेश के तत्काल बाद नगर निगम ने रैलिंग हटा दी थी।
 महापौर पुष्यमित्र भार्गव और जनकार्य समिति प्रभारी राजेंद्र राठौर के साथ ही शहर के 50 से ज्यादा मीडियाकर्मी तोड़ार्पण के साक्षी बने थे। हालांकि जैसे ही सब गए, काम बंद हो गया। इसीलिए रविवार को जीपीओ से लेकर पीसी सेठी हॉस्पिटल के सामने के हिस्से को ही तोड़ा गया। चार दिन हो चुके हैं। काम क्यों बद है? किसी को नहीं पता। 
 प्रदेश में चल रहे यदुकाल में दिनेश यादव एंड कंपनी से सवाल करने की हिमाकत करे भी कौन? इसीलिए किसी ने ये पूछा ही नहीं कि आखिर काम बंद क्यों हैं। हिंदुस्तान मेल ने दिनेश यादव से बात की। उन्हें ये तो पता था कि काम बंद है लेकिन काम क्यों बंद है, नहीं पता था। उन्होंने कहा कि मैं अभी खुजनेर हूं। गुरूवार को इंदौर आऊंगा। तब पता करूंगा कि आखिर काम बंद क्यों है? 
'सरकार' मौके पर होंगे, तभी हटेगी रैलिंग 
बीआरटीएस पर तोड़ार्पण बंद होने से शहर की आवाम नाराज है। लोगों का कहना है कि कंपनी शायद तभी काम करेगी जब 'सरकार' मौके पर खड़े होंगे। इसीलिए शहर के सभी जनप्रतिनिधियों को अपनी ड्यूटी डिसाइड कर लेना चाहिए ताकि कॉरिडोर जल्द से जल्द टूटे। 
ऐसे कितने दिन लगेंगे.... 
- 21 नवंबर 2024 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि बीआरटीएस हटेगा। 
- 27 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बीआरटीएस तोड़ने के आदेश दिए थे।  
- 27 फरवरी 2025 की इसी रात को जनप्रतिनिधियों ने बीआरटीएस की रैलिंग हटाना शुरू कर दी।  
- जीपीओ से लेकर बीजेपी कार्यालय तक की रैलिंग हटी। फिर काम रूक गया। 
- फरवरी से लोग कॉरिडोर हटने का इंतजार करते रहे। काम दोबारा शुरू हुआ 1 नवंबर को। 
- कुल 11.500 किलोमीटर लम्बा है कॉरिडोर। इसमें से फ्लाईओवर निर्माण के कारण 2.5 किलोमीटर हिस्से की रैलिंग हट चुकी है। 9 किमी रैलिंग हटना है। स्टेशन टूटना है। गति यही रही तो टूट फुट में ही सालभर लग जाएगा।

3.25 करोड़ ट्रांसफर, सुविधाओं के नाम पर िगना रहे हैं संकट

माहेश्वरी ट्रस्ट ने कॉलेज को बनाया कमाई का जरिया 

जिम्नेशियम-कैफेटेरिया सिर्फ ब्रोशर में ही, स्टूडेंट्स ने डिमांड की, जवाब मिला जहां है वहां एडमिशन ले लो 
इंदौर. विनोद शर्मा । 
77 से 4700 स्टूडेंट्स तक का सफर तय करने वाला आरपीएल माहेश्वरी कॉलेज इन दिनों माहेश्वरी ट्रस्ट की मनमानियों की मार झेल रहा है। कॉलेज को ट्रस्ट अपनी कमाई का जरिया बना चुका है। इसीलिए तो 2025 के 10 महीनों में कॉलेज के अकाउंट से ट्रस्ट ने 3.25 करोड़ रुपए अपने अकाउंट में ट्रांसफर किए हैं। अब तंगी का बहाना बनाकर कॉलेज में जिम्नेशियम और कैफेटेरिया बनाने को तैयार नहीं है। उलटा, जो स्टूडेंट्स आवाज उठाते हैं, उन्हें कहा जाता है जिन्हें जिम्नेशियम चाहिए वे दूसरे कॉलेज में एडमिशन ले लें। 
 कॉलेज में अकेडमिक स्टाफ और मैनेजमेंट के बीच तनातनी जारी है। जिसका खामियाजा स्टूडेंट्स और कॉलेज चुका रहे हैं। बताया जा रहा है कि एक दर्जन से अधिक स्टूडेंट्स टीसी निकाल चुके हैं जिन्होंने जुलाई में ही एडमिशन लिया था। इसमें कई फस्र्ट ईअर में हैं। जिस कॉलेज ने अपने पैसों से कॉलेज परिसर में स्कूल की बिल्डिंग बनवा दी, उसे अचानक किसकी नजर लग गई? इसका जवाब है पुरुषोत्तमदास पसारी। ट्रस्ट मैदान के सबसे बड़े खिलाड़ी कहलाने वाले पसारी दो साल पहले ही माहेश्वरी के ट्रस्ट के अध्यक्ष बने हैं। 
 उन्होंने अध्यक्ष बनने के बाद ही कॉलेज के प्रेसिडेंट रामअवतार जाजू के माध्यम से कॉलेज के खाते से 3.25 करोड़ रुपया ट्रस्ट के अकाउंट में ट्रांसफर करा लिया। इसके लिए न कोई प्रस्ताव पास हुआ। न ये बताया गया कि इस रकम का ट्रस्ट क्या करेगा? ट्रस्ट ने इसके पहले भी कॉलेज के अकाउंट से बतौर लोन पैसा लिया था। जिसका जिक्र अकाउंट सेक्शन में है। इस बार ऐसे किसी कारण का उल्लेख नहीं है। 
नियमों के खिलाफ है फंड ट्रांसफर
कॉलेज आरपीएल माहेश्वरी विद्यालय ट्रस्ट द्वारा संचालित है। ये ट्रस्ट फर्म एंड सोसाइटी में पंजीबद्ध है। इसके बायलॉज के अनुसार कॉलेज के फंड को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।  
विश्वविद्यालय परिनियम कॉलेज कोड 28 के तहत कॉलेज का पैसा उसकी फाउंडेशन सोसाइटी भी नहीं ले सकती। पैसे का उपयोग कॉलेज में शैक्षणिक सुविधाओं के विस्तार और स्टाफ के नियमित वेतन पर खर्च होना चाहिए।  
ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एज्यूकेशन (एआईसीटीई) कॉलेजों को मान्यता देती है। उसके द्वारा एडमिशन एंड फीस रेग्यूलेटरी कमेटी(एएफआरसी) बनती है जिसके तहत कॉलेज का पैसा ट्रांसफर नहीं हो सकता।  
सभी संस्थाओं के साथ धोखा 
इन सभी जगह कॉलेज के अध्यक्ष या ट्रस्ट को शपथ-पत्र के साथ लिखकर देना पड़ता है कि वह भविष्य में इन संस्थाओं के नियमों का पालन करेगा? वहीं माहेश्वरी काॅलेज के पैसे का मनमाना उपयोग करके माहेश्वरी ट्रस्ट सभी के मापदंडों का उल्लंघन कर रहा है। 
कॉलेज की साख गिरने लगी है...
काॅलेज में स्टूडेंट्स की संख्या 2021-22 में बढ़बर 4700 तक पहुंच गई है जो कि फिर से 3100 तक आ गई है। इसका असर कॉलेज की कमाई पर भी पढ़ेगा। जो 5.25 करोड़ तक पहुंच गई थी। 
विगत कई दिनों से कॉलेज की नकारात्म्क खबरों से स्टूडेंट्स के साथ ही फेकल्टी भी टेंशन में है। मैनेजमेंट लगातार नोटिस पर नोटिस दे रहा है, ताकि फाइल मजबूत हो जाए, उसी के आधार पर फेकल्टी की छूट्‌टी की जा सके।  
(मामले में कॉलेज के अध्यक्ष रामअवतार जाजू से हिंदुस्तान मेल ने उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उन्होंने आधी बात सुनकर फोन काट दिया।)

पसारी के प्रताप से पसर गए स्कूल


आरके डागा और बीडी तोषनीवाल स्कूल बंद
ताला लगाने में माहिर है शैक्षणिक संस्थाओं का ट्रस्टमैन
इंदौर. विनोद शर्मा ।  
माहेश्वरी ट्रस्ट की कमान जब से पुरुषोत्तम दास पसारी को सौंपी गई है आरपीएल माहेश्वरी कॉलेज की उलटी गिनती शुरू हो गई। कॉलेज की अच्छी-भली व्यवस्था को बिगाड़ने में पसारी माहिर है। उनकी इसी अदा ने उनका श्री व्यंकटेश्वर टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट कॉलेज बंद करा दिया। अब बारी माहेश्वरी कॉलेज की है, जो इन दिनों अकेडमिक स्टाफ और मैनेजमेंट के कलेश का केंद्र बना हुआ है।  
 पुरुषोत्तम पसारी दो साल पहले आरपीएल माहेश्वरी विद्यालय ट्रस्ट के अध्यक्ष बने थे। उनके अध्यक्ष रहते ट्रस्ट द्वारा संचालित आरके डागा स्कूल और बीडी तोषनीवाल स्कूल बंद हो चुके हैं। दो साल पहले जब पसारी अध्यक्ष बने थे, तब ही बीडी तोषनीवाल स्कूल का 26वां व आखिरी वार्षिकोत्सव हुआ था। 1997 से 2011 के बीच पसारी इसी स्कूल की वर्किंग कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं।  
  राधाकृष्ण (आरके) डागा स्कूल की भी यही कहानी है। ये स्कूल 2004 में शुरू हुआ था। इंदौर के श्रेष्ठ स्कूलों में से एक रहा है ये स्कूल। 2024-25 के शिक्षा सत्र तक ये स्कूल भी अच्छा चला। आए दिन बेहतर परिणाम और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सुर्खियों में रहा। अब स्कूल की इस इमारत का उपयोग ट्रस्ट ऑफिस की तौर पर किया जा रहा है। दाेनों ही स्कूल में तकरीबन 1200 स्टूडेंट्स पढ़ाई करते थे।